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महाराष्ट्र : मोबाइल नेटवर्क की कमी से जूझ रहे नंदुरबार जिले के आदिवासी बहुल गांवों के लोग

रोचमाड़ गांव के ही विठ्ठल पावरा 55 वर्ष के हैं। वे मजदूरी के जरिए जीविकोपार्जन करते हैं। वे कहते हैं कि “पहले गांव में बीएसएनएल का टावर लगा था। लेकिन, मोबाइल पर नेटवर्क नहीं आता था‌। कुछ सालों से एयरटेल का टावर भी लगा है। फिर भी हालत जस की तस है।” पढ़ें, सतीश भारतीय की यह खबर

महाराष्ट्र का नंदुरबार जिला आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है। जिले के विभिन्न ग्रामीण इलाके पहाड़ियों से घिरे हुए हैं। इन इलाकों में बुनियादी आधारभूत संरचनाओं का घोर अभाव है। खासकर, जिले के धड़गांव प्रखंड के पहाड़ी गांव। पहाड़ी इलाके में बसे इन गांवों में माड़, खर्डी, सांवरिया दिग्गर, बमाना, खापरमाड़, तीनसमाड़ा, उड़गिया और मांडवी आदि शामिल हैं।

यूं तो इन गांवों में कई तरह की परेशानिया हैं, लेकिन एक परेशानी जिससे इन गांवों के लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं, वह है मोबाइल नेटवर्क की कमी।

मांडवी गांव के रमेश वल्वी की उम्र 30 वर्ष है। वे उलगुलान फाउंडेशन के डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। वे विधवा पेंशन, अनाथों के लिए पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, विकलांगों के लिए पेंशन आदि के संबंध में लोगों की सहायता करते हैं। साथ ही, वे डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में भी सक्रिय हैं।

रमेश बतलाते हैं कि “नंदुरबार जिले में धड़गांव ब्लाक के बहुत से गांव‌ मोबाइल नेटवर्क की समस्या से जूझ रहे हैं। ये करीब 20 गांव है, जिनमें मैं काम करता हूं। वहां मोबाइल नेटवर्क मिलना बहुत ही मुश्किल है। इनमें से कई गांव आदिवासी बहुल हैं और पहाड़ों पर बसे हुए हैं। वहीं, उड़गिया जैसे कई गांव तो धड़गांव तहसील से 100 किलोमीटर दूर हैं, जहां नर्मदा नदी पार करके जाना पड़ता हैं। लेकिन, वहां कोई पुल नहीं है। लोगों के पास तब एकमात्र विकल्प नौका का उपयोग ही होता है।”

वे यहीं नहीं रूकते। इलाके के लोगों को किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, इस बारे में वे सोदाहरण बताते हैं कि “हमने पिछले वर्ष खर्डी गांव में लाडली बहना योजना की केवाईसी करवाने के लिए कैंप लगवाया था और डेडलाइन के पहले हमें केवाईसी पूरी करनी थी। लेकिन, गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं था। जिसके कारण केवाईसी के लिए मोबाइल पर ओटीपी नहीं आ पा रहा था। तब हमने गांव की पहाड़ी पर चढ़कर नेटवर्क तलाशा। जब वहां भी नेटवर्क नहीं मिला, तब पहाड़ी के पेड़ों पर मोबाइल लटकाया। फिर, भी नेटवर्क नहीं आया‌। नतीजतन सरकारी डेडलाइन के मुताबिक कार्य पूरा न हो सका।”

मोबाइल नेटवर्क की तलाश में पहाड़ियों पर चढ़ना लोगों की मजबूरी

रमेश आगे बताते हैं कि “हम लोगों ने केवाईसी मामले में नेटवर्क की समस्या को लेकर शासन-प्रशासन से बातचीत की। हमने एयरटेल कंपनी के अधिकारियों को भी इससे अवगत करवाया। तब जाकर एयरटेल कंपनी का एक कर्मचारी नेटवर्क की जांच-पड़ताल करने खर्डी गांव आया था। वहां इसमें सुधार की प्रक्रिया की जा रही है। आशा है कि अब वहां नेटवर्क समस्या आने वाले समय में हल हो जाएगी।”

करीब 22 साल की प्रीति पावरा रोचमाड़ गांव की हैं। वे भी सामाजिक कार्यों से जुड़ी हैं‌। वे बताती हैं कि “मोबाईल नेटवर्क की समस्या ऐसी है कि फोन पर आने वाले ओटीपी, मैसेज, व्हाट्सएप मैसेज, ईमेल से लेकर परिचितों, रिश्तेदारों से बातचीत तक बहुत मुश्किल है। इन सबके लिए हमें या तो धड़गांव ब्लॉक या फिर नंदुरबार जिला जाना पड़ता है। जो किसी गांव से 30 किलोमीटर तो किसी गांव से 50 से लेकर 100 किलोमीटर तक दूर है। हालांकि मेरे गांव से धड़गांव 10 किमी से भी कम दूरी पर है। फिर भी, मोबाइल नेटवर्क की समस्या बनी हुई है।”

वे अपना एक अनुभव बताती हैं कि “हमने एक सामूहिक प्रयास के जरिए डिजिटल स्कूल खोला था। इस स्कूल का उद्देश्य सांवरिया दिग्गर अन्य गांव के विद्यार्थीयों को सरकारी जॉब के लिए मुफ़्त कॉम्पिटेटिव एक्जाम की तैयारी करवाना था। मगर, यह स्कूल नेटवर्क की परेशानी के कारण नहीं चल सका। वहीं, खर्डी, बमाना, उड़गिया, सांवरिया दिग्गर, माड़‌ जैसे गांव में एयरटेल का टावर भी है। फिर, भी नेटवर्क नहीं आता है। इसकी एक वजह यह भी है कि टावर का उचित संचालन व देखभाल नहीं हो रही‌।”

रोचमाड़ गांव के ही विठ्ठल पावरा 55 वर्ष के हैं। वे मजदूरी के जरिए जीविकोपार्जन करते हैं। वे कहते हैं कि “पहले गांव में बीएसएनएल का टावर लगा था। लेकिन, मोबाइल पर नेटवर्क नहीं आता था‌। कुछ सालों से एयरटेल का टावर भी लगा है। फिर भी हालत जस की तस है। कई शहरों के ग्रामीण इलाकों में तो मोबाइल नेटवर्क मौसम पर भी निर्भर करता है। सामान्य दिनों में नेटवर्क अच्छा होता है। लेकिन कोहरा, बारिश, अधिक ठंड नेटवर्क को प्रभावित कर देती है। परंतु हमारे गांव में मौसम अच्छा हो या खराब, इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता, क्योंकि नेटवर्क ही नहीं होता।”

विठ्ठल आगे यह भी कहते हैं कि “गांव में लोग 250-300 से लेकर 500 रुपए तक के रिचार्ज करवा रहे हैं, ताकि उन्हें शिक्षा, एवं ऑनलाइन योजनाओं में कोई बाधा न आए‌। लेकिन, नेटवर्क ना होने के कारण रिचार्ज की अवधि बिना उपयोग के ही समाप्त हो जाती है। राशन लेने, आधार अपडेट करवाने, योजनाओं के ऑनलाइन आवेदन करवाने तक में मुख्य आवश्यकता मोबाईल नेटवर्क की है। मगर, आज के डिजिटल युग में भी यह नेटवर्क हमें प्राप्त नहीं हो पा रहा है।”

तीनसमाड़ा गांव के 20 साल के अन्ना साहेब पावरा बी.कॉम (तृतीय वर्ष) के विद्यार्थी हैं। वे बताते हैं कि “जब जरूरी और जल्दी परिचितों, रिश्तेदारों अन्य से बात करनी होती है, तब एक जरिया मोबाइल सेवा ही है। ऑनलाइन पढ़ना, नौकरी के लिए आवेदन करना, यूट्यूब पर न्यूज देखना, गाने सुनना, देश-दुनिया के बारे में जानना यह सब हमारे गांव में मोबाइल नेटवर्क न हो पाने के कारण संभव नहीं हो पा रहा‌। नौकरियों से संबंधित विशेष जानकारी, आवेदन, विशेष ऑलाइन कार्यक्रम में, शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश पंजीकरण जैसे अन्य जरूरी कार्यों के लिए हमें नंदूरबार शहर में ही जाना पड़ता है।” करीब 23 साल के तीनसमाड़ा गांव के रमेश पावरा बताते हैं कि “मोबाइल नेटवर्क की समस्या इतनी‌ विकराल है कि धड़गांव ब्लाक के गांवों की 200-300 मीटर ऊंची पहाड़ियों पर भी नेटवर्क नहीं मिल पाता। ऐसे में परिचित व रिश्तेदार से बातचीत, हाल-चाल पूछने, सुख-दुख जानने के लिए लोग धड़गांव ब्लॉक में ही बाजार के दिन आपस में भेंट करते‌ हैं। इतना ही नहीं, धड़गांव ब्लाॅक के गांवों में ऑनलाइन पेमेंट के लिए पेटीएम, फोन पे, गूगल पे जैसे एप्स का इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। यदि कोई करता भी है तब पेमेंट फेल हो जाता है या अटक जाता है, जिससे हफ्तों में पैसा रिफंड होता है। डिजिटल के नाम पर हमारे पास कुछ नहीं हैं। बस केवल बिना नेटवर्क का मोबाईल है। जो एक डिब्बे के भांति है।”

तीनसमाड़ा गांव के विपुल शिंदे, 20, इंजीनियरिंग के विद्यार्थी हैं। उनका कहना है कि “धड़गांव ब्लॉक के जो गांव मोबाइल नेटवर्क की समस्या से जूझ रहे हैं, वे असलियत में पूरी दुनिया से डिस्कनेक्टेड और आइसोलेटेड हैं। नेटवर्क ना पहुचने के कारण गांवों में बहुत कम लोग मोबाइल रखते हैं। जो शिक्षित हैं ज्यादातर उनके पास ही स्मार्टफोन होता है। वहीं, कम पढ़े-लिखे लोग कीपैड फोन रखते हैं। फोन नहीं रखने वाले लोग यही सोचते हैं कि जब नेटवर्क ही नहीं है तब मोबाइल रखने का कोई अर्थ नहीं।”

बहरहाल, सवाल यही है कि आजादी के दशकों बाद भी सरकार की प्राथमिकता ये पहाड़ी गांव रहे ही नहीं हैं। यदि होते तो न यहां आधारभूत संरचनाओं का अभाव नहीं होता और न ही मोबाइल नेटवर्क इतनी बड़ी समस्या होती।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सतीश भारतीय

मध्य प्रदेश के सागर जिला के निवासी सतीश भारतीय स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं

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