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ओबीसी साहित्य के सिद्धांत और सिद्धांतकार

कौत्स ओबीसी साहित्य के प्रथम मौलिक सिद्धांतकार थे। निश्चित रूप से बुद्ध और कबीर से लेकर आधुनिक काल में फुले और अर्जक संघ तक के जो वेदविरोधी सिद्धांत हैं, उसकी बुनियाद कौत्स ने डाली है।

ओबीसी और ओबीसी साहित्य नए युग की नई अवधारणाएँ हैं। पर क्या प्राचीनकाल में ओबीसी के लोग नहीं थे? क्या न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण नहीं था? क्या गैलेलियो से पहले पृथ्वी सूरज के चक्कर नहीं काटती थी? सब कुछ था, सिर्फ़ दृष्टि नहीं थी। आज यदि कोई नया शोध आएगा तो निश्चित रूप से उसके नए नामकरण की ज़रूरत पड़ेगी। लेकिन नए नामकरण के कारण उसकी विषयवस्तु की प्राचीनता अथवा उसके अस्तित्व के पुरानेपन को खारिज नहीं किया जा सकता है। ओबीसी के लोग भारत में पुराने हैं। उनके अलग सिद्धांत और मान्यताएँ रही हैं। उनके अलग विचारक और ग्रंथ भी रहे हैं। उनकी ब्राह्मणवादी संस्कृति से अलग नए ढंग की श्रममूलक संस्कृति भी रही है। बात सिर्फ़ उसे रेखांकित करने की है। भारत में ओबीसी के कई सिद्धांतकार हुए हैं। उन सभी सिद्धांतकारों के सिद्धांत मिश्रित रूप से ओबीसी साहित्य के वैचारिक आधार हैं।

ओबीसी साहित्य के प्रथम सिद्धांतकार कौत्स

डॉ. लक्ष्मण सरूप ने लिखा है कि कौत्स एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे। वे एक आंदोलन के नेता थे जिसके दर्शन को भौतिक बुद्धिवाद से मिलता-जुलता कहा जा सकता है। कौत्स की चर्चा यास्क ने निरुक्त के प्रथम अध्याय के पंद्रहवें खंड में की है। निरुक्त का यह अध्याय पूरी तरह से कौत्स के विचारों पर आधारित है। इससे साबित होता है कि कौत्स का समय यास्क से पहले था। पुरातत्वीय खोजों, साहित्यिक संकेतों तथा ज्ञात ऐतिहासिक या राजनैतिक घटनाओं की प्रासंगिक चर्चाओं से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जाता है कि यास्क का समय 600 ई.पू. के आसपास है। इसलिए कौत्स सातवीं शताब्दी ई.पू. या इसके पहले मौजूद थे। वे वरतंतु के शिष्य थे। वरतंतु बुनकर (तंतुवाय) परिवार से आते थे जबकि कौत्स का परिवार किसान (पहले के किसान आज के कुर्मी, कोयरी आदि हैं) था। इसीलिए दुर्ग ने ”कुत्स” का अर्थ ”कृषिवल” (किसान) किया है। ज़ाहिर है कि किसानी और बुनाई का कार्य प्राचीन भारत में ओबीसी के लोग किया करते थे। इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि वरतंतु और उनके शिष्य कौत्स ओबीसी थे।

 

कौत्स वेदविरोधी थे। वे सिर्फ़ वेदों की मान्यता का ही विरोध नहीं करते थे, अपितु यह भी कहते थे कि वैदिक मंत्र अर्थहीन हैं। वे वेद को बकवास साबित करने के लिए अनेक युक्तियाँ दिया करते थे। यह दुर्भाग्य की बात है कि कौत्स का पूरा साहित्य आज उपलब्ध नहीं है। बावजूद इसके, उनका लिखा हुआ जो भी साहित्य मिलता है, उससे पता चलता है कि कौत्स ओबीसी साहित्य के प्रथम मौलिक सिद्धांतकार थे। निश्चित रूप से बुद्ध और कबीर से लेकर आधुनिक काल में फुले और अर्जक संघ तक के जो वेदविरोधी सिद्धांत हैं, उसकी बुनियाद कौत्स ने डाली है।

कौत्स की वेदविरोधी विचारधारा को वेदवादियों ने ”कुत्सित” विचारधारा कहकर खारिज किया है। आज हम ”कुत्सा” का अर्थ निंदा या बुराई लेते हैं। हिंदी शब्दकोश में ”कुत्सित” का अर्थ अधम या नीच है। निश्चित रूप से कुत्सन, कुत्सा, कुत्सित, कुत्स्य जैसे ओबीसी समाज के लिए अपमानजनक शब्दों को हिंदी शब्दकोश से बाहर कर देना चाहिए। कारण कि ये शब्द ओबीसी साहित्य के संस्थापक सिद्धांतकार कौत्स और उनके पिता कुत्स को गलियाते हैं।

मक्खली गोशाल, अजित केशकंबली और बुद्ध

जयप्रकाश कर्दम ने लिखा है कि मक्खली गोशाल जाति से कुम्हार थे और वह ओबीसी से आते हैं। उन्होंने आजीवक संप्रदाय का पुनरुद्धार किया था। इस संप्रदाय का उल्लेख अशोक के अभिलेख में है। एक ओबीसी जाति का सम्राट होने के कारण सम्राट अशोक ने अपने अभिलेख में इस संप्रदाय की चर्चा की।

इतिहास की पुस्तकों में भ्रमवश यह कहा गया है कि मक्खली गोशाल की शिक्षा का मूल आधार अक्रियावाद तथा नियतिवाद था। इतिहासकारों को यह भ्रम उनके बारे में पाणिनि और पतंजलि के द्वारा उल्लेखित ‘मस्करी’ नामक दार्शनिक के साथ उनके विचारों का घालमेल कर देने के कारण हुआ है। वास्तविकता यह है कि चार्वाक दर्शन के अनुयायी ”आजीवक” कहलाते हैं। आजीवकों की मान्यता है कि आत्मा जैसी कोई चीज़ नहीं है और जो कुछ है, वह शरीर ही है। कारण कि शरीर ही कृषि, पशुपालन और वाणिज्य जैसे जीवनोपयोगी क्रियाकलापों का मुख्य आधार-स्तंभ है। ज़ाहिर है कि बुद्ध का दर्शन एवं सिद्धांत उस पंरपरा की है, जिस परंपरा में कौत्स और मक्खली गोशाल हैं। बुद्ध की जाति को लेकर विवाद है। यह विवाद जान-बूझकर खड़ा किया गया है। बुद्ध शाक्य जाति के हैं और ओबीसी साहित्य के प्रमुख सिद्धांतकार हैं।

बौद्ध दर्शन आजीवकों के दर्शन की भाँति अनीश्वरवादी है। बुद्ध ने ईश्वर के स्थान पर मानव को प्रतिष्ठित किया। यह मानववाद हिंदी के सभी प्रमुख ओबीसी रचनाकारों की कविताओं का मूल स्वर रहा है। बुद्ध ने वेदों को अकाट्य प्रमाण नहीं माना है। उनकी दृष्टि में वेदमंत्र पंथहीन जंगल है। यह वही बात है जिसे उनके पहले कौत्स ने कही थी। ओबीसी के सभी दार्शनिकों, विचारकों आदि  के सिद्धांत एक-दूसरे से मेल खाते हैं और एक-दूसरे के क्रम में हैं। यह बात बाद में अर्जक संघ ने भी कही है। बौद्ध-ग्रंथों में जन्म पर आधारित जाति-प्रथा का घोर विरोध किया गया है। बाद में चलकर ओबीसी के एक प्रमुख कवि कबीर ने भी यह बात दुहराई है। जिस वेदवाद, जाति-प्रथा, ब्राह्मणवाद और यज्ञ-कर्मकांड का विरोध बुद्ध ने किया, वह बाद के ओबीसी साहित्य के लिए सिद्धांत बन गया और कबीर से लेकर भारतेंदु (अग्रवाल) और जयशंकर प्रसाद (साहु) तक के ओबीसी रचनाकारों ने अपनी कविताओं में उनका इस्तेमाल किया।

अजित केशकंबली भी उसी पंरपरा के ओबीसी सिद्धांतकार थे, जिस परंपरा में मक्खली गोशाल और बुद्ध थे गोकि वे बुद्ध से उम्र में बड़े थे। वे जाति के पशुचारक थे और उनका चिंतन लोकायत पंरपरा को पुष्ट करता है। अजित केशकंबली स्वर्ग-नरक, इश्वर, आत्मा आदि जैसी ब्राह्मणवादी बातों पर विश्वास नहीं रखते थे। अजित केशकंबली के आदर्शों और सिद्धांतों को ओबीसी की सांस्कृतिक संस्था ”अर्जक संघ” ने भी स्वीकार किया है। रामस्वरूप वर्मा और माहराज सिंह भारती जैसे आधुनिक ओबीसी चिंतकों ने अजित केशकंबली के विचारों को क़ाफी तरजीह दिया है।

नाथ साहित्य में ओबीसी की भागीदारी

कृषक, व्यापारी और पशुपालक जो भारतीय समाज में ओबीसी हैं, ऐसे ही लोग नाथ पंथ के अनुयायियों में सर्वाधिक थे। बंगदेश नाथपंथियों का पुराना गढ़ है। वहाँ की प्राय: पशुचारक जातियाँ नाथ पंथ के अनुयायी हैं। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने भी लिखा है कि बुंदेलखंड के गड़ेरिए नाथयोगियों के अनुयायी हैं। गड़ेरिए भी ओबीसी हैं। यदि राहुल सांकृत्यायन की बात पर यकीन करें तो ज्ञात होगा कि मीननाथ के पुत्र मछिंदरनाथ कामरूप के मछवाहे थे जबकि रामचंद्र शुक्ल ने  उनकी जाति को दबाने के लिए प्रछन्न रूप से कई तर्क जुटाए हैं। स्वयं रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि नाथ संप्रदाय जब फैला, तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों के बहुत से लोग आए जो शास्त्र-ज्ञान-संपन्न न थे तथा जिनकी बुद्धि का विकास सामान्य कोटि का था। बात साफ़ है कि नाथ पंथ में सर्वाधिक लोग ओबीसी के थे और आज भी हैं। यह बात रामचंद्र शुक्ल और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जैसे आलोचक भी मानते हैं। पर गोरखनाथ की जाति बताने के लिए कोई भी आलोचक तैयार नहीं है। कारण कि सभी नाथों में वे सर्वाधिक प्रभावशाली थे। गोरखनाथ ग्वाल थे। इसीलिए जब गोरखनाथ आपेगाँव पधारे थे, तब देवगढ़ के यादव राजाओं के यहाँ नियुक्तकई कर्मचारी गोरखनाथ के शिष्य हो गए थे। यह ठीक है कि वर्णाश्रम व्यवस्था तथा पाखंड सहित कई सामाजिक रूढिय़ों का विरोध जितने ज़ोरदार ढंग से सिद्धों ने किया है, उतना जबरदस्त और गुणात्मक विरोध नाथपंथियों ने नहीं किया है। बावजूद इसके ओबीसी साहित्य को आगे ले जाने में नाथपंथियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

ओबीसी साहित्य के उद्घोषक कवि कबीर

कबीर की जाति चाहे जो भी रही हो — कोरी या जुलाहा — वे ओबीसी में आते हैं। वे एक लंबे समय से इतिहास में दफ़न थे। आज वे तुलसीदास से भी बड़े कवि हैं। आश्चर्य कि इतने बड़े कवि का मूल्यांकन कार्य उनकी मृत्यु के कोई ढाई सौ साल बाद आरंभ हुआ। वह भी यूरोप के विद्वानों ने आरंभ किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे धीर-गंभीर आलोचक भी कबीर के साथ न्याय नहीं कर सके। कबीर को खंडन-मंडन का कवि कहा गया है। यह खंडन-मंडन जैसी बेढंगी स्थापना आलोचना की कौन-सी पद्धति है? जाहिर है कि हिंदी में जितनी भी आलोचना की पद्धतियाँ विकसित हुई हैं, सब सवर्णों के द्वारा आविष्कृत की गई पद्धतियाँ हैं। ऐसी द्विजवादी आलोचना पद्धति से कबीर का मूल्यांकन संभव नहीं  है। कारण कि एक ओबीसी रचनाकार के मूल्यांकन के लिए ओबीसी आलोचना पद्धति की ज़रूरत है। कबीर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे आजीवन गृहस्थ बने रहे और इस नजरिए से उन्होंने शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा की। शारीरिक श्रम की प्रतिष्ठा आजीवकों ने की। कबीर ने उनकी बात दुहराई है। इस प्रकार हम पाते हैं कि कौत्स, गोशाल और बुद्ध से लेकर नाथों तक की संपूर्ण ओबीसी सैद्धांतिकी कबीर के विचारों में शामिल है। इसीलिए मेरा मानना है कि कबीर को मूल्यांकित करने के लिए हिंदी में ओबीसी आलोचना की जरूरत है।

फुले और पेरियार का शंखनाद

जोतिराव फुले और पेरियार दोनों ओबीसी हैं। इसलिए ओबीसी साहित्य का सैद्धांतिक पक्ष फुले और पेरियार जैसे सामाजिक क्रांति के अग्रदूतों में बसा हुआ है। सुप्रसिद्ध विचारक शरद पाटिल ने जोतिराव फुले को शूद्र दार्शनिक कहा है। क्योंकि उन्होंने अब्राह्मणवादी दर्शन की बात कही है। फुले से पहले भी भारत की नास्तिक धाराओं के ओबीसी दार्शनिकों ने अब्राह्मणवादी दर्शन की बात कही है। आधुनिक युग में सामाजिक क्रांति का विचार सबसे पहले फुले ने ही रखा। वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद, नारी सुधार, शिक्षा आदि महत्वपूर्ण विषयों पर उन्होंने अत्यंत मौलिक विचार प्रस्तुत किए। हिंदी के ओबीसी रचनाकारों में उनके विचारों की झलक साफ़तौर पर दिखाई पड़ती है। परंतु हिंदी के द्विजवादी आलोचकों ने भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद और रेणु जैसे ओबीसी रचनाकारों के मूल्यांकन में ऐसा धुंध फैला रखा है कि वे चीज़ें हमें दिखाई नहीं पड़ती हैं। जोतिराव फुले ने स्पष्ट किया कि चार वर्णों की रचना का परंपरागत सिद्धांत काल्पनिक है। वर्ण-व्यवस्था को ईश्वर ने बनाया, यह बतलाकर शूद्रातिशूद्र लोगों का शोषण किया गया। फुले यह भलि-भाँति जानते थे कि मानव समाज में ऐसे बनावटी व नकली सिद्धांत बनानेवाली यह व्यवस्था अन्यायमूलक और पक्षपातपूर्ण है। क्या यह मानवतावादी स्वर जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध काव्य कृति ”कामायनी” में नहीं है? है, और वही उसका प्रमुख स्वर भी है जिसको द्विजवादी आलोचकों ने अपनी कलम की ताकत से दबा रखा है। फुले ने सती-प्रथा का विरोध किया और विधवा विवाह का समर्थन किया। भारतेंदु की रचनाओं ये तमाम विरोध और समर्थन शामिल है अथवा नहीं? हैं, और प्रमुखता से है, परंतु द्विजवादी आलोचकों की नज़र उस नहीं पड़ी। वे सिर्फ़ भारतेंदु के देशप्रेम और भक्तिभाव का बखान करते रह गए। ओबीसी आलोचना के माध्यम से इन बातों को रखा जाना चाहिए। जोतिराव फुले ने मजदूरों के शोषण के खिलाफ़ आंदोलन किया। उन्होंने किसानों की दशा सुधारने की दिशा में भी कई कार्य किए। ”किसान का कोड़ा” इस दृष्टि से उनका महत्वपूर्ण ग्रंथ है। मैथिलीशरण गुप्त ने भी ”किसान” (1917) नाम से मौलिक काव्य-ग्रंथ लिखा है। शोध के नज़रिए से ”किसान का कोड़ा” और ”किसान” का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना चाहिए।

पेरियार ने ब्राह्मणवाद विरोधी कई कार्य किए। उनका निश्चित मत था कि कानून और प्रशासन में अस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है। प्रांत में सभी समुदायों का उनकी जनसंख्या के अनुपात में सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। पेरियार ने भारत की प्राचीन नास्तिक धाराओं की तरह ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है। उनसे पहले ओबीसी के अनेक दार्शनिकों ने यह बात कही है कि ईश्वर नहीं है।

गाँधी, आंबेडकर और लोहिया

महात्मा गाँधी, बाबा साहेब आंबेडकर और राममनोहर लोहिया में से दो गाँधी और लोहिया ओबीसी-बहुजन में आते हैं जबकि आंबेडकर दलित हैं। गाँधी को बहुजन होने का गर्व है। इसलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा के आरंभ में लिखा है कि मैं जाति का बनिया हूँ। गाँधी को समझने से पहले यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि उनका आदर्श, कार्यक्षेत्र तथा मूल्यांकन पद्धति सिद्धांतवादी नहीं बल्कि यथार्थवादी और व्यावहारिक था। उनके विचार किसी क्रमबद्ध अध्ययन के आधार पर विकसित नहीं हुए।

डॉ. आंबेडकर ने सिर्फ़ दलितों के बारे में ही नहीं बल्कि आदिवासी और ओबीसी के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था और जाति-प्रथा का घोर विरोध किया, जिसका लाभ ओबीसी को भी मिला। 14 मई 1938 का कोंकण के कनकवली में आयोजित किसान सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि अछूत और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोग सताए हुए लोग हैं। दोनों की समस्याएँ समान हैं। इसीलिए डॉ. आंबेडकर मानते थे कि अनुसूचित जाति और जनजाति की तरह ओबीसी को भी आरक्षण मिलना चाहिए। यही कारण था कि उन्होंने भारतीय संविधान में धारा 340 के अंतर्गत इसका प्रावधान किया। मंडल आयोग उसी का परिणाम है। इतना ही नहीं, उन्होंने एक ओबीसी परिवार से आए महात्मा फुले को अपना गुरु माना तथा अपनी पुस्तक उन्हीं को समर्पित भी किया। कहना न होगा कि ओबीसी रचनाकारों पर डॉ. आंबेडकर का प्रभाव भी पड़ा है।

डॉ. आंबेडकर के निधन के बाद डॉ. लोहिया ने अपनी नवनिर्मित सोशलिस्ट पार्टी में जाति-तोड़ो और सामाजिक बराबरी के लक्ष्य के लिए विशेष अवसरों के सिद्धांत के अंतर्गत दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, सभी वर्णों की महिलाओं तथा पिछड़े अल्पसंख्यकों के लिए साठ प्रतिशत आरक्षण का कार्यक्रम अपनाया और जाति-तोड़ो का नारा दिया। उन्होंने पिछड़ों और दलितों के साथ-साथ पसमांदा मुस्लिमों के लिए भी विषेश अवसरों की माँग की। हिंदी साहित्य में लोहियावाद के व्यापक प्रभाव को चिन्हित किया जाना चाहिए। ओबीसी साहित्य को इस नज़रिए से देखना चाहिए कि उसमें शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता सर्वोपरि रहेगी। शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता आजीवकों ने स्वीकारी थी। बुद्ध भी शारीरिक श्रम के पक्ष में हैं। कबीर और गाँधी भी शारीरिक श्रम की श्रेष्ठता स्वीकारते हैं। कहने का मतलब यह है कि ओबीसी का कोई भी दार्शनिक, विचारक अथवा चिंतक ऐसा नहीं है जिन्होंने श्रम के महत्व को नकारा हो। वास्तव में श्रममूलक संस्कृति ओबीसी साहित्य का आधार-स्तंभ है। कारण कि ओबीसी की सभी जातियाँ श्रमशील है। कृषि, व्यापार और पशुपालन से लेकर बुनाई एवं कारीगरी के अन्य उद्योगों में ओबीसी के लोग प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक युग तक लगे हुए हैं।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित)


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लेखक के बारे में

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ख्यात भाषावैज्ञानिक एवं आलोचक हैं। वे हिंदी साहित्य में ओबीसी साहित्य के सिद्धांतकार एवं सबाल्टर्न अध्ययन के प्रणेता भी हैं। संप्रति वे सासाराम के एसपी जैन कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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