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खड़ी बोली की कविता जगत को चुनौती देतीं राजेश पाल की कविताएं

कवि सवाल करता है कि ‘फिर चमारीखेड़ा के नाम में ऐसा क्या चुभ गया, जो लोगों को रास नहीं आता’। तथाकथित ऊंची जाति वालों को यह नाम लगातार चुभता रहा, क्योंकि उन्हें अपने गांव का नाम चमारीखेड़ा बतलाना पड़ता था। यही पोस्टल एड्रेस लिखना पड़ता था। पढ़ें, डॉ. सिद्धार्थ रामू की यह समीक्षा

व्यवस्था में गांव
गांव की व्यवस्था
पहाड़ में ठाकुर
पश्चिम में बंजारे
पूरब में गड़ेरिये
दक्खन के कोने में चमार
उनके पीछे भंगी
किसी खूंट में नाई, धोबी और झीवर
[1]।

गड़ेरिया टोले के राजेश पाल के काव्य संग्रह ‘तुम भी सोचो’ में संकलित ये काव्य पंक्तियां सिर्फ उत्तराखंड के गावों का बंटवारा नहीं है, बल्कि पूरा देश ही ऐसे बंटा है। बस रूप-रंग थोड़ा-थोड़ा अलग-अलग है। टोलों की तरह ही सबका मन भी ऐसे ही बंटा है। धन-धरती भी ऐसे ही बंटी है, यहां तक कि आधुनिक खड़ी बोली की कविता की दुनिया भी ऐसी बंटी है। जैसे उत्तराखंड़ के इन गांवों के इन सभी टोलों पर ‘ठाकुर’ के टोले का वर्चस्व है, वैसे आधुनिक खड़ी बोली की कविता पर द्विज-सवर्ण का ही वर्चस्व है।

कविता की दुनिया में यह क्यों और कैसे हुआ? आधुनिक खड़ी बोली की कविता क्या भारतेंदु युग, क्या द्विवेदी युग, क्या स्वच्छंद युग, क्या छायावाद, क्या प्रयोगवाद, क्या प्रगतिवाद और क्या नई कविता सबके प्रतिनिधि और बहुसंख्यक कवि गैर-उत्पादक, गैर-दस्तकार, गैर-शिल्पकार और गैर-मेहनतकश समुदायों के ब्राह्मण-द्विज ही प्रतिष्ठित और चर्चित हुए। दूसरे शब्दों में कहें तो आधुनिक खड़ी बोली की कविता से शूद्र-दलित, उत्पादक, दस्तकार, शिल्पकार और मेहनतकश वर्गों-समुदायों के कवि उसी तरह बाहर रहे, जैसे गांव के द्विज-सवर्ण टोले से बाहर कुर्मी टोला, कुशवाह टोला, यादव टोला, धोबी, नाई, कहार, लोहार, बढ़ई, कुम्हार, गड़ेरिया और अछूत कहे जाने वाले दलितों का टोला होता है।

आधुनिक खड़ी बोली से पहले कविता की दुनिया का सच इसके उलट था। जिसे भक्तिकाल-संतकाल (1400 से 1700 ईस्वी) कहते हैं, उसके सैकड़ों कवियों बहुलांश दस्तकार, शिल्पकार, किसान, व्यापारी और मेहनतकश वर्गों-समुदायों के रहे। मसलन, कबीर, रैदास, नानक, दादू दयाल, सुंदरदास, रज्जब, कुतुबन, धन्ना, पीपा, मलिक मुहम्मद जायसी, मंझन, रसखान आदि। इनके अलावा कई अन्य लोग रहे। ये सभी पिछड़े, अति पिछड़े, दलित या पसमांदा मुसलमान थे।

जैसे हिंदी पट्टी के गांवों की पहचान द्विज-सवर्णों से ही रही है, वैसे ही आधुनिक खड़ी बोली की कविता की पहचान द्विज-सवर्ण ही रहे हैं। इन द्विज-सवर्ण कवियों ने कविता की दुनिया पर वैसे ही अपना वर्चस्व कायम किया है और आज भी बनाए हुए हैं, जैसे इन द्विज-सवर्णों का वर्चस्व गांवों के अन्य टोलों पर होता है। जैसे गांवों में इस वर्चस्व को चुनौती मिली, वैसे ही कविता की दुनिया में इस वर्चस्व को चुनौती मिली।

‘भंगी’ टोले का कोई ओमप्रकाश वाल्मीकि या मोहन मुक्त जैसा कवि ज्वालामुखी की तरह सामने आता है और कवियों के द्विज-सवर्ण टोले में एक भूकंप का झटका महसूस होता है, लेकिन कई अन्य कवि इन टोलों से आते हैं। इसमें एक गड़ेरिया टोले से आए राजेश पाल भी हैं। हालांकि इन सभी कवियों को दलित कवि का टैग लगाकर साहित्य की दुनिया में एक दक्खन टोला रच दिया जाता है। मुख्य देवताओं की पवित्रता और महानता को पूरी तरह बरकार रखते हुए, इन्हें कहीं किनारे पर ‘दलित कवि’ के नाम से एक जगह दे दी जाती है। जैसे यह स्थापित किया जा रहा हो कि आप वर्चस्वशाली टोले के बराबर के दर्जे के सदस्य नहीं हो सकते हैं। द्विज-सवर्ण टोले से बाहर के इन टोलों के कवियों की विश्व दृष्टि, इतिहासबोध, सौंदर्य बोध, काव्य संवेदना, भाषा, अभिव्यक्ति और काव्य प्रयोजन वर्चस्वशाली टोले के कवियों से बिलकुल ही भिन्न है।

कवि राजेश पाल व उनके काव्य संग्रह का आवरण पृष्ठ

राजेश पाल के काव्य-संग्रह ‘तुम भी सोचो’ की पहली कविता ‘लोहा और सोना’ है। लोहा और सोना मानव सभ्यता की विकास-यात्रा का एक रूपक है। लोहे की खोज के बाद मानव सभ्यता छलांग लगा कर आगे बढ़ी। लोहे के हल, कुदाल और गड़ाती आदि ने कृषि उत्पादन को कई गुना बढ़ा दिया। इससे पैदा हुए अतिरिक्त उत्पादन ने शहरों के शहरों-कस्बों के तेजी से विकास को बढ़ावा दिया। इसी आधार पर बड़े-बड़े साम्राज्यों का निर्माण हुआ। इसमें लोहे की तलवारों-भालों आदि ने अहम भूमिका निभाई। लोहे की पहियों और आधुनिक युग में मानव सभ्यता की शिराएं और धमनियां रेलगाड़ियों की पटरियां इसी लोहे की देन हैं। इसके बरक्स सोने का उत्पादन, विकास और मानव सभ्यता के विकास में कोई बुनियादी योगदान नहीं है। वह केवल बाह्य आभूषण और चमक-दमक तथा इसके मालिकों की अमीरी के दिखावे का साधन बना, लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए सोने की तुलना में लोहा हाशिए पर फेंक दिया गया। उसके कालेपन-धूसरपन का सोने की चमक के सामने कोई मूल्य नहीं है। जिस लोहे ने इतिहास को गति दी, उत्पादन को गई गुना बढ़ा दिया और बड़े-बड़े साम्राज्यों के विकास का मुख्य कारक बना, वह गैर-उत्पादक सोने के सामने फीका करार दिया गया है। कवि खुद को लोहे के रूप देखता है, सोने को चुनौती देता हुआ–

हां, मैं लोहा हूं
धूसर काला
इतिहास की गर्तों में खोया हुआ
काल की परतों में सोया हुआ
मैंने ही ढोया है सभ्यता को
धुरी का पहिया बनकर
दुनिया की धमनियों में बिछा हूं
पटरी और पहिया बनकर!

लेकिन सोने के सामने लोहा मूल्यहीन ठहरा दिया गया। सोना ताज बन गया, मुकुट बन गया। सोने के बरक्स लोहे को मूल्यहीन ठहराने की प्रक्रिया धातुओं को मूल्यवान या मूल्यहीन ठहराने तक सीमित नहीं है। लोहे की तरह उत्पादक, दस्तकार, शिल्पकार, मेहनतकश किसान और अन्य मेहनतकश बौद्धिक परजीवियों के बरक्स मूल्यहीन और महत्वहीन ठहरा दिए गए। इस वर्ण-जाति व्यवस्था के रूपक के रूप में देखिए वेदपाठी, मंत्रपाठी, प्रवचन देने वाला, उपदेश देने वाला ब्राह्मण सर्वोश्रेष्ठ घोषित कर दिया गया है और खेती में उत्पादन करने वाला किसान, लोहार, बढ़ई, कुम्हार, पशुचारक, गड़ेरिया और चर्मकार नीच की श्रेणी में शामिल कर दिए गए–

मैंने सभ्यता को अपने सिर पर ढोकर
होकर सर्वसुलभ
श्रेणी में पाया सबसे निकृष्ट स्थान
हां! मैं लोहा हूं

कवि राजेश पाल गर्व से खुद को लोहे से जोड़ रहे हैं। इस प्रक्रिया में वे खुद इस देश के उत्पादकों, दस्तकारों, शिल्पकारों, किसानों और मेहनतकशों से जोड़ रहे हैं। संयोग यह है कि इस देश में जिन्हें शूद्र या दलित की श्रेणी में डाला गया है, उत्पादकों, दस्तकारों, शिल्पकारों, खुदकाश्त किसानों और मेहनतकशों का बड़ा हिस्सा इन्हीं से बना है। दूसरे शब्दों में ये ही इस देश के सृजनकर्ता हैं और सभ्यता के पहिए को आगे बढ़ाने वाले हैं।

इसी संग्रह की एक दूसरी कविता ‘अब और नहीं’ इन उत्पादकों, दस्तकारों, शिल्पकारों, खुदकाश्त किसानों और मेहनतकशों के नदी के रूपक के रूप में देखती है और इसमें मैला फेंक कर खुद को पवित्र घोषित करने वालों को परजीवियों और शोषकों-उत्पीड़कों के रूप में देखती है–

अपने गू-मूत बहाकर
अपनी उत्कृष्टता के लिए
नदी को कर दिया विषैला
अछूत! घृणित! पददलित!

वर्ण-जाति आधारित व्यवस्था की विडंबना देखिए कि जो गू-मूत साफ करता है, वह नीच और जिसका साफ करता है, वह ऊंच। जो कपड़े धोता है, वह धोबी नीच ठहरा दिया गया, जिनके धोता है, वे ऊंच। जो नाई बाल-नाखून काटकर इंसान को वन-मानुष से इंसान बना देता है, वह नीच और जिन्हें इंसान बनाता है, वे उच्च होने का दावा ठोक दिए। करीब हर मानवीय सभ्यता के लिए जरूरी पेशे के साथ भारत में यही हुआ। कवि घोषणा करता है–

नदी होने की यही हुई उपलब्धि
नहीं! अब और नहीं
होना नदी हमें।

यह घोषणा कवि की अकेले की घोषणा नहीं है, बल्कि उन टोलों के सभी लोगों की घोषणा है, जिनके उत्कृष्ट कर्मों को निकृष्ट ठहरा दिया गया।

इस संग्रह की कुछ सशक्त कविताओं में एक कविता का शीर्षक है– ‘हर गांव तो चमारीखेड़ा ही है’। यह कविता अपनी अंतर्वस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर हिंदी की श्रेष्ठ लंबी कविताओं में शामिल होने की सभी शर्तें पूरी करती है। इस संग्रह की यह एक लंबी कविता है। वर्ण-जाति व्यवस्था की वर्चस्ववादी संरचना ने सिर्फ धन-धरती, मान-सम्मान और अधिकारों-कर्तव्यों पर ही अपना वर्चस्व कायम नहीं किया। नामों पर पूरा का पूरा वर्चस्व कायम किया है। किस वर्ण के व्यक्ति का क्या नाम रखा जाए, इसका पूरा का पूरा शास्त्र रचा गया है। शूद्र-दलित का सम्मानजनक-गरिमामय नाम न रखने की ब्राह्मण धर्मशास्त्रों-स्मृतियों ने सख्त निर्देश जारी किया। किसी गांव, शहर या कस्बे का नाम मिसरौली, तिवारीपुरवा, जोशी मठ आदि तो हो सकता है, यह नाम सम्मानजनक हैं, लेकिन किसी गांव या स्थान का नाम ‘चमारीखेड़ा’ कैसे हो सकता है? यह नाम दो तथाकथित देवपुरुषों के लिए कलंक जैसा है–

बस स्टॉप के बोर्ड पर
लिखा हुआ है ‘चमारीखेड़ा’
जिसे पढ़कर
बस में बैठे यात्रियों के चेहरे पर
विभिन्न तरह के हाव-भाव उभर जाते हैं
ओठों पर फैल जाती है, विद्रूप मुस्कान

…

चमारीखेड़ा के नाम पर
किसी ने होंठ बिचकार बोल दिया
‘कोई और नाम नहीं मिला’
…

‘साला गांव का नाम ही सड़ा दिया’
दायें-बायें भी हुई खुसर-फुसर
किसी ने बताया-
‘कोई चमारी हुई थी शहीद’

इस नाम पर और तरह-तरह की बातें। कवि सवाल करता है कि ‘फिर चमारीखेड़ा के नाम में ऐसा क्या चुभ गया, जो लोगों को रास नहीं आता’। तथाकथित ऊंची जाति वालों को यह नाम लगातार चुभता रहा, क्योंकि उन्हें अपने गांव का नाम चमारीखेड़ा बतलाना पड़ता था। यही पोस्टल एड्रेस लिखना पड़ता था– ‘और चुभता रहा चमारीखेड़ा का, पोस्टल एड्रेस’। हालांकि कवि इस सच से पूरी तरह वाबस्ता है कि हिंदुस्तान के नक्शे में हर कहीं चमारीखेड़ा की रीति-नीति मौजूद है– ‘चमारीखेड़ा, देहरादून सहारनपुर हाईवे पर ही नहीं, हिंदुस्तान के नक्शे में कहीं भी हो सकता है।’

इस संग्रह की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता ‘मनसाराम से मुलाकात’ है। यह कविता वर्ण-जाति आधारित अपमान के शिकार मनसाराम के मनोजगत को संवेदनशील तरीके से पाठक के सामने लाती है। भेड़ पालने और उसे चराने वाले को इस वर्ण-जाति व्यवस्था ने ऊंच-नीच के श्रेणीक्रम में नीच कर्म और नीच व्यक्ति की श्रेणी में डाल दिया। मनसाराम का पेशा किसी समाज के लिए एक जरूरी पेशा है। भेड़ के ऊन का कोट और अन्य चीजें पहनकर लोग खुद को श्रेष्ठ समझते हैं, गरिमावान समझते हैं, लेकिन भेड़ पालने और चराने वाले को खुद को कमतर या नीच मानने के लिए विवश कर दिया गया। वह पेशे और उस पेशे को करने के चलते खुद को निम्न मानता है। वह भेड़ चराता है, लेकिन खुद की गड़ेरिया की पहचान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। क्योंकि यह पहचान उसे नीचा ठहराती है। वह खुद को मारवाड़ के रेवाड़ी राजपूत के रूप में कवि के सामने प्रस्तुत करता है, लेकिन ज्योंही कवि खुद को साफ-साफ शब्दों में गड़ेरिया कहता है। मनसाराम भीतर से खुश हो जाता है–

भाई मनसाराम मैं तो गड़रिया हूं
मेरे बाप-दादा भी चराते थे भेड़-बकरी
मनसाराम आत्मीयता से मुस्कराया
मेरे और करीब आया
फिर मुझसे हाथ मिलाया।

थोड़ी देर पहले झूठी महानता बोध दिखा रहा मनसाराम अपना दुखड़ा सुनाने लगता है–

बड़ी कुत्ते से भी बदतर जिंदगी है
ऊपर नंगा आसमान नीचे धरती है

दुख कह लेने से हल्का हुआ मनसाराम प्रेम से भर जाता है–

मनसाराम
प्रेमातुर होकर मेरे कंधे और गाल पर हाथ फेरने लगा

यह किसी एक मनसाराम की दर्द और कहानी नहीं है–

भारत में जहां भी जाता हूं
हर प्रदेश में मुझे मिल जाता है मनसाराम
पूछने पर नहीं बताता है खुद को गड़रिया

कोई क्यों जाति छिपाता है। इसका जवाब कवि इसी संग्रह की अपनी कविता ‘जाति : एक’ में देता है–

इज्जत और अस्मिता से जीने के लिए
छुपानी पड़ती है जाति
पर कितना कष्टकर होता है जाति छुपाकर जीना।

जाति छुपाने को विवश करने वाले लोग भी जाति छुपाने वालों पर ताने कसते हैं और हीनताबोध का शिकार कहते हैं। कुछ लोग कायर और कमजोर कहते हैं। वे यह नहीं सोचते आखिर कोई क्यों जाति छिपाने को विवश होता है, क्यों वह अपनी ही पहचान को सामने नहीं लाता।

कवि के सरोकार का दायरा सिर्फ वर्ण-जाति तक सीमित नहीं है। उत्पादक, दस्तकार, शिल्पकार, खुदकाश्त किसान और अन्य मेनतकश तबकों से आने वाले कवियों का संवेदना का दायरा कबीर, रैदास, नानक, नामदेव की तरह बहुत व्यापक होता है। उनकी खुद की भोगी यातना, अपमान, भूख और अन्य पीड़ाएं उन्हें सबकी पीड़ाओं से जोड़ती है। राजेश पाल के संग्रह में इसी तरह की एक कविता है– ‘कालीन’। अमीरों की बैठकों में सजने वाला यह कालीन कौन से हाथ कितनी मेहनत से तैयार करते हैं और उनकी खुद जिंदगी कैसी होती? इन कालीनों को तैयार करने में बूढ़े-बच्चे सभी शामिल हैं–

कालीन में
जितने भी सुंदर बेल-बूटे थे
उनमें हांफते-खांसते मजदूरों के
हाथ नजर आते हैं

…

उसके गुदगुदेपन में
कुछ बाल मजदूरों के मासूम बचपन की
इबारत छुपी थी।

कवि ‘झोंपडियों में नंगा सच’, ‘भूख’, ‘नरक’, ‘नरक : दो’, ‘गंदी बस्तियां’ और ‘मुर्गा’ आदि कविताओं में कवि की संवेदना देश के तलछट में ठहरा दी गई आबादी से जुड़ती है। दुख-दर्द को अपनेपन के साथ महसूस करती है। जाति का दंश इस देश की बहुसंख्यक पिछड़े-दलितों के लिए सबसे बड़ा दंश रहा है। इस संग्रह में इस दंश के इर्द-गिर्द रची गई कई कविताएं हैं।

कवि राजेश पाल अपने पूर्वजों और अपने समुदाय की पेशेगत पहचान को नहीं छुपाते हैं, भले ही वे वर्तमान में प्रोफेसर हों या भारत सरकार में सर्वेक्षक पद से सेवानिवृत हुए हों या 23वें राष्ट्रीय अंटार्कटिक वैज्ञानिक अभियान दल के सदस्य रहे हों। इस संग्रह में ‘मनसाराम से मुलाकात’ के अलावा कुछ अन्य कविताएं और काव्य पंक्तियां गड़ेरिया समुदाय को केंद्र में रखती हैं। एक कविता का शीर्षक ‘भेड़’ है। यह कविता भेड़ और उसको पालन वाले गड़ेरियों को नीच मानने वालों और उसी भेड़ से बने ऊन परिधान पहनकर आभिजात्य का प्रदर्शन करने वालों के पाखंडी चरित्र को इन शब्दों में उजागर करती है–

तुम्हारी ऊन से बने नरम शॉल ओढ़कर
मालरोड पर टहलने उतरेंगी सुंदरियां
आलीशान होटलों में
कंबल के नुआस में सोते हुए
लोग देखेंगे रासलीला के सपने

और दूसरी तरफ–

तब वे भूल चुके होंगे
और भूल चुके होंगे उन गड़रियों को
जिनकी देह भेड़ की मानिंद बांसती हैं
जिन्हें मुंडते वक्त माक्खा मारता है
जो सदियों से बाड़ी के कीच में सनते रहे!

इसका निहितार्थ यह नहीं है कि कवि सिर्फ दंश, पीड़ा, यातना, शोषण-उत्पीड़न को ही देख रहा है। इसके शिकार लोगों का प्रतिवाद और प्रतिरोध कई कविताओं में आता है। कवि उम्मीदों से भरा है–

मेरी जड़ें बहुत गहरी हैं
बरसात आएगी
और मैं फिर तनकर खड़ा हो जाऊंगा
निरंतर
अपनी लड़ाई लड़ने के लिए

रैदास-कबीर की तरह पिछड़े-दलित मेहनतकश तबकों से आया हर कवि सबके लिए ‘बेगमपुरा’ और ‘अमरदेसवा’ या जोतीराव फुले के बलिराज जैसा स्वप्न ही देखता है। इस संग्रह का कवि भी ऐसा ही स्वप्न देखता है–

कि हमें मुस्कराना है आखों में चमक भरकर
हमें गाना है, एक टीले पर बैठकर
चांद की दूधिया चांदनी में
गा रही हो टिटहरी
गांव के छोर से नदी तट तक
कू रही हो कोयल गहन रात में

यहां कवि की यह चाहत या स्वप्न ‘मैं’ के लिए नहीं ‘हम’ के लिए है। इस संग्रह में कवि ‘मैं’ (किसी व्यक्ति विशेष) का प्रतिनिधि बनकर नहीं आता है, ‘हम’ (समूह का, समुदायों का, वर्ग का) के प्रतिनिधि के रूप में सामने आता है।

चाहे राजनीति की दुनिया हो या कविता की दुनिया। कौन कहां से, किस समुदाय से, किस वर्ग से, किस पेशे से आया है, अक्सर उसकी संवेदना और पक्षधरता और यहां तक कि अभिव्यक्ति का स्वरूप इससे ही तय होता है।

आधुनिक खड़ी बोली की कविता की दुनिया पर द्विज-सवर्ण समुदायों से आए कवियों का वर्चस्व रहा है। इसके चलते कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो कविता की यह दुनिया जाने-अनजाने वर्चस्व का ही एक साहित्य संसार रचती रही है और रच रही है। इसकी संवेदना, बिंब, प्रतीक, मुहावरे, भाषा-शैली और अभिव्यक्ति के ढंग सब में यह वर्चस्व दिखाई देता है। इसके बरक्स पिछड़े, दलितों और आदिवासियों – दूसरे शब्दों में दस्तकारों, शिल्पकारों, खुदकाश्त मेहनतकश किसानों और अन्य मेहनतकश तबकों से आए कवियों की संवेदना, बिंब, प्रतीक, मुहावरे, भाषा-शैली और अभिव्यक्ति वर्चस्व के सभी रूपों को तोड़ने की कोशिश करती दिखाई देती है। हर तरह के वर्चस्व और अधीनता और शोषण-उत्पीड़न को अपनी कविताओं में चुनौती देते ऐसे ही एक कवि राजेश पाल हैं। उनका यह संग्रह उसका साक्ष्य प्रस्तुत करता है।

हालांकि कवि राजेश पाल के इस संग्रह की वे कविताएं ज्यादा सशक्त, प्रभावी और कलात्मक तौर पर ज्यादा बेहतर हैं, जिनमें कवि ने अपने संवेदनात्मक अनभूत सच को अपना विषय बनाया है। कवि उन कविताओं में सापेक्षिक तौर पर कमजोर दिखाई देता है, जहां विचार को कविता का विषय बनाया है। इसका निहितार्थ यह नहीं है कि दर्शन-विचार को उन्नत स्तर का काव्यत्व नहीं प्रदान किया जा सकता है, लेकिन संग्रह में कवि ऐसी कविताओं में कम सफल साबित हुआ है।

समीक्षित पुस्तक : तुम भी सोचो
कवि : राजेश पाल
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य : सौ रुपए

[1] मल्लाह

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

डॉ. सिद्धार्थ रामू

डॉ. सिद्धार्थ रामू लेखक, पत्रकार और अनुवादक हैं। “सामाजिक क्रांति की योद्धा सावित्रीबाई फुले : जीवन के विविध आयाम” एवं “बहुजन नवजागरण और प्रतिरोध के विविध स्वर : बहुजन नायक और नायिकाएं” इनकी प्रकाशित पुस्तकें है। इन्होंने बद्रीनारायण की किताब “कांशीराम : लीडर ऑफ दलित्स” का हिंदी अनुवाद 'बहुजन नायक कांशीराम' नाम से किया है, जो राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। साथ ही इन्होंने डॉ. आंबेडकर की किताब “जाति का विनाश” (अनुवादक : राजकिशोर) का एनोटेटेड संस्करण तैयार किया है, जो फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित है।

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