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जानिए, सामाजिक परिवर्तन के संवाहक बाबू रामसहाय पासी के बारे में

बाबू रामसहाय चौधरी जब 8 वर्ष के थे, उन्होंने अपनी माता उम्मेदा देवी को मंदिर प्रवेश हेतु सवर्ण समाज द्वारा अपमानित होते देखा-सुना। तभी से उनके मन में शूद्रों के सम्मान व विकास की भावना जागृत हो गई थी। उन्होंने डॉ. आंबेडकर के साथ मिलकर अछूतों के आंदोलन को आगे बढ़ाया। आपराधिक जनजाति अधिनियम के उन्मूलन में भी उनका अहम योगदान था। बता रहे हैं डॉ. सी.बी. भारती

सामाजिक क्रांति के प्रणेता और परिवर्तन की वैचारिकी के संवाहक राय साहब बाबू रामसहाय चौधरी (पासी) भारतीय समाज के ऐसे उपेक्षित महान महापुरुष हैं जिनके ऐतिहासिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक योगदान का मूल्यांकन ही अभी तक नहीं हो पाया है।

अंग्रेजी हुकूमत द्वारा सन् 1871 में जरायम पेशा कानून बनाया गया, जिसे क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 या आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 कहा जाता है। इस कानून को भारत के इतिहास का एक बेहद क्रूर और काला कानून माना जाता है। इस कानून के तहत ब्रिटिश सरकार ने देश की लगभग 200 से अधिक वंचित जातियों को ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया था। बिना पुलिस प्रशासन की अनुमति के ये लोग एक जिले या क्षेत्र से दूसरे जिले में नहीं जा सकते थे।

इन जातियों में कोई बच्चा जन्म लेते ही अपराधी की सूची में दर्ज कर लिया जाता था। इलाके में कोई भी चोरी या अपराध होने पर पुलिस बिना किसी सबूत के सबसे पहले इन्हीं समुदायों के लोगों को गिरफ्तार और प्रताड़ित करती थी। इन समुदायों के बच्चों को उनके परिवारों से अलग कर सुधार बस्तियों में भेज दिया जाता था जहां उनसे कम मजदूरी पर जबरिया काम कराया जाता था। इस कानून की चपेट में करोड़ों लोग आए। इसमें मुख्य रूप से मीणा, पासी, भर, बंजारा, बावरिया, सांसी, कंजर, पारधी, लोधी और दुसाध जैसे कई घुमंतू और आदिवासी समुदाय शामिल थे।

इस एक्ट के अंतर्गत आने वाली इसके आतंक से पीड़ित जाति पासी व इसके अमानवीय प्रावधानों से आहत अन्य पीड़ित जातियों वाले कई बड़े नेताओं, समाज सुधारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, संविधान सभा के सदस्यों ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई।

समाज के नेताओं व जननायकों में मुख्य रूप से इलाहाबाद के बाबू मसुरियादीन सांसद, फ़ैज़ाबाद के समाजसेवी पूर्व सांसद बाबू पन्नालाल जो बाद में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य बने, बाबू संकटा प्रसाद सांसद गोरखपुर, बाबू राम निहोर राय सांसद मिर्जापुर, बाबू नारायण दास पासी विधायक फ़ैज़ाबाद, राय साहब बाबू रामसहाय चौधरी एमएलसी, जनपद लखनऊ ने इस एक्ट के विरुद्ध व्यापक जन आंदोलन छेड़ा। इसमें मुख्य भूमिका व प्रभाव बाबू मसुरियादीन व बाबू रामसहाय जी का सर्वोपरि था। 

बाबू मसुरियादीन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के काफी सन्निकट थे। वे नौ वर्षों तक कई बार जवाहरलाल नेहरू के साथ जेल में थे व स्वतंत्रता आंदोलन में उनके साथ सक्रिय थे। वह फूलपुर से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ-साथ सांसद का चुनाव भी लड़े थे। फ़ैज़ाबाद जनपद के बाबू नारायण दास पासी जी, एमएलए ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत जी से इस संदर्भ में कई बार बात की थी। 

बहुत संघर्षों और जनआंदोलनों के पश्चात दमनकारी ब्रिटिश ट्राइब्स एक्ट 1871 की उपयोगिता व सामाजिक प्रभावों के अध्ययन के लिए अंततोगत्वा लोकसभा के पहले उपाध्यक्ष रहे अनंत शयनम् आयंगर के नेतृत्व में एक आयोग का गठन वर्ष 1949 में हुआ था। इस आयोग ने पाया कि ब्रिटिश काल का यह काला कानून भारतीय संविधान की मूल भावना व समानता व स्वतंत्रता के विरुद्ध है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर किसी जाति को जन्मजात अपराधी घोषित करता था। आयोग ने इस काले कानून को निरस्त करने की संस्तुति की। इस संस्तुति के आधार पर दिनांक 31 अगस्त, 1952 को इस एक्ट को पूर्ण रूप से समाप्त किया गया। इसके तहत जातियों को अपराधी के कलंक से मुक्त कर विमुक्त जाति के नाम से पहचान दी गई। इसी ऐतिहासिक दिन की याद में प्रत्येक वर्ष 31 अगस्त को विमुक्त जाति मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

अखिल भारतीय पासी महासभा के प्रमुख मासिक पत्र ‘पासी मित्र’ (वर्ष 1, अंक 3, प्रयाग, मार्च 1939) में ‘अक़वाम जरायम पेशा का सुधार’ नामक शीर्षक से प्रकाशित उल्लिखित टिप्पणी प्राप्त हुई है–

“यू.पी. सरकार ने बदकिस्मती से जरायम पेशा कही जाने वाली जातियों के लिए 1 लाख रुपए प्रदान किया है जो कि निम्नलिखित अनुसार सुधार कार्य में व्यय किया जाएगा। इस समय सरकार ने जो योजनाएं इन गरीब जातियों के सुधार के प्रति तैयार किया उसके लिए हम सरकार के बहुत ही कृतज्ञ हैं।

यू.पी. सरकार ने यह निश्चय किया है कि आइंदा कोई जरायम पेशा न मानी जाएगी। जरायम पेशा कानून जातिगत के बजाय व्यक्तिगत लागू किया जाएगा और रजिस्ट्री उस व्यक्ति की हुआ करेगी जो जरायम करने में आदी होगा। तात्पर्य यह है कि जिन-जिन जातियों पर जरायम पेशा कानून हटा लिया गया है और उनके सुधार के प्रति पंचायतों को भलीभांति संगठित करने के लिए उन्हीं जाति के पढे़-लिखे लोग आर्गनाइजर नियुक्त किए जाएंगे जो कि ग्राम पंचायत से जिला पंचायत आदि बनाकर हर प्रकार से उनके सुधार कार्य में प्रोत्साहन देंगे और उनकी सहायता करेंगे। साथ ही सरकार ने एक रिफ़ामेट्री स्कूल बनाना निश्चय किया है जिसमें जरायम पेशा जाति के लोगों को हर तरह की कारीगरी और खेती वगैरह का काम भलीभांति सिखाया जाएगा जिससे कि वे आइंदा अपना जीवन अच्छा बना सकेंगे।

तारीख 19-02-39 को वमुकाम सीआईडी ऑफिस (पुरानी हाई कोर्ट) में बदकिस्मती से जरायम पेशा कही जाने वाली जातियों के सुधार के लिए जो आर्गनाइजर नियुक्त किए जाएंगे उन उम्मीदवारों का इंटरव्यू और परीक्षा लिया गया। परीक्षा लेने के लिए एक बोर्ड तैयार किया गया था जिसमें निम्नलिखित महानुभाव बोर्ड के सदस्य नियुक्त किए गए थे।

  1. राय साहब चौ. रिसाल सिंह इंस्पेक्टर, सीआईडीटीएस – यूपी
  2. बाबू रामसहाय, एमएलसी
  3. बाबू चेतराम, एमएलए
  4. बाबू विश्वनाथ प्रसाद, एमएलए
  5. बाबू अयोध्या प्रसाद, हेड मास्टर
  6. बाबू छत्रपति जी, सुपरवाइजर
  7. बाबू लक्षमण प्रसाद, सुपरवाइजर
  8. बाबू जवाहर लाल, मास्टर

परीक्षा में करीब 80 उम्मीदवार पासी और कंजर जाति के शरीक हुए थे। बोर्ड का काम निहायत सराहनीय और संतोषजनक रहा।”

अखिल भारतीय पासी महासभा की पत्रिका जो प्रयाग से प्रकाशित होती थी, में उद्धृत उपरोक्त टिप्पणी बाबू रामसहाय के योगदान, संघर्ष, समाज में उनकी सम्मानजनक स्थिति व उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को स्वयमेव परिलक्षित एवं प्रमाणित व प्रस्तुत करते हैं।

जरायम पेशा एक्ट के अंतर्गत आने वाले पीड़ित, प्रताड़ित, शोषित, विकास, शिक्षा के अवसरों से वंचित; आर्थिक रूप से कमजोर; धन, धरती, वन, संपदा व संसाधन से च्युत पासी जाति में, दिनांक 28 फरवरी, 1899 को लखनऊ शहर के मुहल्ला चिरैंदापुरवा (फूलबाग, 28 हीवेट रोड, वर्तमान में 71, शिवाजी मार्ग, लखनऊ) में बाबू रामसहाय का जन्म हुआ था। प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी वीरांगना ऊदा देवी पासी के परिवार में जन्म होने से भी उन्हें स्वयमेव गौरवान्वित होने का अवसर प्रदत्त कराता है।

बाबू रामसहाय के पिता का नाम बाबू सूरज बली व मां का नाम उम्मेदा देवी था। उनका परिवार प्रतिष्ठित एवं संपन्न था। वह भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित थे। बाबू रामसहाय सन् 1927 में गवर्नमेंट वाटर वर्क्स जलकल विभाग में सरकारी सेवा में कार्यरत थे। बाद में सामाजिक कार्यों में अभिरुचि होने के कारण वह त्यागपत्र देकर अपने स्वयं के व्यवसाय क्रिस्टल एंड कंपनी, सेनिटरी और क्रिस्टल सोडा वाटर फैक्ट्री को मेहनत व लगन से चलाने लगे।

बाबू रामसहाय जब 8 वर्ष के थे, उन्होंने अपनी माता उम्मेदा देवी को मंदिर प्रवेश हेतु सवर्ण समाज द्वारा अपमानित होते देखा-सुना। तभी से उनके मन में शूद्रों के सम्मान व विकास की भावना जागृत हो गई थी। अपनी मां का अपमान दलित उत्थान का प्रेरक बन गया।

वे सामाजिक उत्थान के कार्यों में अधिक समय देने लगे थे। वह निर्धन छात्रों को पुस्तकीय सहायता भी प्रदान करते थे। रामसहाय जी सरल स्वभाव व आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उनका मुख्य लिबास शेरवानी कोट, पाजामा, और पैरों में बूट थे। बाबू रामसहाय की मृत्यु 28 फरवरी, 1955 को हुई थी।

रामसहाय अपनी शैक्षिक योग्यता, प्रतिभा, व सामाजिक सेवा के कारण निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 10 जुलाई, 1937 को यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ अवध के गवर्नर द्वारा रसूलपुर, गोसाईगंज से विधान परिषद के सदस्य नामित किए गए थे। वे वर्ष 1937-52 तक परिषद के सदस्य रहे। इनकी समाज सेवा, संघर्ष व लोकप्रियता से प्रभावित होकर बाबू रामसहाय चौधरी को 1 जुलाई, 1940 को ‘राय साहब’ की पदवी से अलंकृत किया गया था।

उनका अधिकांश जीवन पासी समाज के सम्मेलन, पासी समाज के उत्थान, पासी पंचायत संगठनों में व्यतीत होता था। साक्ष्य है कि 10 सितंबर, 1937 तथा 7 मार्च, 1938 को उन्होंने विधानसभा में इसके संबंध में अंग्रेजी में भाषण दिया और उसकी प्रति तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को सौंपी।

‘उ.प्र. विधान परिषद के सदस्य 1937-52’ (प्रकाशन वर्ष 1988) के पृष्ठ संख्या 238 पर उल्लिखित है– “सरकार यह अवश्य जानती है कि क्राइम प्रोविंसेज एसोसिएशन प्रांत में विगत दस वर्षों से बड़ी सफलता के साथ कार्य कर रहा है तथा उन्होंने बड़े उपयोगी कार्य किए हैं।

सेंध लगाना, डकैती डालना, लूटपाट की घटनाओं को कम करने का प्रांत की पासी पंचायतों ने बड़ा प्रयत्न किया है, इसकी पुष्टि बाराबंकी के आंकड़ों से की जा सकती है। मुझे कोई कारण समझ में नहीं आता है कि क्यों सरकार ने एसोसिएशन को अपनी दृष्टि से ओझल कर रखा है तथा पासी पंचायत के लिए अनुदान निर्धारित नहीं किया है? पासी पंचायत क्राइम प्रोविंसेजज एसोसिएशन से संबद्ध है तथा पंचायत सदा से अच्छे कार्य करती रही है। सरकार न्याय करेगी यदि उसे सरकारी मान्यता तथा आर्थिक सहायता दिलाए।”

बाबू रामसहाय चौधरी (28 फरवरी, 1899 -28 फरवरी, 1955)

रामसहाय चौधरी जी ने पासी पंचायत के माध्यम से पिछड़े वर्गों की समस्याओं के लिए  ‘आदि हिंदू डिप्रेस्ड क्लास एसोसिएशन’ नामक संस्था बनाकर पंजीकृत करवाया था और ब्रिटिश कालीन गवर्नर सर मेलकम हेली को प्रतिवेदन दिया था, जिसमें अपराधी प्रवृत्तियों की जातियों की सूची जरायम पेशा एक्ट, 1871 से पासी जाति को निकाले जाने का अनुरोध किया था। उन्होंने पासी समाज के उत्थान के लिए सन् 1940 में रिक्लेमेशन डिपार्टमेंट की स्थापना कराई थी, जिसके प्रभारी डिप्टी एस.पी. चौधरी रिसाल सिंह थे। इस संस्था में सुपरवाइजर की तैनाती की गई थी जो पासी पंचायत को शिक्षा एवं संगठन पर उपदेश देते थे व जागरूक करते थे और पुलिस विभाग का एक इंस्पेक्टर इन कार्यों का अनुसरण कर एस.पी. को सूचना प्रदान करता था।

सन् 1939 में जनपद बाराबंकी के अखिल भारतीय पासी महासभा का अधिवेशन बाराबंकी डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के टाउनहॉल में आयोजित किया गया था, जिसमें बिहार के जगलाल चौधरी, राय साहब बाबू रामसहाय चौधरी, लखनऊ, बाबू बजरंग बिहारी, बाराबंकी, बाबू महादेव प्रसाद, गोरखपुर, बाबू मुसुरियादीन, इलाहाबाद, बाबू नारायण दास, फैजाबाद, बाबू टीका राम, हरदोई, चौधरी महावीर बिहार, मास्टर क्षत्रपति, आलमबाग लखनऊ, श्री अशर्फी लाल, बाबू जगन्नाथ प्रसाद आदि ने पासी समाज की कुरीतियों एवं अंधविश्वास पर विचार व्यक्त किए थे।

‘बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज’ के पृष्ठ संख्या 239 पर प्रकाशित है–

“Babu Ram Sahai, a member of the United Provincial Committee representing the untouchable classes, in his minutes of dissents gave the number (?) of untouchables in U.P.” (बाबू रामसहाय, जो यूनाइटेड प्रोविंशियल समिति में अछूत वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे, ने अपनी औपचारिक असहमति व्यक्त करने के क्रम में यूपी में अछूतों की संख्या के बारे में जानकारी दी।)

बाबू रामसहाय डॉ. आंबेडकर के साथ अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के विकास तथा चेतना के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। बाबासाहब जब भी लखनऊ आते थे तो उनके निवास स्थान पर ठहरते थे। हीवेट रोड पर ही बाबू रामसहाय बगल में बंगाली क्लब था जिसमें मीटिंगें आदि होती थीं। बाबू रामसहाय के घर में पुस्तकों का अच्छा संग्रह था। इस कारण अध्ययन शील राष्ट्रनायक बाबा साहब को उनके यहां ठहरने से मानसिक शांति का अनुभव होता था। बाबासाहब ने अनुसूचित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की थी। इस संबंध में बनारस में उनके निर्देशन में एक सभा का भी आयोजन किया गया था, जिसे बाबू रामसहाय जी ने भी संबोधित किया था। बाबू रामसहाय 1948 में पासी पंचायत नामक संस्था गठित कर सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों को हटाने के लिए कार्यक्रम आयोजित करते रहते थे। सन् 1950 के ‘पासी पंचायत’ के स्थान पर इसे ‘पासी जागृत मंडल’ नाम दिया गया। इसके पश्चात इसे उत्तर प्रदेशीय पासी जागृत मंडल नाम देकर संस्था को पंजीकृत कराया गया। इसके द्वारा पासी समाज के विकास एवं उत्थान व कुरीतियों को हटाने के प्रयास होते रहे।

बाबू रामसहाय चौधरी ने 5 नवंबर, 1951 को पासी धर्मशाला के लिए अपनी 2400 वर्गफुट जमीन पुराना बर्फ खाना, लखनऊ उपलब्ध कराई थी। इस संबंध में उत्तर प्रदेश पासी जागृत मंडल के महामंत्री मातादीन गूजर को इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के पत्र संख्या 3735 दिनांक 8 जनवरी, 1952 द्वारा सूचित भी किया गया था।

डॉ. आंबेडकर के साथ सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन में बाबू रामसहाय की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे महास्थिविर बोधानंद के नवरत्न कमेटी के एक रत्न थे और गौतम बुद्ध के समतामूलक सामाजिक सिद्धांतों से बहुत प्रभावित थे। स्वामी अछूतानंद ने आदि हिंदू आंदोलन चलाया था। उनके इस अभियान को बढ़ाने के लिए बाबू रामसहाय चौधरी ने अपने घर पर आदि हिंदू लाइब्रेरी की स्थापना की थी। सितंबर, 1928 में जब साइमन कमीशन अछूतों की शैक्षिक व आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए आया था तब उस समय चारबाग रेलवे स्टेशन, लखनऊ पर दलितों ने स्वामी अछूतानंद के नेतृत्व में कमीशन का स्वागत किया था और अपनी सामाजिक स्थिति से अवगत कराया था। इस आंदोलन में बाबू रामसहाय चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

डॉ. आंबेडकर ने ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के उपाध्यक्ष चेतराम पासी, इलाहाबाद व महासचिव अशर्फी लाल पासी, लखनऊ को बनाया था। उन्होंने बाबू रामसहाय चौधरी के निवास पर बोलते हुए कहा था कि “महार जाति लाठी वाली जाति होती है और उत्तर प्रदेश में पासी भी लाठी चलाने वाली जाति है। महार जाति उत्तर प्रदेश की पासी जाति के सदृश्य समान है।”

रायसाहब रामसहाय चौधरी उत्तर भारत के एक प्रमुख समाज सुधारक, विचारक व दलित आंदोलन के आधार स्तंभ थे, उन्होंने उत्तर प्रदेश के अग्रणी जाति विरोधी सुधारकों, विशेष रूप से भदंत बोधानंद के साथ मिलकर काम किया। वे भदंत बोधानंद द्वारा गठित रत्नों की कोर कमेटी के एक अभिन्न सदस्य थे। इस सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्षरत क्रांतिकारी समूह में स्वामी अछूतानंद, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, शिव दयाल चौरसिया आदि ऐतिहासिक विभूतियां शामिल थीं। इस गठबंधन के माध्यम से उन्होंने रूढ़िवादी अनुष्ठानों, सामाजिक अंधविश्वासों और कठोर जातिगत असमानताओं को चुनौती दी। उनके संदेशों व कार्यों ने आधुनिक दलित राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक चेतना की नींव रखी। फ़ैज़ाबाद में पासी जाति में जन्मे संत सुकईदास परमहंस ने अवध क्षेत्र के वंचित व पिछड़े समाज वर्ग विशेष कर पासी जाति में फैले अंधविश्वास, कुरीतियों व अशिक्षा के विरुद्ध आंदोलन चलाया था। जिस समय दक्षिण भारत के इड़वा जाति में फैले अंधविश्वास के प्रतीक सर्प पार्कों को नारायण गुरु खुदवाकर फेंकवा रहे थे, उसी समय उत्तर भारत के दलितों व पिछड़ों के घर-घर में स्थापित अंधविश्वास के प्रतीक देवी-देवताओं, कुल देवताओं के स्थलों को संत सुकईदास परमहंस खुदवा कर फेंकवा रहे थे,  शिक्षा, संस्कार व ज्ञान का दीपक जला रहे थे।

ब्रिटिश सरकार ने विमुक्त समाज को जनजातीय अधिनियम के तहत प्रताड़ित करना शुरू किया, तब राय साहब बाबू रामसहाय पासी और उनके साथियों ने समाज को संगठित करने का बीड़ा उठाया। भदंत बोधानंद महास्थिविर ने लखनऊ को वैचारिक क्रांति का केंद्र बनाया। उन्होंने उत्तर भारत के सबसे प्रखर विचारकों की एक टोली तैयार की, जिसमें बाबू रामसहाय पासी वंचित समाज को शिक्षा से जोड़ने, कुरीतियों को मिटाने और राजनीतिक चेतना जगाने के मूल रणनीतिकार थे। स्वामी अछूतानंद ने अछूतों को भारत का मूल निवासी घोषित किया। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने लेखन व प्रकाशन से रचनात्मकता, व्यक्तित्व निर्माण और आत्मविश्वास संवर्धन को जन-जन तक पहुंचाया। बाबू रामसहाय वैचारिक व सामाजिक रूप से सशक्त होने का आह्वान करते थे। शिव दयाल सिंह चौरसिया पिछड़े वर्गों के पैरोकार व काका कालेकर आयोग के महत्वपूर्ण सदस्य थे। उन्होंने भी समाज में व्याप्त फिजूलखर्ची, नशाखोरी और अंधविश्वास के कर्मकांडों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलित और पिछड़े जातियों के बच्चों के लिए पाठशालाएं और पुस्तकालय खुलवाने में मदद की। सन् 1950 में बहराइच में बंबोरा नामक स्थान में बाबू रामसहाय की अध्यक्षता में पासी समाज का अधिवेशन हुआ जिसमें 20 हजार पासी एकत्र हुए। इस अधिवेशन में जरायम पेशा एक्ट पूर्ण रूप से रद्द करने का प्रस्ताव पारित हुआ।

बाबू रामसहाय चौधरी डॉ. आंबेडकर के कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन से बहुत प्रभावित थे। भारत में अछूतों को जन्म से ही मंदिरों में प्रवेश व पूजा करने की मनाही थी। यह मानव गरिमा की लड़ाई थी।  बाबासाहब से प्रेरणा लेकर बाबू रामसहाय चौधरी आदि ने वर्ष 1950 के दशक में काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश हेतु दलित वर्ग के कई साथियों के साथ आंदोलन किया, जिसमें देश के विभिन्न अंचलों से इस धार्मिक व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोशित भारी संख्या में आए अछूत जातियों के लोग सम्मिलित हुए। मंदिर प्रवेश के विरोध में पंडों, पुजारियों व रूढ़वादी समूह की भीड़ ने ईंटों, डंडों व पत्थरों से निहत्थे जुलूस पर प्रहार किया। बाबू रामसहाय चौधरी लहूलुहान हो गए और बहुत सारे लोग घायल हुए। स्वामी हरिहरानंद सरस्वती व उनके समर्थकों ने दलितों के प्रवेश का कड़ा विरोध किया था।

काशी विश्वनाथ मंदिर प्रवेश आंदोलन मंदिर में प्रवेश व पूजा अर्चना व मानवीय गरिमा के स्थापत्य एवं दलितों और वंचित वर्गों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए चलाया गया एक ऐतिहासिक, सामाजिक और कानूनी संघर्ष था। यह मानवीय अस्मिता, गौरव व अस्तित्व एवं सम्मान के अधिकार के लिए चलाया गया था। बाबू रामसहाय का इस देश से जरायम पेशा कानून क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 के विरुद्ध वातावरण तैयार करने, डॉ. आंबेडकर के विचारों को आगे ले जाने व उत्तर भारत में रूढ़िवादी धार्मिक धारणाओं के विरुद्ध व स्वस्थ समाज की संरचना के लिए आंदोलन चलाने के अविस्मरणीय योगदान सदैव याद किया जाता रहेगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

डॉ. सी.बी. भारती

लेखक वरिष्ठ दलित साहित्यकार हैं।

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