आज 2026 में यह कोई पहला मौका नहीं है जब जंतर-मंतर से लोगों को लोकतांत्रिक भावनाओं को व्यक्त करने के अधिकार से रोकने की कोशिश की गई है। यह कोशिश पिछले कई वर्षों और कई तरह से हो रही है। संसदीय लोकतंत्र में इस दौर को इस रूप में देखा जा सकता है कि विभिन्न रास्तों से अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को अप्रत्यक्ष तौर पर किसी कोने में सीमित कर दिया जाए।
जबसे समानता को हासिल करने के उद्देश्य घोषित हुए हैं, यही वर्चस्व रखने वालों के लिए सबसे मुश्किल वाली बात बनी हुई है। संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी जिस तरह से समानता के उद्देश्यों से जुड़ी है, उसी तरह से अभिव्यक्ति की आजादी का महत्व उन स्थानों से जुड़ा है जो उसे व्यक्त करने के लिए बनाए गए हैं। मसलन, सांसदों के बोलने का महत्व संसद में होता है। उनके संबोधनों को देश और समस्त संस्थाओं को मुखातिब व्यक्त माना जाता है। तभी सरकार उसका एक दबाव महसूस करती है। जिस तरह से संसद के सदस्यों की संख्या डेढ़ गुनी से ज्यादा करने की कोशिश हो रही है उसमें यह इरादा निहित है कि इस संस्था की पहचान बदल दी जाए।
दरअसल, संसदीय लोकतंत्र में अधिकारों पर सीधे हमलों की जगह उसे अप्रत्यक्ष तौर पर अप्रासंगिक या दरकिनार करने वाली स्थिति में लाने की कोशिशों का यह दौर है। जबकि जंतर-मंतर महज स्थान नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी को सामूहिक तौर पर व्यक्त करने की एक संस्था है। इसीलिए इसे बंद करने के फैसले को अभिव्यक्ति के अधिकार को कुचलने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।
इसके पहले 2017 में भी इस योजना को लागू करने की कोशिश की गई कि प्रदर्शनों के लिए दिल्ली-हरियाणा सीमा पर जगह बना दी जाए। संसदीय लोकतंत्र में संसद से अभिव्यक्ति के अधिकार की गूंज को दूर करने के प्रयास सत्ता द्वारा निरंतर होते रहे हैं। अभी हाल तक प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में दिल्ली के एक फोटोग्राफर की तस्वीर लगी थी, जिसमें दिखता था कि आम प्रदर्शनकारी संसद परिसर के अंदर संसद सदस्यों के लिए लोकसभा और राज्यसभा के जाने वाले मुख्य दरवाजे के बाहर खड़े होकर नारे लगा रहे हैं। यह तस्वीर ब्रिटिश सत्ता के खत्म होने के थोड़े वर्ष बाद की थी। जो लोग संसद भवन में पिछले पचास वर्षों से जा रहे हैं, उन्हें इसका अनुभव है कि आम लोगों को अपनी नाराजगी व भावनाएं प्रकट करने से रोकने के लिए भारत की संसद से कैसे दूर किया जाता रहा है।
दूसरा चरण यह आया कि संसद मार्ग पर बने संसद के मुख्य दरवाजे तक जाने की मनाही कर दी गई। तीसरा दौर वह भी आया जब बोट क्लब पर विरोध प्रकट करने की मनाही कर दी गई ताकि संसद भवन की छाया भी नहीं दिखे। सत्ता लोकतांत्रिक नहीं होती है, वह लोकतंत्र की सीमाओं को तय करने वाली शक्ति के रूप में काम करती है।

दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र होने का शोर जिन वर्षों में जितना ज्यादा मचा है उतनी ही दूरी लोगों की संसद भवन से बढ़ती चली गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकतंत्र महज सत्ता का विज्ञापन है। इस दौर में विज्ञापन ही राजनीति का औजार बना हुआ है। संसद भवन एक प्रतीक है, जिसका इस्तेमाल सत्ता अपने लोकतंत्र के लिए करती है। लेकिन उसी प्रतीक का इस्तेमाल सामान्य नागरिक या लोग करने की कोशिश करते हैं तो वह लोकतंत्र के प्रतीक पर हमले की आशंका में तब्दील कर दी जाती है। प्रतीक पर हमले का डर आम लोगों के बीच प्रचार की सामग्री होती है। यह एक विवरण तैयार किया जा सकता है कि कैसे विभिन्न बहानों, डर और भावनाओं को सामने रखकर संसद भवन के आसपास के इलाकों में राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं के बैठकर बातचीत करने की जगहें भी एक-एक कर समाप्त कर दी गई। इसी क्रम में 2017 में जंतर-मंतर पर लोगों को अपनी भावनाएं प्रकट करने से रोकने का फैसला राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की तरफ से आया था।
यह अकारण नहीं है कि नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद सामान्य लोगों में जिस कदर का असंतोष और असमानता की तकलीफें बढ़ी है, उनके बीच संगठित होने के तमाम रास्तों को बंद करने की प्रक्रिया तेजी से शुरू हुई। भारतीय दंड संहिता की धारा 144 (अब 163) स्थायी रूप से संसद भवन के आसपास जड़ दी गई। प्रदर्शन, धरना के लिए पुलिस की इजाजत लेने की एक प्रैक्टिस उन राजनीतिक दलों व संगठनों ने डाल दी जो कि सांठगांठ के विरोध की संस्कृति में यकीन करते हैं। विरोध प्रदर्शनों को अनुसूनी करने, उनके खिलाफ पुलिस का दमन, उनके खिलाफ पाबंदियों के आदेश आदि की घटनाओं का एक विवरण तैयार करें तो वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले की ब्रिटिश जमाने से भी ज्यादा भयावह तस्वीर पेश करती दिखाई देगी। इस पहलू को समझने की जरूरत है कि मतदान की प्रक्रियाओं से चुनी जाने वाली सरकार अपने फैसलों व नीतियों के विरोध पर पाबंदी सीधे तौर पर नहीं लगा सकती है, वह दूसरे रास्तों व बहानों से उन पर रोक लगाती है।
2017 में जंतर-मंतर पर गांधीवादी प्रदर्शन, धरना, भूख हड़ताल पर रोक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने लगाई थी। इस न्यायाधिकरण ने जंतर-मंतर के आसपास रहने वाले कुछ लोगों की ध्वनि प्रदूषण की याचिका पर फैसला दिया कि पुलिस और प्रशासन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन नहीं होने दें। इसीलिए यह गंभीर मुद्दा है कि जंतर-मंतर पर आने से लोगों को रोकने की यह कोशिश पिछले कई वर्षों और कई तरह से हो रही है।
लोकतंत्र के लिए संसद बनाम जंतर-मंतर की एक राजनीतिक प्रक्रिया का महत्व स्थापित है। अब उसकी समाप्ति की घोषणा की जा रही है।
(संपादन : नवल/अनिल)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, संस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
