अपने लोगों से मुखातिब पत्रकार कांशीराम

यह पुस्तक ‘दि ऑप्रेस्ड इण्डियन’ के लिए कांशीराम द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए संपादकीय लेखों का हिंदी अनुवाद है, जिसे ‘मा. कांशीराम साहब के संपादकीय लेख’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इसकी भूमिका पूर्व कैबिनेट मंत्री दददू प्रसाद ने लिखी है। पुस्तक में कांशीराम के 77 संपादकीय लेख संकलित किए गए हैं

किसी भी आंदोलन या राजनीति को जानने के लिए सबसे अच्छा माध्यम उसके संस्थापक या मुखिया का रचनाकर्म ही होता है। इसके अंतर्गत, उसके द्वारा लिखे गए लेख, जनता के बीच दिए गए भाषण और मीडिया को दिए गए साक्षात्कार होते हैं। इस दृष्टि से, बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक व बहुजन नेता काशीं राम के सम्पादकीय लेखों का यह संग्रह बहुत महत्वपूर्ण है, जिसे एआर अकेला ने संपादित और विजेंद्र सिंह विक्रम ने अनूदित किया है। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि कांशीराम बहुजन राजनीति के साथ-साथ बहुजन-पत्रकारिता के भी उद्धारक थे। अस्सी के दशक में कांशीराम ने हिंदी में ‘बहुजन संगठक’ साप्ताहिक और अंग्रेजी में ‘दि ऑप्रेस्ड इण्डियन’नामक मासिक पत्रों का प्रकाशन आरंभ किया था। इन दोनों पत्रों के सम्पादक भी वे स्वयं थे।

यह पुस्तक ‘दि ऑप्रेस्ड इण्डियन’ के लिए कांशीराम द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए संपादकीय लेखों का हिंदी अनुवाद है, जिसे ‘मा. कांशीराम साहब के संपादकीय लेख’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इसकी भूमिका पूर्व कैबिनेट मंत्री दददू प्रसाद ने लिखी है। पुस्तक में कांशीराम के 77 संपादकीय लेख संकलित किए गए हैं। पहला लेख ‘समाचार सेवाओं की आवश्यकता’ पर है, जिसमें कांशीराम ने बहुत सही सवाल उठाया है कि जातिवादी बाह्मणवादी प्रेस, दलित और शोषित समाज के समाचारों को ब्लैकआउट करता है। वे इस लेख में लिखते हैं कि इसलिए डा. आम्बेडकर ने निजी समाचार सेवा के महत्व को समझ कर 1920 में ‘मूकनायक’, 1927 में ‘बहिष्कृत भारत’, 1930 में ‘जनता’ और 1955 में ‘प्रबुद्ध भारत’ नाम से समाचारपत्र निकाले थे। लेख में ‘दि आप्रेस्ड इण्डियन’ पत्रिका की शुरुआत के संबंध में लिखा है, ‘आवश्यकता और अवसर, दोनों से हमें चुनौती स्वीकार करने की प्रेरणा मिली है तथा समाचार सेवा के क्षेत्र में कूदने की तैयारी है।’ वे अंत में लिखते हैं, अगले दो सालों में देश के कोने-कोने में समाचार सेवा का विस्तार हो जाएगा।’ हालांकि कांशीराम के समय में ही उनके दोनों पत्रों का प्रकाशन बंद हो गया था, पर यह सच है कि आज देश के कोने-कोने से दलितों और शोषितों के अखबार और पत्रिकाएंं प्रकाशित हो रही हैं।

अप्रैल, 1979 के अंक में उन्होंने आंबेडकरवाद पर प्रकाश डाला है। ‘क्या आंबेडकरवाद पुनर्जीवित तथा दीर्घजीवी होगा?’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं, ‘जो मिशन कभी बाबा साहब के समय में उच्च प्रतिष्ठा को प्राप्त था, वही आज हास्यास्पद स्थिति में नजर आता है।’ इसका कारण वे यह बताते हैं कि जो आरपीआई बाबा साहब ने बनायी थी, वह आठ गुटों में बंटी हुई है और दलित पैंथर के भी छह गुट हैं। वे सवाल उठाते हैं कि इस तरह आंबेडकरवाद कैसे पुनर्जीवित हो सकता है? यह संपादकीय कांशीराम ने तब लिखा था जब बहुजन समाज पार्टी का निर्माण नहीं हुआ था और वे सिर्फ बामसेफ चलाते थे। इसलिए इस लेख में वे इस बात पर जोर देते हैं कि आंबेडकर के मिशन को पूरा करने की जिम्मेदारी बामसेफ ने ली है। इसी अंक में एक टिप्पणी कांशीराम ने धर्मांतरण-विरोधी बिल पर भी की है, जो ओपी त्यागी द्वारा 1979 में संसद में प्रस्तुत किया गया था। इस बिल का मकसद ईसाई मिशनरियों को दलित-आदिवासियों का धर्मांतरण करने से रोकना था। लेकिन कांशीराम लिखते हैं कि इस बिल का विरोध सबसे पहले बौद्धों को करना चाहिए था, क्योंकि, उनके अनुसार, ‘बिल बौद्धों के हितों के ज्यादा विरुद्ध था, बजाय ईसाइयों के, क्योंकि ईसाइयों ने कभी विशाल पैमाने पर धर्मपरिवर्तन नहीं किया।’ वे इसका कारण यह बताते हैं कि ‘आंबेडकररवाद की चहूंं ओर असफलता के कारण धर्मपरिवर्तन को भी झटका लगा। यह गतिरोध इतना बड़ा था कि डा. आंबेडकर के कथित अनुयायियों की ओर से त्यागी बिल का कोई विरोध नहीं हुआ।’


‘दि आप्रेस्ड इण्डियन’ के लगभग सभी संपादकीय लेख, यद्यपि बामसेफ के कार्यक्रमों, नीतियों और गतिविधियों के संबंध में ही सूचना देते हैं पर उनसे यह भी पता चलता है कि वे डा. आंबेडकर के राजनीतिक आंदोलन से किस तरह अपना साम्य बनाते हुए अपनी भावी राजनीति तय कर रहे थे। सबसे पहले उन्होंने धन की आवश्यकता के लिए आंबेडकर मिशन को आधार बनाया। उन्होंने अप्रैल, 1979 के संपादकीय में लिखा-’40 सालों का लम्बा आंदोलन, जो कई मोर्चों पर लड़ा गया, के लिए करोड़ों रुपयों की जरूरत रही होगी। डा. आंबेडकर ने आंदोलन पर अपनी पकड़ ढीली किए बिना तथा आंदोलन की मिशनरी भावना को बनाए रखते हुए, करोड़ों रुपये जुटाए। लेकिन उनके अनुयायी उनसे बहुत कम भी नहीं जुटा पाए तथा इस प्रक्रिया में वे मिशनरी से मर्सीनरी (भाड़े के लोग) बन गए। इस महत्वपूर्ण पहलू को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए जो चाहते हैं कि आंबेडकरवाद पुनर्जीवित हो, उनको स्वयं के साधनों से करोड़ों रुपये जुटाने होंगे।’ और सब जानते हैं कि कांशीराम ने अपने आंदोलन के लिए करोड़ों रुपये जुटाए।

बामसेफ गैर-संघर्षात्मक संगठन इसलिए था, क्योंकि वह सरकारी कर्मचारियों का संगठन था। लेकिन संघर्ष के बिना कांशीराम का जमीनी आधार नहीं बन सकता था। इसलिए 1981 में ही उन्होंने ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ (डीएस-4) का गठन किया । डीएस-4 का पहला राजनीतिक प्रयोग हरियाणा राज्य में किया गया। इसका खुलासा और आवश्यक विवरण देते हुए वे जून, 1982 के संपादकीय में लिखते हैं, ‘हमारे हरियाणा के प्रयोग ने हमें अपने सिद्धांतों को व्यवहार में लाने का अवसर प्रदान किया। अब हरियाणा में इस प्रयोग के बाद हम बहुत आशावादी हैं और पक्की तरह से महसूस करते हैं कि डीएस-4, दलित शोषित समाज को 30 जून, 1983 से पहले राष्ट्रीय स्तर की पार्टी देने में समर्थ हो सकेगा।’


कांशीराम ने अपने संपादकीय लेखों में इतिहास पर भी चर्चा की है और वर्तमान स्थिति पर चिंता भी व्यक्त की है। जुलाई, 1982 के संपादकीय में उन्होंने पश्चिम बंगाल के ”नमोशूद्रा” आंदोलन पर विचार किया है, जो बीसवीं सदी के आरम्भ में वहां एक जनांदोलन बन गया था। वे बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं और वह यह कि भारत में अंग्रेजों के देश छोडऩे से पहले नमोशूद्रा आंदोलन अपने चरम पर था। यह इतना बड़ा आंदोलन था कि बंगाल के नमोशूद्रा लोगों ने बाबा साहब आंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचा कर, पीडि़त और शोषितों के प्रति अपनी पूरी निष्ठा का परिचय दिया था। किंतु कांशीराम उसकी वर्तमान दशा का भी बहुत सही आकलन करते हैं। वे लिखते हैं, बंगाल के विभाजन ने नमोशूद्रा आंदोलन को भी विभाजित कर दिया, जिससे आज नमोशूद्रा लोग जड़विहीन हैं। उनकी जड़ें बंाग्लादेश में हैं और शाखाएं भारत में हैं। वे सही सवाल उठाते हैं कि अवश्य ही इस विभाजन ने उनका बड़ा नुकसान किया है, पर उसके लिए वे कब तक रोते रहेंगे? वे स्वयं उत्तर भी देते हैं कि नमोशूद्रा लोगों को अपना आंदोलन पुन: खड़ा करना चाहिए। यह पूरा अंक नमोशूद्रा लोगों की समस्याओं और उनके आंदोलन पर केद्रित है और इसीलिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी है।

अक्टूबर, 1982 के अंक में कांशीराम ने महाराष्ट्र के दलित पैंथर की आलोचना की है और उन्हें ‘पुरुष वेश्या’ कहा है। उनकी सूचना चौंका देने वाली है। वे लिखते हैं, ‘पूना में मुझे यह देखकर सदमा लगा कि महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स आंदोलन के विफल होने के बाद इनमें से कुछ ने कच्ची शराबखोरी शुरू कर दी है, जुए और सट्टे के अड्डे लगाने शुरू कर दिए हैं।’ यहां तक कि उन्होंने ‘वेश्याओं की दलाली और गैर वेश्यावृत्ति वाले इलाकों में पुलिस को हफ्ता देकर औरतें भिजवाना शुरू कर दिया है। इस प्रकार वे पूरी तरह पुलिस की गिरफ्त में हैं। अब यह समाज की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे पैंथर्स से कैसे निपटे? जहां तक मेरा सवाल है, मेरा यह कहना है कि ऐसे पुरुष वेश्याओं से सावधान, जो स्वयं को दलित पैंथर्स कहते हैं।’ दलित पैंथर पर उनकी यह कटु टिप्पणी बताती है कि महाराष्ट्र में दलित पैंथर कांशीराम के मार्ग में एक बड़ी बाधा बन गया था।

मार्च, 1983 के अंक में कांशीराम, बाबू जगजीवन राम के बारे में लिखते हैं कि चुनाव लडऩे के सिवा उनका कोई दूसरा उद्देश्य नहीं है तो नवंबर, 1983 के अंक में वे पिछड़े वर्ग के लोगों में राजनीतिक चेतना उभारते हैं।

कांशीराम ने 6 दिसंबर, 1983 से साइकिल मार्च और जनसभाओं केमाध्यम से सामाजिक कार्यवाही यात्रा शुरू की थी, जो कन्याकुमारी, कारगिल, कोहिमा, पुरी और पोरबंदर से आरंभ हुई और 15 मार्च, 1984 को बोट क्लब, दिल्ली में एक विशाल रैली के रूप में इसका समापन हुआ। मार्च और अप्रैल, 1984 के अंकों में कांशीराम ने इस पर विशेष संपादकीय लिखे हैं, जो उनके राजनीतिक विकास को समझने में मदद करते हैं। इस यात्रा के बाद ही कांशीराम ने 14 अप्रैल, 1984 को ‘बहुजन समाज पार्टी’ का निर्माण किया और अगले पांच महीने तक ‘दि ऑप्रेस्ड इण्डियन’ का प्रकाशन बंद रहा। अक्टूबर, 1984 के अंक में कांशीराम ने इस पर ‘हम क्षमाप्रार्थी हैं’ शीर्षक से संपादकीय लिखा है, जिसमें वे अब तक की सामाजिक गतिविधियों का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत करते हैं। इसके बाद, जून, 86 तक के संपादकीय लेख पुस्तक में मिलते हैं, जिसे उसका अंतिम अंक माना जा सकता है। इनमें एक लेख में कांशीराम ने अपनी इंग्लैंड यात्रा का वर्णन किया है, जो जुलाई, 1985 के अंक में है। इंग्लैंड में कांशीराम को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, उसका बहुत ही बेबाक वर्णन इस लेख में मिलता है। कांशीराम के समय और उनकी सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों को जानने के लिए ही नहीं बल्कि उनकी पत्रकारिता से परिचित होने के लिए भी उनके संपादकीय लेखों का यह संग्रह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की हैसियत रखता है, जो पठनीय और संग्रहणीय है।

मा. कांशीराम साहब के संपादकीय लेख

संपादक : एआर अकेला

अनुवादक – विजेन्द्र सिंह विक्रम

प्रकाशक – आनंद साहित्य सदन,

सिद्धार्थ मार्ग, अलीगढ़ छावनी, उत्तर प्रदेश

फोन : 09319324963

(फारवर्ड प्रेस के मार्च 2013 अंक में प्रकाशित)


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