आदिवासी बहुल झारखंड राज्य में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) को लेकर कुछ लोगों में अतिशय उत्साह है। वहीं कुछ लोगों में निराशा है। सबसे अधिक उत्साहित हैं एनजीओ पोषित सामाजिक संगठन और नौकरशाही से जुड़े लोग। उनके द्वारा बढ़-चढ़ कर इसके प्रावधानों की मीमांसा की जा रही है।
प्रारंभ से ही मेरी दृष्टि इस बारे में स्पष्ट रही है कि आदिवासी समाज कानूनों का मोहताज कभी नहीं रहा। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट रहा है। भले ही संसदीय राजनीति और अपसंस्कृति से उसके संघर्ष का जज्बा अब पहले जैसा रहा नहीं।
इसके अलावा यह भी मेरे सामने स्पष्ट रहा है कि केंद्र सरकार, खासकर 2014 में आई नरेंद्र मोदी सरकार ने न सिर्फ देश के संघीय ढांचे को कमजोर किया है, बल्कि राज्यों की स्वायत्तता का भी अपहरण किया है। जाहिर है कि पेसा कानून के अधिकारों में भी कटौती हुई है।
मेरी समझ है कि आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा को इस बात का अधिकार होना चाहिए कि वह अपने क्षेत्र में हर तरह की कथित विकास योजनाओं की समीक्षा कर सके और निर्णायक भूमिका अदा कर सके। उसके पास यह अधिकार होना चाहिए कि उसके क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल उसकी सहमति से ही हो। लेकिन क्या अब ऐसा रह गया है?
मैं कुछ ठोस उदाहरण सामने रखता हूं–
- झारखंड के जादूगोड़ा यूरेनियम खदान से निकला अयस्क हैदराबाद जाता है। वहां से परिष्कृत यूरेनियम निकाल कर उसका कचड़ा वापस लाकर झारखंड में ही डंप किया जाता है। क्या उस इलाके की ग्राम सभाएं इस अन्यायपूर्ण प्रक्रिया पर रोक लगाने का अधिकार रखती हैं?
- झारखंड में कृषि योग्य जमीन आधे से भी कम है। बड़े इलाके में कोयला और अन्य अयस्कों का भंडार है। क्या ग्राम सभा यह अधिकार रखती है कि वह कह सके कि उनके इलाके में खनन नहीं होगा, क्योंकि खनन से उनका कोई खास लाभ नहीं और पर्यावरण तेजी से बिगड़ रहा है?
- क्या चांडिल और रामगढ़ इलाके में दिन-रात धुआं उगलने वाले स्पंज आयरन कारखानों को ग्राम सभा बंद करने का अधिकार रखती है?
- रेलवे, जो धीरे-धीरे निजी क्षेत्र में जा रहा है, उसके विस्तार के लिए यदि ग्रामीण इलाकों से जमीन का अधिग्रहण होगा, तो क्या इसके लिए ग्राम सभाओं से सहमति ली जाएगी? यही सवाल राष्ट्रीय राज मार्गों के संदर्भ में भी है?
- अभयारण्यों और राष्ट्रीय पार्कों के निर्माण के नाम पर आदिवासियों से उनके जीवन के संसाधन छीने जाते रहे हैं। क्या ग्राम सभा इनके ऊपर सवालिया निशान लगा सकती है?
- विकास मद की बड़ी राशि सांसद और विधायक निधि के रूप में खर्च होती है और वह भी मनमाने तरीके से। क्या ग्राम सभाएं यह सुनिश्चित करने का अधिकार रखती हैं कि उनकी अनुशंसा और सुझाव पर ही विधायक व सांसद यह राशि खर्च करें?
- किसी भी आयुध कारखाना या राष्ट्रीय हित के नाम पर कोई बड़ा कारखाना निजी क्षेत्र में लगे तो प्रभावित इलाकों की ग्राम सभाएं उनके ऊपर रोक लगा पाएंगीं? मसलन गोड्डा का पावर प्रोजेक्ट, जिससे न तो राज्य को बिजली मिलती है, न कोई ज्यादा राजस्व ही।
- शहरों का दायरा बढ़ता जा रहा है और ग्रामीण इलाके सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में शहरी इलाकों में ग्रामसभा होगी भी तो वह पेसा के अधिकारों का उपयोग कर सकेगी?
इन सवालों के बरअक्स यह अमूर्त बात है कि इससे परंपरागत स्वशासन व्यवस्था को बल मिलेगा। क्या निकट भविष्य में शहरी इलाकों में तो दूर, ग्रामीण इलाकों में भी पुलिस प्रशासन की भूमिका घटने वाली है?

विकास में जनता की उर्जा और भागीदारी का उपयोग जब तक नहीं होगा, तब तक यह सब बस मुलम्मेबाजी है। जब संघीय ढांचा ही तोड़ा और बिखेरा जा रहा हो, राज्य सरकारों के वित्तीय अधिकार सिमटते जा रहे हों, तब पेसा बहुत ज्यादा भूमिका क्या निभा पाएगी? यकीनन पेसा कानून एक हसीन सपना है, जिसे मोदी सरकार ने पहले ही दर्जनों केंद्रीय कानून बना कर नेस्तनाबूद कर दिया है।
ग्रामीण इलाकों के लिए पेसा, शहरी इलाकों के लिए?
यह गौर तलब है कि शहरी क्षेत्र का निरंतर विस्तार हो रहा है। औद्योगीकरण के बाद तमाम बड़े शहर अस्तित्व में आए। जैसे– धनबाद, बोकारो, हजारीबाग, रांची, टाटा, रामगढ़ आदि। इनके आने के पहले ये तमाम इलाके छोटे-बड़े गांव ही थे। अपने आप में आत्मनिर्भर गांव, जहां जीवन की जरूरतों के हिसाब से आर्थिक गतिविधियां और उद्योग-धंधे भी चलते ही थे। लेकिन औद्योगीकरण के बाद शहर अस्तित्व में आए और गांवों को लील गए। तेजी से बन रहे एक्सप्रेस हाई-वे और संचार संसाधनों के विस्तार से शहरों का निरंतर विस्तार हो रहा है। नए शहर पिछले कई दशकों से नहीं बने हैं, लेकिन पुराने शहरों में आबादी का विस्फोट जिस कदर हो रहा है, उससे गांव सिमटते जा रहे हैं। और यह प्रक्रिया अभी और तेज होनी है। शहरीकरण होगा और उसके आसपास गांव की जगह झोपड़पट्टियां या फिर स्लम बस्तियां ले लेंगी। रांची शहर के बीच बसे गांव धीरे-धीरे इसी दिशा में बढ़ रहे हैं।
सवाल है कि ग्रामीण इलाकों के लिए तो पेसा है, शहरी क्षेत्र के आदिवासियों की सुरक्षा कैसे हो? सरकार ने कभी विचारा था कि पेसा की तर्ज पर मेसा, एमईएसए कानून बनाया जाएगा, जो नगरपालिका क्षेत्र में बसे आदिवासियों के हितों की रक्षा करेगा। लेकिन यह सोच कभी कानून का रूप नहीं ले सका। शहरीकरण के साथ पेसा प्रभावी इलाके सिमटते गए और पांचवीं अनुसूची के प्रावधान भी अघोषित रूप से ढीले पड़ गए और इसलिए इस अनुसूची के क्षेत्र में बसे तमाम शहरों में बड़ी तेजी से आदिवासी जमीनों की बिक्री जारी है। रांची जैसा पूरा शहर ही आदिवासियों की जमीन पर खड़ा है। कानून कहता है कि आदिवासी जमीन का पंजीकरण किसी गैर-आदिवासी को नहीं हो सकता, लेकिन इसको नकारने के अनेकानेक तरीके खोजे जा चुके हैं।
विडंबना यह कि पेसा कानून को लागू कराने के लिए सक्रिय धुरंधर नेता इन सवालों पर मौन हैं। वास्तविकता यह भी है कि ज्यादातर नेताओं का ग्रामीण इलाकों से संवेदना के स्तर पर कोई रिश्ता नहीं है। एनजीओ प्रायोजित सम्मेलनों में, कभी राजधानी में आयोजित विरोध प्रदर्शनों में ही उनकी आदिवासी जनता से मुलाकात होती है। लेकिन ऐसे ही एनजीओ से जुड़े लोग ही नौकरशाही में बैठे अधिकारियों के साथ मिलकर नियमावली बनाते हैं और फिर ढिंढोरा पीटने में लगे हैं कि कोई ऐतिहासिक घटना हो गई।
यह नियमावली है क्या? जिस तरह से पेसा कानून परिभाषित है, उसमें आदिवासियों के अधिकारों के लिए प्रावधान हैं, यदि वह लागू हो भी गया तो ग्रामसभा उसका इस्तेमाल कैसे करेगी, उनकी बैठकें कैसे होंगी। वे कोई प्रस्ताव सरकार के सामने कैसे रखेंगी? यह सब तो ग्रामसभा को ही तय करना है। हां, राज्य सरकार को अपने अधिकारियों को यह समझाने की जरूरत है कि वे पेसा के अधिकार क्षेत्र में कैसे काम करेंगे। पेसा के तहत आदिवासी जनता को अनुसूचित क्षेत्र में क्या अधिकार हैं, जिनका उन्हें पालन करना है।
यह सही है कि पेसा के अधिकारों का उपयोग कर आदिवासियों ने कई छोटे-बड़े जंग जीते हैं। नियमगिरि के कंध आदिवासी इसी के तहत आज तक लड़ते रहे हैं। पत्थलगड़ी आंदोलन की शक्ल में लोग पेसा के अधिकारों का ही उपयोग कर रहे थे, जिसे पूर्ववर्ती रघुवर दास सरकार ने बुरी तरह से कुचल दिया था। दुमका में भी पैनम कंपनी के खिलाफ काठीकुंड का आंदोलन सिस्टर वाल्सा पेसा के तहत ही लड़ रही थीं, लेकिन जैसे-जैसे ग्राम सभाएं कमजोर होती गईं, नियमावली बनाने का आंदोलन तेज हो गया। यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया।
क्या ग्रामीण इलाकों के लिए पेसा की बात करने वाले नेताओं ने कभी शहरी इलाकों में बसे आदिवासी गांवों को, उनकी जमीन की सुरक्षा के लिए कुछ करने के लिए सोचा? या उन्हें थाना, पुलिस, नगर निगम, न्यायपालिका व संवेदनहीन ब्यूरोक्रेसी के हवाले छोड़ दिया गया? रांची ही नहीं, कई अन्य शहरों के आसपास के ग्रामीण इलाके कब एक सरकारी नोटिफिकेशन से नगरपालिका क्षेत्र में शामिल कर लिये जाएंगे और पेसा कानून के दायरे से बाहर हो जाएंगे, पता नहीं। शहरीकरण का अर्थ नागरिक सुविधाओं का विस्तार समझ कर बहुत सारे लोग इसके प्रति उदासीन भी हैं। लेकिन अंत में होगा यही कि शहर तो बढ़ेगा, लेकिन वहां आदिवासी नहीं रह जाएंगे। उनकी बची-खुची जमीन पर भी रिहायशी कालोनियां बन जाएंगी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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