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पश्चिमी राजस्थान में जमींदार और खेतिहर मजदूरों का हाल

अगर जमींदार के घर में चाय बनी है और बटाईदार के पास खुद का बर्तन नहीं है और न ही जमींदार के पास बटाईदार के लिए अलग बर्तन हो तो उसे कई बार चाय से वंचित रहना होता है या फिर उसे आक के पौधे के पत्ते के दोने में चाय पीनी होती है। बता रहे हैं जितेंद्र मेघवाल

पश्चिमी राजस्थान में जमींदार वर्ग और खेतिहर मजदूर (जिनमें अधिकतर दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लोग शामिल हैं) के बीच विषम भूमि-स्वामित्व संबंध मौजूद है। पश्चिमी राजस्थान के थार मरुस्थल की अधिकांश जागीरें तथाकथित राजपूत अभिजात वर्ग और अन्य उच्च कुलों के अधीन हैं। ऐतिहासिक रूप से निम्न जातियों के मजदूरों और छोटे किसानों का बड़े जमींदारों और उच्च जातियों के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष रहा है। आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन कानूनों के लागू होने से स्थिति में कुछ बदलाव आए, लेकिन आज भी बड़ी-बड़ी जोत वाले भूस्वामी और भूमिहीन कृषि मजदूर हैं। पश्चिमी राजस्थान (जैसे जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर) में कम बारिश और सूखे की स्थिति के कारण खेती अनिश्चित हो गई है। फसल नष्ट होने पर इसका सबसे बड़ा आर्थिक बोझ छोटे और बटाईदार (आधियार) किसानों पर पड़ता है।

उच्च वर्गों की जमीनों पर बटाईदार के रूप में काम करने वाले लोगों में सामाजिक रूप से शोषित और दमित तबका सबसे ज्यादा है। तथाकथित उच्च जातियों के खेतों पर बटाईदार के रूप में काम करते समय उनके साथ पदानुक्रम या श्रेणीक्रम के सोपान के अनुसार व्यवहार किया जाता है। खेतिहर मजदूर और भूमिहीन किसान जमीन की जुताई, बुवाई और कटाई जैसे कठिन कार्यों में पूरे वर्ष लगे रहते हैं। श्रम आधारित सभी काम उन्हें ही करने पड़ते हैं। लेकिन खेतों में इनके साथ जो व्यवहार होता है, वह मनु के सामाजिक नियमों जैसा है। जब आजिविका के लिए यह लोग उच्च वर्गों के खेतों में किरायेदार या बटाईदार के रूप में काम करते हैं तब इनके साथ ‘भू-दास’ या ‘कृषि-दास’ की तरह व्यवहार किया जाता है। उन्हें कई बार लोग अपने बर्तन में खाना-पानी नहीं देते। तथाकथित उच्च वर्गों के खेतों में पुराने झोपड़ों और बाड़ पर इनके लिए अलग से बर्तन रखे होते हैं। खेतों में यह खेतिहर मजदूर अपने लिए अलग झोपड़-पट्टी बना कर रहते हैं। वे जमींदार के घर में नहीं जा सकते हैं। अगर जाते भी हैं तो घर के मुख्य द्वार पर हाथ जोड़कर एक कोने में बैठे रहते हैं।

अगर जमींदार के घर में चाय बनी है और बटाईदार के पास खुद का बर्तन नहीं है और न ही जमींदार के पास बटाईदार के लिए अलग बर्तन हो तो उसे कई बार चाय से वंचित रहना होता है या फिर उसे आक के पौधे के पत्ते के दोने में चाय पीनी होती है। हालांकि प्रत्येक जमींदार के खेत पर ऐसा नहीं होता, लेकिन अधिकांश पुराने ख्यालातों वालें दकियानूसी और सामंती सोच के जमींदार आज भी बटाईदारों के साथ यह व्यवहार करते हैं।

बटाईदारों के साथ इस व्यवहार के अलावा महिलाओं के साथ भी बहुत दकियानूसी व्यवहार किया जाता है। महिलाएं अपना या जमींदार के घर के काम के अलावा खेत का काम करती हैं, लेकिन उन्हें या उनके काम को आधिकारिक तौर पर ‘श्रमिक’ या ‘किसान’ के रूप में मान्यता नहीं मिलती। महिलाओं के काम के घंटे यहां 16 से 18 घंटे होते हैं, लेकिन उनके काम को हमेशा कम आंका जाता है, चाहे यह उनके खुद के आदमी हो या फ़िर जमींदार। कई बार जमींदार भी सहानुभूति देने के लिए महिलाओं के काम को मान्यता देते हैं, लेकिन बटाईदारों के समूह या उनका परिवार औरत के काम को ‘काम’ नहीं समझता। राजस्थान में खेती में महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति (लगभग 78 प्रतिशत) होने के बावजूद जमीन के कागजों में उनका मालिकाना हक काफी कम लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है। महिलाओं के काम को तो केवल ‘पारिवारिक सहायक’ के रूप में मान्यता है। उनके योगदान को आर्थिक गणना में उचित स्थान नहीं मिलता है।

पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जैसे जिले में बहुत सारी महिलाएं, ख़ासतौर से सीमावर्ती क्षेत्रों की महिलाएं तो खेतिहर मजदूर के रूप में जमींदारों के खेत में काम करने जाती हैं। सुबह-सुबह 4-5 बजे गाड़ियां और ट्रैक्टर महिलाओं और बच्चों को लेने आते हैं। उनका काम होता है खेत में दिनभर काम करना। खर-पतवार निकालना, फ़सल की कटाई उनका मुख्य काम होता है, इसके बदले में उन्हें कुछ रुपए मिलते हैं। लेकिन यहां भी महिलाओं के काम की क़ीमत पुरुष के काम से कम आंकी जाती हैं। समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुष से कम भुगतान किया जाता है। खाने के लिए बर्तन मजदूरों को खुद के घर से एक झोले में या हाथ में ले जाने होते हैं। अगर खेतिहर मजदूर समान व्यवहार की बात करेंगे तो उनसे उनका रोज़गार छीन जाएगा। यह रोज़गार भी हमेशा नहीं होता है। यह फ़सल की बुवाई के बाद होता है और कटाई से पहले होता है। बीच के दिनों में या बाद के दिनों में उन्हें खाली बैठना होता है या फिर कोई दूसरा छोटा-मोटा काम देखना होता है या फिर कढ़ाई-कशीदाकारी और पैचवर्क का काम करना होता है, जिनसे उनका घर चलता है।

खेतों में काम करने के दौरान ही खाना बनाती एक महिला खेतिहर मजदूर (तस्वीर : जितेंद्र मेघवाल)

जबकि पुरुष खेतिहर मजदूर अधिकतर शराब के नशे की गिरफ्त में होते हैं। वे अपनी कमाई का आधा हिस्सा शराब पीने में लगा देते हैं। कई बार तो वे पूरे दिन की कमाई शराब की दुकान पर उड़ा आते हैं। रही बात सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की तो अधिकांश खेतिहर मजदूर उनसे परिचित नहीं हैं। लोग यहां नहीं जानते कि महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना क्या है। यह भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा चलाई जाने वाली एक प्रमुख योजना है। जबकि यह योजना राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार दीनदयाल अंत्योदय योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का एक उप-घटक है, जिसका मुख्य उद्देश्य खेती में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और उनकी उत्पादकता में सुधार करना है।

‘दी टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट बताती है कि “ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और भूमिहीन मजदूर स्थानीय साहूकारों या बड़े फार्म मालिकों से अग्रिम ऋण ले लेते हैं। इस कर्ज को चुकाने के नाम पर उन्हें बेहद कम मजदूरी या बिना मजदूरी के खेतों में काम करने पर मजबूर किया जाता है। …“हाल ही में नागौर और बीकानेर जैसे जिलों के खेतों से संदिग्ध बंधुआ मजदूरी के ऐसे मामले सामने आए हैं जहां परिवारों (बच्चों सहित) को खेतों में बंधक बनाकर रखा गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन्हें खेत छोड़कर जाने की इजाजत नहीं दी गई।”

निम्न वर्गों के पास अगर खुद की जमीनें हैं तो भी उनका शोषण कम नहीं होता है। उनके सामने पानी और प्राकृतिक संसाधनों का संकट, कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण से जुड़ा शोषण है। पश्चिमी राजस्थान में बड़े पैमाने पर सोलर एनर्जी और अन्य औद्योगिक प्रोजेक्ट चल रहे हैं। निजी कंपनियों और प्रशासनिक मिलीभगत से स्थानीय किसानों को बिना उचित नोटिस या मुआवजे के उनकी जमीन से बेदखल करने या काम रोकने की कोशिश की जाती है। ख़ासतौर से यह बाड़मेर और जैसलमेर सहित अन्य सीमावर्ती जिलों में हो रहा है।

कृषि इनपुट (खाद-बीज) और मंडी में शोषण जैसी कई दिक्कतों का सामना उन्हें करना पड़ता है। कई बार खेती का सीजन खत्म होने के बाद या सूखे के दौरान आजीविका चलाने के लिए इन मजदूरों को गुजरात, पंजाब या अन्य राज्यों के शहरों में निर्माण कार्यों या फैक्ट्रियों में काम करने के लिए पलायन करना पड़ता है। पलायन करने वालों में सबसे बड़ी संख्या दलित व आदवासी मजदूरों की हैं। बहुत बड़ी संख्या में युवा पलायन करके गुजरात चले जाते हैं ताकि दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर सकें और घरवालों को पैसा भेज सकें। कई बार बाहर काम करते-करते युवा मजदूर नशें की गिरफ्त में आ जाते हैं और उसके आदी हो जाते हैं। और इस प्रकार खेतिहर मजदूर, कारखानों के मजदूर में परिवर्तित हो जाते हैं।

मजदूरों के लिए खेत के बगल में बनाई गई झोपड़ियां (तस्वीर : जितेंद्र मेघवाल)

एक अध्ययन में कुशल, अर्द्धकुशल और अकुशल मजदूरों के बारे में बताया गया है कि पलायन करने वाले दलितों में 61.29 प्रतिशत अकुशल मजदूर हैं। वहीं 57.04 प्रतिशत आदिवासी मजदूर और अन्य पिछड़े वर्गों के 45.68 मजदूर अकुशल श्रेणी के हैं। इनकी तुलना में, ‘जनरल’ या डोमिनेंट कम्युनिटी के सिर्फ़ 37.26 प्रतिशत मजदूरों को अनस्किल्ड कैटेगरी में रखा गया था। यह अध्ययन पूरे राजस्थान पर लागू होता है न कि केवल पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों पर।

मजदूर वर्ग के इस शोषण में जाति बहुत मायने रखती है। डॉ. आंबेडकर ने अपनी ऐतिहासिक पुस्तक ‘जाति का विनाश’ में लिखा है कि जाति-व्यवस्था केवल ‘श्रम का विभाजन’ नहीं है, बल्कि यह ‘श्रमिकों का विभाजन’ है। उनकी बात यहां पश्चिम राजस्थान में एकदम सटीक बैठती है।

पश्चिमी राजस्थान में इन सब समस्याओं के समाधान के लिए भूमि सुधार बहुत आवश्यक है। भूमि का असमान वितरण मजदूरों की बदहाली का मुख्य कारण है। गरीब, पिछड़े और निचले तबके के किसान और खेतिहर मजदूरों को बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्र में कृषि और पशुपालन आपस में जुड़े हुए हैं। कई बार पानी के संकट से स्थानीय पशुपालकों को भी बहुत संकटों का सामना करना पड़ता है। अभी हाल ही की दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि बाड़मेर की 9 तहसीलों (गडरारोड, चौहटन, बाड़मेर, बायतु, सेड़वा, रामसर, शिव, धनाऊ और बाड़मेर) को राज्य सरकार ने अकालग्रस्त घोषित करने की अधिसूचना जारी की है और इन तहसीलों को गंभीर सूखाग्रस्त की श्रेणी में शामिल किया गया है।

दोपहर में आराम करते खेतिहर मजदूर (तस्वीर : जितेंद्र मेघवाल)

पश्चिमी राजस्थान के लगभग 65 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों से कम-से-कम एक व्यक्ति काम की तलाश में बाहर जाता है। बाड़मेर-जैसलमेर के मजदूर बड़ी संख्या में गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश पलायन करते हैं। वहां की फैक्ट्रियों और कारखानों में अकुशल मजदूरों को बहुत अधिक मेहनती और भारी काम करवाया जाता है जो उनके शरीर को तोड़ देता है। पलायन करने वाले मजदूरों में से अधिकतर 18 से 30 वर्ष के बीच के होते हैं, मतलब युवा! और यह कारखानों या फैक्ट्रियों में काम कर-करके शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं यानी समय से पहले बुढ़े। जमींदार वर्ग उनके संघर्षों को नहीं समझता। खेतों में असमानता का व्यवहार, कम पारिश्रमिक, जी-तोड़ मेहनत करने के बाद भी मजदूर वर्ग अपना काम नहीं छोड़ता क्योंकि उन्हें परिवार चलाने हैं। पश्चिमी राजस्थान में कोई संगठित यूनियन भी नहीं हैं जो खेतिहर मजदूरों और कारखानों के मजदूरों के शोषण के खिलाफ जमींदारों और सामंती लोगों के ख़िलाफ़ लड़ सकें। मजदूरों के लिए पश्चिमी राजस्थान में संगठन होना बहुत जरूरी है जो उनके लिए लड़ सके। अकेले मांग करने पर जमींदार या मालिक बात नहीं सुनते, लेकिन संगठन के माध्यम से मजदूर न्यूनतम मजदूरी तय करवा पाते हैं। भूमि अधिकारों के लिए सामूहिक दबाव बनाया जा सकता है और सरकारी योजनाओं तक सीधी पहुंच बन सकती है क्योंकि व्यक्तिगत रूप से फॉर्म भरने या दफ्तरों के चक्कर काटने के बजाय संगठन के माध्यम से काम आसान और जल्दी हो जाता है। मजदूरों को पश्चिमी राजस्थान के क्षेत्रों में संगठित करना बहुत जरूरी है। जब तक वो संगठित नहीं होंगे तब तक उनका शोषण होता रहेगा। विरले जमींदार ही उनके साथ सहानुभूति रख पाते हैं, अधिकतर उनका बेहिसाब शोषण करते हैं। सरकारें गूंगी हैं, उन्हें लगता है कि उनकी योजनाएं ग्राउंड लेवल पर अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं लेकिन सच्चाई इससे बहुत दूर है। उनकी योजनाएं सिर्फ कागजों में दफ़न हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

जितेंद्र मेघवाल

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में स्नातक के छात्र तथा अपने कॉलेज के छात्रसंघ के संयुक्त सचिव हैं।

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