परिवार में निर्णय लेना – भरोसा : एक आधारशिला

निर्णय लेना एक मुश्किल जिम्मेदारी होती है, नाशुक्रा काम, लेकिन एक ऐसी जिम्मेवारी जो घर-परिवार के हर सदस्य द्वारा दर्शाए गए भरोसे के बल पर कायम रहता है। यह जीवंत संबंधों की आधारशिला है! इसे कायम रखना, इसका पोषण करना और इसे बढ़ाना हर निर्णय लेने वाले के लिए एक चुनौती है!

पिछले महीने के लेख में हमने एक केस स्टडी पर गौर किया था। सुरंजन ने अपने परिवार की, और खासतौर पर अपने पिता की, मदद से एक ऐसी कार्यप्रणाली बनाई जिसके द्वारा परिवार का प्रत्येक सदस्य आजादी का अनुभव कर सके और साथ ही साथ जिम्मेवारी उठाने में भी भागीदार बने। पिता और पुत्र दोनों ने एक टीम की तरह काम किया। उन्होंने पूरे परिवार के लिए सप्ताह के आखिर में एक डिनर का आयोजन किया ताकि वहाँ बैठ कर सब निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें। सुरंजन ने अपने पिता से चर्चा की पहल करने का आग्रह किया क्योंकि वह उनके अधिकार पर भरोसा रखता था। पिता ने भी चर्चा आरंभ करने के बाद उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी सुरंजन को सौंप दी क्योंकि उन्हें अपने बेटे की अगुवाई करने की क्षमता पर भरोसा था। क्योंकि दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा था इससे निर्णय लेना आसान हो गया।

यह माना जा सकता है कि सुरंजन और उसके पिता में आपसी भरोसे का यह संबंध बनने में बरसों लगे होंगे, शायद तब से जब सुरंजन बच्चा ही था। क्या इसमें हमारे लिए भी कोई सबक है? माँ-बाप और बच्चों में गहरा भरोसा विकसित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

भरोसा : असली बुनियाद

भरोसा हर रिश्ते और निर्णय लेने की हर प्रक्रिया का आधार स्तंभ होता है।

हालाँकि यह मान लिया जाता है कि बच्चा तो माँ-बाप पर हमेशा भरोसा करेगा ही (क्योंकि बच्चे को अपने माँ-बाप चुनने का अवसर नहीं मिलता!), लेकिन बच्चे पर भरोसा करना माँ-बाप का निर्णय होता है, माँ-बाप को यह चुनाव करना होता है कि उन्हें अपने बच्चों पर भरोसा करना है या नहीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चे जो कह रहा है उसे सही मान कर विश्वास किया जाए या फिर बच्चे की व्यैक्तिकता के आधार पर उसका विश्वास न किया जाए। हम यह भी नहीं कह रहे कि बच्चे पर तब तक विश्वास नहीं करना चाहिए जब तक वह अपने को भरोसे के लायक साबित न कर दे।

भरोसा और रिश्ता

दूसरे शब्दों में, भरोसा अपने आप होने वाली चीज नहीं है। उसे स्थापित किया जाता है। माँ-बाप अपने बच्चे पर इसलिए भरोसा करते हैं क्योंकि उनका उनसे रिश्ता होता है। भावनाएँ और अहसास इस बात का निर्धारण करती हैं कि माँ-बाप को शक करने की बजाय अपने बच्चों पर स्वभाविक रूप से भरोसा करना चाहिए। यही सही भी लगता है। बच्चे के लिए भी यही बात कही जा सकती है — बच्चा माँ-बाप पर इसलिए भरोसा करता है क्योंकि उसका उनके साथ एक संबंध है। अब क्या कोई बच्चा अपने माँ-बाप के किसी सहकर्मी पर केवल इसलिए भरोसा कर सकता है कि वह व्यक्ति उनके साथ एक ही जगह काम करता है? वास्तविकता हमें बताती है कि ऐसी स्थिति में शक का भाव होता है और बच्चे के सामने एक सवालिया निशान खड़ा रहता है। बच्चा अपनी समझ के अलावा अपने जज्बातों के साथ भी कश्मकश करता रहता है। बल्कि हम जानते ही हैं कि बच्चे के लिए अपने माता-पिता के सहकर्मी के साथ संबंध वैसा ही होता है जैसा किसी अजनबी के साथ, और माँ-बाप ने यह बात सिखाई होती है कि अजनबी पर भरोसा नहीं करना। बच्चे के सामने भी वही दुविधा होगी जो ऐसी किसी परिस्थिति में किसी वयस्क के सामने होगी। किसी अजनबी पर भरोसा कैसे करें? यह ऐसी दुविधा है जिसमें जज्बात और तर्क दोनों शामिल होते हैं। इसलिए, हैरत की बात नहीं अगर कोई भरोसे की कमी के रूप में अपना संदेह व्यक्त करे। हमारा अविश्वास और संदेह अकसर इस तरह से अभिव्यक्त होता है: डर, आत्मविश्वास की कमी, अजनबी द्वारा किए दावों की पुष्टि की जरूरत, अजनबी की विश्वसनीयता स्थापित करने वाले सबूतों की जरूरत, और इस बात की पुष्टि की जरूरत की यह व्यक्ति ठीक है। अब चूंकि हमारी सामाजिक मानसिकता पर संस्कृति और परंपरा का गहरा प्रभाव होता है, वयस्क इससे भी एक कदम आगे जाते हैं, और चेतन या अवचेतन रीति से यह जानना चाहते हैं कि यह अजनबी किस बिरादरी या समुदाय का है। इसका कारण समझ से परे है, लेकिन हम वयस्क इसे महत्वपूर्ण और आवश्यक समझते हैं। किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत उसकी विश्वसनीयता से कैसे संबंधित हो सकती है, इस विषय पर सोचने की आवश्यकता है और इससे हमें लोगों के रवैये और समझ के बारे में दिलचस्प सबक मिल सकता है।

एक बार यह और इससे संबंधित प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जाएँ तो फैसले लिए जाते हैं और उन पर अमल किया जाता है। जब अनुभव इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह संबंध सच्चा और भरोसे के लायक है तो निर्णय लिए जाते हैं और भविष्य में भी संबंध बनाए रखने की संभावना बनती है। जबतक कि उस पर किसी बुरी घटना की काली छाया न पड़ जाए। उस समय हमारी पुष्टि फिर खतरे में पड़ जाती है, संदेह पैदा होते हैं और शक और अविश्वास के काँटे उभर आते हैं। इससे वह सारी प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है जिसमें खोया विश्वास, भरोसा और विश्वसनीयता पाने के लिए फिर से पुष्टि की आवश्यकता होती है। हालाँकि भरोसा तोडऩा आसान होता है, उसे जीतना, स्थापित करना और भरोसा बनाए रखना मुश्किल होता है।

भरोसे के मुद्दे पर बात करते हुए एक और तत्व सामने आता है। वह है अँधा और बिना शर्त का भरोसा। यह भरोसा अकसर डरावना रूप इख्तियार कर सकता और कर लेता है। दुर्भाग्यवश, यह पूर्व में तोड़े गए भरोसे को देखने में नाकामयाब होता।

भरोसा और सच्चाई

भरोसे के निर्माण में सच बोलना और सच जीना शामिल होते हैं। कहते हैं हाथ कंगन को आरसी क्या। यह उन लोगों पर लागू होता है जो चाहते हैं कि उन पर भरोसा किया जाए। यहाँ इसका अर्थ हुआ कि सीधी-सच्ची बात की जाए, सच्चा जीवन जीया जाए और सच-झूठ को परखने की क्षमता पाई जाए।

सच्ची वाणी और सच्चे जीवन में अगर कमी आती है तो इसके बहुत भयानक परिणाम आ सकते हैं, खासतौर पर जब कोई नौसिखिया ऐसा करने का प्रयास करता है। सच्चाई और सच्ची बात के लिए थोड़ी परिपक्वता की जरूरत होती है। इस परिपक्वता में गहरी जानकारी, योग्यता, कुशलता, जुबान पर काबू और थोड़ी कूटनीति की आवश्यकता होती है। यह किसी भी संबंध में और खासतौर पर वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में अत्यावश्यक होते हैं। ऐसा इसलिए कि नजदीकी रिश्तों में हम बहुत अधिक भावुक होते हैं, हर कोई यह मान कर चलता है कि काफी हद उसे कोई कुछ नहीं कहेगा, और जो कुछ वह कहना चाहते हैं कह सकते हैं। लेकिन जब बाजी पलटती है तो हमारी प्रतिक्रियाएँ बिलकुल उलटी होती हैं। हम जो परिवार से चाहते हैं उस समय हम परिवार को वह देते नहीं हैं, खासतौर पर निर्णय लेने वालों को!

निर्णय लेना एक मुश्किल जिम्मेदारी होती है, नाशुक्रा काम, लेकिन एक ऐसी जिम्मेवारी जो घर-परिवार के हर सदस्य द्वारा दर्शाए गए भरोसे के बल पर कायम रहता है। यह जीवंत संबंधों की आधारशिला है! इसे कायम रखना, इसका पोषण करना और इसे बढ़ाना हर निर्णय लेने वाले के लिए एक चुनौती है!

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी 2012 अंक में प्रकाशित)


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