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समाज और संस्कृति

लोकायत केवल धर्म और ईश्वर का नकार नहीं, संपूर्ण जीवन-दर्शन था
गणतांत्रिक प्रणाली के अस्तित्व में आने से पहले, लोकायत देशज व्यवस्था का हिस्सा था। उसमें छोटे-छोटे आत्मनिर्भर और स्वायत्त गांव या गांवों के समूह शामिल थे, जो धर्म, धर्मसत्ता या राजसत्ता से नहीं, बल्कि लोकेच्छा...
पसमांदा विमर्श पर संवाद करती किताब
भारत में दलित आंदोलन ने लंबे समय तक मुख्य रूप से हिंदू दलितों के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन मुस्लिम और ईसाई समाज के दलित समुदायों की समस्याओं को उतनी प्राथमिकता नहीं मिली...
सरहुल पर्व : आदिवासी संस्कृति, प्रकृति पूजा और कृषि परंपरा का उत्सव
आज जब पूरी दुनिया ‘पेरिस समझौते’ और ‘कार्बन फुटप्रिंट’ जैसे तकनीकी शब्दों में उलझी है, सरहुल का दर्शन एक सरल लेकिन अचूक समाधान पेश करता है। ‘प्रकृति पूजा’ का अर्थ केवल पेड़ के आगे झुकना...
ब्राह्मण नहीं, श्रमण थे आयुर्वेद के प्रतिपादक (पहला भाग)
श्रमणों की तरह, चिकित्सक भी ज्ञान के साधक थे। वे घूमते-फिरते, रोग का कारण तथा उसके लिए नई औषधि, उपचार और चिकित्सा ज्ञान प्राप्त करने में निरंतर लगे रहते थे। इसके लिए वे उन अन्य...
मिस्र बनाम सिंधु : भाषा और ज्ञान का उद्गम, प्रवाह व अवरोध
भारत के संबंध में भाषा की खोज का सिलसिला भीमबेटका की पहाड़ियों तक ले जाता है। मध्य प्रदेश...
सुदर्शन ऋषि और डुमार (डोमार) समाज
पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है, क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी...
देखें, जगत के प्रकाश को
इस क्रिसमस पर हम झिलमिलाते बल्बों और साज-सज्जा से आगे देखें – हमारे जगत के उस प्रकाश को...
आर्यभट नहीं, आजीवक थे भारतीय गणित के प्रतिपादक
सच तो यह है कि सभ्यता के आरंभिक चरण में प्रकृति के सान्निध्य में रहकर, उसका करीब से...
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