h n

उत्तर प्रदेश : यूजीसी इक्विटी नियमावली लागू करने की मांग अब गांव और कस्बों में भी

भाजपा सरकार बहुजन समुदाय के लिए लाए जा रहे सकारात्मक कानून को कोर्ट के जरिए रुकवा दे रही है। वहीं ईडब्ल्यूएस आरक्षण को उसी कोर्ट द्वारा आसानी से मंजूरी दिलवा दिया जा रहा है। सम्मेलन में इसके खिलाफ यूपी के छात्र-युवा, किसान-मजदूर को खड़ा कर एकताबद्ध आंदोलन का संकल्प लिया गया। पढ़ें, यह खबर

यूजीसी इक्विटी नियमावली लागू करने और समता, सामाजिक न्याय और संविधान के सवालों को अब गांवों और कस्बों में ले जाया जाएगा। यह निर्णय गत 22 फरवरी को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दारुलसफा में सम्मेलन में लिया गया। सम्मेलन में यूपी के विभिन्न छात्र संगठनों के प्रतिनिधि, किसान संगठन, सामाजिक-राजनीतिक संगठनों, बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट और विभिन्न जिलों के नेतृत्वकर्ता शामिल हुए। बैठक में राष्ट्रीय बांस शिल्पी महासंघ भी शामिल हुआ और सम्मेलन की शुरुआत राजा बेन की जयंती पर पुष्प अर्पित करने के साथ किया गया।

सम्मेलन में प्रयागराज, लखनऊ, गाजीपुर, बाराबंकी, आजमगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर, चंदौली, उन्नाव, हरदोई, अयोध्या, बलिया, सीतापुर, देवरिया, रायबरेली, अमेठी, बांदा आदि जिलों से राष्ट्रीय बांस शिल्पी महासंघ, यादव सेना, यूजीसी एक्ट 2026 समता आंदोलन, आईसा, आरवाईए, कम्युनिस्ट फ्रंट, एनएपीएम, बापसा, ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी, सोशलिस्ट पार्टी, पूर्वांचल किसान यूनियन, सोशलिस्ट किसान सभा, बामसेफ, मोस्ट, सामाजिक न्याय मंच, अखंड भारत मिशन, संविधान बचाओ संघर्ष समिति के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

इस मौके पर राजीव यादव, शिवकुमार यादव, कमल उसरी, बलवंत यादव, मनीष शर्मा, सुनील मौर्या, संतोष कुमार धरकार, अश्वनी, वीरेंद्र यादव, कुलदीप यादव, कुमार चंदन, शशिकांत, पवन यादव, गौतम राणे, आकांक्षा आजाद, विशाल सिंह, जीशान अहमद, श्यामलाल निषाद, रणधीर यादव, डीपी यादव, मुमताज़ अहमद, संजय कुशवाहा, एडवोकेट दिलीप यादव, रामसागर, अशोक कुमार, एडवोकेट सूर्यमणि यादव आदि ने संबोधित किया।

सम्मेलन में यह निर्णय सामूहिक रूप से लिया गया कि यूपी के सभी जिलाें, प्रखंडों, कॉलेज व विश्वविद्यालयों में अभियान चलाते हुए कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। बैठक में तय हुआ कि 28 फरवरी को यूपी के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया जाएगा। कोर्ट में इस मसले में सुनवाई से पहले लखनऊ में सम्मेलन और महापंचायत का आयोजन किया जाएगा। अगर सुप्रीम कोर्ट से फैसला पक्ष में नहीं आता है तो आने वाले समय में और बड़े आंदोलन की तरफ बढ़ा जाएगा। हर जिले में इस आंदोलन की संचालन टीम का भी गठन किया जाएगा।

सम्मेलन को संबोधित करते एक वक्ता

वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि यूजीसी रेगुलेशन को और बेहतर प्रारूप के साथ लागू करने तक यह लड़ाई जारी रहेगी। भारत सरकार से यह मांग है कि रोहित वेमुला एक्ट की तर्ज पर वंचित समाज के सभी वर्गों के साथ हो रहे जातिवाद व भेदभाव के खिलाफ सशक्त रोहित एक्ट का निर्माण संसद से करें। देशस्तर पर जातीय जनगणना करवाने की मांग को भी इस आंदोलन में उठाते हुए अभियान चलाने का निर्णय लिया।

वक्ताओं ने आगे कहा कि भाजपा सरकार बहुजन समुदाय के लिए लाए जा रहे सकारात्मक कानूनों या रेगुलेशन को कोर्ट के जरिए रुकवा दे रही है। वहीं ईडब्ल्यूएस आरक्षण को उसी कोर्ट द्वारा आसानी से मंजूरी दिलवा दिया जा रहा है। यह वंचितों के साथ अन्याय है। इसके खिलाफ यूपी के छात्र-युवा, किसान-मजदूर को खड़ा कर एकताबद्ध आंदोलन का संकल्प लिया गया।

यूजीसी के अपने आंकड़े ही बताते हैं कि 2019 से 2024 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इन स्थितियों में एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक आत्महत्या करने को मजबूर होते जा रहे हैं। इस लिहाज से विश्वविद्यालयों-कॉलेजों को जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न से मुक्त बनाने की दिशा में यूजीसी इक्विटी नियमावली न्यूनतम कोशिश है। इसे तत्काल लागू किया जाए। सामाजिक न्याय के लिए ठोस व सुसंगत नीतियां व योजनाएं बने, इसके लिए जरूरी है कि जाति जनगणना हो। जाति जनगणना की घोषणा के बाद अभी जारी जनगणना फॉर्म में जाति का कॉलम क्यों नहीं है, सरकार इसका जवाब दे।

सामाजिक न्याय के सवालों पर न्यायालय के रवैये पर वक्ताओं ने कहा कि भारत की न्यायपालिका, विशेषकर संविधान पीठों में, सामाजिक विविधता एवं प्रतिनिधित्व का अभाव लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है। ऐसे में संविधान पीठ में अनिवार्य रूप से एसटी-एससी व ओबीसी को सम्मिलित किया जाना चाहिए और न्यायपालिका में एससी-एसटी व ओबीसी के प्रतिनिधित्व की गारंटी होनी चाहिए।

सम्मेलन में राजशेखर, निशांत राज, एडवोकेट इमरान अहमद, जगरू प्रसाद, मानविका, डाक्टर आरपी गौतम, अलोक, ऊषा विश्वकर्मा, अहद आज़मी, संदीप बेनवंशी, अरमान सिंह, राजीव गुप्ता, प्रदीप, रोहित कश्यप, रणवीर, कवि तीर्थराज, एहसानुल हक मलिक, डॉ. उमाशंकर आदि भी शामिल हुए।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

एफपी डेस्‍क

संबंधित आलेख

पंजाब विश्वविद्यालय : एक दलित प्रोफ़ेसर की आपबीती
दलित समुदाय से आने वाले डॉ. हरप्रीत सिंह के साथ नौकरी ज्वाइन करने वाले उनके सवर्ण सहकर्मी आज विभागाध्यक्ष हैं, जबकि वे पिछले 18...
बिहार विधानसभा में ‘ब्राह्मण’ शब्द का असंसदीय हो जाना
यूजीसी रेगुलेशन-2026 को लागू करने की मांग करते हुए माले के विधायक संदीप सौरभ ने ‘ब्राह्मणवादी मानसिकता’ की बात कही थी, लेकिन सदन में...
ब्राह्मणवादी कर्मकांडों से परे एक विदाई : बुद्ध शरण हंस की स्मृति में गूंजे आंबेडकरवादी सरोकार
बुद्ध शरण हंस के निधन के बाद उनके परिवार और बिहार के नागरिक समाज ने जिस तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक नजीर पेश की, उसने पारंपरिक...
एक किताब, जिसमें दर्ज है मीडिया में दलित-बहुजनों के प्रति हिकारत के दास्तान
न्यूज़रूम में दलितों और आदिवासियों को अख़बार के सवर्ण समाज से आने वाले मालिकों, मैनेजरों और संपादकों का भरोसा नहीं मिलता; उन्हें यह महसूस...
श्रम की गरिमा : भारत में पवित्रता और प्रदूषण की अवधारणाएं
जब तक हम यह मानते रहेंगे कि शारीरिक श्रम केवल विशिष्ट जातियों और लिंग के व्यक्तियों के हिस्से में है और उसमें कोई गरिमा...