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आदि कवि वाल्मीकि के जीवन मूल्य : एक विमर्श

राजनीतिक सन्दर्भों में वाल्मीकि का शब्द-निरूपण तत्कालीन राज्य-व्यवस्था की विद्रूपताओं का चित्रण है, जो संकेत करता है कि राजा के होते हुए भी तत्कालीन समाज अराजक स्थिति में था। कहीं अध्यात्म में डूबे शासक राज्य की भौतिक अभिवृद्धि की उपेक्षा कर रहे थे, और कहीं चरम भोगवाद धर्म की अनुभूतियों को नष्ट कर रहा था। बता रहे हैं कंवल भारती :

डा. रामविलास शर्मा ने अपने एक निबन्ध में लिखा है, “प्राचीन भारत में भरत, कोसल और मगध, इन तीनों गण-समाजों की निर्णायक भूमिका थीI….भरत गण यज्ञवादी संस्कृति का उपासक था मगध गण इसका परम विरोधी थाI…..मगध की आधार भूमि से ही जैन और बौद्ध धर्मों का प्रवर्तन हुआI…मगध और भरत गणों के बीच में पड़ते थे कोसलI ये लोग कर्मकांडी नहीं थे, और वेद-विरोधी मतों के प्रचारक भी नहीं थेये लोग मुख्यत: कवि और कविता-प्रेमी जन थेI महाभारत और रामायण, इन दोनों महाकाव्यों का घनिष्ठ संबंध कोसल गण से हैI….वाल्मीकि तमसा के किनारे रहते थेI वह आदि कवि के रूप में विख्यात हैंI” रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘भाषा ओ छंद’नाम की कविता में वाल्मीकि नारद से कहते हैं, “अब तक देवताओं पर काव्य लिखा गया है, मैं अपने काव्य में मनुष्य को अमर करूँगाI[1]

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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आंबेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’, ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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