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बी.पी. मंडल का ऐतिहासिक संबोधन– “कोसी नदी बिहार की धरती पर स्वर्ग उतार सकती है”

औपनिवेशिक बिहार प्रांत में बाढ़ के संदर्भ में कई परामर्श कमिटियां गठित हुईं। बाढ़ सम्मलेन भी हुए। लेकिन सभी कमिटियों के गठन, सम्मलेन और मीटिंग में बाढ़ के सवालों को तटबंध, गाद और बालू का प्रकरण प्रमुख सवाल बना रहा। बी.पी. मंडल भी स्वतंत्रता के पश्चात 1950 के दशक में 1953 और 1954 के भयंकर बाढ़ को देखते हुए लगातर सदन से सड़क तक बोल रहे थे। बता रहे हैं रमेश कुमार

बी.पी. मंडल के स्वभाव के बारे में भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर कहते थे कि उनका स्वाभिमान इस प्रकार था कि वह किसी भी प्रश्न पर समझौता कर सकते थे, लेकिन सम्मान, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के प्रश्न पर किसी से भी समझौता करने को तैयार नहीं होते थे। सामाजिक और राजनीतिक लड़ाई में उन्होंने इसी कथन के स्वरूप को वास्तविक तौर पर जीया।

लंबे समय से चले आ रहे ‘कोसी के प्रश्न’ को लेकर उन्होंने बिहार विधानसभा में पहले कार्यकाल में ही कोसी के सवाल को सम्मान, आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ पुरजोर तरीके से रखा। पहली बार 21 मई, 1952 को राज्यपाल के अभिभाषण प्रस्ताव पर बोलते हुए उन्होंने कहा– “सबसे पहले मैं कोसी की योजना पर बोलूंगा, कोसी के सवाल को रखूंगा, जो सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं है, और न ही यह सिर्फ राज्य की, बल्कि यह पूरे भारत की समस्या है। मुझे ख़ुशी है कि महामहिम ने अपने भाषण में कोसी योजना को शामिल किया है। लेकिन अध्यक्ष महोदय सनद रहे कि कोसी क्षेत्र के लोग बार-बार वादे और आश्वासन सुनकर थक गए हैं। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया है। महोदय, इस क्षेत्र के लोगों के दुख और ऋण की कोई सीमा नही है। मैं आपको बता सकता हूं महोदय कि बड़ी संख्या में लोग बीमारी से मर रहे हैं। लेकिन मैं यह आशा और उम्मीद कर सकता हूं कि यह योजना ठोस तरीके से मानवीय पहल पर अगर उतरती है तो वास्तविक तौर पर जिस कोसी नदी को बिहार का शोक कहा जाता है वह बिहार की धरती पर स्वर्ग उतार सकती है।”

प्रारंभिक समय से ही बी.पी. मंडल की जेहन में जो सवाल थे, उनमें कोसी की समस्या सबसे प्रमुख थी। इसका इतिहास औपनिवेशिक भारत में उनके पिता रासबिहारी मंडल, भाई भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल और कमलेश्वरी प्रसाद मंडल द्वारा कोसी के लोगों से जुड़े बाढ़ एवं उससे नुकसान संबंधित उठाए गए प्रश्नों में साफ़ दिखता है, जो विभिन्न अभिलेखों के रूप में मौजूद हैं। 

अभिलेखीय रिपोर्ट के अनुसार कोसी की बाढ़ सबसे पहले मधेपुरा अनुमंडल में 1911 में आई। इससे पूर्व यह सहरसा के पूर्वी भाग तक सीमित होती थी। धीरे-धीरे मधेपुरा शहर में कोसी के प्रवेश करने के कारण वहां के आवागमन और जनजीवन को अत्यधिक नुकसान पहुंचने लगा। कोर्ट-कचहरी, जेल, कारखाने, शिक्षण संस्थान आदि कभी सुपौल तो कभी सहरसा शिफ्ट किए जाने लगे, जिससे जनमानस पर काफी विपरीत प्रभाव पड़ा।

इस विषय को लेकर 1920 के दशक में ‘सेंट्रल भागलपुर नॉन मोहम्मडन रूरल कंसीट्वेंसी’ के सदस्य भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल ने बिहार एंड उड़ीसा लेजिस्लेटिव कौंसिल में ‘फ्लड, एम्बंक्मेंट एंड रिमूवल ऑफ़ मधेपुरा सबडिविजन टाउन’ विषय पर बोलते हुए बार-बार औपनिवेशिक शक्तियों को आगाह किया कि स्थानीय लोग कोसी की बाढ़ से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। इसके नियंत्रण के लिए तटबंध और कुछ हद तक रिलीफ का वितरण, वास्तविक हल नहीं है।”

बी.पी. मंडल (25 अगस्त, 1918 – 13 अप्रैल, 1982), बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री व अध्यक्ष, द्वितीय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयाेग, भारत सरकार

अभिलेखीय रिपोर्ट, समाचार पत्र-पत्रिकाओं के अनुसार 20वीं शताब्दी में 1930 के दशक तक यानी 1902, 1906 और 1908, 1921 और 1927 और 1929 में भागलपुर प्रमंडल के उत्तरी भाग मधेपुरा और सुपौल अनुमंडल में कोसी में सबसे बड़ी बाढ़ आई। इस बाढ़ ने बड़े स्तर पर अकाल और महामारी दोनों को जन्म दिया और बड़े आबादी को प्रभावित किया। अकाल के कारण लोगों को कई महीने तक करमी के पत्ते खाकर गुजारने पड़ते थे। महामारी के बारे में तो कहा जाता है कि मधेपुरा और सुपौल अनुमंडल में बाढ़ के कारण मलेरिया और हैजा का प्रकोप बना हुआ था।

कहा जाता है कि 1906 में मधेपुरा और प्रतापगंज थाने में 15 प्रतिशत लोगों के मृत्यु हैजे से हुई। मलेरिया की बात करें तो 1925 और 1927 में मृत्यु का आंकड़ा 35 हजार के करीब रही। वहीं 1929 और 1930 में यह आंकड़ा 43 हजार के करीब पहुंच गया।

औपनिवेशिक बिहार प्रांत में बाढ़ के संदर्भ में कई परामर्श कमिटियां गठित हुईं। बाढ़ सम्मलेन भी हुए। लेकिन सभी कमिटियों के गठन, सम्मलेन और मीटिंग में बाढ़ के सवालों को तटबंध, गाद और बालू का प्रकरण प्रमुख सवाल बना रहा। बी.पी. मंडल भी स्वतंत्रता के पश्चात 1950 के दशक में 1953 और 1954 के भयंकर बाढ़ को देखते हुए लगातर सदन से सड़क तक बोल रहे थे। उन्होंने पुरजोर तरीके से कहा कि कोसी योजना को ठीक तरीके से लागू किया जाए। इसे तटबंधों, बैराजों, उनके मरम्मत और रख-रखाव इत्यादि तक नहीं सीमित रखा जाए, बल्कि इस मुख्य आपदा के जड़ से परिणाम तक के सवालों को संवेदनाओं के साथ देखा जाए। 

वे अक्सर कोसी बाढ़ के विषय में बोलते हुए इसके कारण के साथ-साथ मानवीय क्षति पर अधिक जोर देते थे। उन्होंने 1953 और 1956 में सदन में इस बात पर भी और अधिक जोर देते हैं कि वास्तविक तौर पर कृषक लोन और प्राकृतिक आपदा लोन का वितरण सही ढंग से नहीं होने के कारण आधी से अधिक आबादी रिलीफ से वंचित रह जाती हैं, जिसकी वजह से उनपर दोहरी मार पड़ती है। इसके अतिरिक्त बाढ़ के कारण लोग अधिक संख्या में महामारी से मर जाते हैं। डिस्पेंसरी सेंटर और फ्लोटिंग बोट डिस्पेंसरी की संख्या भी बाढ़ प्रभावित इलाके में बढ़ाई जाए, जिससे लोगों को सुविधा हो और उनकी जान बचाई जा सके।

कोसी के सवालों को उठाने वालों में स्वतंत्रता सेनानी भूपेंद्र नारायण मंडल, लहटन चौधरी, गुलाब लाल दास आदि नायक शामिल थे। आज जरूरी है यह सीखने की कि किस प्रकार हमारे पुरखों और पूर्व के नायकों ने कोसी के सवालों को सम्मान, आत्मसम्मान और स्वाभिमान से जोड़कर लड़ाई लड़ी और परिवर्तन की लकीर आजाद भारत में खींचने का प्रयास किया।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

रमेश कुमार

लेखक मूलतः बिहार में कोसी क्षेत्र के सहरसा जिले के सुदूर देहात इलाके के रहने वाले हैं तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पीएचडी शोधार्थी हैं। इनके अध्ययन के केंद्र में कोसी नदी से जुड़े विषय शामिल हैं।

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