गत 9 अक्टूबर, 2026 को संसद में विपक्ष की पार्टियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव आयोग और खासतौर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी के आरोप के साथ राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू से मुलाकात की। राष्ट्रपति ने इस ज्ञापन को लेने के साथ प्रतिनिधिमंडल से क्या कहा, यह जानने की उत्सुकता हर किसी में हो सकती है। लेकिन आमतौर पर राष्ट्रपति ज्ञापन लेने के बाद तत्काल कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करते हैं। लेकिन क्या चुप्पी भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की कोई भाषा हो सकती है? दूसरा कि क्या ज्ञापन के दौरान प्रतिनिधिमंडल द्वारा लगाए जाने वाले आरोपो का खंडन नहीं करना भी एक प्रतिक्रिया हो सकती है?
राष्ट्रपति को संविधान में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। संसदीय इतिहास में यह पहली बार देखा जा रहा है कि विपक्ष की पार्टियों ने एकजुट होकर राष्ट्रपति के समक्ष यह आरोप लगाया है कि संसदीय लोकतंत्र में निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान के जरिए चुनाव नहीं हो रहे हैं और वोट चोरी के साथ सत्तारुढ़ पार्टियां सरकार बना रही हैं।
बिहार में विधान सभा चुनाव से पहले 24 जून, 2025 से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) चलाया गया। इस प्रक्रिया में लगभग 65 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया और चुनाव के नतीजे सत्तारुढ़ गठबंधन के पक्ष में आए। बिहार में जो वोट चोरी के आरोप का सिलसिला शुरू हुआ वह पूरे देश में विभिन्न तरीकों से वोट चोरी के आरोप की शक्ल के रूप में एक बड़ा मुद्दा बन गया है। विपक्ष वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन के क्रम में ही राष्ट्रपति से मिलने पहुंचा था।
राष्ट्रपति से मिलने के बाद राहुल गांधी ने यह नहीं कहा कि उनके ज्ञापन पर राष्ट्रपति ने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने राष्ट्रपति की चुप्पी की भाषा को पढ़ने की अपील की। उन्होंने मीडिया को बताया कि राष्ट्रपति को ज्ञापन देने के वक्त राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप का खंडन नहीं किया। राहुल के मुताबिक उन्हें यह लग रहा था कि राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया यह होगी कि वोट चोरी से चुनाव नहीं होता है। लेकिन राष्ट्रपति ने हमारी बातें सुनीं और उन्होंने उन बातों को नकारा नहीं।

क्या विपक्ष का राष्ट्रपति की चुप्पी को इस तरह पढ़ना उचित है? राहुल गांधी ने राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद जब मीडिया को उनकी खामोश प्रतिक्रिया के बारे में बताया तो केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी ने उस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और उसे गलत करार दिया। उसे लोगों को भ्रमित करने की कोशिश कहा।
राष्ट्रपति को संविधान के रक्षक के रूप में परिभाषित किया गया है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से ही विधायिका में लिए गए फैसले अधिकारिक दस्तावेज के रूप में परिवर्तित होते हैं। राष्ट्रपति संविधान की दृष्टि से सर्वोच्च होते हैं, लेकिन यह एक राजनीतिक हकीकत है कि केंद्र सरकार के राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार चलने की एक विशेष स्थिति में होते हैं। राष्ट्रपति को सार्वजनिक तौर पर बोलने के लिए अक्सर सरकार की नीतियों के अनुकूल भाषण दिये जाते हैं। कई बार यह होता है कि राष्ट्रपति अपने अनुभवों, अपने नजरिए से किसी हालात का किसी सार्वजनिक मंच पर बयान कर देते हैं। मसलन 26 नवंबर, 2022 को शायद पहला मौका था जब संविधान दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देश की राष्ट्रपति दौपद्री मूर्मू ने कार्यक्रम में उपस्थित न्यायाधीशों व अन्य को संबोधित किया था। समाचार माध्यमों ने राष्ट्रपति के भाषण के उन अंशों को नागरिकों के लिए प्रमुखता दी जो कि राष्ट्रपति द्वारा अपने अनुभवों पर आधारित जाहिर किए गए।
यह माना जा सकता है कि राष्ट्रपति की दो तरह की भूमिका यहां दिखती है। उसका एक पक्ष यह है कि वह नागरिकों के भरोसे को लेकर भी फ्रिकमंद खुद को मानती हैं और दूसरा संविधान के ढांचे के अनुसार अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी का निर्वहन करने की बाध्यकारी स्थितिय़ां हैं। मसलन राष्ट्रपति के रूप में के.आर. नारायणन ने जनवरी, 1999 में ओडिशा के क्योंझर जिले में ऑस्ट्रेलियाई पादरी ग्रेहम स्टेंस और उनके दो बेटों की जिंदा जलाकर हत्या और बिहार में दिसबंर, 1997 में सवर्णों की निजी सेना रणवीर सेना द्वारा 49 वंचितों की हत्या की घटनाओं को ‘राष्ट्रीय शर्म’ कहा था।
राजनीतिक संस्कृति और परिस्थितियों के अनुसार भाषा के रूप बदल जाते हैं। जनप्रतिनिधि सत्ता के ढांचागत घेरे के बावजूद निजी तौर पर जो महसूस करते हैं, उसे व्यक्त करने के अवसर और भाषा का चयन करते हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने 2022 में संविधान दिवस के मौके पर जो भाषण दिया उसमें उन्होंने मुख्यत: भारत में जेलों की ब़ढ़ती तादाद, जेलों में हाशिए के समाज के लोगों के बंदी के रूप में हालात, न्यायापालिका के रुख और विकास की नीतियों को लेकर सवाल खड़े किए। उनके इस बयान ने सुर्खियां बटोरी लेकिन वह राष्ट्रपति के अधिकारिक भाषण का हिस्से के रूप में स्वीकार नहीं हुआ। राष्ट्रपति के अधिकारिक भाषण से भिन्न सामग्री समाचार माध्यमों में आई। 26 नवंबर, 2022 को राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कार्यक्रम में दिए गए भाषण और उस कार्यक्रम की अधिकारिक भाषण के बीच खबरों में भिन्नता दिखी। मानो वे दो अलग-अलग कार्यक्रमों में राष्ट्रपति की उपस्थिति और उनके भाषण हैं।
लोकतंत्र में यह उचित माना जाता है कि किसी भी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले प्रतिनिधि नागरिकों के बीच समाज और व्यवस्था से जुड़ी किसी स्थिति को लेकर अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं। राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू के भाषण के बाद देश में जेलों में लंबे समय से बंदी रहने वाले समाज के कमजोर वर्गों के लोगों और न्यायापालिका की लचर स्थिति को लेकर कुछ सुगबुगाहट दिखी और समाज में उन्हें बल मिला जो कि लंबे समय से अमानवीय हालात में जिंदगी गुजार रहे लोगों के मुद्दों को लेकर चिंता जाहिर करते हैं।
दूसरी ओर, राष्ट्रपति के अधिकारिक भाषण को तैयार करने की एक प्रक्रिया होती है और उसमें राष्ट्रपति का कार्यालय मुख्य रूप से शामिल होता है। लेकिन एक नागरिक के रूप में राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया की भाषा शिकायत व आरोप का खंडन नहीं करने के रूप में भी हो सकती है। इस तरह से भी पढ़ा जा सकता है कि विपक्ष ने देश में लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के आरोप लगाए हैं और उसे बतौर संविधान के रक्षक तत्काल प्रभाव से खंडित किया जाना चाहिए जैसे कि सत्तारुढ़ पार्टियां करती हैं। लेकिन राष्ट्रपति ने ऐसा करना उचित नहीं समझा। संविधान के रक्षक के बतौर राष्ट्रपति के होने के साथ यह भी उनकी एक संवैधानिक जिम्मेदारी है और यह इस कारण कि राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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