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पुस्तक पुनर्पाठ : सुनो कहानी ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’

महुआ माजी की यह कथा कोल्हान क्षेत्र (पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, और सरायकेला-खरसावां) के उन आदिवासी समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों को सामने लाती है, जो लंबे समय से यूरेनियम खनन और उससे निकलने वाले रेडियोधर्मी कचरे के दुष्प्रभावों को झेल रहे हैं। पढ़ें, फैयाज आलम द्वारा यह पुनर्पाठ

भारत के आदिवासी समुदाय सदियों से जल, जंगल और जमीन के साथ गहरे संबंध में अपना जीवन जीते आए हैं। उनकी संस्कृति, आजीविका और पहचान प्रकृति से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। लेकिन आधुनिक विकास की परियोजनाओं, खनन, औद्योगीकरण और संसाधनों के दोहन ने सबसे अधिक प्रभावित इन्हीं समुदायों को किया है। विस्थापन, पर्यावरण प्रदूषण, आजीविका का संकट और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने उनके जीवन को लगातार कठिन बनाया है। अनेक स्थानों पर विकास के नाम पर उन्हें अपनी जन्मस्थली से बेदखल होना पड़ा। इसके बदले में उन्हें न तो पर्याप्त सुरक्षा मिली और न ही सम्मानजनक पुनर्वास मिला। ऐसी परिस्थितियों में आदिवासियों का संघर्ष अपनी संस्कृति, पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का भी संघर्ष बन जाता है। इसी संवेदनशील यथार्थ को महुआ माजी का उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

महुआ माजी झारखंड की एक प्रमुख लेखिका, पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक चिंतक हैं। वर्तमान में वह राज्यसभा की सदस्य हैं। उनकी लेखनी मुख्य रूप से आदिवासी जीवन, प्रकृति संरक्षण, स्त्री विमर्श और विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन और पर्यावरणीय विनाश पर केंद्रित रही है। वर्ष 2013 में प्रकाशित महुआ माजी का उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ आदिवासी जीवन की कठोर वास्तविकताओं को उजागर करता है।

‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ उपन्यास की पृष्ठभूमि में ‘हो’ जनजाति के जीवन में व्याप्त पीड़ा, संघर्ष और शोषण है। यह कथा कोल्हान क्षेत्र (पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, और सरायकेला-खरसावां) के उन आदिवासी समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों को सामने लाती है, जो लंबे समय से यूरेनियम खनन और उससे निकलने वाले रेडियोधर्मी कचरे के दुष्प्रभावों को झेल रहे हैं। इसके कारण कम उम्र में मृत्यु, विभिन्न गंभीर बीमारियां, गर्भपात, त्वचा संबंधी रोग और समय से पहले बुढ़ापा जैसी समस्याएं यहां आम हो गई हैं।

महुआ माजी का यह उपन्यास तथाकथित विकास की उस विडंबना को उजागर करता है, जिसमें स्थानीय लोगों का जीवन संकट में पड़ जाता है। यद्यपि संबंधित कंपनियां इन समस्याओं से अपना संबंध नकारती रही हैं, फिर भी अनेक विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने क्षेत्र का अध्ययन कर यूरेनियम प्रदूषण को इन स्वास्थ्य समस्याओं का प्रमुख कारण माना है। लेखिका ने एक संवेदनशील दृष्टि के साथ सारंडा के जंगलों और खदान प्रभावित इलाकों का अनुभव करते हुए आदिवासियों के दर्द, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ का आवरण पृष्ठ व उपन्यासकार महुआ माजी

उपन्यास का प्रमुख पात्र किशोर सगेन एक सामान्य आदिवासी युवक है, जिसका जीवन अपनी परंपराओं, संस्कृति और प्राकृतिक परिवेश से गहराई से जुड़ा हुआ है। सारंडा के सघन जंगलों और मरंग गोड़ा की बस्ती में रहने वाले लोग जल, जंगल और जमीन को ही अपने जीवन का आधार मानते हैं। उनके त्योहार, धार्मिक आस्थाएं, सामाजिक रीति-रिवाज और वन संसाधनों पर आधारित आजीविका उनके सामुदायिक जीवन की पहचान हैं। लेकिन यूरेनियम खनन की शुरुआत के साथ यह संतुलित जीवन धीरे-धीरे संकट में बदलने लगता है। जमशेदपुर के निकट स्थित जादूगोड़ा क्षेत्र में 1960 के दशक से प्रारंभ हुए खनन कार्यों से आसपास के अनेक गांवों के हजारों लोगों का स्वास्थ्य और जीवन विकिरण के दुष्प्रभावों से गंभीर रूप से प्रभावित हुआ।

महुआ माजी अपने उपन्यास में आदिवासी स्त्रियों की स्थिति को भी अत्यंत संवेदनशील ढंग से चित्रित करती हैं। वे एक ओर सामाजिक कुरीतियों का सामना करती हैं, तो दूसरी ओर बाहरी शक्तियों द्वारा आर्थिक और यौन शोषण की शिकार बनती हैं। अशिक्षा और अधिकारों के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण उनकी समस्याएं और जटिल हो जाती हैं। उपन्यास में गोनोंग जैसी परंपरा का उल्लेख मिलता है। गोनोंग प्रथा लड़की के पिता के द्वारा लिया जाना वाला दहेज है। गोनोंग प्रथा वह प्रथा है जिसके अनुसार लड़के वाले लड़की वालों को दहेज़ देकर शादी करते है। लड़की का पिता बिना दहेज़ लिए अपनी लड़की की शादी नहीं करता है। यह प्रथा कई बार लड़कियों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, क्योंकि अधिक गोनोंग की अपेक्षा के कारण उनके विवाह में विलंब होता है या उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध अधिक आयु वाले व्यक्तियों से विवाह करना पड़ता है। इस तरह लड़की की अपनी पसंद-नापसंद की कोई अहमियत नहीं रह जाती और उसे समाज के बनाए नियमों के अनुसार जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

कथा का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष यूरेनियम विकिरण से उत्पन्न स्वास्थ्य संकट है। मरंग गोड़ा के लोगों में असामान्य बीमारियां, जन्मजात विकृतियां और असमय मृत्यु की घटनाएं बढ़ने लगती हैं। नवजात शिशुओं में शारीरिक विकलांगता, शरीर पर गांठें तथा अन्य गंभीर रोग सामान्य होते जाते हैं। इन के वैज्ञानिक कारणों को समझने के बजाय समुदाय के कुछ लोग अंधविश्वासों का सहारा लेते हैं और निर्दोष महिलाओं को डायन बताकर उनके विरुद्ध हिंसा का वातावरण तैयार कर देते हैं। सगेन की ताई पर लगाया गया आरोप इसी मानसिकता का उदाहरण है, जहां वास्तविक कारण विकिरण होने के बावजूद दोष किसी बेगुनाह व्यक्ति पर मढ़ दिया जाता है।

उपन्यास व्यापक अर्थों में तथाकथित विकास मॉडल की भी आलोचना प्रस्तुत करता है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति के साथ प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन, वनों की कटाई, खनन और औद्योगीकरण ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव उन आदिवासी समुदायों पर पड़ा है, क्योंकि उनका जीवन पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर है। जल, जंगल और जमीन से उनका विस्थापन केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और अस्तित्वगत संकट भी है।

साहित्य आज तक को साक्षात्कार देते हुए लेखिका कहती हैं कि “1964 से यूरेनियम का खनन शुरू हुआ। जहां पर यूरेनियम के वेस्ट मेटेरियल फेंके जाते थे, वहां पर रहने वाले आदिवासी उस पर से नंगे पांव चले जाते थे, जिसके कारण उन्हें शारीरिक विकलांगता और रेडिएशन के कारण कई बीमारियां होने लगीं। कई लोगों की तो मृत्यु हो गई।” इसी वास्तविकता को उपन्यास में सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया गया है। सगेन के अपने परिवार के सदस्य रहस्यमय बीमारियों के कारण एक-एक करके दम तोड़ देते हैं, जिससे उसे यह एहसास होता है कि यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामूहिक पीड़ा है। इसके बाद वह यूरेनियम खनन और उससे फैल रहे विकिरण के विरुद्ध जनसंघर्ष का नेतृत्व करता है। उसके सहयोगी आदित्यश्री द्वारा तैयार की गई वृत्तचित्र फिल्म इस समस्या को अंतर्राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का माध्यम बनती है। परिणामस्वरूप मरंग गोड़ा का स्थानीय संघर्ष वैश्विक परमाणु-विरोधी विमर्श से जुड़ जाता है। सगेन का व्यक्तित्व प्रतिरोध, जागरूकता और सामाजिक न्याय का प्रतीक बनकर उभरता है तथा यह संदेश देता है कि विकास तभी सार्थक है जब वह मनुष्य और प्रकृति दोनों के हितों की रक्षा करे।

असल में हिंदी साहित्य में जब मुख्यधारा के लेखक हाशिए के समाज को नजरअंदाज कर रहे हों, तब ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ एक साहसिक हस्तक्षेप है। यह उपन्यास न केवल आदिवासी साहित्य को समृद्ध करता है बल्कि पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी चिंताओं को भी व्यक्त करता है। पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि विकास का मॉडल कितना निर्दयी हो सकता है। यूरेनियम विकिरण की समस्या को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास महुआ माजी के चार वर्षों के शोध-कार्य का परिणाम है। इसमें उन्होंने एक गंभीर शोधार्थी की तरह झारखंड के बीहड़ जंगलों और जापान-अमेरिका के परमाणु संयंत्रों का जायजा लेकर विषय से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जरूरी जानकारी को एकत्रित किया है। समाजशास्त्री, मानवशास्त्रीय और पर्यावरणीय शोधपूर्ण समझ से लिखी गयी यह रचना झारखंड की यूरेनियम खादानों से निकलने वाले विकिरण, प्रदूषण और उसके बीच आदिवासियों के विस्थापन की पीड़ा को व्यक्त करती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

फ़ैयाज़ आलम

लेखक हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद में हिंदी (स्नातकोत्तर) के छात्र हैं

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