[यह साक्षात्कार 8 अगस्त, 2021 को उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित कंवल भारती जी के आवास पर रिकार्ड किया गया था। इसे पांच वर्षों के बाद इस कारण प्रकाशित कर रहे हैं कि इसमें शामिल विमर्श आज भी प्रासंगिक है।]
जब साहित्य के शिल्प और सौंदर्य की चर्चा होती है तब यह कहा जाता है कि जो बात मुख्यधारा के साहित्य में है, वह दलित साहित्य में नहीं है। इस संबंध में पहला सवाल यही कि मुख्यधारा के साहित्यकार जिस तरह के बिंबों का उपयोग करते हैं, शिल्प रचते हैं, वह क्या हैं और इन्हें दलित साहित्य के संदर्भ में कैसे देखा-समझा जाए?
देखिए, जितना मैंने पढ़ा है मुख्यधारा के साहित्य को और जिसे दलित साहित्य कहा जा रहा है उसको भी, तो मुझे तो कुछ भी ऐसा नहीं लगता है कि मुख्यधारा के साहित्य में कोई विशिष्टता है। भाई, शिल्प या सौंदर्य के प्रति जो दृष्टि है, वह निश्चित रूप से दलित साहित्य से अलग है। दलित साहित्यकारों की सौंदर्य दृष्टि अलग है और उनका विषय अलग है। लेकिन शिल्प तो वही है। शिल्प कोई बाहर से आया नहीं है। भाई, जितनी भी कहानियां, कविताएं हैं और अन्य साहित्य हैं, सभी में एक ही तरह का शिल्प है। लेकिन दृष्टि में अंतर है। मुख्यधारा के साहित्य में हमें दलित जीवन दिखाई नहीं देता, दलितों की पीड़ा दिखाई नहीं देती, दलितों का संघर्ष दिखाई नहीं देता।
मुख्यधारा के कुछ सवर्ण साहित्यकारों और लेखकों ने दलितों के जीवन पर लिखा भी है, हम इस बात से इंकार नहीं करते, लेकिन जो पीड़ा उन्होंने दिखाई है, वह बनावटी है। उन्होंने बनावटी परिवेश गढ़ा है। तो वह जो बनावटी परिवेश है तो यथार्थ भी बनावटी है। जैसे मैंने अभी मार्कण्डेय की एक कहानी पढ़ी– ‘गरीब की बस्ती’। इसमें पूरा का पूरा परिवेश बनावटी है। मतलब उसमें कोई स्वाभाविक परिवेश नहीं है। एक बच्ची है जो ठेले पर मुंगफली बेचती है। कोई उसके बचपन का दोस्त है सवर्ण समाज का। दोनों के बीच वार्तालाप होता है। तो इस कहानी में उस दलित लड़की का संघर्ष दिखाई नहीं दे रहा। ये लोग पीड़ा तो दिखा देंगे, दर्द दिखा देंगे कि सड़क पर जी रही है, जैसे निराला जी ने ‘तोड़ती पत्थर’ कविता लिखी। लेकिन आप देखिए इनमें संघर्ष कहां है। दूसरी ओर दलित साहित्य तो संघर्ष और समानता का साहित्य है। स्वतंत्रता का साहित्य है। यह तो मुख्यधारा के साहित्य में नहीं दिखाई देता। तो इसलिए दलित लेखकों ने अपने लिए जो अपना सौंदर्य बोध तैयार किया है, उनकी जो दृष्टि है, वह मुख्यधारा में आ ही नहीं सकती, क्योंकि यह सवाल अनुभूतियों का है। अनुभूतियों का जब प्रश्न उठता है तब मैं आपको स्पष्ट रूप से बता दूं कि अनुभूतियां भी परिवेश से जुड़ी होती हैं। आपका परिवेश जिस तरह का है, उसी तरह की अनुभूतियां होंगी। अगर आप गरीब परिवेश से आते हैं, मजदूर पृष्ठभूमि से आते हैं तब मजदूरों के प्रति आपकी दृष्टि दूसरी होगी। वह वही होगी जो आपके अंदर है। आपके मन में उनके लिए सहानुभूति होगी। लेकिन अगर आप इस पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं, आप मध्यवर्गीय समाज से आते हैं, खाते-पीते परिवार से आते हैं, या जमींदार परिवार से आते हैं, फिर गरीबों को देखकर आपके मन में दया भावना भले ही आपके अंदर आ जाए, लेकिन आपका जो दृष्टिकोण होगा वह अलग होगा।
यदि भाषा और बिंब के स्तर पर बात करें तो दलित-बहुजन साहित्यकारों के सामने परेशानियां होती हैं कि किसी घटना या विषय को कैसे प्रस्तुत करें। उनके लिए द्विजवादी शब्दों व बिंबों का उपयोग करना मजबूरी बन जाती है।
आपकी यह बात ठीक है। लेकिन बिंबों का क्या है, वे तो बदलते रहते हैं। दलित साहित्य की बात करें तो शुरू-शुरू में कुछ लोगों ने ऐसा किया, लेकिन जो दलित कवि हैं, जैसे कि ओमप्रकाश वाल्मीकि हुए, जयप्रकाश कर्दम हैं, और भी तमाम लोग हैं, मैं भी हूं। हमने द्विजवादी बिंबों का कभी इस्तेमाल नहीं किया, जो मिथकों से और पौराणिक कथाओं से आते हैं। हिंदू शब्दावली का हमने कभी प्रयोग नहीं किया। और प्रयोग किया भी उनका खंडन करने के रूप में किया। आप देखिए कि अब तो बहुत अच्छे-अच्छे बिंब आ रहे हैं। जब बिंबों की बात आती है तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि जिनके पेट भरे होते हैं, उनकी चिंताएं कम होती हैं या नहीं होती हैं। उनके सामाजिक सरोकार नहीं होते। वे कल्पना में बिंब ढूंढ़ते रहते हैं। आप अरुण कमल को देख लें, अनामिका को देख लें, कैसे-कैसे उन्होंने घटिया बिंबों का इस्तेमाल किया है। मैंने अभी हाल ही में इस विषय पर एक आलेख भी लिखा। उनके बिंब इतने घटिया हैं और समझ से परे हैं। उनके दिमाग में वह बिंब आ ही नहीं सकता जो दलित साहित्यकारों के दिमाग में चलता है।

यदि हम गद्य पर विचार करें तो हम पाते हैं कि नई कहानी आंदोलन ने बहुत कुछ बदला है। शब्द, विषय और पात्र तक। मसलन, आजादी के पहले की रचनाओं में गांव केंद्र में होते थे, लेकिन आजादी के बाद शहरों की तरफ झुकाव दिखा। एक समय वह भी आया जब साहित्य में भारत-पाक विभाजन को विषय बनाया गया। विभाजन के दंश की बात कही गई। लेकिन दलित-बहुजन हाशिए पर रहे, जबकि वे संविधान लागू होने के बाद उसमें अपने लिए अधिकार होने पर बदलाव महसूस कर रहे थे। ऐसें में यह लगता है कि बहुसंख्यक समाज को साहित्य के हाशिए पर रखने की साजिश थी। आप इसे कैसे देखते हैं?
देखिए, नई कहानी आंदोलन किन लोगों ने शुरू किया। ऐसा हुआ कि 1950 और 1960 के दशक में गांवों में जो मध्यवर्ग समाज के लोग थे, सामंती थे, जमींदार थे, उनके परिवारों से पढ़-लिखकर शिक्षित होकर कुछ लोग शहरों में आए नौकरी करने। इस तरह एक समाज आया जो सुशिक्षित था, ऊंचे तबकों से आया था, आर्थिक रूप से सुखी-संपन्न था। उन्होंने कहानियां लिखीं। उनकी कहानियों में उनका व्यक्तिगत जीवन ज्यादा आया। नई कहानी आंदोलन का जो लेखन है, वह व्यक्ति का है, समस्ती का नहीं है। उसमें वैयक्तिक्ता है। इसे ऐसे समझिए कि भीड़ है लेकिन एक आदमी खुद को अकेला महसूस कर रहा है। नौकरी कर रहा है, लेकिन आत्महत्या करने को मजबूर है। सबकुछ उसके घर में है, लेकिन उसका मन नहीं लग रहा है। उसमें एक हताश, निराश व्यक्ति का चित्रण है। चाहे आप राजेंद्र यादव की कहानी ‘अभिमन्यू की आत्महत्या’ देख लें या फिर कमलेश्वर की कहानी ‘कस्बा’ और ‘दिल्ली में एक मौत’। ‘दिल्ली में एक मौत’ में क्या है, एक अर्थी निकली है, कहानी का पात्र सोच रहा है कि अर्थी में शामिल होऊं या न होऊं। यदि चला गया तो छुट्टी नहीं मिलेगी। यह क्या कोई कहानी है। ये व्यक्तिगत परेशानियां हैं। ‘अभिमन्यू की आत्महत्या’ के पात्र को ही देखिए, आत्महत्या करने निकल पड़ा है। समंदर के किनारे टहल रहा है। “मैं मरना चाहता हूं। मैं क्यों जिंदा रहूं।” ईश्वर को दोष दे रहा है कि मुझे क्यों बनाया। उसके मन में जीवन के प्रति वितृष्णा पैदा हो गई है, उन लोगों में जो मध्यवर्गीय समाज से आए।
वे यह नहीं देख रहे थे कि जीवन की इन्हीं विसंगतियों के बीच एक ऐसा परिवेश भी था, एक ऐसा समाज भी था जो जूझ रहा था, इन विसंगतियों से निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था। वे उधर नहीं देख रहे थे, लेकिन वे उसी में मर रहे थे। आप मोहन राकेश जी कहानी ‘मिस पाल’ देख लिजीए। इसमें एक आदमी डाकखाने से निकलकर आया और बस में सवार हो गया। बस में एक महिला बैठी है। वह हाथ हिलाया, उससे मिला। तुम तो वहां थी, यहां कैसे आई। और एक बस स्टैंड पर कहानी खत्म हो जाती है। इसमें कोई कथानक ही नहीं है। यह तो हुआ कि नई कहानी आंदोलन के लेखकों ने कथानक को तोड़ा। फिर जैसे कि उपकथाएं होती हैं, बस उतना ही। मोहन राकेश की ही एक कहानी है– ‘जीनियस’। अब इस कहानी में आप देखिए कि कुछ लोग बैठे हैं कॉफी हाउस में और जीनियस पर बातचीत चल रही है और कहानी खत्म। कुछ है ही नहीं उसके अंदर। इन कहानियों के कहानीकार उस परिवेश से आए थे जहां उनके सामाजिक सरोकार थे ही नहीं। वे अपने में ही आत्ममुग्ध थे।
निर्मल वर्मा को ही आप देख लिजीए। उनकी एक कहानी है– ‘परिंदे’। इस कहानी में एक हिल स्टेशन पर एक हॉस्टल में चार-पांच कुलीन लोग रहते हैं। इस कहानी के सारे पात्र कुलीन हैं। एक मिस्टर हुबर्ट है। डॉ. मुखर्जी है। एक लता है। इन सबकी अपनी-अपनी चिंताएं हैं। डॉ. मुखर्जी की चिंता यह है कि मैं मरने से पहले वर्मा जाना चाहता हूं। लता की चिंता है कि मैं बूढ़ी हो रही हूं, लोग मुझे बुढ़िया कहेंगे। और हुबर्ट की चिंता है कि वह लता से प्यार करता है, लेकिन कह नहीं पाता। उसे किडनी की बीमारी है। उसे मरने की चिंता है। तो परिंदे जो आते हैं, उन्हें अपनी मंजिल का पता होता है कि जाना कहां है। वे पहाड़ों पर घूमने आते हैं और कुछ दिनों तक ठहरने के बाद उड़ जाते हैं। लेकिन इस कहानी के पात्र कहते हैं कि हम कहां जाएं। ‘परिंदे’ कहानी का परिवेश कुलीन है। इसमें कुलीन परिवारों की कुंठाएं हैं। अगर इसे हम नई कहानी कहेंगे तो कह सकते हैं कि समाज के स्तर पर यह कहानी कोई प्रभाव नहीं छोड़ती। इसमें जो भी व्यक्तिगत अनुभव हैं, वे सामाजिक अनुभव नहीं बन पाते।
हालांकि हम यह मानते हैं कि आपके अंदर हताशा और निराशा है, लेकिन वह सामाजिक नहीं है। जो भी है, वह व्यक्ति के स्तर पर है। जैसे प्रेमचंद ने कहानियों को जहां छोड़ा, उसके आगे जो भी लेखक आए, जैसा कि मैंने मार्कण्डेय की कहानी का उल्लेख किया, या अमरकांत आए, या शैलेश मटियानी आए, इन लोगों ने कहानी को थोड़ा-सा आगे बढ़ाया और बढ़ाने के बाद जो यथार्थ प्रेमचंद ने गढ़ा था, उसको उन्होंने बनावट के रूप में गढ़ा। जैसे ‘हंसा जाई अकेला’ मार्कण्डेय की कहानी है। इसमें कहीं कुछ नहीं है, क्योंकि वे किसान नहीं रहे, मजदूर नहीं थे, गरीब नहीं थे। मार्कण्डेय तो राजपूत थे। अगर वे मजदूरों पर कहानी लिखेंगे तो गढ़कर लिखेंगे।
नई कहानी आंदोलन के बाद जिन्होंने वास्तव में ग्रामीण जीवन के यथार्थ को छुआ, वे पिछड़े वर्ग के लेखक व कहानीकार ही थे। जैसे संजीव ने किया, शिवमूर्ति ने किया। शिवमूर्ति ने ‘तिरिया चरित्तर’ लिखी, ‘सिरी उपमा जोग’ लिखी। शिवमूर्ति ने गांव के यथार्थ को नंगा कर दिया। दूसरी ओर मध्यवर्गीय समाजों से आए लेखक अपनी ही कुंठाओं से पीड़ित और चिंतित थे। आप देखिए कि इनका दृष्टिकोण उन लोगों के प्रति कैसा था, जो इनकी दासता में लगा था। इसको मधुकर सिंह ने उघाड़ा। शिवमूर्ति ने उघाड़ा। अगर हम कहें कि नई कहानी क्या है तो वास्तव में यह संजीव और शिवमूर्ति से शुरू होती है।
फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य को कैसे देखें फिर?
रेणु नई कहानी आंदोलन के कहानीकारों में अपवाद हैं। रेणु ने उस जमाने की सांप्रदायिक हिंदू महासभा और आरएसएस की बड़ी धज्जियां उड़ाई हैं। गांवों में निम्न वर्गों के प्रति किस तरह से छल-प्रपंच रचे जाते थे, उसे उन्होंने बहुत उघाड़ा है। वे इसलिए उघाड़ पाए क्योंकि वे मध्यवर्गीय परिवार से नहीं, निम्न मध्यवर्गीय परिवार से थे। वे पिछड़े वर्ग से थे। ठाकुर, बनिया और ब्राह्मण नहीं थे। प्रेमचंद भी गांवों में निम्न जातियों के प्रति छल-प्रपंच को इसलिए उघाड़ पाए क्योंकि वे द्विज नहीं थे। वे कायस्थ थे, जो उस समय शूद्र जाति थी। लेकिन प्रेमचंद के कुछ यथार्थ बनावटी भी हैं। लेकिन फिर भी उन्होंने उस जमाने में साहस किया। वे एक आदर्श को लेकर चल रहे थे। लेकिन वह आदर्श तो प्रेमचंद के साथ ही खत्म हो गया। पिछड़ी जातियों के जो कहानीकार हुए उन्होंने उनके आदर्श को त्याग दिया और उसके बदले यथार्थ को अपनाया। देखिए प्रेमचंद का जो यथार्थ है, वह आदर्शोन्मुख है। लेकिन पिछड़ी जातियों के कहानीकारों का यथार्थ एकदम नंगा यथार्थ है।
दलित साहित्य की बात करें तो क्या आप इसकी आवश्यकता नहीं समझते हैं कि अब आत्मकथाओं के आगे इसका विस्तार हो?
यह आपने अच्छा सवाल किया है। मैं भी सोचता हूं कि दलित साहित्य में एक बड़ी कमी आई है। कोई अच्छा उपन्यास नहीं आया है अभी तक। आंबेडकर पर भी बेहतर उपन्यास नहीं लिखा गया। पहले जैसे ‘गिरमिटिया’ गांधी पर आया। ‘आवारा मसीहा’ शरतचंद्र चटोपध्याय पर आया विष्णु प्रभाकर का। इस तरह का उपन्यास डॉ. आंबेडकर पर नहीं आया। दलित साहित्यकारों को सोचना चाहिए कि यह एक बड़ी कमी है। आत्मकथा लिखना आसान है। आत्मकथाएं जल्दी पॉपुलर हो जाती हैं। इसमें दोष लेकिन लेखकों का कम, प्रकाशकों का ज्यादा है। प्रकाशकों ने ही लेखकों पर ज्यादा जोर डाला कि आप हमें अपनी आत्मकथा लिखकर दिजीए। जब ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ छपी तब तमाम प्रकाशकों में आत्मकथाओं को छापने की होड़ लग गई। कविता नहीं छापेंगे, लेकिन आत्मकथा छापेंगे। तो इस तरह से आपकी बात ठीक है। लेकिन देखिए कि दलित चेतना का विस्तार तो हो रहा है। कई लेखक कर रहे हैं। जैसे अजय नावरिया कर रहे हैं। रत्न कुमार सांभरिया तो दलित चेतना को संपेरों और बंजारों तक ले गए हैं। अजय नावरिया ने ओमप्रकाश वाल्मीकि के युग को पलटा है। उनके युग में तो केवल निम्न वर्ग था। निम्न वर्ग जब मध्य वर्ग बना मतलब एक चमार या एक भंगी जब मध्य वर्ग में आया, अफसर बना, डिप्टी कलेक्टर बना, आईपीएस बना, तो उसमें क्या परिवर्तन आया, यह अजय नावरिया की कहानियों में दिखता है।
दलित साहित्य के नामकरण को लेकर भी कई तरह की बातें कही जा रही हैं। यह कहा जा रहा है कि इसे आंबेडकरवादी साहित्य कहा जाए। आपकी राय क्या है?
डॉ. तेज सिंह ने आंबेडकरवादी साहित्य की अवधारणा को शुरू किया था। जब वे जीवित थे तभी मैंने उनकी इस अवधारणा के खिलाफ एक आलेख लिखा था। मैंने कहा था आप मार्क्सवादी साहित्य से प्रभावित होकर आंबेडकरवादी साहित्य की बात कर रहे हैं। जैसे मार्क्सवादी साहित्य है, वैसे ही आंबेडकरवादी साहित्य है। यदि हम दलित साहित्य को आंबेडकरवादी साहित्य कहेंगे तो हम इसे सीमित कर देंगे। आंबेडकरवादी साहित्य तो वही कहलाएगा जो आंबेडकर के इर्द-गिर्द है। लेकिन दलित साहित्य न आंबेडकर से शुरू हुआ है और न ही उनपर खत्म होता है। दलित साहित्य की परंपरा बहुत लंबी है। यदि आप इसे देखें तो सिद्धों से इसकी शुरुआत होती है। तुलसीराम ने इसे जोड़ा भी है। चौरासी सिद्धों में 33 सिद्ध शूद्र हैं। उन्होंने अपनी रचनाएं लिखी हैं। कबीर भी उसी परंपरा में आ गए, रैदास भी आ गए। यह परंपरा आंबेडकर से प्रारंभ हुई, कैसे कहेंगे। यह इसलिए कि सिद्धों ने ईश्वर को भी माना है।
अब देखिए कि दलित साहित्य धीरे-धीरे, मतलब जैसे-जैसे दलित जातियों में चेतना बढ़ती चली जाएगी, इसका विस्तार होगा। अभी दलित साहित्य केवल एक या दो जातियों का साहित्य है, जो जागरूक हुई हैं, शिक्षित हुई हैं। अभी बहुत सारी दलित जातियां कोमा में पड़ी हैं। धीरे-धीरे वे शिक्षित होंगी तो उनमें से कुछ लेखक भी आएंगे। वे अपने परिवेश को समझते हुए लिखेंगे भी। तब यह दलित साहित्य बहुजन साहित्य में परिणत हो जाएगा। मैं भी चाहता हूं कि दलित साहित्य बहुजन साहित्य में परिणत हो।
(संपादन : अनिल)
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