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ओबीसी साहित्य की अवधारणा कितनी प्रासंगिक?

आज जरूरत है कबीर, फुले, पेरियार, अंबेडकर सरीखे सामाजिक चिंतकों के वर्णाश्रम और ब्राह्मणवाद विरोधी चिंतन एवं बहुजन समाज के संघर्ष, स्वप्न और आदर्श को साहित्य में केंद्रीयता प्रदान करने की, न कि जाति के आधार पर साहित्य का एक अलग कुनबा बनाने की।

दलित साहित्य की तर्ज पर ओबीसी साहित्य की परिकल्पना एक विवादास्पद और जोखिम भरा मुद्दा है। विशेषकर तब जब इसे ओबीसी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों से विच्छिन्न करके जाति विशेष की पहचान तक सीमित रखा जाए। यह जातिगत पूर्वाग्रह का ही परिचायक है कि भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद के साहित्य में तो ओबीसी तत्वों को दूरबीन से ढूँढ़ा जाता है, जबकि गैर-पिछड़े समाज से आए लेखकों के उस साहित्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है जिनमें श्रमशील पिछड़े वर्ग और हाशिए के समाज की केंद्रीयता है। प्रश्न यह है कि यदि प्रभुत्वशाली अभिजन साहित्य परंपरा के बरक्स पिछड़े समुदाय की श्रमशील परंपरा की तलाश की जाती है तो वह साहित्य की विषयवस्तु के आधार पर की जानी चाहिए या कि लेखक की जाति के आधार पर?

1936 में प्रेमचंद ने लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए लेखकों का आह्वान किया था कि, “जो दलित है, पीड़ित है, वंचित हैं, चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, उनकी हिमायत करना हमारा फर्ज है।” लेखकों से यह माँग करने से पूर्व प्रेमचंद स्वयं अपने साहित्य में दलित, पिछड़े व हाशिए के समाज को केंद्रीयता प्रदान कर चुके थे। इतना ही नहीं उन्होंने साहित्य की सौंदर्यदृष्टि की कसौटी बदलने की भी माँग की थी और यह करते हुए उन्होंने भारतीय समाज की ब्राह्मणवादी संरचना को भी चुनौती दी थी। प्रेमचंद की स्पष्ट मान्यता थी कि, “हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है बल्कि उस सामाजिक जुए से भी उस पाखंडी जुए से भी जो विदेशी शासन से कहीं अधिक घातक है।” यह कहते हुए प्रेमचंद उसी वैचारिक धरातल पर खड़े थे, जहाँ जोतिराव फुले और डॉ. अंबेडकर, क्योंकि वे ब्राह्मणवाद की गुलामी को ब्रिटिश साम्राज्यवाद से कमतर नहीं आँकते थे।

प्रेमचंद की कहानी “सवा सेर गेहूँ” का शंकर कुर्मी और “बाबा जी का भोग” का राजधन अहीर ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा नहीं, बल्कि वर्णाश्रमी ब्राह्मणवाद द्वारा उत्पीड़ित थे। कौन था “गोदान” का होरी? होरी कोई द्विज न होकर पिछड़े समुदाय की कुर्मी जाति का था। प्रेमचंद द्वारा पिछड़े समुदायों के पात्रों का यह चयन महज आकस्मिक न होकर उस सामंती वर्णाश्रमी सत्ता संरचना को अनावृत करने का परिणाम था, जो उनके शोषण के मूल में थी। प्रेमचंद अपने समूचे साहित्य में वर्णाश्रमी हिंदुत्व, उसकी जड़, मर्यादा एवं अतीतोन्मुखी महिमामंडन का प्रत्याख्यान करते हैं। यही कारण है कि प्रेमचंद के समकालीन ब्राह्मणवादी लेखकों ने उन्हें “घृणा का प्रचारक” कहा और आचार्य रामचंद्र शुक्ल सरीखे समालोचक ने उन्हें “समाज सुधारक” और “प्रोपेगैन्डिस्ट” करार देकर कमतर करने की कोशिश की।

प्रेमचंद की ही तर्ज पर कई और गैर-शूद्र और द्विज पृष्ठभूमि के लेखकों ने वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर किसान, दलित, स्त्री एवं अन्य मेहनतकश समुदायों को अपनी रचनात्मकता का विषय बनाया। निराला, राहुल सांकृत्यायन, पांडेय बेचन शर्मा “उग्र”, वृंदावन लाल वर्मा, नागार्जुन, रांगेय राघव और यशपाल सरीखे लेखक इनमें अग्रणी थे। मेहनतकश समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के ही चलते निराला लिख सके थे कि—

आज अमीरों की हवेली/किसानों की होगी पाठशाला
धोबी, पासी, चमार, तेली/खोलेंगे अंधेरे का ताला,
एक पाठ पढ़ेंगे, टाट बिछाओ

और इसी का परिणाम था कि निराला को “ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत” की यातना से गुजरना पड़ा था।

राहुल सांकृत्यायन ने अपने समूचे साहित्य में दलित और पिछड़ी जातियों के सामाजिक-आर्थिक शोषण का ऐतिहासिक व समसामयिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया। राहुल सांकृत्यायन का निष्कर्ष था कि “हिन्दुस्तान तो सबसे बड़े नरक में है, क्योंकि इसके ऊपर विलायती जोंकों की गुलामी भी है और अपनी भी।” सामाजिक गुलामी का विमर्श रचते हुए जहां उन्होंने अपनी कहानी “सतमी के बच्चे” में अहीर जाति की सतमी के अभावग्रस्त जीवन संघर्ष की यातना कथा कही है, वहीं “रेखा भगत” सरीखी कहानी में जमींदारों के नृशंस अत्याचार के विरुद्ध पिछड़े समुदाय की प्रतिरोधी चेतना का वृत्तांत भी रचा है। पिछड़े समुदाय में प्रतिरोधी चेतना की इस उपस्थिति का रेखांकन राहुल सांकृत्यायन की प्रतिबद्ध सामाजिक दृष्टि का ही परिणाम है। इसी दृष्टि के चलते वे “1857” के “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” के उस मिथक का भी भेदन कर सके थे जिसमें दलितों और पिछड़ों को उच्च जातियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने से रोका गया था। “कनैला की कथा” में -1857 की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है कि, “बड़ी जाति छोटी जाति वाले कैसे एक पांती में लड़ते?” जातिगत भेद का खुलासा करके राहुल सांकृत्यायन 1857 के “धर्मयुद्ध” की उस सत्ता-संरचना का विखंडन करते हैं जिसमें दलित व शूद्र जातियों की अपनी कोई निर्णायक भूमिका नहीं थी और जो अंतत: अँग्रेजी सत्ता व देशी कुलीन सामंती सत्ता के हितों की टकराहट का ही परिणाम था।

प्रेमचंद, निराला, और राहुल सांकृत्यायन की ही तर्ज पर पांडेय बेचन शर्मा “उग्र” और रांगेय राघव ने भी क्रमश: “बुधुवा की बेटी” और “गदला” जैसी कई कथा-रचनाएँ लिखकर हाशिए के समाज को साहित्यिक प्रमुखता प्रदान की। इस संदर्भ में नागार्जुन का उपन्यास “बलचनमा” तो एक समाजशास्त्रीय दस्तावेज सरीखा है। इस उपन्यास का मुख्य पात्र बालचंद्र (बलचनमा) जाति का गोप (अहीर) है। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि “बलचनमा” सहित उपरोक्त समूचा लेखन रेणु द्वारा “मैला आँचल” लिखे जाने के पूर्व किया जा चुका था।

विचारणीय यह है कि ओबीसी साहित्य की पूर्व-पीठिका क्या हो? ऐसा साहित्य जिसमें पिछड़ी कृषक जातियों, शिल्पकारों एवं मेहनतकश समुदाय के संघर्ष व प्रतिरोधी चेतना को अभिव्यक्त किया गया हो या कि वह साहित्य जो अनिवार्यत: पिछड़ों व शूद्र समुदाय व जाति के लेखकों द्वारा लिखा गया। यदि इस कसौटी पर भारतेंदु और मैथिलीशरण गुप्त सरीखे साहित्यकारों का आकलन किया जाए तो वे अपनी अंतिम परिणतियों में उस हिंदुत्व के पक्षधर और चातुर्वण्य के पोषक सिद्ध होते हैं जो पिछड़ों व मेहनतकश समुदाय के शोषण का आधार तैयार करता है। भारतेंदु जिन हिंदू परंपराओं और अतीत का उद्दात्तीकरण करते हुए भारत दुर्दशा की तलाश करते हैं, उसी का स्वभाविक परिणाम है कि मुस्लिम संप्रदाय की निंदा और दलितों एवं श्रमशील जातियों की उपेक्षा। भारतेदु द्वारा संपादित “हरिश्चंद्र मैगजीन” व “कवि वचन सुधा” के पृष्ठों पर दलित व पिछड़ों के प्रति दुराव व अभिजनवादी अभिव्यक्तियों की भरपूर बानगी देखी जा सकती है। वसुधा डालमिया ने अपनी पुस्तक “द नेशनलाइजेशन ऑफ हिंदू ट्रैडीशन्ज” में इसका विस्तृत विश्लेषण किया है।

यह वास्तव में विडंबनात्मक है कि जिन मैथिलीशरण गुप्त ने “भारत-भारती” में राष्ट्रप्रेम को हिंदुत्व का पर्याय मानते हुए चातुर्वण्य के ह्रास पर पर चिंता प्रकट की हो, उनमें ओबीसी साहित्य की परंपरा तलाशी जा रही है। इस संबंध में “भारत-भारती” की निम्न पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं :

ब्रह्म, राजन्यत्व, युत वैश्यत्व भी सब नष्ट है,
शूद्रत्व और पशुत्व ही अपशिष्ट है, हा! कष्ट है।

उनके हिंदुत्व में बौद्धों के पराभव के प्रति यह विजय भाव भी शामिल है।

यद्यपि सनातन धर्म की ही अंत में जय जय रही,
भगवान शंकर ने भगा दी बौद्ध भ्रान्ती भयावही

प्रश्न यह है कि बौद्ध धर्म को “भयावह भ्रान्ती” मानने वाले और वर्णाश्रम व्यवस्था के ह्रास पर रुदन करने वाले मैथिलीशरण गुप्त को मेहनतकश ओबीसी समुदाय की साहित्यिक विरासत का पुरोधा कैसे माना जा सकता है? ओबीसी साहित्य की सैद्धांतिकी गढ़ते हुए जिन्हें मानवतावादी धरातल पर जयशंकर प्रसाद की “कामायनी” ओबीसी साहित्य की कोटि में पांक्तेय नजर आती है, वे “गोदान” और “बलचनमा” सरीखी पिछड़े समुदाय की संघर्षगाथा को क्यों नजरअंदाज करते हैं?

जब प्रेमचंद ने “सौंदर्य की कसौटी” बदलने की बात कही थी तब वे हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को अभिजनवाद से मुक्त कर श्रम की चेतना को केंद्रीयता प्रदान करना चाहते थे। जाति और वर्ण से मक्त होकर साहित्यिक हस्तक्षेप करने का जो अभियान प्रेमचंद की पीढ़ी ने शुरू किया था, उसी का परिणाम था कि अशराफ सैय्यद कुलीन परिवार में जन्म लेकर भी राही मासूम रजा “आधा गांव” सरीखा उपन्यास लिख सके जिसमें हिंदू-मुसलमान दोनों ही संप्रदायों के जुलाहे और अहीर सरीखे पिछड़ों की प्राथमिकता थी।

मैत्रेयी पुष्पा, वीरेन्द्र जैन, अब्दुल बिस्मिल्लाह, संजीव, शिवमूर्ति, भगवानदास भोरवाल, चंद्रकिशोर जायसवाल, रामधारी सिंह दिवाकर आदि लेखक इसी परंपरा की सुदृढ़ कड़ी हैं। क्या मैत्रेयी पुष्पा के “इदन्नमम्” और वीरेन्द्र जैन के “डूब” सरीखे उपन्यासों की महज इसलिए अनदेखी की जानी चाहिए क्योंकि वे क्रमश: ब्राह्मण और जैन पृष्ठभूमि के लेखकों द्वारा लिखे गए हैं?

यहाँ यह भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि पिछड़े समाज की जातिगत पृष्ठभूमि के बावजूद संजीव, शिवमूर्ति, चंद्र किशोर जायसवाल, मधुकर सिंह, प्रेमकुमार मणि, भगवानदास भोरवाल, दिनेश कुशवाह, और सुभाषचंद्र कुशवाहा सरीखे लेखक हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के लेखक हैं। वे अपनी साहित्यिक अभियानों द्वारा मुख्यधारा के साहित्य को बहुजन समाज के प्रश्नों और संघर्षशील चेतना से समृद्ध कर रहे हैं। इन लेखकों को ओबीसी की कोटि तक सीमित करना हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को अभिजनवादी सरोकारों के आगे परोस देना है। जब साहित्य के कुलीन तंत्र द्वारा साहित्य के केंद्र से प्रेमचंद के “होरी” को बेदखल करके अज्ञेय के “शेखर” को स्थापित करने की तैयारी हो तो जाति के आधार पर किसी तरह का साहित्यिक विभाजन आत्मघाती और प्रतिगामी ही होगा।

किस तरह जाति साहित्य की निर्णायक कसौटी नहीं हो सकती हिंदी के शीर्षस्थ लेखक राजेन्द्र यादव इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। हाशिए के समाज और दलित विमर्श की पक्षधरता के बावजूद राजेन्द्र यादव की स्वयं की स्वीकारोक्ति है कि उनका समूचा कथा साहित्य मध्यवर्गीय सरोकारों से ओत-प्रोत है। एक समय में उन्होंने इसे अस्वीकार करने की बात भी कही थी। अब यदि जाति को ही साहित्य की कसौटी माना जाएगा तो क्या राजेन्द्र यादव के कथात्मक लेखन को ओबीसी लिटरेचर के रूप में स्थापित करने की कसरत उसी तरह नहीं करनी पड़ेगी, जिस तरह भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद को लेकर की जा रही है।

ओबीसी साहित्य को सैद्धांतिकी गढ़ने की कवायद करते हुए जिन्हें बनिया पृष्ठभूमि के कारण गाँधी की याद आती है, उन्हें यह न भूलना चाहिए कि गाँधी आजीवन वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक रहे और हिंदुत्व उनके चिंतन का प्रस्थानबिंदु रहा है। हाँ, इस संदर्भ में डॉ. राममनोहर लोहिया का स्मरण हो जाना स्वभाविक ही है, जिन्होंने पिछड़ों के राजनीतिक चिंतन को सकारात्मक दिशा प्रदान की। लेकिन यह वास्तव में विडंबनात्मक ही है कि जिन लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति को दिशा प्रदान की उन्हीं के साहित्यिक अनुयायियों ने “परिमल” जैसी साहित्यिक संस्था का गठन करके वामपंथ के विरोध के नाम पर साहित्य में कलावाद के दुर्ग को ही सुदृढ़ किया। यह अनायास नहीं है कि डॉ. धर्मवीर भारती, विजयदेव नारायण साही, डॉ. रघुवंश, केशवचंद्र वर्मा, डॉ. लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ. जगदीश गुप्त सरीखे लोहिया भक्त साहित्य में आजीवन अज्ञेय की खेमेबंदी करते रहे। अत: लोहियावाद के साहित्यिक संस्करण की ओबीसी साहित्य की सैद्धांतिकी निर्धारण में कोई कारगर भूमिका तलाश करना बहुजन साहित्य को नख-दंत विहीन ही करना है।

आज जरूरत है कबीर, फुले, पेरियार, अंबेडकर सरीखे सामाजिक चिंतकों के वर्णाश्रम और ब्राह्मणवाद विरोधी चिंतन एवं बहुजन समाज के संघर्ष, स्वप्न और आदर्श को साहित्य में केंद्रीयता प्रदान करने की, न कि जाति के आधार पर साहित्य का एक अलग कुनबा बनाने की। जब साहित्य की मुख्यधारा बहुजन समाज के सरोकारों से जुड़ने का जतन कर रही हो, तब “ओबीसी साहित्य” की किसी भी अवधारणा की न तो कोई आवश्यकता है और न ही औचित्य।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2012 अंक में प्रकाशित)


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लेखक के बारे में

वीरेंद्र यादव

लेखक हिंदी के प्रतिष्ठित वरिष्ठ आलोचक हैं

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