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सामाजिक न्याय की दृष्टि वाले प्रखर विमर्शकार थे वीरेंद्र यादव

वीरेंद्र यादव की आलोचना दृष्टि का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने हिंदी आलोचना को एक नैतिक-सामाजिक दायित्वबोध से जोड़ा है। उनके लेखन ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आलोचना का कार्य महज शाब्दिक विश्लेषण या सौंदर्य की व्याख्या नहीं, बल्कि साहित्य के माध्यम से समाज के अंतर्विरोधों और संघर्षों को समझना और उसके प्रगतिशील संभावनों को रेखांकित करना है। श्रद्धांजलि दे रहे हैं डॉ. रामकृष्ण यादव

स्मृति शेष : वीरेंद्र यादव (5 मार्च, 1950 – 16 जनवरी, 2026)

हिंदी आलोचना में वीरेंद्र यादव का नाम एक ऐसे साहसी और प्रतिबद्ध बौद्धिक के रूप में उभरता है, जिन्होंने साहित्यिक मूल्यांकन की परंपरागत ‘कुलीन’ दृष्टि को चुनौती देकर हाशिए के समाज और उसकी संवेदनाओं को केंद्र में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया। 5 मार्च, 1950 को जौनपुर, उत्तर प्रदेश में जन्मे और लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त करने वाले वीरेंद्र यादव ने आरंभ में पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा, जिसने उनके चिंतन को वर्तमान के साथ गतिशील संवाद करने की क्षमता दी।

पत्रकारिता से साहित्य समीक्षा में आने की यह यात्रा उनके चिंतक व्यक्तित्व को समृद्ध करती है और उनकी आलोचना दृष्टि को एक ऐसी गहरी सामाजिक-राजनीतिक समझ से जोड़ती है जो महज सौंदर्यशास्त्रीय विवेचन से आगे जाकर सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रश्नों से जूझती है।

वीरेंद्र यादव का मानना था कि साहित्य में हाशिये के समाज की केंद्रीयता के द्वारा ही साहित्य के जनतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया पूरी हो सकती है। इसी दृष्टि के आलोक में वे आलोचना के क्षेत्र में एक ऐसे ‘हस्तक्षेप’ के रूप में सामने आते हैं जो निष्पक्षता के ठंडे बस्ते में न पड़कर साहित्यिक कर्म की प्रगतिशील, जनपक्षधर भूमिका के प्रति सजग और पक्षधर है।

वीरेंद्र यादव की आलोचना दृष्टि का केंद्रीय संदर्भ बिंदु ‘साहित्यिक कुलीनतावाद एवं आस्वादपरक मूल्यों का प्रत्याख्यान’ रहा है। वे हिंदी आलोचना की वह परंपरा जो अभिजनवादी कलात्मक मानकों से बंधकर रचना का मूल्यांकन करती है, उसकी कठोर समीक्षा प्रस्तुत करते हैं। उनका मानना था कि इस ‘कुलीन’ दृष्टि ने साहित्य को एक संकीर्ण सौंदर्यबोध तक सीमित कर दिया है और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता एवं परिवर्तनकारी शक्ति को नजरअंदाज किया है।

इसका प्रतिकार करने के लिए वीरेंद्र यादव ने एक नए ‘कैनन फॉरमेशन’ की शुरुआत की और सबाल्टर्न अध्ययन की पद्धति को हिंदी उपन्यासों के विश्लेषण में सक्रिय रूप से लागू किया। यह दृष्टि उन्हें उत्तर-मार्क्सवादी चिंतन से जोड़ती है, जहां वर्ग संघर्ष के साथ-साथ जाति, लिंग, धर्म आधारित उत्पीड़न की बहुआयामी संरचनाओं को समझना जरूरी हो जाता है। वीरेंद्र यादव भारतीय समाज को समझने में वर्ग विश्लेषण की सीमाओं को रेखांकित करते हुए कहते थे कि यहां जाति का वर्चस्व इतना गहरा है कि “भारत के बदलते आर्थिक, सामाजिक स्वरूप के चलते जातियों का पेशागत विभाजन जहां दिनोंदिन अनुत्पादक और अर्थहीन होता जा रहा है, उतनी ही जाति व्यवस्था की जकड़न ज़ोर पकड़ती जा रही है।”

वीरेंद्र यादव ने उपन्यास को महज एक साहित्यिक संरचना न मानकर एक सामाजिक संरचना के रूप में पढ़े जाने पर बल दिया था। जब साहित्य की सामाजिक भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे थे, तब वीरेंद्र यादव आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती साहित्य को सामाजिक संदर्भ प्रदान कर उसे नई अर्थवत्ता देने की कोशिश कर रहे थे। वे साहित्य को महज आस्वाद की वस्तु बनाने के पक्ष में कतई नहीं थे।

वीरेंद्र यादव (5 मार्च, 1950 – 16 जनवरी, 2026)

वीरेंद्र यादव का लेखन विषय और विमर्श की दृष्टि से अत्यंत व्यापक है। उनकी आलोचनात्मक पुस्तकें हिंदी साहित्य के अध्ययन में मील का पत्थर साबित हुई हैं। उनकी बहुपठित कृति ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ उपन्यास आलोचना में उनकी विशिष्ट पहचान स्थापित करती है। इसमें उन्होंने उपन्यास के माध्यम से भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक वर्चस्व की संरचनाओं का विश्लेषण किया है।

‘प्रगतिशीलता के पक्ष में’ उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को स्पष्ट करती है। जहां प्रगतिशीलता को संकीर्ण मार्क्सवादी दायरे से निकालकर उन सभी लेखकों के पक्ष में खड़ा किया गया है, जो प्रतिक्रियावादी ताकतों से संघर्षरत रहे हैं। यह कृति वीरेंद्र यादव को एक रूढ़िवादी मार्क्सवादी आलोचक के बजाय एक सर्जनात्मक मार्क्सवादी चिंतक के रूप में प्रस्तुत करती है। ‘विमर्श और व्यक्तित्व’ पुस्तक उनके विविध लेखन का संग्रह है जिसमें प्रेमचंद, गुंटर ग्रास, नीरद चौधरी, कृष्णा सोबती, राजेंद्र यादव, डॉ. धर्मवीर, अरुंधति राय, गीतांजलि श्री जैसे लेखकों के चिंतन की पड़ताल है। साथ ही इसमें संस्मरणों के माध्यम से लखनऊ व इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश की झलक भी मिलती है। इस पुस्तक में भी वे अपनी असहमतियां दो टूक अंदाज में दर्ज करते हैं।

इन कृतियों के अलावा उन्होंने दलित विमर्श के क्षेत्र में भी गहन हस्तक्षेप किया है। एक आलेख में उन्होंने ‘दलित विकासवाद’ की अवधारणा को स्थापित करने का प्रयास किया है। वे भारतीय समाज में दलित अस्मिता के ऐतिहासिक संघर्ष और डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रस्तावित नए समाज की परिकल्पना पर विचार करते हैं।

वीरेंद्र यादव प्रेमचंद के गहरे अध्येता के रूप में भी जाने जाते हैं। ‘गोदान’ पर उनका लेख ‘औपनिवेशिक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीय किसान : संदर्भ गोदान’ काफी चर्चित हुआ और इसे ‘गोदान’ का एक मुकम्मल पाठ भी माना जाता है। उनके अनुसार, प्रेमचंद अपने कथा-वृत्तांत में इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि अंग्रेजी सरकार और जमींदार के गठजोड़ द्वारा निर्दयतापूर्वक लगान वसूली और बेदखली की जाती थी, जिसका भूमि की उर्वरता से कोई लेना-देना नहीं था। वे प्रेमचंद के उन सुझावों की ओर भी ध्यान खींचते हैं जो उन्होंने किसानों की समस्या के समाधान और भूमि सुधार के बारे में दिए थे।

वीरेंद्र यादव प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लेखकों की तलाश भी करते थे और उनके प्रगतिशील सरोकारों को वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में टटोलते थे। उनका यह अध्ययन दर्शाता है कि कैसे एक क्लासिक रचना को समकालीन सैद्धांतिक दृष्टि (जैसे सबाल्टर्न स्टडीज) से पढ़कर उसमें नए अर्थ खोजे जा सकते हैं।

वीरेंद्र यादव की आलोचनात्मक प्रतिबद्धता उनके जीवन में भी विवादों के रूप में अभिव्यक्त हुई है। एक उल्लेखनीय घटना 2013 की है जब उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कारों को लेकर एक बहस छिड़ी। वीरेंद्र यादव ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया था। उन्होंने कहा कि “हिंदी संस्थान के इतिहास में अब तक द्विज लेखक ही पुरस्कृत होते रहे हैं। शूद्र और दलित लेखक उस सूची से हमेशा नदारद रहे हैं।”

उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि क्या राही मासूम रजा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह जैसे लेखक संस्थान के उच्च पुरस्कारों के योग्य नहीं थे। वीरेंद्र यादव के लिए यह मुद्दा महज व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थागत पूर्वाग्रह का था। उनका तर्क था कि “जिस संस्थान में पुरस्कारों के लिए एकमात्र अर्हता द्विज होना हो, वहां यदि 112 लेखकों में दो शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को सम्मानित किया जाता है तो जरूर उसके इतर कारण होंगें।” इस पूरे प्रकरण ने उनके आलोचकीय व्यक्तित्व के एक और पक्ष को उजागर किया। यह है साहित्यिक संस्थानों की अंदरूनी राजनीति और बहिष्कार की प्रवृत्तियों के प्रति एक सतर्क, विद्रोही और प्रश्नाकुल चेतना।

इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि यादव की आलोचना का दायरा केवल पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह साहित्य की संस्थागत संरचनाओं और उनमें व्याप्त सामाजिक-जातीय पूर्वाग्रहों तक फैली हुई है। वे मानते हैं कि साहित्य का जनतांत्रिकीकरण केवल रचनाओं के विषय तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी मान्यता और प्रतिष्ठा के तंत्र भी उसमें शामिल होने चाहिए।

वीरेंद्र यादव की आलोचना दृष्टि का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने हिंदी आलोचना को एक नैतिक-सामाजिक दायित्वबोध से जोड़ा है। उनके लेखन ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि आलोचना का कार्य महज शाब्दिक विश्लेषण या सौंदर्य की व्याख्या नहीं, बल्कि साहित्य के माध्यम से समाज के अंतर्विरोधों और संघर्षों को समझना और उसके प्रगतिशील संभावनों को रेखांकित करना है। उन्होंने हिंदी उपन्यास के अध्ययन में सबाल्टर्न दृष्टि को लागू करके एक नया मार्ग प्रशस्त किया। इसने न केवल प्रेमचंद, रेणु जैसे लेखकों के पाठ को नए सिरे से खोलने में मदद की, बल्कि समकालीन दलित और ओबीसी लेखन को समझने के लिए एक सैद्धांतिक आधार भी प्रदान किया। उनकी प्रासंगिकता आज के ऐसे दौर में और भी बढ़ जाती है जब साहित्य को महज मनोरंजन या निजी अभिव्यक्ति तक सीमित करने के प्रयास हो रहे हैं। वीरेंद्र यादव प्रेमचंद के उस कथन को याद दिलाते हैं कि “साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली चीज नहीं, उसके आगे-आगे चलने वाला ‘एडवांस गार्ड’ है।”

वीरेंद्र यादव को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान, गुलाब राय सम्मान, शमशेर सम्मान तथा मुद्राराक्षस सम्मान जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। लेकिन उनकी असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने हिंदी आलोचना को एक ऐसी सामाजिक-राजनीतिक चेतना से समृद्ध किया है जो साहित्य को जीवन से और जीवन को संघर्षों से जोड़ती है।

वीरेंद्र यादव की आलोचकीय यात्रा साहित्यिक कर्म में नैतिक प्रतिबद्धता और सामाजिक दायित्व के पक्ष में एक सतत संघर्ष की गाथा है। उन्होंने न केवल साहित्यिक पाठों का एक नया ‘कैनन’ (मानक संग्रह) प्रस्तावित किया बल्कि साहित्यिक संस्थानों की जातिगत और वर्चस्ववादी मानसिकता को भी बेनकाब करने का साहस दिखाया। उनकी दृष्टि मार्क्सवादी वर्ग-विश्लेषण और सबाल्टर्न अध्ययन पद्धति के समन्वय से निर्मित हुई, जो भारतीय समाज की जटिलताओं विशेष रूप से जाति के प्रश्न को समझने में अधिक सक्षम है।

आज जब साहित्यिक बहसें अक्सर भाषाई कलाबाजी या व्यक्तिगत प्रशंसा-निंदा तक सिमटती दिखती हैं, वीरेंद्र यादव का लेखन इस बात की याद दिलाता है कि आलोचना का अंतिम लक्ष्य सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होना है। उनका समूचा लेखन इसी ‘हस्तक्षेप’ की भावना से अनुप्राणित है – एक ऐसा हस्तक्षेप जो शास्त्रीय नियमों से अधिक मानवीय पीड़ा और सामाजिक न्याय के प्रति उत्तरदायी है। हिंदी आलोचना की दुनिया में वीरेंद्र यादव का नाम एक ऐसे प्रहरी के रूप में दर्ज रहेगा जिसने साहित्य को महज ‘रसास्वादन’ की वस्तु न मानकर सामाजिक परिवर्तन के एक सक्रिय हथियार के रूप में पहचाना और स्थापित किया।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

रामकृष्ण यादव

युवा समालोचक डॉ. रामकृष्ण यादव शमसुल हक मेमोरियल इवनिंग डिग्री कॉलेज, धनबाद, झारखंड में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं

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