आलू का बीजड़ काटने आई कुर्मी जाति की अनारकली देवी को चाय की पेशकश की गई तो उन्होंने हाथ जोड़कर कहा– “बिट्टी आज हमार हरि उठनी एकादशी के उपवास (व्रत) अहै। आज तोहार चाय नाहीं पियब।” वहां मौजूद सभी लोग ताज़्ज़ुब से हंसने लगे। आगे का सवाल-जवाब कुछ यूं है–
लेकिन दादा (महिला के दिवंगत पति) तो बड़े पुरुख के पुजेर रहेन, तू विष्णु के पूजा कैसेन करै लागिउ? (आपके दिवंगत पति तो बड़े पुरुख, एक मुस्लिम पीर के पुजारी थे, आप विष्णु की पूजा कैसे करने लगीं?)
पूजत तौ रहेन बचवा, लेकिन अब, ओन तौ अहैं नाही, तो उनकै ऊ जानैं, हमारि हम जानी। (पूजा तो होती ही थी। लेकिन अब वे तो हैं नहीं, तो जो उन्होंने किया उसका फल उन्हें मिला, और अब मैं अपने लिए पूजा कर रही हूं।)
अरे तौ एकादशी शुरू कैसे करिउ ई तौ बतावा। (आपने एकादशी का व्रत रखना कैसे प्रारंभ किया?)
दुई साल से रहै लागे। तिउरिस साल जब भैया (बेटे को भैय्या बुलाती हैं) सत्यनारायन के कथा सुने रहें तौ पण्डित जी बताये रहेन कि आपन जनम बनावै ख़ातिर, बैकुण्ठ पावै ख़ातिर एकादशी के व्रत रहै चाही। तबै से रहै लागे। स्वाती (नातिन) सबेरे से तुलसी माई के सजावति अहैं। संझा के तुलसी विवाह होये। (दो साल से कर रही हूं। तीन साल पहले बेटे ने सत्यनारायण कथा करवाया था, जिसमें पंडित ने कहा था कि अपना जन्म सफल करने और स्वर्ग पाने के लिए एकादशी का व्रत रखना चाहिए। तब से रख रही हूं। सुबह से मेरी नातिन तुलसी माई को सजा रही है, शाम को उसका विवाह होना है।)
तो शालिग्राम भी ले आयी हो क्या?
नाही। पण्डित जी बताये रहे कि केला के पेड़ में भगवान विष्णु के वास माना जात है। तौ केला के पेड़े से तुलसा के विवाह करवावा जाये।
तब से एक बच्चे ने पूछा– लेकिन विष्णु की शादी तो लक्ष्मी से हुई थी दादी, फिर आप तुलसी से क्यों करवा रही हो?
अरे बचवा भगवान तुलसी के वरदान दिहे रहेन, पति रूप में पावै के, इहि बिना उनकै विवाह करवावा जात है।
संझा के तुहूं प्रसाद पावै आया, ठीक बा ना। (भगवान ने तुलसी को पति रूप में पाने का वरदान दिया था, इसलिए उनका विवाह कराया जाता है। शाम को तुम भी आना प्रसाद खाने।)
और फिर शाम को उनके यहां तुलसी का विवाह केले के पेड़ के साथ संपन्न होता है। स्त्रियां विवाह गीत गाती हैं–
“तुलसी लहरिया लेई हों
राम तोहरे अंगनवा
कब हो तुलसी कै जनम भये हैं
कब होय गई दुइ पात हो, राम तोहरे …
सावन म तुलसी के जनम भये हैं
अरे भादव भयी दुई पात हो …”
(राम तुम्हारे आंगन में, तुलसी लहरा रही हैं। तुलसी का जन्म कब हुआ है, और तुलसी कब दो पत्तों वाली हुई हैं। तुलसी का जन्म सावन महीने में हुआ है और वह दो पत्तों वाली भादो महीने में हुई हैं।)

हरि प्रबोधिनी एकादशी और तुलसी विवाह का मिथ
पद्म पुराण, स्कंद पुराण, नारद पुराण, भागवत पुराण में वृंदा, जलंधर और विष्णु की कहानी का विस्तार से वर्णन किया गया है। कथा है कि असुर राजा जलंधर का विवाह का दैत्यराज कालनेमि की पुत्री वृंदा से हुआ था। जलंधर के बल पराक्रम से देवता भयभीत थे। कोई भी देवता उसे युद्ध में हरा नहीं पा रहा था। पुराणों में जलंधर के पराक्रम को वृंदा के सतीत्व से जोड़कर कहा गया कि वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय है और जब तक वृंदा का सतीत्व (यौन शुचिता) भंग नहीं होगी तब तक जलंधर की हार नहीं होगी। इसलिए सारे देवताओं ने मिलकर योजना बनाई। जलंधर को हराने के लिए एक उपाय निकाला गया। विष्णु ने जलंधर का रूप धर वृंदा के साथ दुष्कर्म किया। और तब देवताओं ने मिलकर उसकी हत्या कर दी। वृंदा ने विष्णु को उनकी काली नीयत की तरह काले रंग का हो जाने का श्राप देकर आत्मदाह कर लिया। कहा जाता है कि वृंदा ने जिस जगह पर आत्मदाह किया था, उस जगह पर तुलसी का पौधा उग आया। शालिग्राम (काले पत्थर) को विष्णु का शापित रूप माना जाता है। इस तरह यौन पीड़िता को उसके यौन उत्पीड़क के साथ विवाह करवा देने की सामाजिक प्रथा चल पड़ी।
मिथक, सत्ता और समाज के संबंधों को परिभाषित और स्थापित करते हैं। इस दृष्टिकोण से विचार करें तो दलित बहुजन समाज में विष्णु पूजा व्रत और तुलसी विवाह का बढ़ता चलन बलात्कार और बलत्कृता के वैवाहिक संबंधों को ही नहीं, बल्कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को भी मान्यता प्रदान करता है। ख़ासकर धर्म रक्षा के संबंध में। हाल के दिनों में जिस तरह से मुस्लिम स्त्रियों को कथित भगवा धर्मरक्षकों द्वारा टारगेट किया जा रहा है, उन्हें खुलेआम बलात्कार की धमकियां दी जा रही हैं, वह इसी बात की मुनादी है कि धर्म रक्षा के लिए बलात्कार जैसे अपराध भी ज़ायज़ हैं। कुछ साल पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में गोरखपुर में एक सार्वजनिक मंच से मुस्लिम स्त्रियों को क़ब्र से निकालकर बलात्कार करने की बात कही गई थी। गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानों के गैंगरेप के आरोपियों को न सिर्फ़ सरकार द्वारा छोड़ दिया गया बल्कि उनकी रिहाई पर सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों द्वारा उनका फूलों की माला पहनाकर, मिठाई खिलाकर स्वागत किया गया। इस घटना के आरोपी भाजपा और बजरंग दल के सक्रिय कार्यकर्ता थे।
बलात्कारी से विवाह और न्यायपालिका
हाल के दिनों में देश की न्यायपालिका द्वारा पीड़िता को अपने बलात्कारी से विवाह करने का सुझाव देने के कई मामले सामने आये हैं। मार्च 2021 में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी समाचार की सुर्खियों में थी। यह एक स्कूली छात्रा से बलात्कार के आरोपी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिकल प्रोडक्शन कम्पनी में टेक्नीशियन मोहित सुभाष चव्हाण की ज़मानत याचिका से संबंधित थी। इस मामले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने अभियुक्त से पूछा था– “अगर आप (पीड़िता से) शादी करना चाहते हैं तो हम आपकी मदद कर सकते हैं। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपकी नौकरी चली जाएगी, आप जेल जाएंगे। आपने लड़की के साथ छेड़खानी की, उसके साथ बलात्कार किया है।” गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया था कि पीड़िता जब पुलिस के पास गई तो अभियुक्त की मां ने पीड़िता से शादी का प्रस्ताव दिया था, जिसे पीड़िता ने साफ़ इंकार कर दिया था।
इसी तरह 20 फरवरी, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी को इस शर्त पर जमानत दी कि वह रिहाई के तीन महीने के भीतर पीड़िता से शादी कर लेगा। आरोपी नरेश मीणा ने लड़की को पुलिस में भर्ती करवाने का झांसा देकर उसका यौन उत्पीड़न किया था। लड़की से उसने 9 लाख रुपए ऐंठे थे और उसका आपत्तिजनक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करके उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाई थी।
16 मई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा करके बलात्कार करने के दोषी व्यक्ति की 10 साल की सज़ा को निलंबित कर दिया था, क्योंकि पीड़िता और रेपिस्ट शादी को राज़ी हो गए हैं। यह फ़ैसला न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा की पीठ ने दिया था।
इसी तरह जून, 2015 में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी. देवदास ने अपने फ़ैसले में पीड़िता को बलात्कारी से समझौता करने का सुझाव दिया था। इससे पीड़िता ने मना कर दिया था। लेकिन फिर 6 महीने बाद पीड़िता को अपने बलात्कारी से विवाह करने के लिए मज़बूर होना पड़ा। बता दें कि आरोपी ए. मोहन ने साल 2008 में एक नाबालिग (15 साल की लड़की) के साथ बलात्कार किया था। 2012 में कुड्डालोर महिला न्यायालय ने उसे 7 साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। इसके बाद दोषी ने मद्रास हाईकोर्ट का रुख़ किया था, जिसके बाद जस्टिस पी. देवदास ने यह अज़ीबो-ग़रीब आदेश दिया था।
व्रत खाये-अघाये लोगों का प्रपंच है
अमूमन दलित-बहुजन समाज की स्त्रियां कोई ब्राह्मणवादी व्रत नहीं रखती थीं।, न ही पूजा-पाठ और कर्मकांड करती थीं। इसके पीछे का कारण यह है कि वे दूसरे के खेतों में सारा दिन मज़ूरी खटती हैं। फिर खेतों में जाने से पहले और खेतों से लौटने के बाद चूल्हा-चौका बर्तन सब करना पड़ता है। मवेशियों के लिए हरा चारा और चूल्हे के लिए जलावन तक की व्यवस्था करनी पड़ती है। कुल-मिलाकर दिन भर में उन्हें 15-17 घंटे हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। यदि वे व्रत-उपवास रखने लगीं तों इतनी मेहनत नहीं कर पाएंगी।
वरिष्ठ साहित्यकार कुमार मुकुल कहते हैं कि “व्रत उपवास खाये-अघाये लोगों का प्रपंच है। जिन वर्गों के लोगों को पहले से ही भर-पेट खाना नहीं नसीब हो रहा है, वे क्यों रखेंगे व्रत उपवास। लेकिन अब पूंजी के साथ ब्राह्मणवादी बुराइयों ने भी इन वर्गों में घुसपैठ की है।”
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि समाज में इनको फिर से क्यो पुनर्स्थापित किया जा रहा है। झूंसी निवासी नरेंद्र तिवारी कहते हैं कि पहले सार्वजनिक तौर पर पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड करने में लोगों को एक झिझक हुआ करती थी। लोगों को लगता है कि यह निजी, गोपनीय और घर के भीतर की चीज़ है। लेकिन इस सरकार में लोगों की हिंदू धर्म में आस्था मज़बूत हुई है।
यहां एक चीज़ यह समझने की है कि लोगों के बीच धार्मिक आस्था पहले भी थी, लेकिन लोगों के देवी-देवता अलग अलग थे। दलित बहुजन जातियों में स्थानीय ग्राम देवियों, काली, भैरव या बड़े पुरुख और गाज़ी मियां की पूजा की जाती थी। लेकिन अब सरकार द्वारा जगह-जगह गाज़ी मियां की मज़ारों पर बैन लगाने से और हिंदू देवताओं की पूजा को प्रोत्साहन और आर्थिक सहयोग देने से चीज़े बदल रही हैं। हिंदू धर्म में भी अधिकांश लोग शिव, कृष्ण और देवी में आस्था रखते थे। लेकिन अब उनके समानांतर राम और विष्णु जैसे देवताओं को स्थापित किया जा रहा है, जिनके साथ ब्राह्मणवाद ज़्यादा मज़बूत होता दिखता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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