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बिहार में मजदूरी मांगने पर हिंसा, उठते सवाल

चंदेश्वर चौधरी के परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों ने ग्रामीण समाज में पीढ़ियों से चले आ रहे श्रम-संबंधों और शोषण पर भी सवाल खड़े किए। यदि कोई मजदूर बेहतर मजदूरी पाने के लिए दूसरे व्यक्ति के यहां काम करने का निर्णय लेता है, तो यह उसका अधिकार है। बता रहे हैं अशोक कुमार चंद्रवंशी

बिहार के नालंदा और रोहतास जिले से सामने आईं दो घटनाएं हमारे समाज और शासन व्यवस्था के सामने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा करती हैं। क्या एक मजदूर को अपनी मेहनत का पैसा मांगने का भी अधिकार सुरक्षित नहीं है? क्या गरीब और कमजोर तबकों के लोगों को अपनी मजदूरी मांगने की कीमत कभी गोली खाकर, तो कभी खौलते तेल में झुलसकर अपनी जान देकर चुकानी पड़ेगी?

यह दोनों घटनाएं केवल दो व्यक्तियों की हत्या या दो आपराधिक विवादों तक सीमित नहीं हैं। इनके भीतर श्रम के अपमान, आर्थिक असमानता, सामाजिक वर्चस्व, भय और कानून के अप्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े अनेक प्रश्न छिपे हैं। जब किसी मजदूर की मेहनत की कमाई मांगने पर उसके साथ कथित तौर पर ऐसी बर्बरता होती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संविधान द्वारा घोषित समानता और गरिमा का अधिकार समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक आखिर कब पहुंचेगा?

नालंदा में मजदूरी मांगने पर खौलते तेल की कड़ाही में धकेलने का आरोप

नालंदा जिले के नूरसराय थाना क्षेत्र के दरुआरा बेलदारी गांव में बीते 4 अक्टूबर, 2026 को घटित घटना 12 अक्टूबर, 2026 को प्रकाश में आई। इस खबर ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया। लगभग 30 वर्षीय कामो चौहान ब्रह्मभोज के अवसर पर हलवाई के काम में सहयोग करने गए थे। परिजनों के अनुसार, 4 अक्टूबर को काम समाप्त होने के बाद जब उन्होंने अपनी मजदूरी मांगी, तो विवाद हुआ। आरोप है कि उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें खौलते तेल की कड़ाही में धकेल दिया गया। गंभीर रूप से झुलसे कामो चौहान को कई दिनों तक उपचार के लिए पहले बिहारशरीफ अस्पताल ले जाया गया, उसके बाद पटना के राजेंद्र मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अस्पताल ले जाया गया। आखरी समय में पटना स्थित निजी अस्पताल में ले जाया गया, जहां 12 अक्टूबर, 2026 को उनकी मृत्यु हो गई।

अबतक प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस आरोपित व्यक्तियों की तलाश में छापेमारी कर रही है। जबकि घटना को अंजाम देने के मामले में मुख्य रूप से दिलीप एवं राजा नामक व्यक्ति आरोपित हैं। मामले को रफा-दफा करने व कराने में मुख्य भूमिका पंचायत के वर्तमान मुखिया मणिशंकर गुप्ता उर्फ सोनू सुल्तान का नाम सामने आया है। मुखिया ने अपने ग्राम पंचायत के लेटर पैड पर घायल मजदूर कामो चौहान से इलाज कराने की गारंटी देते हुए जान बचाने का सौदा कुल 2 लाख 65 हजार में तय कर दी और इलाज के बहाने घायल मजदूर से पंचायत के मुखिया ने घटना का सारा दारोमदार पीड़ित के ऊपर खुद ले लेने की बात पर सहमत करा लिया। एक कहावत है– मरता क्या नहीं करता – की तर्ज पर इलाज के लिए तड़प रहे कामो चौहान ने अपने जीवन को बचाने के लिए बेहतर इलाज कराने के वास्ते उन्होंने पंचायत के मुखिया की शर्त को स्वीकार कर लिया।

नालंदा जिले के नूरसराय इलाके के दरुआरा बेलदारी गांव के निवासी कामो चौधरी के रोते-बिलखते परिजन

यहां प्रश्न केवल मजदूरी की राशि का नहीं है। प्रश्न यह है कि मेहनत करने वाला व्यक्ति जब अपने श्रम का पारिश्रमिक मांगता है, तो उसके साथ हिंसा करने का दुस्साहस कहां से पैदा होता है? यदि आरोप जांच में सही साबित होते हैं, तो यह एक मामूली विवाद नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और जीवन के अधिकार पर भयावह हमला है। हालांकि ऐसे हमले आए दिन बिहार के विभिन्न जिलों में घटित होती रहती हैं।

रोहतास : मजदूरी और काम बदलने के विवाद में चंदेश्वर चौधरी की हत्या

इससे पहले अगस्त, 2026 में रोहतास जिले के दिनारा थाना क्षेत्र के जोगिया गांव में चंदेश्वर चौधरी की हत्या का मामला सामने आया था। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 60 वर्ष के चंदेश्वर चौधरी को 5 अगस्त, 2026 को गोली मारे जाने की घटना हुई। इस मामले में मजदूरी, पुराने बकाये और दूसरे नियोक्ता के यहां काम करने को लेकर विवाद की बात सामने आई। पुलिस की जांच से संबंधित खबरों में बताया गया कि उनका शव बाद में बक्सर जिले की एक नहर से बरामद किया गया। इस हत्याकांड के सिलसिले में अजीत तिवारी की गिरफ्तारी की खबर भी प्रकाशित हुई। घटना के बाद गांव में हिंसा और आगजनी हुई, जिसके कारण पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था बढ़ानी पड़ी तथा सीआईडी को जांच सौंपी गई।

चंदेश्वर चौधरी के परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों ने ग्रामीण समाज में पीढ़ियों से चले आ रहे श्रम-संबंधों और शोषण पर भी सवाल खड़े किए। यदि कोई मजदूर बेहतर मजदूरी पाने के लिए दूसरे व्यक्ति के यहां काम करने का निर्णय लेता है, तो यह उसका अधिकार है। किसी व्यक्ति या परिवार को किसी खास नियोक्ता के यहां काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

मजदूर का श्रम किसी की निजी जागीर नहीं है। उसके श्रम पर उसका अपना अधिकार है। यदि मजदूरी का बकाया है, तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि धमकी, मारपीट या जानलेवा हिंसा से।

किसी व्यक्ति की हत्या का विरोध करते हुए भी किसी के घर, वाहन या संपत्ति को गैरकानूनी तरीके से नुकसान पहुंचाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। कानून का राज तभी स्थापित होगा, जब हत्या के आरोपों की जांच भी निष्पक्ष हो और उसके बाद हुई हिंसा के मामलों में भी कानून समान रूप से लागू हो।

दो घटनाएं, और सवाल कि क्या ग्रामीण बिहार में सामंती मानसिकता अब भी कायम है?

नालंदा और रोहतास की घटनाओं को एक साथ देखने पर ग्रामीण बिहार में श्रम, आर्थिक शक्ति और सामाजिक वर्चस्व के संबंधों पर गंभीर बहस की जरूरत दिखाई देती है। बिहार ने सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों की भागीदारी और लोकतांत्रिक चेतना के क्षेत्र में लंबा संघर्ष देखा है। फिर भी ग्रामीण समाज के कुछ हिस्सों में आर्थिक रूप से निर्भर मजदूरों और प्रभावशाली लोगों के बीच शक्ति का असमान संतुलन बना हुआ हो सकता है। जहां किसी मजदूर की आजीविका किसी शक्तिशाली व्यक्ति पर निर्भर हो, वहां मजदूरी मांगना, काम बदलना या अपने अधिकार की बात करना उसके लिए जोखिमपूर्ण बन सकता है।

सामंती मानसिकता का मूल केवल जमीन का स्वामित्व नहीं, बल्कि यह धारणा भी है कि आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर व्यक्ति को बराबरी का अधिकार नहीं है। ऐसी मानसिकता तब दिखाई देती है, जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके पास धन, जमीन, जातिगत प्रभाव, ऊंची राजनीतिक संपर्क या पुलिस प्रशासन तक पहुंच होने के कारण वह दूसरों के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है।

हालांकि, केवल इन दोनों घटनाओं के आधार पर पूरे बिहार या किसी एक जाति के सभी लोगों के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन यह तो साफ है कि अपराध की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि जहां किसी घटना में सामाजिक वर्चस्व, जातिगत भेदभाव या आर्थिक शोषण की भूमिका सामने आए, वहां प्रशासन उन पहलुओं की अनदेखी न करे।

साथ ही यह भी कि सामाजिक न्याय का अर्थ केवल सत्ता और पदों में प्रतिनिधित्व नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति बिना भय के अपनी मजदूरी मांग सके, अपना पेशा चुन सके और अपनी बात पुलिस तथा प्रशासन के सामने रख सके।

संविधान की कसौटी पर मजदूर की गरिमा

भारत का संविधान प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने की बुनियादी सुरक्षा प्रदान करता है। नालंदा और रोहतास की घटनाओं को इसी संवैधानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ गंभीरता से देखे जाने की जरूरत है। मसलन, अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता – किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, जाति, सामाजिक प्रभाव या राजनीतिक संपर्क के कारण कानून के व्यवहार में भेदभाव नहीं होना चाहिए। वहीं अनुच्छेद 21 कहता है कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है; इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का व्यापक संवैधानिक महत्व भी शामिल है। जबकि अनुच्छेद 23 बेगार और अन्य प्रकार के बलात् श्रम का निषेध का प्रावधान करता है। यह अनुच्छेद बलात् श्रम के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा देता है। किसी विशिष्ट मामले में इसका लागू होना संबंधित तथ्यों और कानून की कसौटी पर निर्भर करेगा।

इसी तरह अनुच्छेद 39 के नीति-निदेशक सिद्धांत के तहत राज्य से अपेक्षा की गई है कि उसकी नीतियां नागरिकों के स्वास्थ्य और शक्ति के दुरुपयोग को रोकने तथा श्रमिकों के लिए मानवीय परिस्थितियों को बढ़ावा देने की दिशा में हों।

इन संवैधानिक प्रावधानों का व्यावहारिक अर्थ यह है कि मजदूर को भयमुक्त वातावरण मिलना चाहिए, उसके श्रम का उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित होना चाहिए और किसी भी हिंसक हमले की स्थिति में उसे निष्पक्ष न्याय प्राप्त होना चाहिए। साथ ही, जहां जातिगत अपमान या अनुसूचित जाति के सदस्य के विरुद्ध उसकी जाति के कारण अपराध के विशिष्ट तथ्य मौजूद हों, वहां अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम सहित लागू विशेष कानूनों की प्रासंगिकता की जांच की जानी चाहिए।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अशोक कुमार चंद्रवंशी

लेखक पटना उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं

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