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जाति और सांवली त्वचा : विशेषाधिकारों पर मामूली खरोंच भर से बिलबिलाहट

यह संभव है कि क्रिकेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन जैसे ऊंची जाति के सांवले व्यक्तियों के साथ कुछ मौकों पर ऐसा व्यवहार किया जाता हो जो उनकी दृष्टि में उनके दर्जे या प्रतिष्ठा के अनुरूप न हो। मगर उनकी जाति के कारण उन्हें विरासत में प्राप्त सामाजिक साख बनी रहती है। बता रही हैं डेज़ी बर्मन

अंग्रेजी दैनिक ‘मिंट’ में गत 29 मार्च, 2026 को प्रकाशित अपने कॉलम ‘द पैराडॉक्स ऑफ बीइंग बोथ अपर कास्ट एंड डार्क स्किन्ड इन ए डीप्ली अनइक्वल सोसायटी’ में मनु जोसफ लिखते हैं कि भारत में त्वचा के रंग से उपजे पूर्वाग्रह बहुत जटिल तरीके से काम करते हैं और यहां तक कि जब-तब वे जातिगत विशेषाधिकारों पर भी हावी हो जाते हैं। उन्होंने पूर्व भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी और कमेंटेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन के व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऊंची जातियों के सांवले लोगों को एक एकदम अलग तरह के अलगाव का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपने रूप-रंग के कारण भेदभाव का सामना तो करना पड़ता ही है, मगर साथ में उन्हें उस एकजुटता का लाभ नहीं मिलता जो पारंपरिक रूप से हाशियाकृत समुदायों में अक्सर होती है।

मनु जोसफ भारतीय समाज में विशेषाधिकार हासिल होने को एक समस्या, एक मुसीबत बता रहे हैं! यह तर्क उनके लेख को उकसाने और चिढ़ाने वाला बनाता है। इसमें कोई शक नहीं है कि भारत में त्वचा के रंग को बहुत महत्व दिया जाता है। आपसे लोग किस तरह मिलेंगे, आपसे संबंध बनाने की उनकी कितनी इच्छा होगी, आप पर वे कितना विश्वास करेंगे और आपको अपने अन्य परिचितों से मिलवाने के लिए वे कितने आतुर होंगे – यह सब आपके सांवले होने से प्रभावित होता है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि नस्लवाद भारत की सामूहिक समझ का हिस्सा है। मगर समस्या तब पैदा होती है जब जोसफ इस तथ्य को जरूरत से ज्यादा खींचकर यह तर्क देते हैं कि भारत में ऊंची जाति के सांवले लोगों को नीची जाति के सांवले लोगों की तुलना में ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहां यह लेख ढांचागत असमानता और अनुभवात्मक असमानता का घालमेल करता है। सरल शब्दों में, लेखक के अनुसार किसी व्यक्ति को ऐसा महसूस होना कि उसे नीची नज़रों से देखा जा रहा है और किसी व्यक्ति का सुनियोजित ढंग से दमन एक ही बात हैं।

वे कतई एक बात नहीं हैं। बल्कि वे एक-दूसरे के नज़दीक भी नहीं हैं।

जोसफ काफी असंगत तर्कों के ज़रिए यह बताते हैं कि जाति, नस्ल और वर्ग की त्रयी भारतीय समाज में एक-दूसरे से कैसे संबद्ध है। उनके अनुसार, ‘प्रेजेंटेबिलिटी’ (दर्शनीयता) वही है जिसे समाजशास्त्री सांस्कृतिक पूंजी कहते हैं और जो भारत में जाति का एक महत्वपूर्ण चिह्नक है। जाति-व्यवस्था केवल अनुष्ठानिक नहीं है। वह पसंदगी-नापसंदगी, भाषा, स्कूली शिक्षा, संपर्क-संबंध, आत्मविश्वास, दर्शनीयता, उपनाम एवं सामाजिक मंडली से भी परिभाषित होती है। शिवरामकृष्णन पर जो गुजरा उसके आधार पर जोसफ हमें यह मानने के लिए कह रहे हैं कि जाति व्यवस्था में रंगे भारतीय यह मानकर चलते हैं कि नीची जाति के लोग अक्सर निम्न सामाजिक वर्ग के और सांवले रंग के होते हैं। इसके विपरीत, ऊंची जातियों के लोग उच्च वर्ग के और गोरे होते हैं। यह बात कुछ हद तक सही है और इसके विपरीत उदाहरणों को कुछ हद तक असामान्य माना जाता है। मगर सामाजिक यथार्थ इस तरह के समीकरणों से कहीं अधिक जटिल होता है। उदाहरण के लिए, असम, जहां से मैं आती हूं, में यह अंधविश्वास बहुत आम है कि सांवला ब्राह्मण (कोला बामून) अपशकुनी, मनहूस और हानिकारक होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी त्वचा के रंग के कारण मनहूस या हानिकारक माना जाना संबंधित व्यक्ति के लिए अपमानजनक है। ऊंची जातियों के सांवले व्यक्ति निश्चित तौर पर सुस्थापित पदक्रम में कुछ हद तक ‘मिसफिट’ हो सकते हैं और जब कोई व्यक्ति जाति-व्यवस्था के सौंदर्यशास्त्र में फिट नहीं बैठता तो लोगों को वह अजीब और संदेहास्पद लगता है और वे चकरा जाते हैं। मगर क्या केवल सांवला होने के कारण किसी ब्राह्मण को सामाजिक दर्जे, सामाजिक पूंजी और स्वीकार्यता के उन विशेषाधिकारों से वंचित होना पड़ता है जो उसकी जाति के कारण उसे हासिल होते हैं? ऐसा कतई नहीं होता।

लेखक व पत्रकार मनु जोसफ; पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी व कमेंटेटर लक्ष्मण शिवरामकृष्णन

जोसफ लिखते हैं कि “हो सकता है कि कुछ लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता हो कि उन पर (शिवरामकृष्णन) क्या गुजरी। मगर तथ्य यह है कि भारत में सांवला और ऊंची जाति का होना ‘और बुरा’ है।” जोसफ का यह तर्क बात को जरूरत से ज्यादा खींचता है और इसमें कोई दम नहीं है। क्या ऐसा होना इसलिए ‘और बुरा है’ क्योंकि शिवरामकृष्णन जैसा कोई व्यक्ति यह नहीं समझ पा रहा है कि विशेषाधिकार एक पैकेज के रूप में नहीं आते। वह नहीं समझ पा रहा है कि जातिगत और आर्थिक विशेषाधिकार अपने आप में इस बात की कोई गारंटी नहीं होते कि समाज में आपको सौंदर्यात्मक विशेषाधिकार मिलें। क्या ऐसा व्यक्ति और अधिक अपमानित इसलिए महसूस करता है क्योंकि वह चाहता है कि समाज जिन भी चीजों को वांछनीय मानता है, वे सब उसमें हों और यदि उसे उनमें जरा-सी भी कमी नजर आती है तो उसे धक्का लगता है? इसके अलावा, अगर कोई अन्य व्यक्ति आपको ‘सपोर्ट स्टाफ’ (सहायक) या ड्राइवर मान लेता है तो इससे आखिर आपके विशेषाधिकार को इतनी गहरी चोट क्यों लगती है? अगर किसी को गरीब या सामाजिक दृष्टि से वंचित मान लिया जाता है तो वह भला वास्तव में गरीब और सामाजिक रूप से वंचित होने से ‘और बुरा’ कैसे है? और फिर वह किसके अनुसार और बुरा है? और इसे नापने का क्या मापदंड है?

अगर मापदंड शर्मिंदगी का भाव है – अर्थात किसी पार्टी में आपको निम्न दर्जे का मान लिया जाना या फिर ‘सुदर्शनों’ के श्रेष्ठी समूह से बाहर कर दिया जाना या फिर अजनबियों द्वारा आपको ‘सेवाकार्य करने वालों’ में गिना जाना – तो हां, हम मान सकते हैं कि इससे संबंधित व्यक्ति कुछ असहज महसूस कर सकता है। दंभ पर लगी चोट से भी घाव बन सकता है। मगर वह घाव उस घाव से ‘ज्यादा बुरा’ नहीं हो सकता जिसके साथ भारतीय समाज का एक तबका पीढ़ियों से जीने के लिए अभिशप्त है। अपने बारे में अपनी धारणा को चोट लगने की तुलना ढांचागत बाधाओं से करना एक बड़ी भूल होगी। 

यह संभव है कि शिवरामकृष्णन जैसे ऊंची जाति के सांवले व्यक्तियों के साथ कुछ मौकों पर ऐसा व्यवहार किया जाता हो जो उनकी दृष्टि में उनके दर्जे या प्रतिष्ठा के अनुरूप न हो। मगर इससे वे उन्हें उपलब्ध ढांचागत लाभों से वंचित नहीं हो जाते। उनकी जाति के कारण उन्हें विरासत में प्राप्त सामाजिक साख बनी रहती है, उनके संपर्क-संबंध, शिक्षा तक उनकी पहुंच और सामाजिक आत्मविश्वास कायम रहते हैं और साथ ही अपने बारे में यह धारणा भी बनी रहती है कि उच्च जाति के होने के कारण वे ‘योग्य’ हैं। अगर चंद मौकों पर उन्हें उनकी असली पहचान से वंचित होना भी पड़ता है तो जल्दी ही यह गलती सुधार ली जाती है और सामाजिक पदक्रम में उन्हें हासिल मुकाम पर वे वापस पहुंच जाते हैं। मगर हमेशा से हाशियाग्रस्त जातियों के लोगों को ऐसे मामले में अपमान का सामना गाहे-बेगाहे नहीं करना पड़ता। अपमान रोजाना की उनकी जिंदगी में बुना रहता है। अछूत प्रथा, भेदभाव, शिक्षा से वंचित किया जाना, काम देने में पूर्वाग्रह, सामाजिक अलगाव, उनके लिए ऐसी भाषा का प्रयोग जो सामान्य प्रतीत होते हुए भी मर्मभेदी होती है, वंशागत लांछन और उन्हें ‘अलग’ और ‘दूसरा’ बताने के कई और तरीके उनका रोज़ का भोगा हुआ यथार्थ होते हैं। उन्हें यदा-कदा शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़ता। उन्हें हर रोज़, सतत रूप से एक क्रूर सच्चाई का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके जीवन की दिशा तय होती है।

जोसफ की दृष्टि से देखें तो एक व्यक्ति वह है जो विशेषाधिकारों के पालने में झूल रहा है और कभी-कभी उसे हल्का-सा झटका लग जाता है। दूसरा वह व्यक्ति है, ढांचागत बाधाएं जिसके सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। ये दोनों एक ही किस्म के अनुभव के दो अलग-अलग संस्करण नहीं हैं। उनकी जड़ में सत्ता के साथ एकदम भिन्न संबंध हैं।

जो बात जोसफ के तर्क को एकदम अजीब बनाती है वह है उसके पीछे का भावनात्मक तर्क। उनका कहना कि उच्च जातियों के सांवले लोगों को अधिक पीड़ा इसलिए झेलनी पड़ती है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके ‘अपने लोग’ उनके साथ भेदभाव कर रहे हैं। इसके विपरीत, निम्न जातियों या निम्न वर्गों को कम-से-कम यह संतोष होता है कि उनकी पीड़ा सामूहिक है और उन्हें अपने समुदाय का सहारा उपलब्ध रहता है। 

यह बेहूदा तर्क है।

मानव स्वभाव के बारे में थोड़ा-सा भी जानने वाला यह समझ सकता है कि गाहे-बगाहे महसूस होने वाले अलगाव की तुलना सदियों से चले आ रहे दमन से नहीं की जा सकती। इसके अलावा, यह मानना भी गलत है कि अपमान को सहन करना केवल इसलिए आसान हो जाता है क्योंकि अन्य लोगों को भी यही करना पड़ रहा है। अगर कोई दूसरा भी कष्ट भोग रहा है, इससे आपका कष्ट कम तो नहीं हो जाता। यदि हम किसी अपने को खो दें तो क्या हमारा दुःख इसलिए कम हो जाता है क्योंकि हमारे परिवार के अन्य सदस्य भी दुखी हैं? यही बात जाति-जनित अपमान पर भी लागू होती है। अगर किसी व्यक्ति को अपमानित किया जाता है तो केवल इसलिए उसकी चुभन कम नहीं हो जाती कि समाज में कई लोग उन्ही हालातों से गुज़र रहे हैं। दमन की पीड़ा इसलिए नहीं घट जाती क्योंकि लाखों अन्य लोग भी दमित हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम समुदाय के महत्व को कम करके आंक रहे है। असमान समाज में समुदाय का बहुत महत्व होता है। अगर हम सब एक-से अनुभव से गुज़र रहे हैं तो उससे हममें राजनीतिक जागृति आ सकती है, हम लामबंद हो सकते हैं, हम प्रतिरोध करने के लिए तत्पर हो सकते हैं और इन सब के कारण हम अपना अस्तित्व बचाए रखते के प्रति प्रतिबद्ध हो सकते हैं। मगर साझा दमन, अपमान का घाव नहीं भरता, न ही वह ऊंच-नीच से समझौता करना आसान बनाता है और न ही सामाजिक परिवर्तन उसका अनिवार्य परिणाम होता है। समाजशास्त्र की दृष्टि से तो आपकी जाति के कारण आपको जिस कष्ट से गुज़रना पड़ता है, वही जाति को ढांचागत बनाती है।

अंत में जोसफ की यह स्थापना विशुद्ध बकवास है कि निम्न वर्गों (और निम्न जातियों) को इस तथ्य से कुछ राहत मिलती है कि आज, उनके अनुसार, विशेषाधिकार-प्राप्त और वंचित वर्गों की बीच बहुत कम संपर्क-संबंध हैं। वे ऐसी बात कैसे कर सकते हैं जब नवउदारवाद ने दोनों के बीच संबंधों को और गहरा किया है। शायद वे लाखों ‘हेल्पर्स’ जोसफ के लिए अदृश्य हैं, जिनके श्रम के कारण ही विशेषाधिकार-प्राप्त लोगों की जिंदगी आरामदेह बनती है। वे उनके घर, उनकी कारें और उनके टॉयलेट साफ़ रखते हैं, वे उनकी हाउसिंग सोसाइटी के गेट पर चौकीदारी करते हैं, वे सड़कें और नालियां साफ़ करते हैं, वे उनकी कारें चलाते हैं और उनके कुत्तों को घुमाते हैं, और दस मिनट में किराने का सामान उनके दरवाज़े पर पहुंचाते हैं। और वे उन गटरों को साफ़ करते हुए अपनी जान गवां देते हैं, जिन गटरों के भीतर झांकने की हिम्मत तक विशेषाधिकार प्राप्त समूहों के सदस्य नहीं कर सकते। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)


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लेखक के बारे में

डेज़ी बर्मन

लेखिका गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट (गीतम), बेंगलुरु में समाजशास्त्र विषय की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी शोध रूचियों में धर्म का समाजशास्त्र, समकालीन भारत में जाति और असमानता व पूर्वाेत्तर भारत में पहचान के सवाल आदि शामिल हैं।

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