डॉ. बी.आर. आंबेडकर 6 दिसंबर, 1956 को 65 साल की उम्र में चल बसे। अपने जीवनकाल में वे समाज के विभिन्न क्षेत्रों के अनेक लोगों से मिले और उनसे संवाद किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे आम लोगों के हिमायती थे और हम सब जानते हैं कि वे लगातार यह प्रयास करते रहे कि भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले ज्यादा-से-ज्यादा समुदायों के लोगों से उनके संपर्क-संबंध बना सकें। इसी के चलते वे मुसीबतजदा मनुष्यों की मुक्ति के काम में इतना अहम योगदान दे सके।
एक राजनीतिक नेता के बतौर वे अलग-अलग विचारधाराओं के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनेताओं से मिले। इनमें शामिल थे– ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम, विंस्टन चर्चिल, हेरोल्ड लास्की, डब्ल्यू.ई.बी.डू बॉयज, एमन डे वलेरा और गांधी। वे अनेक धार्मिक नेताओं से भी मिले, जिनमें पोप (1930 के दशक में) से लेकर आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद तक शामिल थे। पोप के साथ उनकी मुलाकात इतनी चर्चित हुई कि ‘टाइम’ पत्रिका ने लिखा कि डॉ. आंबेडकर “शायद ऐसे एकमात्र जीवित व्यक्ति हैं जो पोप के साथ निजी मुलाकात के बाद झुंझलाते हुए बाहर निकले।” वह इसलिए क्योंकि पोप ने उनसे कह दिया था कि अछूतों के साथ दुर्व्यवहार का इलाज करने में तीन से चार सदियों का समय लगेगा।[1]
हम में से कई आंबेडकर की राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के साथ मुलाकातों के बारे में जानते हैं। मगर बहुत कम लोग राजनीति और धर्म से इतर क्षेत्रों के समकालीन अहम किरदारों से डॉ. आंबेडकर की मेल-मुलाकातों से वाकिफ हैं। अपने एक लेख[2] में मैंने फिल्म, थिएटर और संगीत के क्षेत्रों के मर्मज्ञों से बाबासाहेब की मुलाकातों का ब्यौरा दिया था। इस लेख में मैं उनके दौर के शीर्ष वैज्ञानिकों से मुलाकातों के बारे में बताने का प्रयास करूंगा।
मैंने जो भी थोड़ा बहुत शोधकार्य किया है, उससे मुझे कम-से-कम चार अग्रणी भारतीय वैज्ञानिकों से डॉ. बी.आर. आंबेडकर की मेल-मुलाकातों और उनके बीच संवाद के दस्तावेजी सबूत मिले हैं। ये वैज्ञानिक थे– डॉ. मेघनाद साहा, सर सी.व्ही. रमन, जी.डी. नायडू और होमी जहांगीर भाभा। इस लेख में मैं इन मुलाकातों का कुछ विस्तार से वर्णन करने का प्रयास करूंगा। शुरुआत प्रोफेसर साहा से।
मेघनाद साहा और आंबेडकर
प्रसिद्ध खगोलभौतिकीविद् (एस्ट्रोफिजिसिस्ट) डॉ. मेघनाद साहा का जन्म ढाका (अब बांग्लादेश की राजधानी) के नज़दीक शेओरातली नामक गांव में एक निम्न-जाति परिवार में 6 अक्टूबर, 1893 को हुआ था।[3] कुछ लोगों का मानना है कि वे तत्समय अछूत माने जाने वाले नामशूद्र समुदाय से थे। उनके घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वे किसी अच्छे स्कूल में दाखिला ले पाते। मगर वे अपनी धुन के पक्के थे और उन्होंने अपने परिश्रम से अनेक वजीफे हासिल किए और उनके सहारे उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से मिक्स्ड मैथमेटिक्स में एमएससी की डिग्री हासिल की। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने 1919 में उन्हें उनके शोधप्रबंध “ऑन द ओरिजिन ऑफ़ लाइन इन स्टेलर स्पेक्ट्रा” पर डीएससी की उपाधि प्रदान की।
डॉ. साहा को उनके इंक़लाबी ‘साहा आयोनाईज़ेशन इक्वेशन’ के लिए जाना जाता है, जो एस्ट्रोफिजिक्स में आज तक इस्तेमाल हो रहा है और असंख्य पीढ़ियों तक होता रहेगा। साहा की इस खोज ने सितारों के प्रकाश के विश्लेषण से उनका रासायनिक संयोजन और तापमान का पता लगाना संभव बनाया। उसके पहले तक सितारों से निकलने वाली रोशनी विज्ञान के लिए एक रहस्य थी। जब साहा ने यह खोज की तब वे मात्र 27 साल के थे।
साहा के ‘आयोनाईज़ेशन इक्वेशन’ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए महान भौतिक वैज्ञानिक सर आर्थर एड्डिंगटन ने लिखा, “प्रोफेसर साहा का थर्मल आयोनाईज़ेशन सिद्धांत, सन 1596 में फेब्रिसिअस द्वारा पहले वेरिएबल स्टार (ऐसा सितारा जिसके प्रकाश की तीव्रता घटती-बढ़ती रहती है) मीरा सेटी की खोज से लेकर अब तक खगोलभौतिकी के क्षेत्र के 12 मील के पत्थरों में से एक है।”[4] यह दिलचस्प है कि प्रोफेसर साहा को सात बार भौतिकशास्त्र में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था, जिनमें से एक नामांकन इस इक्वेशन की खोज के लिए भी था।

विज्ञान के क्षेत्र में प्रोफेसर साहा का योगदान यहीं तक सीमित नहीं था। उन्हें भारत के पहले साइक्लोट्रोन की स्थापना के लिए भी जाना जाता है। साइक्लोट्रोन एक कण त्वरक (पार्टिकल एक्सीलेटर) है जो आवेशित कणों को विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके अत्यधिक उच्च गति और ऊर्जा तक त्वरित करता है, जिससे वे सर्पिल पथ में घूमते हुए ऊर्जा प्राप्त करते हैं। साहा ने भारतीय कैलेंडर प्रणाली में भी सुधार करने का प्रयास किया। उन्होंने प्रस्ताव किया कि शक संवत को एकीकृत राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में अपनाया जाना चाहिए। यहां यह बताना समीचीन होगा कि अधिकांश शक, बौद्ध धम्म समर्थक थे। इसके अलावा उन्होंने अनेक संस्थाओं की स्थापना की, जिनमें इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस शामिल है। सन् 1949 में उन्होंने कलकत्ता में इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फिजिक्स की स्थापना की, जिसे बाद में साहा इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर फिजिक्स (एसएनआईपी) का नाम दिया गया और जो भारत में न्यूक्लियर और पार्टिकल फिजिक्स में शोध का केंद्र बना।
डॉ. मेघनाद साहा और डॉ. आंबेडकर की ऐसी पहली मुलाकात, जिसका दस्तावेजी सबूत उपलब्ध है, 1943-44 में तब हुई जब डॉ. आंबेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद् में श्रम सदस्य (1942-1945) थे। एस.बी. कर्मोहापात्रा के अनुसार, साहा और आंबेडकर आगे भी कई मौकों पर दामोदर नदी घाटी परियोजना पर चर्चा के लिए मिले।[5]
इन मुलाकातों की अहमियत ठीक ढंग से समझने के लिए ज़रूरी है कि हम बंगाल में बाढ़ के लंबे सिलसिले के संदर्भ में इन्हें देखें। सन् 1871 के बाद से बंगाल में बड़े और छोटे पैमाने पर लगातार बाढ़ आई। इनमें से 1881, 1922 और 1943 की बाढ़ प्रलयंकारी थी। इन बाढ़ों से होने वाली बर्बादी के डॉ. साहा अपने बचपन से ही प्रत्यक्ष साक्षी थे। वे चाहते थे कि बंगाल में बहने वाली विशाल नदियों के बहाव को नियंत्रित करने के लिए उपाय किए जाएं। इस मामले में उनकी सोच को प्रमोद व्ही. नायक ने निम्न शब्दों में वर्णित किया है–
“भूमि के समतल होने और नदियों की अपेक्षाकृत कम लंबाई के चलते बाढ़ का पानी कई अलग-अलग धाराओं में बह कर जाता था। इसके नतीजे में काफी कम समय में बड़े पैमाने पर डेल्टा निर्मित हुए और धरती में बदलाव हुए, जिससे खेती, साफ़-सफाई और जनसंख्या वितरण संबंधी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो गईं। इसे वर्तमान एवं सुदूर अतीत की स्थिति की तुलना कर आसानी से समझा जा सकता है। … सन् 1787 के पहले बंगाल की नदी प्रणाली ऐसी थी कि बाढ़ का पानी पूरे प्रांत में समान मात्रा में बंट जाता था और मलेरिया एवं मिट्टी के कटाव की समस्याएं अधिक गंभीर नहीं थीं।
“… साहा ने सुझाव दिया कि इनका तात्कालिक एवं स्थाई, दोनों दृष्टियों से हल यह है कि नदी प्रणाली को जहां तक संभव हो सके पुनः 1787 की स्थिति में ले आया जाए। इसके लिए अभूतपूर्व पैमाने पर इंजीनियरिंग काम किए जाने की आवश्यकता थी।”[6]
सन् 1943 में बंगाल में प्रलयंकारी बाढ़ आई, जिससे कलकत्ता तीन महीने तक शेष देश से कटा रहा। वह द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था और भारत के पूर्वी भाग पर जापानी सेना के हमले का खतरा मंडरा रहा था। इस कठिन घड़ी में डॉ. साहा ने बाढ़ से जुड़ी समस्याओं पर रोशनी डाली। उन्होंने हालात की गंभीरता का विवरण प्रस्तुत करते हुए पत्रिकाओं में कई लेख लिखे। प्रोफेसर साहा के लेखों आदि की प्रतिक्रिया में बंगाल सरकार ने दामोदर बाढ़ जांच समिति की नियुक्ति की। वर्द्धमान के महाराजा को समिति का अध्यक्ष बनाया गया और प्रोफेसर साहा व एन.के. बोस इसके सदस्यों में शामिल थे।
प्रोफेसर साहा ने सुझाव दिया कि दामोदर नदी प्रणाली का इस्तेमाल एक बहुउद्देश्यीय परियोजना के लिए किया जा सकता है, जिससे न केवल नदी के प्रवाह नियंत्रित होगा बल्कि विद्युत उत्पादन सहित कई अन्य लाभ भी हो सकते हैं। लेकिन दुखद यह कि युद्ध से जनित अनिश्चितताओं के चलते सारी प्रक्रिया थम गई। इन नाजुक हालातों के बीच डॉ. साहा ने बाबासाहेब आंबेडकर से मुलाकात की और आसन्न संकट से निपटने के लिए सुझाव दिए। डॉ. आंबेडकर ने डॉ. साहा के सुझावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और तुरंत पुनर्निर्माण की एक विशाल परियोजना की शुरुआत की। ‘साइंस एंड कल्चर’ पत्रिका में लिखते हुए प्रो. साहा ने इस मामले में श्रम मंत्रालय की पहलों और प्रयासों की सराहना की और टिप्पणी की– “भारत सरकार का श्रम विभाग एक ऐसी परियोजना का गंभीरतापूर्वक क्रियान्वयन करने के लिए बधाई का पात्र है, जो भारत में अपने प्रकार की पहली परियोजना है।”[7]
वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के श्रम सदस्य के रूप में आंबेडकर ने विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक योगदान दिया, जिनमें सिंचाई, जलमार्ग एवं जल निकास, अंतर्देशीय परिवहन, विद्युत ऊर्जा, नदी घाटी प्राधिकरण, नदी घाटियों का बहुउद्देशीय एवं क्षेत्रीय विकास, तकनीकी विशेषज्ञ संस्थानों की स्थापना इत्यादि शामिल थे। उन्होंने राष्ट्र स्तरीय पुनर्निर्माण योजना, युद्ध की समाप्ति के बाद के लिए आर्थिक योजना व कई अन्य मसौदे तैयार किए, जिनसे देश के बड़े पैमाने पर औद्यागिकीकरण की ठोस नींव रखी जा सकी।[8]
डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में शुरू की गई नदी घाटी परियोजनाओं की चर्चा करते हुए भारत सरकार के केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया–
‘सन् 1944-46 के दौरान जिन नदी घाटी परियोजनाओं पर श्रम विभाग सक्रियता से विचार कर रहा था वे थीं– दामोदर नदी घाटी परियोजना, सोन नदी घाटी परियोजना, महानदी सहित उड़ीसा की नदियों से संबंधित परियोजनाएं, बिहार में कोसी नदी से संबंधित परियोजना और चंबल व दक्खन की नदियों से जुड़ी परियोजनाएं। इन परियोजनाओं को कई उद्देश्यों की एक साथ पूर्ति के लिए बनाया गया था। इनमें शामिल थे– सिंचाई, नदियों के जरिए परिवहन, घरेलू जल आपूर्ति, जल विद्युत का निर्माण आदि। श्रम मंत्रालय को बड़ोदा, जयपुर, काठियावाड़, कच्छ, नवानगर, बूंदी, अवध और मोरवी रियासतों की कम मात्रा में पानी के भंडारण की क्षमता वाले छोटे बांध बनाने में मदद भी करनी थी ताकि जल संरक्षण और बाढ़ से मुक्ति, ये दोनों लक्ष्य हासिल किए जा सकें।
… केंद्र सरकार द्वारा दामोदर घाटी के समन्वित विकास की परियोजना शुरू करवाने में आंबेडकर ने मुख्य भूमिका अदा की। स्वतंत्रता–पूर्व की कैबिनेट के सदस्य बतौर उन्होंने दामोदर घाटी के विकास के प्रस्ताव की जबरदस्त वकालत की। उन्होंने यह निर्देश दिया कि दामोदर घाटी का विकास अमरीका की टेनिसी वैली अथॉरिटी की तर्ज पर किया जाना चाहिए। इस परियोजना का शुरुआती काम आंबेडकर की देखरेख में हुआ। इस प्रकार दामोदर घाटी परियोजना की नींव डाली गई और वह स्वतंत्र भारत की पहली नदी घाटी विकास योजना बनी। संसद के एक अधिनियम के जरिए दामोदर वैली कार्पोरेशन की स्थापना की गई।[9]
श्रम सदस्य (1942-45) के बतौर आंबेडकर का योगदान इतना व्यापक और गहन था कि इस लेख में उसका संक्षिप्त विवरण भी प्रस्तुत करना संभव नहीं है। इसलिए मैंने अपनी बात को केवल आंबेडकर द्वारा नदी घाटी विकास परियोजना की पहल और डॉ. साहा से उनके जुड़ाव तक सीमित रखा है।
जल व नदी घाटी से संबंधित परियोजनाओं के बारे में नीतियां बनाते समय हमेशा की तरह डॉ. आंबेडकर पूरे विषय का गहन अध्ययन करते थे और पुराने कानूनों और नियमों आदि पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर अपनी राय प्रस्तुत करते थे, जो लगभग हमेशा बहुत ज्ञानवर्द्धक और स्पष्ट हुआ करती थी। इस मामले में जाने-माने इंजीनियर सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या से कई मुद्दों पर उनके मतभेद थे। डॉ. आंबेडकर का यह शानदार विश्लेषण आज भी प्रासंगिक है–
ढेर सारे संसाधन होने के बाद भी उड़ीसा इतना गरीब, इतना पिछड़ा और दुखी लोगों से भरा प्रांत क्यों है? इस प्रश्न का जो एकमात्र उत्तर मेरे पास है, वह यह है कि उड़ीसा अपनी जल संपदा का उपयोग करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका अब तक खोज नहीं सका है। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि बाढ़ की समस्या का निदान खोजने के काफी प्रयास किए गए हैं।
… उस साल (1928) से लेकर 1945 तक बाढ़ की समस्या से निपटने के उपाय सुझाने के लिए कई समितियों की नियुक्ति की गई। ‘सन् 1928 में गठित उड़ीसा फ्लड इन्क्वारी कमेटी के अध्यक्ष बंगाल के जाने–माने चीफ इंजीनियर श्री एडम्स विलियम्स थे। सन् 1937 में यह काम श्री एम. विश्वेश्वरय्या के काबिल हाथों में सौंपा गया। इस समिति ने दो रपटें प्रस्तुत कीं – पहली 1937 में और दूसरी 1939 में…
… इन समितियों के सदस्यों के प्रति सम्मान भाव रखते हुए मैं खेदपूर्वक यह कहना चाहूंगा कि उन्होंने समस्या को सही ढंग से नहीं समझा। उनके दिमाग पर यह सोच हावी रही कि अधिक पानी की उपलब्धता एक बुराई है और जब पानी की मात्रा ज्यादा हो तो जो एकमात्र काम किया जा सकता है वह है इस पानी को व्यवस्थित ढंग से समुद्र में वापस पहुंचाना। ये दोनों ही दृष्टिकोण न केवल गलतफहमियों पर आधारित हैं, बल्कि ये जनकल्याण की दृष्टि से खतरनाक हैं।
यह सोचना गलत है कि पानी की विपुल मात्रा किसी भी तरह की बुराई या मुसीबत है। पानी कभी इतना ज्यादा हो ही नहीं सकता कि वो मुसीबत बन जाए। मनुष्य के सामने पानी की अधिकता उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी कि पानी की कमी है। समस्या यह है कि प्रकृति न केवल हमें पानी देने में कंजूसी बरतती है, बल्कि इस पानी का वितरण भी अनिश्चित होता है। कभी सूखा पड़ता है तो कभी तूफान आता है। मगर इससे यह तथ्य नहीं बदलता है कि पानी हमारी कीमती संपदा है। अब चूंकि पानी लोकसंपत्ति है और चूंकि उसका वितरण अनिश्चित है, इसलिए सही दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि हम प्रकृति की शिकायत करने की बजाए पानी को संरक्षित करें।[10]
विधि मंत्री (1947-1951) और भारत के संविधान के मुख्य निर्माता के बतौर डॉ. आंबेडकर ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 में नदियों और नदी घाटी परियोजनाओं के विनियमन में केंद्र सरकार की भूमिका संबंधी प्रावधानों में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। जैसा कि केंद्रीय जल आयोग का एक दस्तावेज कहता है–
आंबेडकर संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष थे। 21 फरवरी, 1948 को जब संविधान का मसविदा प्रस्तुत किया गया तब ही यह स्पष्ट हो गया था कि उस पर आंबेडकर की गहरी छाप है, विशेषकर स्वतंत्र भारत की जल नीति के संदर्भ में। संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 239-242 सन् 1947 में लागू किए गए गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के अनुच्छेद 130-134 से काफी मिलते–जुलते थे। इन सभी अनुच्छेदों में ‘किसी भी प्राकृतिक स्रोत का जल’ इस वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। संविधान के मसविदे की सातवीं अनुसूची की पहली सूची (अर्थात संघ सूची) हालांकि 1935 के अधिनियम से काफी अलग थी। इसमें अंतर्राज्यीय जल मार्गों का विकास संघ सूची में शामिल कर दिया गया था। संबंधित विवरण इस प्रकार है– ‘74. बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जल परिवहन एवं जल विद्युत के उद्देश्य से अंतर्राज्यीय जल मार्गों का विकास’.…
… 9 सितंबर, 1949 को आंबेडकर ने एक संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसके जरिए मसविदे के अनुच्छेद 239-242 में अनुच्छेद 242ए जोड़ा जाना था, यथा– 242ए (1) संसद किसी भी अंतर्राज्यीय नदी अथवा नदी घाटी के पानी के उपयोग, वितरण अथवा नियंत्रण संबंधी विवाद या शिकायत के अधिनिर्णयन के लिए कानून बना सकेगी …
…यह मसविदा अनुच्छेद संविधान का अनुच्छेद 262 बना। इस प्रावधान के अंतर्गत संसद ने अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 और नदी बोर्ड अधिनियम 1956 बनाए। जल विवाद अधिनियम की भूमिका में कहा गया है– “अंतर्राज्यीय नदियों और नदी घाटियों से संबंधित विवादों के अधिनिर्णयन हेतु।” रिवर बोर्ड अधिनियम में प्रविष्टि 56 के संदर्भ में अंतर्राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन और विकास के लिए नदी बोर्डों की स्थापना की व्यवस्था है।[11]
यह सचमुच चौंकाने वाली बात है कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर के इन महती योगदानों को स्वीकार करने की बजाय तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने शुरुआत से ही जानते-बूझते बाबासाहेब का नाम इतिहास के इन गौरवपूर्ण पन्नों से हटाने का प्रयास किया।
लोकसभा में बोलते हुए प्रोफेसर साहा ने कांग्रेस सरकार पर ऐसी परियोजनाओं, जिनके निर्माण में कांग्रेस की शून्य भूमिका थी, का श्रेय लेने के अथक प्रयासों पर निशाना साधते हुए कहा–
“अनेक समितियों के सदस्य के बतौर स्वतंत्रता से पूर्व भारत सरकार से मेरे जुड़ाव के आधार पर मैं यह कहना चाहूंगा कि जो भी रचनात्मक कार्य भारत में हाथ में लिए गए हैं, उनके लिए इस सरकार को कोई श्रेय नहीं दिया जा सकता। जहां तक सिंदरी खाद कारखाने का सवाल है, मैं यह दावा कर सकता हूं कि इस मामले को मैंने 1943 में देश के सामने रखा था। …बंगाल में उस समय बहुत भयावह अकाल पड़ा था और मैंने उसके विषय में ‘साइंस एंड कल्चर’ में एक लेख लिखा था, जिसके बाद मुझसे कहा गया कि मुझे जेल में डाल दिया जाएगा। मैंने लेख में जो कहा था, वह यह था कि देश में भोजन की कमी इसलिए है, क्योंकि हमारे यहां उर्वरकों का प्रयोग नहीं होता और वाइसराय लॉर्ड लिन्लिथगो कृत्रिम उर्वरकों के इस्तेमाल के खिलाफ थे।
यह लेख वाइसराय की कैबिनेट के समक्ष आया और सर रामास्वामी मुदलियार ने इस मामले को उठाया। सर जेम्स पिटकेथली एवं दो भारतीयों की सदस्यता वाली एक समिति इस पूरे मुद्दे पर विचार करने के लिए गठित की गई। इस समिति ने सभी जरूरी योजनाएं तैयार कीं, परंतु यह काम जब खत्म हुआ तब तक कांग्रेस की सरकार आ चुकी थी और ये योजनाएं उसके समक्ष प्रस्तुत की गईं। आशंका यह थी कि इन योजनाओं को सिरे से खारिज कर दिया जाएगा क्योंकि एक बहुत महान कांग्रेस नेता ने कहा था कि, “हमारे देश में पर्याप्त गोबर उपलब्ध है और इसलिए कृत्रिम उर्वरकों की हमें जरूरत नहीं है।”
… अंततः हुआ यह कि दिवंगत डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण गोबर की उपलब्धता वाले तर्क को बहुत वजन नहीं दिया गया। डॉ. मुखर्जी का कहना था कि योजना तैयार है। उस पर कुछ काम हो भी चुका है और हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह काम खत्म हो। यह है सिंदरी खाद कारखाने की पूरी कहानी और इसके निर्माण का श्रेय आज की कांग्रेस सरकार ले रही है …
यही बात दामोदर घाटी परियोजना, भाखड़ा नांगल परियोजना और अन्य परियोजनाओं के मामले में भी सही है जिनके निर्माण का सारा श्रेय कांग्रेस सरकार ले रही है। इन नदी घाटी परियोजनाओं के निर्माण का श्रेय अगर किसी को दिया जाना है तो डॉ. आंबेडकर को दिया जाना चाहिए।
एक माननीय सदस्य : या अंग्रेजों को?
श्री मेघनाद साहा : वे (डॉ. आंबेडकर) वाइसराय की परिषद के सदस्य थे। उन्होंने इस पूरे काम को देखा, समझा और उसकी नींव रखी। इस सरकार ने जो किया है वह सिर्फ यह है कि चीजों को बिगाड़ा है।
श्री अल्गू राय शास्त्री : वे उस समय सरकार में थे या नहीं?
श्री मेघनाद साहा : हां, उस समय (थे)।
श्री शंकर शांताराम मोरे : आपकी (सरकार) में नहीं।
श्री मेघनाद साहा : वे (डॉ. आंबेडकर) वाइसराय की कैबिनेट में ईंधन और ऊर्जा मंत्री थे… मैं इस मिथक का पर्दाफाश करना चाहता हूं कि जो भी रचनात्मक काम इस देश में हुए हैं, उनके लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। वस्तुत: कांग्रेस सरकार ने केवल सामुदायिक परियोजनाओं और कई अन्य मदों में पैसा ही बर्बाद किया है। आपको इस देश का औद्योगिकीकरण करना है, इस बारे में आपको विचार करना चाहिए, पर आपने अब तक यह नहीं किया है।
एक अन्य मौके पर प्रोफेसर साहा ने जोर देकर लोकसभा में कहा–
बांबे प्लानर्स ने औद्योगिकीकरण के लिए 2500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है और हमें केवल 306 करोड़ की मामूली रकम उपलब्ध करवाई गई है। इसमें उद्योगों की स्थापना पर होने वाला खर्च तो शामिल है ही, इसमें ऊर्जा और सिंचाई पर खर्च का आधा हिस्सा भी शामिल है। इसमें से 94 करोड़ हमें सार्वजनिक क्षेत्र से लेने हैं। कुल जमा मिलाकर हमें लगता है कि औद्योगिकीकरण को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। हां, सरकार के पास… सिंदरी खाद कारखाना है, लेकिन वह सरकार के कारण नहीं है, वह रामासामी मुदलियार की पहल के कारण है।
…हमारे पास नदी घाटी परियोजनाएं भी हैं, बहुउद्देशीय परियोजनाएं भी हैं, मगर मैं यह कहना चाहूंगा कि इन बहुउद्देशीय परियोजनाओं में (कांग्रेस सरकार द्वारा) बहुउद्देशीय भ्रष्टचार हुआ है। ये (नदी घाटी परियोजनाएं) भी मेरे मित्र डॉ. आंबेडकर की पहल का नतीजा हैं।[12]
आंबेडकर की तरह प्रोफेसर साहा को भी जीवन भर जातिवाद का दंश झेलना पड़ा। जब वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के ईडन हॉस्टल में रहते थे तब उच्च जातियों के विद्यार्थियों ने उनके साथ खाना खाने से इनकार कर दिया था। जैसा कि प्रमोद नायक लिखते हैं, “उनके जीवन की कुछ स्मृतियां बहुत कसैली थीं। एक बार सरस्वती पूजा के एक कार्यक्रम में एक पुजारी ने उनसे बहुत बद्तमीज़ी से मंच से नीचे उतर जाने को कहा, क्योंकि वे (भारतीय जाति प्रथा की बेवकूफाना सिद्धातों के तहत) किसी उच्च जाति से नहीं थे। एक छोटे से स्वाभिमानी बच्चे पर इस तरह के व्यवहार का क्या असर पड़ सकता है, यह समझना मुश्किल नहीं है। उस दिन के बाद से मेघनाद ने पूजा-अर्चना में भाग लेना बंद कर दिया।”[13]
प्रोफेसर अनिर्भान पाठक कहते हैं, “साहा स्वयं जाति-व्यवस्था से पीड़ित थे और ऐसे में उनका उसके खिलाफ होना स्वाभाविक था। उन्होंने कभी जाति-व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया और उस पर मूलभूत प्रश्न उठाए जैसे, ‘एक अशिक्षित पंडित, जो बिना अर्थ समझे संस्कृत में मंत्रोचारण करता है, उसे भला समाज में किसी मोची या जुलाहे से अधिक सम्मान क्यों मिलता है?’”[14]
‘भारतबर्ष’ नामक बांग्ला पत्रिका में प्रकाशित अपने लेखों में डॉ. साहा ने जाति प्रथा पर तीखे हमले किए। उनका कहना था कि जाति प्रथा का एक बहुत नुकसानदेह नतीजा है दिमाग और हाथों के बीच पूर्ण संबंध विच्छेद, जिसने देश की प्रगति पर गंभीर विपरीत प्रभाव डाला है। साहा के शब्दों का प्रोफेसर अनिर्भान पाठक द्वारा किया गया अनुवाद निम्नानुसार है–
मैं इस पूरे मसले को एक अलग परिप्रेक्ष्य से देखता हूं। मेरी राय में जाति प्रथा ने हमारे दिमाग और हमारे हाथों के बीच के जुड़ाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया है, जिसके चलते भौतिकतावादी, आधुनिक सभ्यता के निर्माण में हम यूरोप और अमरीका के पीछे रह गए हैं। मध्यकाल से ही भारतीय बुद्धिजीवी अपने किताबी ज्ञान का बखान करते आए हैं। उनके अमूर्त ज्ञान की गहराई निसंदेह प्रभावित करने वाली थी, मगर असली जीवन से उनका तनिक भी लेना–देना नहीं था। उद्योग और व्यापार के विकास के लिए प्रयास करने का विचार तक उनके मन में कभी नहीं आया। शायद अगर वे ऐसा करते तो उन्हें अपने समुदाय (जाति) से बाहर कर दिया जाता।
… इसी तरह योद्धा भी जो अस्त्र–शस्त्र उन्हें उपलब्ध थे, उनके इस्तेमाल में अपने कौशल दिखाते रहे, अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहे। उन्होंने कभी अन्य देशों में विकसित हो रही नई तकनीकों और तरकीबों को सीखने या अपनाने की कोशिश नहीं की। भारत ने एक लंबे समय तक किसी उपयोगी तकनीक या प्रक्रिया की खोज नहीं की। वह इसलिए क्योंकि यहां दिमागी काम को हाथ से किए जाने वाले काम से ऊंचा दर्जा दिया जाता है। इससे दिमाग और हाथों का संबंध ही ख़त्म हो गया है।
….आज किसी अमरीकी प्रोफेसर या विद्यार्थी को बढ़ई या अन्य किसी कारीगर का काम करने में कोई गुरेज नहीं होता है, मगर भारतीय विद्यार्थियों को वह मंज़ूर नहीं है। जब तक हमारे बुद्धिजीवी स्वयं मशीनों से काम नहीं करेंगे और हमारे तकनीशियन, बुद्धिजीवियों के निकट संपर्क में नहीं आएंगे तब तक हम अमरीका और यूरोप की तरह नई मशीनों और नई तकनीकों का विकास नहीं कर सकेंगे।[15]
यह दिलचस्प है कि आंबेडकर और साहा के विचार प्रक्रिया और दृष्टिकोण में कई समानताएं हैं, जो हमारा ध्यान खींचतीं हैं। इनमें शामिल हैं– धर्मशास्त्र और अंधविश्वासों की समालोचना; गरीबी और भूख की समस्यायों से निपटने में विज्ञान और तकनीकी की उपादेयता पर जोर और बीमा क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण और नमक पर टैक्स की वापसी। दोनों ने गांव और असमानता पर आधारित वर्ण-जाति प्रथाओं से गांधी के पागलपन की हद तक प्रेम पर तीक्ष्ण हमले किए। इस मसले पर लिखने को बहुत कुछ है। साहा और आंबेडकर की वैचारिक समानताओं का और विस्तृत विवरण मैं अपने अगले लेख में प्रस्तुत करूंगा।
जी.डी. नायडू और आंबेडकर
गोपालस्वामी डोरेस्वामी नायडू का जन्म 23 मार्च 1893 को तब के मद्रास प्रांत और आज के तमिलनाडु के कोयम्बटूर से करीब 26 किलोमीटर दूर स्थित कलंगल नाम के गांव में हुआ था। जी.डी. नायडू की जीवनगाथा दिलचस्प भी है और असाधारण भी, क्योंकि विज्ञान में कोई औपचारिक शिक्षा या प्रशिक्षण हासिल न करने के बावजूद उन्होंने विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में ज़बरदस्त योगदान दिया।
जी.डी. नायडू के योगदान पर चर्चा करते हुए आर. अखिलेश लिखते हैं–
वे (जी.डी. नायडू) सुबह खेतों में काम करते थे और शाम को तमिल में किताबें पढ़ते थे। वे स्व–शिक्षित थे। जब वे 20 साल के थे तब उन्होंने पहली बार तब मोटरसाइकिल देखी जब उस पर सवार एक अंग्रेज़ अधिकारी उनके गांव से गुज़रा। यह देख कर उनके आश्चर्य की सीमा न रही कि वह गाड़ी घोड़े या बैल द्वारा खींचे जाने की बजाय अपने–आप चल रही थी … वे कोयम्बटूर चले गए और वहां छोटे–मोटे काम करने लगे। उन्हें एक रेस्टोरेंट में वेटर की नौकरी मिल गई और तीन साल में उन्होंने एक दो–पहिया वाहन खरीदने लायक तीन सौ रुपए बचा लिये। उन्होंने गाड़ी खरीदी और वह कैसे अपने–आप चलती है यह समझने के लिए उसके सभी कल–पुर्जे पहले खोले और फिर जोड़े।
बेल्जियम की अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने खिलौने की कार की मोटर को दाढ़ी बनाने के रेजर से जोड़ कर ‘रसंत इलेक्ट्रिक रेजर’ बना डाला। अपने इस अविष्कार को उन्होंने यूरोप में पेटेंट करवाया और फिर जर्मनी से मोटर, स्विट्ज़रलैंड से बाहरी खोल और स्वीडन से स्टील आयात कर बड़े पैमाने पर रसंत इलेक्ट्रिक रेजर का निर्माण शुरू किया। पहले ही महीने में लंदन में 7,500 रसंत इलेक्ट्रिक रेजर बिक गए। सन् 1940 के दशक में लंदन और अमरीका की पत्रिकाओं में नायडू के रेजर के विज्ञापन छपे।
इसके अलावा उन्होंने वोट दर्ज करने की मशीन, संतरे का रस निकालने का उपकरण, सिक्के डाल कर चलने वाले फोनोग्राफ (ग्रामोफ़ोन का एक पुराना संस्करण), इलेक्ट्रॉनिक कैलकुलेटर और जर्मनी के सहयोगियों के साथ मिलकर लेथ मशीनें और 16 एमएम के प्रोजेक्टर भी बनाए। उन्होंने शहरी गरीबों के लिए किफायती घर बनाने के कोशिश भी की, जो सिर्फ एक दिन में तैयार हो जाते थे।[16]

हमें नहीं मालूम कि जी.डी. नायडू और बाबासाहेब पहली बार कब मिले, मगर सोशल मीडिया पर उपलब्ध चित्रों से हम यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि 1930 के दशक से ही वे गहरे मित्र थे। इस बात की काफी संभावना है कि ब्राह्मण-विरोधी (द्रविड़) आंदोलन में दोनों की भागीदारी के दौरान वे एक-दूसरे के करीब आए हों। जी.डी. नायडू पर ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन के प्रभाव के बारे में बताते हुए प्रोफेसर जी.एम. नटराजन लिखते हैं– “शहर (कोयम्बटूर) में पहली सादी शादी 1944 में एल.जी. बालाकृष्णन (जी.डी. नायडू के पहले दामाद) की हुई थी। उसमें पेरियार सहित कई नेताओं ने भाग लिया था और उसमें मेहमानों को केवल चाय पिलाई गई थी। जी.डी. नायडू का विवाह भी बिना किसी पुजारी के द्रविड़ रीति से हुआ था।”[17]
सर सी.व्ही. रमन, होमी भाभा एवं आंबेडकर
समाज के हाशियाकृत समुदायों को उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए आंबेडकर ने 1946 में बंबई में सिद्धार्थ कॉलेज की स्थापना की। उनका जोर विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा प्रदान करने पर था। बाबासाहेब का यह झुकाव उनके द्वारा लिखित इन पंक्तियों से साफ़ है–
मानविकी और कानून की शिक्षा से न तो अनुसूचित जातियों के विद्यार्थियों और न ही आमजनों को कुछ ख़ास हासिल होने वाला है। इससे हिंदुओं को भी कुछ विशेष हासिल नहीं हुआ है। विज्ञान और तकनीकी में उच्च दर्जे की शिक्षा से अनुसूचित जातियों को लाभ होगा।
… लेकिन यह साफ़ है कि विज्ञान और तकनीकी शिक्षा अनुसूचित जातियों की पहुंच से बाहर है और यही कारण है कि उनमें से अधिकांश अपने बच्चों को मानविकी और कानून पाठ्यक्रमों में दाखिला दिलवाते हैं। अनुसूचित जातियां सरकारी मदद के बिना विज्ञान और तकनीकी में उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकतीं। अतः यह उचित और न्यायपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस मामले में उनकी मदद करने के लिए आगे आए।[18]
डॉ. आंबेडकर ने अपने कॉलेज में विज्ञान और तकनीकी के पाठ्यक्रम शुरू किए और तत्समय के कई अग्रणी विचारकों को वहां आमंत्रित किया ताकि वे अपना ज्ञान विद्यार्थियों के साथ बांट सकें और उन्हें विज्ञान और तकनीकी में शोध कार्य करने की प्रेरणा दे सकें। इन मेहमानों में सर सी.व्ही. रमन और होमी भाभा शामिल थे।[19]

होमी भाभा 1946 में सिद्धार्थ कॉलेज पहुंचे और वहां उन्होंने आधुनिक दुनिया में विज्ञान के महत्व पर विद्यार्थियों को व्याख्यान दिया। ऐसा बताया जाता है कि इस अवसर पर डॉ. आंबेडकर ने भाभा को भारत का नया नायक बताया।
नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी.व्ही. रमन 3 फरवरी, 1949 को सिद्धार्थ कॉलेज पहुंचे। वहां के अपने अनुभव के बारे में रमन ने लिखा, “सिद्धार्थ कॉलेज और वहां के क्लास रूमों और प्रयोगशालाओं को देखकर मुझे बहुत संतोष का अनुभव हुआ। यह साफ़ है कि यह एक खिलता हुआ संस्थान है और मैं यह उम्मीद कर सकता हूं कि आने वाले समय में वह उस स्थिति में पहुंच जाएगा, जिसके लिए उसके संस्थापकों ने उसकी स्थापना की है। मुझे पूरी आशा है कि यह कॉलेज इस बात का ख्याल रखेगा कि वह शिक्षा को अधिक व्यापक बनाये, उच्चतम स्तर की शिक्षा प्रदान करे और विशेष रूप से शोध संबंधी गतिविधियों को प्रोत्साहित करे। मुझे यह देख पर बहुत ख़ुशी हुई कि कम-से-कम कॉलेज के एक विभाग के अध्यापक शोध कार्य करने के इच्छुक थे और उसका परिणाम भी दिख रहा था।”[20]
यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि आंबेडकर बैंगलोर में सी.व्ही. रमन द्वारा स्थापित रमन इंस्टीट्यूट के पास बौद्ध भिक्षुकों और अध्येताओं के प्रशिक्षण के लिए एक संस्थान स्थापित करना चाहते थे। इस उद्देश्य से दक्षिण भारत की अपनी यात्रा के दौरान 1954 में वे मैसूर के शासक महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार से मिले। आंबेडकर के प्रस्ताव से प्रभावित हो महाराजा जयचामराजेंद्र ने रमन इंस्टिट्यूट और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस के बीच 5 एकड़ का ज़मीन का एक टुकड़ा उन्हें आवंटित कर दिया।[21]
यह भी महत्वपूर्ण है कि महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार के चाचा महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने 1919 में सरकारी अफसर सर लेसली क्रीरी मिलर के सिफारिश पर अपने राज्य में पिछड़े वर्गों, महिलाओं और अछूतों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया था। (शाहू महाराज ने 1902 में कोल्हापुर में वंचित वर्गों के लिए आरक्षण दिया था।)
हाशियाकृत समुदायों को आरक्षण प्रदान करने के महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार के निर्णय का कड़ा विरोध हुआ और विरोधियों में मैसूर रियासत के तत्कालीन दीवान मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या जैसी शख्शियत भी शामिल थी। अंततः महाराजा से कई मसलों पर विवाद के बाद विश्वेश्वरय्या ने 1918 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया।[22]
पूरे लेख का लब्बोलुआब यह है कि आंबेडकर का उनके समय के कम-से-कम चार वैज्ञानिकों से साबका पड़ा। कदाचित अन्य वैज्ञानिकों से भी उनका मेल-मिलाप हुआ होगा, मगर इसका पता तभी चल सकेगा जब आंबेडकर के मराठी में लेखन और भाषणों और अंग्रेजी में उनकी अप्रकाशित कृतियों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए।
संदर्भ :
[1] ‘रिलिजन अनटचेबल लिंकन’, टाइम पत्रिका https://time.com/archive/6755156/religion-untouchable-lincoln/
[2] साईराम, एस.पी.वी.ए (2025). ‘एन अनएक्सप्लोर्ड साइड ऑफ डॉ. अम्बेडकरः हिज़ क्वाइट रिलेशनशिप विथ सिनेमा, थियेटर, एंड म्यूजिक. द कल्चर कैफे’ https://www.theculturecafe.in/p/an-unexplored-side-of-dr-ambedkar
[3] रमेश, संध्या (2023). “मेघनाद साहा – पॉलीमेथ, पॉलिटिशियन, पायोनीर, साईंटिस्ट हू इज़ कॉल्ड ‘डारविन ऑफ एस्ट्रोनोमी’”. द प्रिंट https://theprint.in/theprint-profile/meghnad-saha-polymath-politician-pioneer-scientist-who-is-called-darwin-of-astronomy/1792478/; स्वामीनाथन, पदमिनी (2011). “आर ‘सांइटिफिक’ इंस्टीट्यूशन्स जेंडर-प्रीजूडाइज्ड?”. द हिन्दू https://www.thehindu.com/books/are-scientific-institutions-genderprejudiced/article2548119.ece; ‘साइन्स टू हिस्ट्रीः द रमन इफेक्ट’. नेचर https://www.nature.com/articles/nindia.2012.151
[4] नायक, प्रमोद वी. (2017). ‘मेघनाद साहाः हिज लाईफ इन साइन्स एंड पोलिटिक्स’. स्प्रिंगर
[5] कर्मोहापातरो, एस.बी. (1997). ‘मेघनाद साहा’, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार. यहां से लिया : https://archive.org/details/meghnadsaha00sbka
[6] नायक प्रमोद वी. (2017). ‘मेघनाद साहा : हिज लाइफ इन साइंस एंड पोलिटिक्स’, स्प्रिंगर
[7] सेन, एस.एन. (1954). ‘प्रोफेसर मेघनाद साहा : हिज लाइफ, वर्क एंड फिलोसोफी’, मेघनाद साहा 60 बर्थडे कमेटी, कलकत्ता
[8] थोराट, सुखदेव (2026). ‘आंबेडकर्स रोल इन इकोनोमिक प्लानिंग, वाटर एंड पॉवर पोलिसी’. क्षिप्रा पब्लिकेशंस
[9] ‘आंबेडकर्स कन्ट्रीब्यूशन टू वाटर रिसोर्सेज डेवलपमेंटः ए रिसर्च प्रोजेक्ट बाई सेंट्रल वाटर कमीशन’. यहां देखा जा सकता है : https://cwc.gov.in/sites/default/files/ambedkars-book_1.pdf
[10] आंबेडकर, बी.आर. ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग्स एंड स्पीचेज’, खंड 10 https://baws.in/books/baws/EN/Volume_10/pdf/321
[11] https://cwc.gov.in/sites/default/files/ambedkars-book_1.pdf
[12] चटर्जी, सांतिमेय एंड गुप्ता, ज्योतिर्मोय (संपादक) (1993). ‘मेघनाद साहा इन पार्लियामेंट’. द एशियाटिक सोसायटी, कलकत्ता, पृष्ठ 74 व 119) https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.181906/page/n141/mode/2up?q=ambedkar
[13] नाइक, प्रमोद वी. (2017), ‘मेघनाद साहाः हिज़ लाईफ इन साइन्स एंड पोलिटिक्स’, स्प्रिंगर
[14] घटक, अजोय एवं पाठक, अनिर्भान (संपादक) (2019). ‘मेघनाद साहाः ए ग्रेट साइंटिस्ट एंड विजनरी (प्रोफेसर मेघनाद साहा की 125वीं जयंती पर व्याख्यान)’. द नेशनल एकेडमी ऑफ साईंस इंडिया (एनएएसआई) का प्रकशन, वीवा बुक्स, दिल्ली
[15] वही
[16] अखिलेश, आर. (2022). ‘जी.डी. नायडू : एन इनोवेटर फॉर ऑल सीजन्स’. द हिन्दू https://www.thehindu.com/news/national/tamil-nadu/gd-naidu-an-innovator-for-all-seasons/article65186422.ece
[17] जेशी, के. (2013). ‘द फेक्ट फाइन्डर’. द हिन्दू https://www.thehindu.com/features/friday-review/history-and-culture/the-fact-finder/article4534039.ece
[18] आंबेडकर, बी.आर. ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरः राइटिंग्स एंड स्पीचेज’. खंड 10 https://baws.in/books/baws/EN/Volume_10/pdf/448
[19] सिद्धार्थ कॉलेज ऑफ आर्टस, साईन्स एंड कामर्स एल्यूमनी एसोसिएशन का फेसबुक पेज https://www.facebook.com/share/p/17YaoUhtwW/
[20] वही
[21] आंबेडकर, बी.आर. ‘डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग्स एंड स्पीचेज’. खंड 10 https://baws.in/books/baws/EN/Volume_17_01/pdf/453
[22] रामनाथ, अपराजिथ (2024). ‘इंजीनियरिंग ए नेशन : द लाइफ एंड कैरियर ऑफ एम. विश्वेश्वरय्या’. पेंग्युइन वाइकिंग. अध्याय 13, ‘ए दीवान ऍट वर्क’
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)