h n

अपनी खुद की पार्टी बनायें डिनोटिफाइड जनजातियों के लोग

डिनोटिफाइड समुदाय लम्बे समय से हाशिये पर रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके हिसाब से देखें तो अंग्रेजों की तुलना में आज़ाद भारत के शासक थोड़ा कम क्रूर भले रहे हों, लेकिन बेरूखी और उपेक्षा अभी भी जारी है। स्थितियां ऐसी हैं कि डीएनटी समुदाय को संसद और विधानसभाओं में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक पृथक पार्टी का बनानी चाहिए। पढ़ें, एम. सुब्बा राव का विश्लेषण :

डिनोटिफाइड यानी घुमन्तू/खानाबदोश और अर्द्धघुमन्तू जनजातियों की आबादी को मिला दें तो भारत में उनके 12 करोड़ वोट बनते हैं। यह एक अच्छी खासी संख्या है। विडम्बना है कि डिनोटिफाइड समुदायों का भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से वर्गीकरण किया गया है। कहीं उन्हें अनुसूचित जाति कहा जाता है तो कहीं अनुसूचित जनजाति, तो कहीं अन्य पिछड़ा समुदाय तो कहीं अल्पसंख्यक। इन अलग-अलग श्रेणियों में शामिल डिनोटिफाइड समुदायों के सदस्य अपनी इस विशिष्ट पहचान के प्रति जागरूक नहीं दिखते और यहां तक कि कई चुने हुए डीएनटी नेता, जिनमें से कुछ पार्टियों के अगुआ हैं, वह भी ऐसे मुद्दों में उलझे हैं , जिनका डीएनटी समुदायों से कोई संबंध नहीं है।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : अपनी खुद की पार्टी बनायें डिनोटिफाइड जनजातियों के लोग

 

 

 

 

लेखक के बारे में

एम सुब्बा राव

लेखक डीएनटी पीपुल फ्रंट के संयोजक हैं

संबंधित आलेख

आखिर क्यों नहीं दिए जा रहे श्रम पुरस्कार?
संसद में मजदूरों से संबंध बनाने के लिए भाषा नहीं दिखती है। केवल कामगारों, श्रमिकों, मजदूरों के लिए चार लेबर कोड बनाए गए। कोड...
राजस्थान : हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में नहरी क्रांति से दलितों को क्या मिला?
राजस्थान में अनुसूचित जातियों की कृषि भूमि के हस्तांतरण को लेकर विशेष कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनके अनुसार दलितों की कृषि भूमि को सवर्ण...
डेमोग्राफी परिवर्तन आयोग : निशाने पर दलित-बहुजन व मुस्लिम एकता
लंबे समय से इस धारणा को हमारी आम समझ का हिस्सा बनाने की सचेत कोशिश की गई कि जहां मुसलमानों की आबादी ज़्यादा होती...
आखिर हम तिरस्कृत पसमांदा-बहुजन कॉकरोच कब करेंगे अपना आंदोलन वायरल?
लगभग हर दशक में कुछ मेधावी दलित-बहुजन शख्सियतें उभर के आती हैं जो व्यवस्था की बारीकी से समालोचना करते हैं और सत्ताधारी आसानी से...
अर्जक संघ में शामिल हों महिलाएं : रीता चौधरी
लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. रीता चौधरी ने अपने वक्तव्य में अर्जक संघ के आंदोलन में शामिल स्त्री-विमर्श को रेखांकित किया। उन्होंने अर्जक संघ...