[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें डॉ. संजीव कुमार का यह आलेख]
विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया
वित्त बिना शूद्र गए!
इतने अनर्थ एक अविद्या ने किये
ये चार पंक्तियां शिक्षा की ताकत को समझने के लिए बहुत बड़ा उदाहरण हैं। शिक्षा में कितनी ताकत होती है यह बात जोतीराव फुले से बेहतर भला कौन समझ सकता था। इसलिए उन्होंने अपना पूरा जीवन और पूरा धन सब कुछ त्याग कर भारत के शूद्रों और अतिशूद्रों (आज क्रमश: पिछड़े व दलित) के लिए शिक्षा के द्वार खोले। शिक्षा की सबसे बड़ी ताकत के रूप में आगे चलकर हमें बाबासाहब के रूप में धधकती हुई ज्वाला मिली जिसे आज पूरा विश्व ज्ञान का पुंज कहता है।
11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में जन्मे जोतीराव गोविंदराव फुले भी एक साधारण व्यक्ति थे। उनके पिता फूलों के व्यवसाय से अपना घर-परिवार चलाते थे। जोतीराव फुले को अपने एक ब्राह्मण मित्र की बारात में अपमान का सामना करना पड़ा तब उनके हृदय को बहुत गहरी ठेस लगी और यहीं से उन्होंने ब्राह्मणवाद पर विचार करना आरंभ किया। मात्र सातवीं कक्षा तक अध्ययन करने वाले फुले ने तत्कालीन भारतीय समाज में फैले कुरीतियों से लड़ने और समाधान के लिए 1873 में सत्यशोधक समाज की नींव रखी। यह वही दौर था जब त्रावणकोर (वर्तमान में केरल का भाग) में दलित स्त्रियों को स्तन ढंकने के लिए भी टैक्स देना पड़ता था। ऐसे काल में जन्मे फुले की मानसिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है। लेकिन भारतीय समाज की समस्याओं की जड़ तलाशते हुए अंततः फुले इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इन सबके पीछे शिक्षा की कमी तथा समाज में गहरा व्याप्त पाखंड है। इसलिए पाखंड पर प्रहार करने के लिए उन्होंने स्त्री शिक्षा पर जोर दिया और किताबों और समाचार पत्रों को माध्यम बनाया।
जब स्त्रियों की शिक्षा के लिए उन्होंने विचार किया तो उनके सामने समस्या यह थी कि स्त्रियों को घर-घर जाकर पढ़ाएगा कौन? फिर उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले की सहायता ली। इसके लिए उन्होंने स्वयं पहले अपनी पत्नी को शिक्षित किया और फिर उन्हें स्त्रियों की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया। इसका कुंठित समाज ने पुरजोर विरोध किया।
फुले का उद्देश्य वंचित समाज, या उनकी भाषा में कहा जाए तो शूद्र व अतिशूद्र समाज को शिक्षित करने के साथ-साथ उन्हें मानसिक, सामाजिक एवं धार्मिक रूप से भी चेतनशील बनाना था।
आज भारत के वंचित समाज में पाखंड और जातीय भेदभाव से लड़ने का जो साहस है, जिनके माध्यम से इन समाज में बौद्धिक विकास हुआ है, उसके पीछे निश्चय ही फुले की रोशनी है। जिन पुराणों का बखान करते हुए सामंतवादियों ने हजारों साल तक दलितों, पिछड़ों का शोषण किया हैं, जिनकी वजह से यह राष्ट्र कभी एक न हो सका, जिनकी वजह से अनगिनत आक्रांताओं का दंश इस देश ने झेला है, उन पुराणों का फुले ने बहुत कठोर शब्दों में विरोध किया था। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में जातीय सड़ांध पर खुल कर बात होने लगी।

सन् 1873 में ही जोतीराव फुले ने एक पुस्तक की रचना की थी, जो आज भी ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के हजार पुस्तकों का इकलौता जवाब है। इस पुस्तक का नाम है– ‘गुलामगिरी’। इस किताब में उन्होंने हिंदू धर्म के विष्णु के अवतारों तथा सुर-असुर के युद्ध को खंडित करते हुए लिखा है कि ब्राह्मणों द्वारा रचित सभी पुराण भारत के मूलनिवासियों को गुलाम बनाने की लिए रची गई काल्पनिक पुस्तके हैं। उनके शब्दाें में, “उनके [शूद्रों व अतिशूद्रों] के ऊपर अपनी सत्ता स्थापित करके उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखने के लिए ब्राह्मणाें ने (आर्यों ने) अपने हितों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से कई ग्रंथों की रचना की।”[1]
किताब के पहले भाग ‘ब्रह्मा, मनुष्य की उत्पत्ति, सरस्वती और ईरानी या आर्य लोगों के बारे में’ में फुले लिखते हैं– “यूरोप महाद्वीप में शामिल अंग्रेज, फ्रांसीसी इत्यादि दयालु सरकारों ने गुलाम बनाने की प्रथा पर पाबंदी लगा दी है। इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मदेव के नियमों को खारिज कर दिया है, क्योंकि मनुसंहिता में लिखा गया है कि ब्रह्मदेव ने अपने मुख से ब्राह्मणों को पैदा किया और फिर केवल उनकी सेवा-चाकरी करने के लिए अपनी टांगों से शूद्रों को पैदा किय।”[2] वे यहीं नहीं रूकते। वे इसके आगे लिखते हैं– “अब यह बताओ कि अगर ब्राह्मणों का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ होगा, तो वह एक प्रकार का गर्भाशय ही हुआ न, और यदि गर्भाशय होगा तो मासिक धर्म भी होगा। तो क्या मनु का कोई लेख है, जो बताता हो कि मासिक धर्म के उन चार दिनों में ब्रह्मा अलग-थलग एकांतवास में बैठता था या फिर लिंगायत स्त्रियों की तरह राख लगाकर पाक होकर वह अपने घर के सारे काम कर लेता था?”[3]
आज के दौर में इस तरह के लेख और पुस्तकें लिखना चुनौती है। जोतीराव फुले ने हिंदू धर्म के जिन ग्रंथों पर सवाल उठाए थे, वे वैज्ञानिक दृष्टि से तार्किक थे। उनके सवालों में उस दौर के ब्राह्मण समाज तथा सामंतवादी व्यवस्था के अति अमानवीय, घृणित कर्म के विरुद्ध तीखा प्रहार था।
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उस दौर में दलितों और शूद्रों का जीवन पशुओं से भी बदतर था तो उसके पीछे कोई विदेशी आक्रांता नहीं बल्कि उनके अपने ही देश के ऐसे लोग थे जो एक विशिष्ट जाति में जन्म लेने के कारण स्वयं को ईश्वर का स्वरूप मानते थे और दूसरों को अपने सामने पशु समझते थे। वे इनका शोषण करते थे और उनकी स्त्रियों को भोग की वस्तु समझना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे। इसके लिए ब्राह्मणों ने बाकायदा धर्मशास्त्र भी गढ़ा था। इसीलिए फुले इन कपोल कल्पित ग्रंथों को ही समाज का सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। उन्होंने इसके विरोध में अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ के माध्यम से ऐसे-ऐसे सवाल खड़े किए, जो अकल्पनीय थे। उन्होंने इन ग्रंथों का ऐसे शब्दों में खंडन किया है कि आज का कोई धार्मिक व्यक्ति उन्हें पढ़े तो उसकी आंखों से खून निकल आए।
हालांकि ऐसा नहीं है कि फुले ने जो लिखा वह सब कल्पना करके लिखा। जिस प्रकार से वे अपनी किताब ‘गुलामगिरी’ में वेदों और शास्त्रों के बारे में उल्लेख करते हैं, उससे स्पष्ट है कि उन्होंने इन सब का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही इनका खंडन किया था।
फुले की इस किताब ने बहुजन समाज में एक ऐसी क्रांति के बीज बो दिए थे जिससे देश में अनेक बहुजन महापुरुषों ने अपने समाज को सदियों से चली आ रही रुढ़िवादी, ब्राह्मणवादी, सामंतवादी एवं पाखंडी समाज से लड़ने की चेतना पैदा कर दी। फुले ने सामाजिक जागरण के लिए अपने पुस्तकों के साथ-साथ अनेक पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रकाशन किया जिससे शूद्र व अतिशूद्र इस लड़ाई को और मजबूती से लड़ सकें।
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शूद्र व अतिशूद्र यानी आज के दलित-बहुजन पत्रकारिता के जनक फुले ने 1877 में ‘दीनबंधु’ साप्ताहिक पत्र में शासक वर्ग के खिलाफ लिखना आरंभ किया। मराठी भाषा में निकलने वाला यह पत्र पुणे से छपता था। सन् 1888 तक छपने वाले इस पत्र का संपादन फुले के प्रमुख सहयोगी नारायणराव मेघाजी लोखंडे ने किया था। इसके प्रकाशन में आर्थिक सहयोग के.पी. भालेकर कर रहे थे जो एक मजदूर नेता थे। सन् 1885 में फुले ने ‘सतसार’ नामक एक लघुपत्र प्रकाशित किया।[4] एक आना में बिकने वाली इस पत्रिका का प्रथम अंक की 1050 प्रतिया बिक जाने से फुले की इस पत्रिका का महत्व हम समझ सकते हैं। वह भी ऐसे दौर में जब दलित-पिछड़ा समाज शिक्षा के मामले में शून्य पर था। सन् 1885 में ही फुले ने एक और महत्वपूर्ण पत्रिका छापी थी जिसका नाम था– ‘इशारा’।[5] इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने अछूत समाज की स्थिति का वर्णन किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘किसान का कोड़ा’ सहित कई अन्य पुस्तकों की भी रचना की थी। उनकी सभी रचनाएं उस दौर में समाज में फैले पुरोहितों द्वारा कर्मकांड के विरोध में लिखी गई थीं, जिन्होंने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया था।
दलित-बहुजन समाज को उनके हक व अधिकारों के लिए खड़ा करने वाले इस जनक्रांति के नायक फुले का अंततः समाज की सेवा करते हुए 28 नवंबर, 1890 को में निधन हो जाता है। परंतु प्रकृति का इशारा देखिए कि करीब पांच माह बाद ही 14 अप्रैल, 1891 को डॉ. आंबेडकर का जन्म हुआ, जिन्होंने फुले की क्रांति को आगे बढ़ाया और संविधान की रचना की। निधन के पहले 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर के दीक्षा भूमि में बाबासाहब ने बौद्ध धर्म स्वीकार करते समय देश के बहुजनों को जो 22 प्रतिज्ञाएं दिलवाईं, उनका सार वही था जो जोतीराव फुले की ‘गुलामगिरी’ में है।
संदर्भ :
[1] फुले, जोतीराव, गुलामगिरी, फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली, 2021, पृष्ठ 55-56
[2] वही, पृष्ठ 69
[3] वही, पृष्ठ 71-72
[4] फुले, जोतीराव, सतसार, अनुवाद, संजय गजभिये, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 17
[5] फुले, जोतीराव, इशारा, अनुवाद, संजय गजभिये, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 18
(संपादन : नवल/अनिल)
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