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संस्मरण : जब पैदल ही विधानसभा के लिए निकल पड़े रामस्वरूप वर्मा

पहले तो रामस्वरूप वर्मा जी मेरा सवाल सुनते रहे। फिर उन्होंने कई सारे सवाल पूछे। असल में वे सवाल का जवाब सवाल के रूप में ही देते थे। और तर्क के आधार पर सवाल का जवाब हमसे ही उगलवा लेते थे। उनका कहना था कि शोषित समाज दल और अर्जक संघ के समर्थकों में ऐब यह है कि वह मुखर नहीं हैं। स्मरण कर रहे हैं उपेंद्र पथिक

रामस्वरुप वर्मा (22 अगस्त, 1923 – 19 अगस्त, 1998) पर विशेष

अर्जक संघ के संस्थापक रहे महामना रामस्वरूप वर्मा समतामूलक समाज में यकीन रखते थे। यह उनके व्यक्तिगत आचरण में भी निहित था। उनसे मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई थी। तारीख याद नहीं है। उस समय गया और बोधगया के बीच एक गांव है खिरियावां, वहीं पर गया जिला अर्जक संघ का सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन में रामस्वरूप वर्मा जी के अलावा कांशीराम जी और चौधरी महाराज सिंह भी शामिल हुए थे। यह पहला मौका था जब मैंने इन तीनों को देखा और सुना था। तीनों ने अपने वक्तव्य में इस बात पर जोर दिया था कि वंचितों के बीच एकता के बगैर सवर्णों के वर्चस्ववाद को खत्म नहीं किया जा सकता है। इसलिए अर्जक संघ, शोषित समाज दल और बामसेफ के बीच समन्वय स्थापित करने की बात कही गई।

वर्मा जी से मेरी दूसरी मुलाकात बोकारो में 1983 में हुई। वहां अर्जक संघ बिहार का सम्मेलन सह आंबेडकर मेला का आयोजन किया जा रहा था। यह भी बेहद संक्षिप्त मुलाकात थी। मैं उन्हें सिर्फ अपना नाम और यह बता सका कि मैं पत्रकार हूं और अर्जक संघ से भी जुड़ा हूं। हालांकि तब मैं अर्जक संघ द्वारा प्रकाशित पत्रिका “अर्जक साप्ताहिक” के लिए नियमित तौर पर लिखा करता था, और इसके संपादक स्वयं रामस्वरूप वर्मा जी थे, तो वे मुझे नाम से जानते थे। लेकिन लंबी बात न हो सकी।

उनसे मेरी पहली लंबी मुलाकात 1989 में हुई। तब मुजफ्फरपुर के देवरिया कोठी में अर्जक संघ, बिहार प्रदेश का सम्मेलन हुआ था। तब मैं अर्जक संघ राज्य कार्यकारिणी का सदस्य बन चुका था। यह सम्मेलन तीन दिवसीय सम्मेलन था। उस दौरान हम जितने भी कार्यकर्ता थे, सभी के पास कुछ न कुछ जिम्मेदारी थी। मेरी जिम्मेदारियों में रामस्वरूप वर्मा जी का ध्यान रखना भी था। तो हुआ यह कि आयोजन के दूसरे दिन रामस्वरूप वर्मा जी को नहाना था। इसके लिए सम्मेलन स्थल पर चापाकल की व्यवस्था थी। मैं बालटी और मग आदि लेकर पहुंचा। लेकिन उन दिनों ठंड का मौसम था तो रामस्वरूप वर्मा जी ने धूप में बैठने की बात कही। फिर हमदोनों करीब एक घंटे तक बात करते रहे।

इसी बातचीत के क्रम में मैंने उनसे पूछा कि आखिर क्या वजह है कि उत्तर प्रदेश में शोषित समाज दल और अर्जक संघ का इतना बड़ा संगठन है, फिर भी बसपा जैसा संगठन अधिक प्रभावशाली हो गया? पहले तो रामस्वरूप वर्मा जी मेरा सवाल सुनते रहे। फिर उन्होंने कई सारे सवाल पूछे। असल में वे सवाल का जवाब सवाल के रूप में ही देते थे। और तर्क के आधार पर सवाल का जवाब हमसे ही उगलवा लेते थे। उनका कहना था कि शोषित समाज दल और अर्जक संघ के समर्थकों में ऐब यह है कि वह मुखर नहीं हैं और चाय-पान की दुकानों पर जो कांग्रेस के लोग हैं या फिर बसपा के लाेग हैं, उनकी तरह अपनी बात रख नहीं पाते हैं। यह एक बड़ी कमी है। जबकि कांशीराम जी ने अपने कार्यकर्ताओं काे ऐसे प्रशिक्षित किया है जिससे वे कांग्रेस व अन्य संगठनों के लोगों की हां में हां मिलाने के बजाय अपनी बात कह सकें।

ऐसे ही सरल हृदय के थे रामस्वरूप वर्मा। मन में कुछ भी नहीं रखते थे। वे अपने संगठन की मजबूती को जानते थे तो कमजोरियों को भी बखूबी समझते थे।

एक बार 1989 में लखनऊ उनके आवास जाना हुआ। दरअसल, तब मुझे दिल्ली में दलित साहित्य अकादमी की ओर से आंबेडकर फेलोशिप मिला था। वहां माता प्रसाद जी भी थे। उनसे बातचीत हुई तो उन्होंने बताया कि वह लखनऊ के हैं। तब मैंने उनसे अपने मन की इच्छा व्यक्त की कि मैं लखनऊ जाकर रामस्वरूप वर्मा जी से मिलना चाहता हूं। तब माता प्रसाद जी ने मेरी सहायता की और मैं लखनऊ रामस्वरूप वर्मा जी के आवास पर पहुंचा। तब वह विधायक थे। मेरे आने की जानकारी मिलने पर वे नीचे आए। उन्होंने मेरा हालचाल और आने का प्रयोजन पूछा। करीब पौन घंटे तक हम बातचीत करते रहे। फिर वे विधानसभा जाने को तैयार हुए। चूंकि विधानसभा सत्र चल रहा था। 

मैं यह सोच रहा था कि रामस्वरूप वर्मा जी पूर्व मंत्री रहे हैं और वर्तमान में भी विधायक हैं, तो किसी गाड़ी से जाएंगे। लेकिन मैंने देखा कि वह पैदल ही निकल पड़े। साथ में मुझे भी ले लिया। हम करीब एक किलोमीटर की दूरी तय कर उत्तर प्रदेश विधानसभा के द्वार पर पहुंचे। वहां सिपाहियों ने रामस्वरूप वर्मा जी का अभिवादन किया। वहीं मुख्य द्वार पर उन्होंने करीब बीस मिनट तक मुझसे और बातचीत की तथा मुझे यह बताया कि मुझे गया वापस कैसे जाना है। वे बिल्कुल सरल स्वभाव के थे। उनमें दिखावा लेश मात्र भी नहीं था। नीति, सिद्धांत के पक्के थे। तभी तो कांग्रेस आलकमान के द्वारा भेजा गया मुख्यमंत्री पद के ऑफर को भी ठुकरा दिया था। वर्ष 1991 में शोषित समाज दल द्वारा तीन दिवसीय दिल्ली में धरना का कार्यक्रम था। वहां भी हमारी मुलाकात और बातचीत लंबी हुई थी। मैं जब भी मिला, तब उनसे कई सवाल पूछा करता था और वे बिना ऊबे हर सवाल का ज़बाब देते थे।

अंतिम मुलाकात की बात कहूं तो उनसे अंतिम बार गया में मिला। वह 1995 का साल था। लेकिन वह मुलाकात सामान्य मुलाकात थी। मुझे यह लगा ही नहीं था कि यह हमारी आखिरी मुलाकात साबित होनेवाली है। 19 अगस्त, 1998 को उनका लखनऊ में निधन हो गया।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

उपेन्द्र पथिक

सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार उपेंद्र पथिक अर्जक संघ की सांस्कृतिक समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। वे बतौर पत्रकार आठवें और नौवें दशक में नवभारत टाइम्स और प्रभात खबर से संबद्ध रहे तथा वर्तमान में सामाजिक मुद्दों पर आधारित मानववादी लेखन में सक्रिय हैं

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