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राजनीति प्रसाद : एक साहसी संघर्षशील समाजवादी का अवसान

राजनीति बाबू ने कहा था कि “लोकपाल बिल को फाड़ने को लेकर मेरे मन में वही बेचैनी थी जो बेचैनी भगत सिंह के मन में केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने से पहले रही होगी। इस बिल में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था। लोकपाल में केवल अगड़ी जातियों के लोगों को सदस्य बनाया जाता।” स्मरण कर रहे हैं अरुण कुमार

गत 18 दिसंबर को प्रखर समाजवादी नेता, राष्ट्रीय जनता दल के पूर्व राज्यसभा सांसद और पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजनीति प्रसाद का निधन हो गया। वे 79 वर्ष के थे और कुछ दिनों से बीमार थे। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान को लेकर अपनी पक्षधरता और प्रतिबद्धता के अनुरूप लोगों ने उन्हें याद किया। सामाजिक न्याय और समाजवादी विचार के समर्थकों के लिए वे एक ऐसे नायक की तरह थे, जिनके निधन से उनकी सामाजिक क्षति हुई है।

राजनीति प्रसाद अपनी मृत्यु के समय पटना के महेंद्रू स्थित सूड़ी टोला में रहते थे, लेकिन वे सोहसराय, नालंदा जिला के मूल निवासी थे। उनका जन्म 9 अगस्त, 1946 को बिहार के नालंदा जिले में पिता गोविंद प्रसाद साहू और माता जागेश्वरी देवी के घर हुआ था। राजनीति प्रसाद के माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी फुआ उन्हें मुंगेर ले आईं और यहीं उनकी प्रारंभिक और कॉलेज तक की शिक्षा हुई। वे सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में शुरू से ही बढ़-चढ़ कर रुचि लेते थे। उनकी नाटकों में विशेष रुचि थी जिसमें उन्हें अभिनय के लिए कई पुरस्कार मिले थे। बाद में उन्होंने पटना लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की।

राजनीति प्रसाद ने अपना पूरा जीवन समाजवादी विचारधारा को समर्पित कर दिया था। वे 26 वर्ष की आयु में ही संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के युवा प्रकोष्ठ समाजवादी युवजन सभा के अध्यक्ष बन गए थे। साहसी प्रवृत्ति के राजनीति प्रसाद अपने युवावस्था से ही दलितों और वंचितों के सवालों पर मुखर हो गए थे। इस दौरान वे कई बार जेल भी गए लेकिन अपनी पक्षधरता से कभी समझौता नहीं किया।

राजद के नेता शिवानंद तिवारी ने उन्हें याद करते हुए लिखा कि “राजनीति प्रसाद के साथ मेरा बहुत पुराना संबंध रहा है। 1974 के जयप्रकाश आंदोलन के शुरुआती दौर में हम लोग साथ ही गिरफ़्तार हुए थे और कुछ दिनों तक फुलवारी शरीफ जेल में साथ रहे। 1970 के आसपास हम लोग संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के एक कार्यक्रम में गिरफ़्तार हुए थे और कुछ दिनों तक दिल्ली के तिहाड़ जेल में रहे।” शिवानंद तिवारी की इन बातों से हमारे मन में राजनीति प्रसाद की जो छवि उभरती है उसके अनुसार वे एक साहसी समाजवादी कार्यकर्ता थे जिसने जनहित के मुद्दों पर प्रतिरोध को अपनी राजनीति का माध्यम बनाया था और जो जेल जाने से कभी डरा नहीं।

राजनीति प्रसाद (9 अगस्त, 1946 – 18 दिसंबर, 2025)

राजनीति प्रसाद लालू प्रसाद यादव के करीबी मित्रों में से थे। लालू प्रसाद यादव के कई करीबी मित्र उन्हें छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए, लेकिन राजनीति प्रसाद आजीवन साथ रहे। राजद में उनकी छवि एक विचारशील, संघर्षशील और सिद्धांतवादी नेता के रूप में रही। वे बार-बार यह कहते थे कि वे आजीवन लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय का कार्य करते रहेंगे। राजनीति प्रसाद को लालू प्रसाद यादव ने वर्ष 2006 में राज्यसभा का सदस्य बनाया था। वे 2006 से 2012 तक कुल छह वर्षों के लिए राज्यसभा के सदस्य रहे। समाजवादी कार्यकर्ता और पिछड़े वर्ग के व्यक्ति को राज्यसभा का सांसद बनाने के लिए उस समय लालू प्रसाद यादव की काफी प्रशंसा हुई थी। उच्च सदन में वे अपनी बेबाकी और स्पष्ट विचारों के लिए लगातार चर्चा में रहे। उन्होंने यहां डॉ. राम मनोहर लोहिया और मधु लिमये की विरासत को जिंदा रखने की पूरी कोशिश की। राजनीति प्रसाद ने अपनी सांसद निधि से अनुग्रह नारायण सिंह सामाजिक शोध संस्थान, पटना को समृद्ध करने का काम किया क्योंकि वे बिहार में एक आधुनिक और सुविधा सम्पन्न शोध संस्थान की जरूरत को बड़ी शिद्दत से महसूस करते थे। उन्होंने यहां एक ‘मधु लिमये अतिथि गृह’ बनवाया है, जहां बहुत कम खर्च में शोधार्थी रहते हैं।

राजनीति प्रसाद वर्ष 2008 में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए जब उन्होंने राज्यसभा में यूपीए सरकार द्वारा प्रस्तुत लोकपाल विधेयक की प्रतियों को संसदीय मामलों के तत्कालीन राज्यमंत्री वी. नारायण सामी के हाथ से छीनकर फाड़ दिया था। राजनीति प्रसाद के इस साहसी काम को उनकी मृत्यु के बाद अपने-अपने विचार के अनुसार लोग फिर से याद कर रहे हैं। उस घटना को भारतीय संसदीय राजनीति के एक विवादास्पद और दुखदपूर्ण प्रसंग के रूप में भी लोग याद करते हैं। यह घटना वर्ष 2008 की है। राज्यसभा में लोकपाल के गठन के लिए बिल लाया गया था। लोकपाल बिल को संसद में लाने का मुख्य उद्देश्य सरकारी तंत्र में उच्च पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक स्वतंत्र संस्था बनाना था। यह एक ऐसी संस्था होती जो प्रधानमंत्री, मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की निष्पक्ष जांच करती। यह संस्था संसद के ऊपर बैठ जाती। लालू प्रसाद यादव के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय दल लोकपाल बिल का विरोध कर रहे थे। इन क्षेत्रीय दलों को डर था कि लोकपाल का उपयोग उनकी राजनीति को खत्म करने के लिए किया जाएगा। उस समय कांग्रेस की सरकार थी और राजद उसकी सहयोगी थी। राज्यसभा में इस विधेयक पर काफी देर तक चर्चा चली थी। सरकार की ओर से आधी रात के लगभग जब बिल पेश हुआ तो लालू प्रसाद यादव राज्यसभा के दर्शक दीर्घा में बैठकर कार्यवाही देख रहे थे। बिल जैसे ही पेश हुआ राजनीति प्रसाद मंत्री के हाथ से बिल की प्रति लेकर उसे फाड़ना शुरू कर दिया। उनकी नजर दर्शकदीर्घा की ओर भी जा रही थी जहां लालू प्रसाद यादव बैठे थे। मीडिया ने यह खबर चलाई कि लालू प्रसाद यादव के कहने पर ही राजनीति प्रसाद ने बिल की कॉपी फाड़ी है, लेकिन राजनीति प्रसाद ने यह बयान दिया कि उन्होंने यह स्वतःस्फूर्त किया था। लालू जी के निर्देश पर नहीं।

इस घटना के अगले दिन मैं (इन पंक्तियों के लेखक) राजनीति प्रसाद से उनके 191 नॉर्थ एवेन्यू, दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर मिला था। उन्होंने इस घटना के बारे में बताया कि “इस बिल को फाड़ने को लेकर मेरे मन में वही बेचैनी थी जो बेचैनी भगत सिंह के मन में केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने से पहले रही होगी। इस बिल में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था। लोकपाल में केवल अगड़ी जातियों के लोगों को सदस्य बनाया जाता। हम सभी अगड़ी जातियों के न्यायिक चरित्र को अच्छी तरह जानते हैं। उनसे न्याय की आशा नहीं कर सकते। यह बिल हमारे वर्ग के खिलाफ था इसलिए मैंने यह बिल फाड़ दी। मैं कालिदास नहीं बन सकता था कि जिस डाल पर बैठा हूं, उसी डाल को काट दूं।”

राजनीति प्रसाद प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक प्रो. मधु लिमये के अनुयायी थे और समाजवाद के मूल सिद्धांतों पर आजीवन अडिग रहे। वे मधु लिमये से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए थे। राजनीति प्रसाद मुंगेर जिले के निवासी थे। जब 1964 में मधु लिमये मुंगेर लोकसभा का उपचुनाव लड़ने आए तभी राजनीति बाबू उनके संपर्क में आए। उस समय चुनाव प्रचार के दौरान मधु लिमये पर हमला हुआ था। राजनीति प्रसाद और रामदेव सिंह यादव उनके बचाव में आगे आए थे। यहीं वे मधु लिमये के करीब आए। मधु लिमये और जॉर्ज फर्नांडिस के आपसी संबंध भी बहुत अच्छे थे। मधु लिमये के दबाव में ही जार्ज फर्नांडिस 1979 में जनता पार्टी से अलग हो गए थे। इसी कारण राजनीति प्रसाद के भी जार्ज फर्नांडिस से अच्छे संबंध बन गए। राजनीति बाबू पिछले 30 वर्षों से लगातार अनुग्रह नारायण सिंह समाज अध्ययन संस्थान, पटना में मधु लिमये की याद में सभा आयोजित करते थे। यह अपनी तरह की अद्भुत सभा होती थी, जिसमें बिहार के समाजवादी बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता शामिल होते थे। अब उनकी अनुपस्थिति में शायद ही यह सभा आयोजित हो पाए। मधु लिमये के साथ भी राजनीति बाबू का प्रेम निःस्वार्थ ही था। वे यह अच्छी तरह जानते थे कि मधु लिमये के कारण बिहार की राजनीति में उन्हें कोई विशेष राजनीतिक लाभ नहीं मिलने वाला है, फिर भी वे यह मानते थे कि मधु लिमये के विचारों को अगली पीढ़ी जाने, उस पर बात करे।

राजनीति प्रसाद को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर लिखते हैं कि “राजनीति प्रसाद दोस्तपरस्त व्यक्ति थे। हर मौसम के दोस्त। राजनीति में ऐसे लोग कम होते हैं। उनसे मेरा परिचय उस समय से था जब हमलोग समाजवादी युवजन सभा में साथ काम कर रहे थे। मैं जब मुख्यधारा की पत्रकारिता में आया तब भी राजनीति प्रसाद ने मुझसे संबंध बनाये रखा। हालांकि कभी नहीं कहा कि मेरा यह न्यूज छाप दो। हां, वे हर साल मधु लिमये की जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर आने के लिए जरूर जिद करते थे। उनसे मेरा एक और भी संबंध था। वे मेरे छोटे भाई नागेंद्र के भी मित्र बन गये थे। नागेंद्र और राजनीति प्रसाद पटना लाॅ कालेज के छात्र थे। छात्रावास के हाॅस्टल में दोनों एक ही कमरे में रहते थे। नागेंद्र अब दुनिया में नहीं रहा। पर जब तक वह था, राजनीति प्रसाद ने निःस्वार्थ भाव से उससे भी संपर्क-संबंध जारी रखा। जब भी राजनीति रांची जाते थे, नागेंद्र से जरूर मिलते थे। दरअसल, अधिकतर नेता लोगों का यह स्वभाव बन जाता है कि यदि आपसे कोई स्वार्थ पूरा नहीं होता हो तो वे पुराने मित्रों को भी दरकिनार कर देते हैं। राजनीति प्रसाद ऐसे नहीं थे।” संबंधों को निभाने के मामले में राजनीति बाबू अद्वितीय थे। वे जिसके साथ भी जुड़े पूरी तरह से जुड़े।

राजनीति बाबू राजनीति में पारदर्शिता और शुचिता के अद्वितीय उदाहरण हैं। वे छह वर्षों तक सांसद रहे लेकिन अपने लिए एक अदद मकान भी नहीं बना पाए। मुंगेर स्थित उनका पुश्तैनी मकान कब का गिर चुका है और अब वहां परती जमीन ही बची हुई है। वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु रंजन ने उनकी ईमानदारी और सादगीपूर्ण जीवनशैली को याद करते हुए लिखा है कि “एक बार सांसद रहते हुए राजनीति बाबू उनके दिल्ली स्थित आवास पर सरकारी बस से आए थे। उस समय उनके पास कार नहीं थी। जब राज्यसभा में उनका कार्यकाल खत्म हुआ तो उन्होंने अगले ही दिन सरकारी आवास खाली कर दिया और अपना सामान लेकर ट्रेन से घर लौट आए। उनके पास दिल्ली में रहने का अपना कोई ठिकाना नहीं था। उनके निधन से एक स्पष्टवादी और निर्भीक राजनीतिक व्यक्तित्व का भी अवसान हुआ है। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय और समाजवाद की धारा का एक प्रखर अधिवक्ता का जाना है।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अरुण कुमार

डॉ अरुण कुमार पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना में हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं।

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