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पहुंची वहीं पे ख़ाक जहां का खमीर था

शरद यादव ने जबलपुर विश्वविद्यालय से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी और धीरे-धीरे देश की राजनीति के केंद्र में आ गए। पिता ने तो उन्हें इंजीनियर बनाना चाहा था, लेकिन वे वंचितों-पीड़ितों के हितार्थ ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के काम में लग गए। वह डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे। स्मरण कर रहे हैं अली अनवर

शरद यादव (11 जुलाई, 1947 – 12 जनवरी, 2023) 

प्राख्यात समाजवादी नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव तो पूरे कोरोना काल से लड़कर जीतते रहे, लेकिन दिल्ली-एनसीआर की इस बार शीतलहरी को वह मात नहीं दे सके। पिछले कुछ वर्षों से किडनी की बीमारी से जुझ रहे 75 वर्षीय शरद यादव को सांस लेने में दिक्कत आने के बाद 12 जनवरी, 2023 की रात गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती किया गया। लेकिन उन्हें बचाया न जा सका। 14 जनवरी, 2023 को मकर संक्रांति के दिन मध्य प्रदेश में पुराने होशंगाबाद जिला के आंखमऊ (उनके पैदाईशी गांव) में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हो गया। यानी ‘पहुंची वहीं पे ख़ाक जहां का खमीर था’। जहां से उनकी यात्रा शुरू हुई थी, वहीं जाकर उसको विराम मिला।

शरद यादव ने जबलपुर विश्वविद्यालय से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी और धीरे-धीरे देश की राजनीति के केंद्र में आ गए। पिता ने तो उन्हें इंजीनियर बनाना चाहा था, लेकिन वे वंचितों-पीड़ितों के हितार्थ ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के काम में लग गए। वह डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे। वह मध्य प्रदेश के जबलपुर से दो बार, उत्तर प्रदेश के बदायूं से एक बार तथा बिहार के मधेपुरा से चार बार सांसद रहे। बिहार से वह दो बार राज्यसभा के भी सदस्य रहे। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर यह असाधारण बात है कि वह देश के तीन बड़े राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार से लोकसभा चुनाव जीतते रहे। इनके अलावा ऐसा रिकार्ड सिर्फ भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी का ही है। मौजूदा दौर में शायद अब किसी और दूसरे नेता का इस तरह का रिकार्ड बनाना मुश्किल ही लगता है।

शरद यादव अपने व्यक्तिगत जीवन में सादगी के कायल थे। तड़क-भड़क और दिखावा उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था। वह इतने सरल और मिलनसार थे कि देश का कोई राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता उनसे आसानी से मिलकर बात कर सकता था। वह आजीवन राजनीतिक-सामाजिक रूप से सक्रिय रहे। अपने जीवन के अंतिम करीब दो वर्षों में नई दिल्ली के लुटियन जोन से निकलकर गुरुग्राम के एक फार्म हाउस में रहने के लिए चले जाने के बाद अल्बत्ता उन्होंने अपने को अकेला जरूर महसूस किया होगा।

वर्ष 1976 में जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा का कार्यकाल पांच साल से बढ़ाकर छह साल किया तो उन्होंने इसके खिलाफ लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर इस अलोकतांत्रिक और तानाशाही कदम का विरोध किया। यह शरद यादव ही थे, जिन्होंने ‘हवाला’ केस में नाम आने के बाद सार्वजनिक रूप से 4-5 लाख रुपए चंदा लेने की बात स्वीकार की और कहा कि पार्टी चलाने के लिए कौन नहीं जो इस तरह का चंदा लेता है। लालकृष्ण आडवाणी सरीखे दूसरे कई दिग्गज नेता इस तरह का नैतिक बल नहीं दिखा सके और मौन रह गए। 

बाद के वर्षों में इसी तरह का मामला ‘सहारा डायरी’ में आए कई नामों को लेकर प्रकाश में आया, लेकिन खामोश रह कर ही दिग्गजों ने तूफान को निकल जाने दिया। 

शरद यादव स्पष्टवादी थे। पाखंडियों का माखौल उड़ाते थे। पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र पर उनका कतई भरोसा नहीं था। जाति को लेकर उनका जेहन बहुत साफ था। वह कहते थे कि लोगों के हाड़-मांस में यह जाति घुसी हुई है। पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों के लिए आरक्षण तथा सामाजिक न्याय के तमाम सवालों पर संसद से लेकर सड़क तक वह हमेशा न सिर्फ मुखर रहे, बल्कि इसकी अगुवाई की। 18 दिसम्बर, 2009 को जब मैंने राज्यसभा में जाति जनगणना की मांग उठायी तो इसे सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुए। उस समय वह लोकसभा के सदस्य थे। 2010 के मार्च महीने में उन्होंने लोकसभा में लालू जी, मुलायम सिंह यादव जी के साथ मिलकर इस सवाल को उठाया। उनके इस काम में भाजपा सांसद गोपीनाथ मुंडे का भी साथ मिला। इसके बाद ही मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 की सरकार ने 2011 की जनगणना जाति के आधार पर कराने की बात मान ली। यह बात और है कि 2011 की जनगणना को 1950 के जनगणना कानून से अलग हटाकर अदक्ष लोगों से करा दिया गया, जिसका कोई नतीजा नहीं निकला। 

शरद यादव (11 जुलाई, 1947 – 12 जनवरी, 2023)

2013 में भाजपा ने जब नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश करने का निर्णय लिया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके खिलाफ एनडीए गठबंधन से अपनी पार्टी को अलग करने का निर्णय कर लिया। उस समय शरद यादव एनडीए में बने रहने के पक्ष में जरूर थे, लेकिन इस पद पर रहते हुए उन्होंने भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडों का कभी समर्थन नहीं किया। नरेंद्र मोदी सरकार ने जब नोटबंदी का फैसला लिया तब शरद जी और मैंने खुलकर भाजपा सरकार के इस कदम का विरोध किया, जबकि नीतीश जी उसके समर्थन में आ गए। हालांकि करीब एक साल बाद उन्होंने भी इस फैसले को गलत करार दिया। 

2015 में बिहार में राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर जब नीतीश कुमार जी ने महागठबंधन बनाया तो शरद जी पूरी तरह न सिर्फ इसके पक्ष में थे, बल्कि इसकी उन्होंने पहल भी की। 2017 में अचानक नीतीश कुमार जी महागठबंधन तोड़कर पुनः एनडीए में जा मिले। शरद जी के लिए यह असमंजस की स्थिति थी। कुछ दिन मौन रहने के बाद उन्होंने नीतीश कुमार जी के इस फैसले का खुलकर विरोध करना शुरू कर दिया। मैंने तो पहले दिन से ही इस फैसले के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया था। केरल के सामाजवादी नेता और राज्यसभा सदस्य एम. पी. कुमार साहब के अलावा जेडीयू के किसी सांसद, विधायक ने हमलोगों का साथ नहीं दिया। शरद जी के कहने पर मैं सोनिया गांधी जी द्वारा बुलायी गयी बैठक में शामिल हुआ। बैठक से बाहर आते ही मुझे पार्टी से निलंबित कर दिया गया। उन्हीं दिनों लालू जी की पार्टी राजद द्वारा पटना में बुलायी गयी एक रैली में दूसरी विपक्षी नेताओं के साथ शरद जी और मुझे भी आमंत्रित किया गया। हमदोनों साथ रैली में शामिल हुए। इसी को आधार बनाकर हमदोनों की राज्यसभा की सदस्यता समाप्त कर दी गयी। 

चूंकि तबतक हमलोगों ने संसद के अंदर पार्टी के किसी ह्वीप का उल्लंघन नहीं किया था, इसलिए कायदे से हमारी सदस्यता नहीं जानी चाहिए थी। लेकिन ‘डबल इंजन’ की चपेट में हम दोनों को आ जाना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एकजुट करने का शरद जी ने जी-तोड़ प्रयास किया। दिल्ली सहित देश के दूसरे भागों ‘साझी विरासत बचाओ’ नाम से कई सम्मेलन भी आयोजित किये गये। दिल्ली में हुए इस तरह के एक सम्मेलन में तो कांग्रेस, सपा, राजद और रालोद के साथ बसपा और वामपंथी दल भी साथ थे, लेकिन दूसरे सम्मेलन में सपा, बसपा नहीं शामिल हुईं। इसके बाद शरद जी की इच्छा के अनुसार ‘लोकतांत्रिक जनता दल’ नाम से नए दल का भी गठन हुआ, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के समय लोकतांत्रिक तौर-तरीकों की कमी के चलते यह नया दल बिखर गया। इस चुनाव में शरद जी मधेपुरा से चुनाव हार गए, जिसकी उम्मीद कत्तई नहीं थी। वैसे चुनाव में तो जीत-हार होती ही रहती है। 

गौरतलब बात यह है कि एक लंबा निष्कलंक राजनीतिक जीवन जीकर वह दुनिया से गुजर गए।

(संपादन : समीक्षा/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अली अनवर

लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद तथा ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के संस्थापक अध्यक्ष हैं

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