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‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ : मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद की दास्तान

मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग वैसी ही बनी हुई है। आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी का सवाल अब भी अनुत्तरित है। लेखक यह साफ करता है कि ‘अल्पसंख्यक’ और ‘अक़लियत’ जैसे शब्दों ने पसमांदा समाज की असली पहचान को धुंधला कर दिया है। पढ़ें, अब्दुल्लाह मंसूर की यह समीक्षा

बिहार की सरजमीं से बीते 27 सालों से मुस्लिम समाज के भीतर सामाजिक न्याय की अलख जगा रहे मुख्तार अंसारी की किताब ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ सिर्फ आत्मकथा भर नहीं है, बल्कि भारतीय मुस्लिम समाज के उस ‘अंधेरे कोने’  दस्तावेज़ है, जिस पर हमारे रहनुमाओं और इतिहासकारों ने या तो साजिशन चुप्पी साध ली या फिर उसे मजहबी चादर तले ढंककर नज़रअंदाज़ कर दिया। किताब का शीर्षक जिस वर्ष (1998) की ओर इशारा करता है, वह दरअसल उस पसमांदा इंकलाब का साल है जब अली अनवर अंसारी ने ‘पसमांदा मुस्लिम महाज़’ के ज़रिए भारतीय राजनीति के स्थापित मुहावरों को चुनौती दी थी। इस किताब के पन्नों से गुजरते हुए यह अहसास होता है कि मुख्तार अंसारी यहां महज़ अपनी कहानी नहीं कह रहे, बल्कि वे उन करोड़ों ‘अजलाफ-अरजाल’ (पिछड़े और दलित) मुसलमानों की सामूहिक चीख, सदियों के अपमान और दबे हुए संघर्षों को जुबान दे रहे हैं, जिन्हें सत्ता की मलाई खाने वाले अशराफ तबके ने हमेशा हाशिए पर धकेला।

यह किताब उस कड़वे और बुनियादी सवाल से हमें रू-ब-रू कराती है कि “यदि इस्लाम का मूल दर्शन बराबरी और इंसाफ़ है, तो फिर भारतीय मुस्लिम समाज के धरातल पर जातिवाद और छुआछूत का यह गहरा ज़हर आख़िर आया कहां से?” यह कृति उसी ‘मसावात’ (बराबरी) की अधूरी जंग का एक मुकम्मल और साहसी बयान है।

किताब की शुरुआत लेखक मुख्तार अंसारी के निजी जीवन से होती है। लेकिन यह निजी जीवन बहुत जल्दी एक सामाजिक दस्तावेज़ में बदल जाता है। वर्ष 1956 में बिहार के कैमूर ज़िले के एक छोटे से गांव में जन्मे मुख्तार अंसारी का बचपन आर्थिक तंगी, सामाजिक हीनता और जातिगत पहचान के बोझ के साथ बीता। यह वही कहानी है जो देश के लाखों पसमांदा घरों में दोहराई जाती रही है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि पसमांदा चेतना किसी किताब को पढ़ने या किसी भाषण से नहीं पैदा होती, बल्कि वह रोज़मर्रा के अपमान, अस्वीकार और संघर्ष से जन्म लेती है। उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ उनकी शादी से जुड़ा हुआ है। एक शारीरिक रूप से अक्षम और गंभीर रूप से बीमार महिला बदरुन निशा से विवाह करना उस समाज में, जहां शादी को हैसियत, वंश और ‘बराबरी’ से जोड़ा जाता है, एक असामान्य और साहसिक फैसला था। लेखक इस फैसले को किसी नैतिक उपदेश की तरह पेश नहीं करते, बल्कि इसे एक मानवीय ज़िम्मेदारी के रूप में रखते हैं। यही निर्णय आगे चलकर पसमांदा आंदोलन की वैचारिक नींव बनता है जो आगे चलकर ‘पसमांदा’ यानी पीछे छूटे हुए लोगों का दर्द समझने की मजबूत बुनियाद बना।

उनका यह निजी फैसला इस बात का प्रतीक है कि पसमांदा आंदोलन सिर्फ सत्ता में हिस्सेदारी पाने का एक राजनीतिक जरिया भर नहीं है, बल्कि यह एक गहरी मानवीय संवेदना और समाज के सबसे कमजोर, सबसे लाचार व्यक्ति के साथ मजबूती से खड़े होने का एक जज्बा है।

किताब का एक बेहद मार्मिक पक्ष वह है जहां लेखक अपनी पत्नी के संघर्षों को सामने रखते हैं। बदरुन निशा का सिलाई करके घर चलाना, सामाजिक उपेक्षा सहना और आंदोलन के कठिन दौर में अपने पति का साथ देना यह सब उस अनदेखे श्रम की याद दिलाता है, जिसे अक्सर आंदोलनों के इतिहास से बाहर कर दिया जाता है। यहां यह किताब पसमांदा आंदोलन को केवल पुरुष नेतृत्व की कहानी नहीं रहने देती, बल्कि उसे उन आम पसमांदा महिलाओं के संघर्ष से जोड़ती है, जिनके बिना कोई भी सामाजिक आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता। इस किताब में आम घरों की उन महिलाओं की खामोश कुर्बानियां भी शामिल हैं, जिन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।

इस किताब का एक महत्त्वपूर्ण और बेचैन कर देने वाला हिस्सा मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जाति-व्यवस्था और छुआछूत पर किया गया विश्लेषण है। आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि मजहबी तौर पर इस्लाम में जाति नहीं है, लेकिन मुख्तार अंसारी इस दावे को ज़मीनी अनुभवों के आधार पर चुनौती देते हैं। वे बताते हैं कि धार्मिक पहचान जातिगत मानसिकता को अपने आप समाप्त नहीं कर देती। वे उन घटनाओं का सिलसिलेवार जिक्र करते हैं जहां पसमांदा बिरादरी के लोगों के साथ ठीक वैसा ही अमानवीय व्यवहार किया गया जैसा हिंदू समाज में पिछड़े और दलित के साथ होता रहा है।

मसलन, कैमूर के सिरबिट गांव की 2001 की वह घटना हमारे मुस्लिम समाज के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा है, जहां एक अंसारी मास्टर साहब को प्यास लगने पर सिर्फ इसलिए उनके साथी ने पानी नहीं पीने दिया क्योंकि जिस घर से पानी मांगा गया था वह ‘धोबी’ (पसमांदा) का था और साथ चल रहे ‘खान साहब’ (अशराफ) ने उसे अपवित्र मान लिया था। इसी तरह बिक्रमगंज (हाटा, कैमूर) की वह घटना, जहां एक अंसारी बाराती की खटिया केवल इसलिए उलट दी जाती है, क्योंकि वह ‘जोलहा’ है, मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद सामंती सोच को सामने लाती है।

ये घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि पसमांदा मुसलमानों के लिए बराबरी का सवाल मस्जिद, शादी, पानी, बैठने और खाने तक फैला हुआ है। इस्लामी बराबरी का दावा किताबों और भाषणों में मौजूद है, लेकिन सामाजिक जीवन में उसकी मौजूदगी बेहद सीमित है।

समीक्षित पुस्तक ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ का आवरण पृष्ठ व लेखक मुख्तार अंसारी

पूर्वी चंपारण के अल्हेपुर गांव की घटना इस किताब का सबसे तीखा और राजनीतिक रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। एक अंसारी की बेटी की शादी में दूल्हे का सज-संवर कर मीरों के मोहल्ले से गुजरना इतना बड़ा अपराध मान लिया गया कि बारात पर हमला कर दिया गया। मेहमानों का खाना ज़मीन पर फेंक दिया गया और सामाजिक अपमान की सारी सीमाएं तोड़ दी गईं। जब इसी गांव में अंसारियों ने अपनी खरीदी हुई ज़मीन पर अलग मस्जिद बनाने की कोशिश की, तो उस मस्जिद को भी ढाह दिया गया। उल्टा पीड़ितों पर ही मुकदमे दर्ज कराए गए। यह घटना मुस्लिम एकता के खोखले दावों पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। अगर एक ही खुदा को मानने वाले लोग एक साथ इबादत तक नहीं कर सकते, तो वह एकता किस काम की है?

यह किताब पसमांदा आंदोलन के राजनीतिक सफर को भी विस्तार से दर्ज करती है। मुख्तार अंसारी बताते हैं कि 1998 के बाद किस तरह यह आंदोलन बिहार से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगा। यह आंदोलन मुस्लिम राजनीति की उस परंपरागत सोच को चुनौती देता है, जिसमें मुसलमान को एक समान अल्पसंख्यक मान लिया जाता है। अब तक भारतीय राजनीति में ‘मुसलमान’ का मतलब सिर्फ ‘अल्पसंख्यक’ समझा जाता था, लेकिन इस आंदोलन ने पूरी दुनिया को यह बताया कि उस अल्पसंख्यक के भीतर भी एक बहुत बड़ा ‘बहुसंख्यक पसमांदा’ वर्ग है, जिसका जायज हक मुट्ठी भर 15 प्रतिशत अशराफ लोग सदियों से डकार रहे हैं। 2004 में पसमांदा मुस्लिम महाज़ ने जब ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ का रूप लिया, तो यह एक नए युग की शुरुआत थी जिसका प्रभाव हमें 4 दिसंबर, 2004 को दिल्ली के रामलीला मैदान के ‘दलित मुस्लिम महापंचायत’ में देखने को मिलता है कि अब यह तबका जाग चुका है। पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह, प्रभास जोशी और योगेंद्र यादव जैसे दिग्गजों की मौजूदगी ने इस आंदोलन को एक राष्ट्रीय पहचान दी। मुख्तार अंसारी बताते हैं कि जब ‘पसमांदा’ शब्द का शोर तेज हुआ, तो कैसे अशराफ तबके में खलबली मच गई। उन्होंने इस आंदोलन को कुचलने के लिए इसे ‘मजहब के खिलाफ’ और ‘शैतान की आवाज’ तक करार दिया। मस्जिदों के इमामों का इस्तेमाल इस सामाजिक न्याय के आंदोलन को बदनाम करने के लिए किया गया। किसी भी न्याय की बात करने वाले को धर्म विरोधी घोषित कर देना हमेशा से सत्ताधारियों का सबसे आसान और घटिया हथियार रहा है, और पसमांदा आंदोलन के साथ भी यही हुआ।

बिहार में 2005 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह पसमांदा मुस्लिम महाज ने गोलबंदी की और राजद की सरकार बदली, वह इस समाज की ताकत का अहसास कराता है। पसमांदा अब सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं रहना चाहता, वह अब अपनी हिस्सेदारी का हिसाब चाहता है। आंदोलन की देन ही रहा कि नीतीश कुमार ने 2006 में अति पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया और अली अनवर अंसारी को राज्य सभा में भेजा तथा मो. उसमान हलालखोर को अति पिछड़ा वर्ग आयोग का सदस्य बनाया, जिससे बिहार में पहली बार अरजाल मुस्लिम को सत्ता में भागीदारी मिली। इसी साल 23 फरवरी, 2006 को पटना के तारामंडल सभगार में सच्चर कमेटी के सामने हुई हिंसा का जिक्र इस किताब में एक बड़े जख्म की तरह मौजूद है। वहां पसमांदा मुसलमानों पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि वे अपने लिए ‘अनुसूचित जाति’ के दर्जे की मांग कर रहे थे। अशराफ तबका नहीं चाहता था कि पसमांदा समाज को उनकी अलग पहचान मिले, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनका ‘मुस्लिम नेतृत्व’ का एकाधिकार खत्म हो जाएगा। यह हमला सिर्फ व्यक्तियों पर नहीं, बल्कि पसमांदा चेतना पर किया गया एक प्रहार था।

किताब में यह भी बताया गया है कि किस तरह धर्म के नाम पर पसमांदा भीड़ का राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है। 2018 की ‘दीन बचाओ – मुल्क बचाओ’ रैली इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां पसमांदा मुसलमानों की भारी भीड़ दिखाकर अशराफ नेतृत्व ने राजनीतिक लाभ हासिल किया, जबकि पसमांदा समाज को कोई ठोस हिस्सेदारी नहीं मिली। यहां कांशीराम का संदर्भ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जिन्होंने मुस्लिम नेतृत्व में ब्राह्मणवादी मानसिकता की पहचान की थी। यह विश्लेषण पसमांदा आंदोलन को दलित-बहुजन राजनीति के व्यापक विमर्श से जोड़ देता है।

लेखक ने केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भाषायी मोर्चे पर भी इस लड़ाई को बहुत मजबूती से लड़ा है। उन्होंने किताब में उन भद्दी और अपमानजनक कहावतों का जिक्र किया है जो समाज में जानबूझकर जुलाहा, धुनिया और अन्य छोटी जातियों के खिलाफ फैलाई गई थीं। मसलन, ‘खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा’ या ‘बारह बरस तप कइली, जोलहा भतार मिलल’, ‘तीसी के खेत में जोलहा भुलाईल’, ‘सावां कोदो अन्न नहीं, जोलहा धुनिया जन नहीं’, ‘माजा मारे गाजी मियां, बान्हल जाए डफाली’ आदि। ऐसे मुहावरे उस गहरी मानसिक दासता और हीनता के भाव को दर्शाते हैं जो सदियों से हमारे समाज की रगों में भरे गए हैं। इसी तरह, लेखक ने नामों के पीछे छिपे जातिवाद को भी बेनकाब किया है। अशराफों के नाम जहां इज्जत और रूतबे वाले होते हैं, वहीं पसमांदा और दलित तबके के लोगों के नाम ऐसे रखे जाते थे जिससे उनकी पहचान हमेशा छोटी बनी रहे। जैसे बत्तख मियां, सोमारु, बुद्ध, ईदू, बकरीदू, सोबराती, जुमराती, बरफाती, खैराती आदि उसी तरह महिलाओं में भी ईदनी, बकरीदनी, सोबरतनी, बरफतनी, सनिचरी, अतवरिया आदि नाम है।

मुख्तार अंसारी ने इन अपमानों का जवाब देने के लिए अपने लोकगीतों को एक शक्तिशाली हथियार बनाया। उनके भोजपुरी गीत केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक चेतना जगाने का माध्यम हैं। वे पसमांदा समाज से कहते हैं कि जब तक वह खुद को पहचानेगा नहीं और संगठित नहीं होगा, तब तक उसके साथ अन्याय होता रहेगा। यह संदेश विशेष रूप से पढ़े-लिखे पसमांदा तबके के लिए है, जो नौकरी या सामाजिक हैसियत मिलने के बाद अपनी जड़ों से दूरी बना लेते हैं। उनके लोकगीतों के कुछ मुखरे द्रष्टव्य हैं–

दलित पसमांदा जागऽ जागऽ हो महिला
चले के बाऽ दिल्ली लड़े बात इहे कहिला।

कह मुख्तार चलऽ देश के बचाइ जाऽ
नीरज नदान सबके इहे समझाई जाऽ।।

कुछ पड़ल बाऽ देशवा में दंगाई ए बलम जी
नाहि त लूट जाई पुरुखन के कमाई ए बलम जी।।

मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग वैसी ही बनी हुई है। आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी का सवाल अब भी अनुत्तरित है। लेखक यह साफ करता है कि ‘अल्पसंख्यक’ और ‘अक़लियत’ जैसे शब्दों ने पसमांदा समाज की असली पहचान को धुंधला कर दिया है। ये शब्द सुरक्षा और एकता का भ्रम पैदा करते हैं, लेकिन सत्ता और संसाधनों पर कब्ज़ा कुछ गिने-चुने तबकों के हाथ में ही रहता है। यह किताब एक आह्वान है। मुख्तार अंसारी के जीवन का यह सफर हमें यह सिखाता है कि न्याय की लड़ाई कभी भी आसान नहीं होती। उन्हें धमकियां मिलीं, उनके साथियों की हत्याएं की गईं (जैसा कि उन्होंने ‘मसावात की जंग’ किताब का हवाला देते हुए बताया है), लेकिन वे पीछे नहीं हटे। उनका यह विश्लेषण हमें मजबूर करता है कि हम मुस्लिम समाज के भीतर के उस ढांचे को देखें जो बाहर से तो बहुत खूबसूरत और एकजुट दिखता है, लेकिन अंदर से भेदभाव की सड़ांध से भरा हुआ है।

यह किताब सिर्फ इतिहास नहीं बताती, बल्कि भविष्य का रास्ता भी दिखाती है। वह रास्ता जो आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी, सम्मान और सच्ची बराबरी की ओर जाता है। पुस्तक में दिए गए आंकड़े, समाचार पत्रों की कतरनें और चुनावी सूची इसे केवल वैचारिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक संदर्भ ग्रंथ का रूप देते हैं। यह सामग्री शोधार्थियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी है। हालांकि, कभी-कभी तथ्यों की अधिकता पाठकीय प्रवाह को धीमा कर देती है, जिसे संपादकीय स्तर पर थोड़ा संतुलित किया जा सकता था। इसके बावजूद यह किताब पसमांदा साहित्य का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह हमें याद दिलाती है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई लंबी होती है, लेकिन अगर चेतना जाग चुकी हो, तो उसे रोका नहीं जा सकता। यह किताब उस खामोश क्रांति की आवाज़ है, जिसने अब बोलना शुरू कर दिया है और जो अब रुकने वाली नहीं है। लेखक का मानना है कि जब तक हमारा बुद्धिजीवी वर्ग अपनी जड़ों पर गर्व नहीं करेगा, तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी। उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम के संघर्षों का उदाहरण देकर यह समझाया है कि कैसे एक ‘सोती हुई कौम’ को जगाया जा सकता है।

समीक्षित पुस्तक : पसमांदा जन आंदोलन 1998
लेखक : मुख्तार अंसारी
प्रकाशक : एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस
मूल्य : 150 रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

अब्दुल्लाह मंसूर

लेखक पेशे से शिक्षक हैं और ‘पसमांदा डेमोक्रेसी’ नामक यूट्यूब चैनल के संचालक हैं

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