विगत दो-तीन दिनों से सोशल मीडिया पर जमकर हंगामा मचा हुआ है। इस बार ट्रोलर्स के निशाने पर हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के जाने-माने प्रोफेसर और यूपीएससी मार्गदर्शक डॉ. विजेंद्र चौहान। दरअसल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और जातिवाद के संबंध पर यह नई बहस उस समय छिड़ी जब प्रो. विजेंद्र का एक बयान सुर्खियों में आया कि “कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो सकती है। एआई द्वारा दिए गए उत्तर उच्च जाति के दृष्टिकोण से लिखे हो सकते हैं, क्योंकि इसके विस्तृत डेटाबेस की सूचना सामग्री उच्च जाति और सत्ताधारियों के पक्ष में होती है। इसलिए सामाजिक न्याय के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर पूर्णत: निर्भर नहीं रहा जा सकता।”
इसके बाद इंटरनेट पर यूजर्स दो धड़ों में बंट गए। ‘क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जातिवादी हो सकती है?’ के मुद्दे ने एक बार फिर से देश में जातिवाद जैसी क्रूर व्यवस्था पर नए संदर्भों में तीखी बहस छेड़ दी है।
दरअसल कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक ऐसा तंत्र है जो अपने उत्तर और प्रतिक्रियाओं के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध व्यापक डेटाबेस पर आधारित है। इस विस्तृत डेटाबेस में अनेकानेक वेबसाइट, ई-पत्रिकाएं, न्यूज-पोर्टल, ई-किताबें, फोटो, वीडियो, आलेख, साहित्यिक सामग्री आदि शामिल होती हैं। इस तरह एआई स्वयं को पहले से मौजूद इन सूचनाओं के आधार पर विकसित करता है और अपने उत्तरों और प्रतिक्रियाओं के लिए इन्हीं उपलब्ध सामग्री पर निर्भर करता है। एआई की कोई स्वतंत्र, मौलिक सत्ता और बौद्धिकता नहीं होती है। इस तरह इन सूचनाओं में मौजूद पूर्वाग्रह एआई के जवाबों में भी आ जाते हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि डिजिटल मीडिया संस्थानों, सोशल मीडिया चैनलों, साहित्यिक संस्थानों और वे सभी माध्यम जिनसे हमें सूचनाएं प्राप्त होती हैं, उनके शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्ति किस वर्ग से आते हैं? जाहिर है कि इनमें पिछड़े, दलित और आदिवासी समुदायों की भागीदारी न्यूनतम है। ऐसे में इस आभिजात्य वर्ग के भीतर व्याप्त पूर्वाग्रह उनके सांस्थानिक कार्यों को भी उसी दिशा में प्रभावित करेंगे। यही कारण है कि आज विचारकों का एक वर्ग एआई के जातिगत और नस्लीय पूर्वाग्रहों से पूर्णतः मुक्त होने पर संशय प्रकट कर रहा है और इसकी तटस्थता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

विदेशों में नस्लीय पूर्वाग्रहों से हटकर अगर हम भारत में दलितों के परिप्रेक्ष्य में इसे देखें, तो यह स्थिति और भी आसानी से समझी जा सकती है। हमारे देश में दलितों के साहित्य को एक साहित्यिक विमर्श के रूप में अपनाने के लिए आभिजात्य साहित्य-जगत को एक लंबा समय लगा। आजादी के दशकों बाद 1990 से दलित साहित्य को मान्यता मिलनी शुरू हुई। आज भी दलित-साहित्य को उस सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता, जिस दृष्टि से आभिजात्य वर्ग अपने आभिजात्य साहित्य को देखता है। कभी शिल्प, कभी कला और कभी सौंदर्य तो कभी अलंकार, न जाने कितने-कितने कुतर्कों से दलित-साहित्य और उसकी संवेदना को खारिज किया जाता रहा है। ऐसे में अगर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तृत डेटाबेस में आभिजात्य संस्कृति का साहित्य और इससे उपजी सूचनाओं की भरमार हो तो आश्चर्य ही क्या है?
आज 21वीं सदी में भी दलितों और आदिवासियों की समस्याओं, उनके खिलाफ होने वाले अपराधों पर केंद्रित कोई बड़ा मीडिया संस्थान नही है। ऑक्सफैम और न्यूज़लॉन्ड्री के सर्वे (2019 और 2022) के अनुसार देश के बड़े मीडिया संस्थानों के स्वामित्व में ओबीसी, एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व नगण्य है। दलित-अस्मिता विमर्श पर आधारित जो कुछेक न्यूज चैनल हैं, वे मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाए हैं। इस तरह सूचना क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में भी दलित-पिछड़ा-आदिवासी वर्ग हाशिए पर है।
दरअसल 21वीं सदी की यह जातिवादी व्यवस्था अपने स्वरूप में काफी अस्पष्ट और अमूर्त है। यह उस जाति-आधारित भेदभाव और क्रूरताओं से अलग है, जो देश की आजादी से पहले या आजादी के प्रारंभिक दशकों में देखने को मिलती थी। आज युग कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का है। इस दौर में मानवीय संबंध जितने तरल, अमूर्त, अस्थिर और अवसरवादी होते जा रहे हैं, सामाजिक गतिशीलता उतनी ही बढ़ती जा रही है। हालांकि सामाजिक बंधनों की दृढ़ता में कमी तो आई है, लेकिन जाति आधारित वर्जनाएं अभी भी मौजूद हैं। इन वर्जनाओं को नए संदर्भों में परिभाषित करने की आवश्यकता है। इस उत्तरोत्तर आधुनिकता (मेटा आधुनिकता) के युग ने भले ही पुरानी-व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर डाला है और व्यक्ति-स्वातंत्र्य पर जोर दिया है। लेकिन इसने समाज की जाति-व्यवस्था को ध्वस्त नहीं किया है। मेटा-आधुनिकतावाद की जाति-व्यवस्था अमूर्त है, जो न तो नंगी आंखों से दिखाई देती है और न ही शब्दों में स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होती है। यह अमूर्त जातिवाद आज व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और सांस्थानिक प्रक्रियाओं में अपने बदले हुए स्वरूप के साथ अनवरत जारी है, जो ‘लेटरल एंट्री’, ‘नॉट फाउंड सुटेबिल’ जैसी व्यवस्थाओं और चयनसूचियों की अपारदर्शी प्रक्रियाओं में दिखता है। यह अंततः हाशिए पर पड़े दलित-आदिवासी समुदायों की आवाज़ को दबाता है और विस्तृत डेटाबेस से इस वर्ग की संवेदनाओं और समस्याओं को और भी हाशिए पर धकेल देता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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