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समाज और संस्कृति

मंडल कमीशन की सिफारिशें : वर्ण-जाति आधारित वर्चस्व-अधीनता के रिश्ते के खात्मे का प्रस्ताव
जो कोई व्यक्ति भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुसार समता, स्वतंत्रता, बंधुता आधारित भारत, सबके लिए हर स्तर पर न्याय प्रदान करने वाला भारत बनाना चाहता हो, भारत को एक सच्चे लोकतांत्रिक राष्ट्र और समाज...
‘जाति के अंत के लिए बुद्ध, फुले और आंबेडकर तीनों आवश्यक’
‘शाहू महाराज ने महात्मा फुले के समग्र वैचारिक दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया था। यह तथ्य है। उन्होंने फुले के विचारों में से केवल यह स्वीकार किया कि जाति-व्यवस्था अन्यायपूर्ण, शोषणकारी और समाज की प्रगति...
सोहेल हाश्मी की किताब ‘पत्थरों का संगीत’ अर्थात इस्लामी वास्तुकला का मिथक
इस पुस्तक में सोहेल हाशमी ने मध्यकालीन दक्षिण एशियाई वास्तुकला या निर्माण-शिल्प के कुछ उन ख़ास तत्वों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिन्हें हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कुछ लोगों का कहना है...
दक्ष प्रजापति कुम्हार समुदाय के आदर्श नहीं
पिछले कुछ दशकों में अनेक कथावाचकों, धार्मिक आयोजकों और कुछ संगठनों ने यह प्रचारित करना प्रारंभ किया कि वर्तमान प्रजापति (कुम्हार) समुदाय के पूर्वज पुराणों के महाराज दक्ष प्रजापति थे। इस प्रकार की कथाएं धार्मिक...
पुस्तक समीक्षा : अशराफी आधिपत्य के बरक्स पसमांदा अस्मिता का घोषणापत्र
पसमांदा विमर्श के समकालीन परिदृश्य में यह पुस्तक महज एक सामान्य अकादमिक अध्ययन या आंकड़ों का पुलिंदा नहीं...
राष्ट्रीय चेतना के उद्घोषक थे भिखारी ठाकुर : प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव
बीते 9 जुलाई को ऑनलाइन गोष्ठी में प्रो. वीरेंद्र नारायण यादव ने निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया कि भिखारी...
आदिवासी प्रश्न और मुख्यधारा के समाजशास्त्र की सीमाएं (संदर्भ : निर्मल कुमार बोस की पुस्तक ‘ट्राइबल लाइफ़ इन इंडिया’)
आदिवासियों या उनकी आर्थिक व्यवस्था को ‘पिछड़ा’ कहना या उनको ‘बैकवर्ड हिंदू’ कहना केवल एक वर्णनात्मक श्रेणी का...
ऐसे थे भिखारी ठाकुर और ऐसा था उनका प्रभाव
भोर होने से पहले भिखारी ठाकुर की नाच मंडली को गांव छोड़ना पड़ा। लेकिन नाच की आंच बहुत...
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