दलित लेखिकाओं ने साहित्य को आंदोलन से जोड़ा : मोहनदास नैमिशराय

मेरी राय में आज दलित साहित्य की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। कल तक जो दुख-दर्द, यातना का इतिहास था, आज उससे संघर्ष भी जुड़ गया है। खेतों में काम करनेवाली महिला पढऩे-लिखने के साथ आंदोलन से भी जुड़ गई हैं। वह संघर्ष करना सीख गई हैं। इसी कारण द्विज समाज में भयानक किस्म की प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। वह उन्मादी हो गया है

जोतिबा फूले से पूर्व सामाजिक परिवर्तन की धारा दुविधापूर्ण परिस्थितियों के बीच अनगिनत अवरोधों के कारण रुक-रुक कर आगे बढती थी। ऐसा हमें इतिहास बताता है और बताती हैं महापुरुषों के द्वारा दर्ज की हुई टिप्पणियां। जोतिबा फूले के साथ सावित्रीबाई फूले और यहां तक पंडित रमाबाई आदि को भी परम्परावादियों से दो-दो हाथ करने होते थे। ब्राह्मणवाद का सबसे नकारात्मक पहलू तो यही है कि स्वयं ब्राह्मणों ने अपने निकट के सगे-संबंधियों को, पड़ोसियों तथा मित्रों तक को नहीं छोड़ा। स्वयं उनके घर में रह रहीं, चाहे वह उनकी बेटी हों, बहिन हों या फिर मां हों। रिश्तों का कोई लिहाज नहीं। धार्मिक ग्रंथों में दर्ज महिलाओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियां तक मिल जाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में परिवर्तन को नवजागरण के नाम से भी पुकारा गया है। पर कैसा परिवर्तन, द्विजों के द्वारा शुरू किए गए परिवर्तन का क्या विशेष उद्देश्य रहा, ये सब जगजाहिर हो चुका है। चाहे वह परमहंस समाज के द्वारा किए गए कुछ छिटपुट कार्य हों या फिर ब्रह्म समाज का समाज परिवर्तन के बारे में उनका अपना दर्शन हो। तथाकथित प्रगतिशील विचारों के रईस, जमींदार, नवाब आदि परिवर्तन की बात करते हुए मूर्तिपूजा, कर्मकांड तथा पाखंडवाद को छोडऩे के लिए तैयार न थे।

ऐसे दौर में दलित साहित्य का उद्भव हुआ और विकास की धाराओं से गुजरते हुए आगे का मार्ग प्रशस्त हुआ। आजादी के बाद उसमें बहुत कुछ जुड़ा। नए शब्द जुड़े। नया सौंदर्य भाव आया। नई पद्धति प्रयोग में आई। नई शैली में अपनी बात कहने-लिखने की चुनौती दलित साहित्यकारों ने स्वीकार की। आज स्थिति यह है कि नामवर सिंह जैसे वरिष्ठ आलोचक दलित साहित्य को स्वीकार करने लगे हैं। मैनेजर पांडे तो बहुत पहले ही दलित साहित्य से सहमत हो गए थे। उनसे पूर्व शीर्ष कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने तो दलित लेखन से सहमत होते हुए सामाजिक परिवर्तन को स्वीकार कर हंस के माध्यम से दलित विमर्श के झंडे गाड़ ही दिए थे। उन्हीं के समानांतर महीप सिंह भी दलित साहित्य और आंदोलन की अस्मिता को स्वीकारने में पीछे न रहे। उन्होंने संचेतना का दलित विशेषांक भी प्रकाशित किया। कमलेश्वर ने भी बहुत पहले सारिका जैसी पत्रिका का दलित साहित्य विशेषांक छापा था। उन्होंने न सिर्फ सारिका का विशेषांक छापा, बल्कि दलित और गैर-दलित समाज में जो लम्बे समय से साहित्यिक स्तर पर संवादहीनता थी, उसे दूर कर संवाद स्थापित किया, जिससे दलित विमर्श पर सम्मलेन तथा गोष्ठियों में तेजी आई। कहना न होगा कि सामाजिक न्याय की जो धारा तथागत बुद्ध से आरंभ हुई और उसे जोतिबा फूले, सावित्रीबाई फूले ने सिंचित और विकसित करने में मदद की, उसे और आगे, यहां तक लाने में बाबा साहेब आम्बेडकर ने दलित साहित्यकारों की पहली पीढ़ी को जो तेवर दिए तथा उनमें उनकी अस्मिता हेतु जो आक्रोश भरा, निश्चित रूप से वही साहित्य आज युग परिवर्तनकारी साबित हुआ।

द्विजों की सारी श्रेष्ठता धरी रह गई। उनकी महान परंपरा को दलित साहित्यकारों ने ठोकर मारकर नई पीढ़ी के लिए अपना मार्ग स्वयं ही प्रशस्त किया। अंधेरा छंटा, उजाला आया। मूकनायक जननायक बनने लगा। उसकी हुंकार गांव-कस्बों से लेकर महानगरों तक में गूंजने लगी। कहने का तात्पर्य यह है कि दलित साहित्य सिर्फ साहित्य नहीं रहा, बल्कि एक जबरदस्त आंदोलन बन गया। विशेष रूप से दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक जमात की महिलाओं ने अपने अधिकारों के प्रति लडऩे की हिम्मत जुटाई, जिसके लिए बहुत पहले जोतिबा फूले तथा आम्बेडकर ने आह्वान किया था। वो साहित्य सृजन से जुड़ीं। वो आंदोलनों में शामिल हुईं और समाज को बदलने में उन्होंने अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई। मेरी राय में ये सब कुछ बाबा साहेब आम्बेडकर की प्रेरणा से हुआ।


बकौल मैनेजर पांडे आत्मकथाएं वे व्यक्ति लिखते हैं, जिनको समाज में अपने महत्वपूर्ण होने का बोध होता है या कभी-कभी महत्वपूर्ण होने का भ्रम होता है, क्योंकि जो महत्वपूर्ण होता है, उसी की जिंदगी में दूसरों की दिलचस्पी होती है। पीडि़त समुदायों में आत्मकथा-लेखन उसके भीतर के शोषणकारी तत्वों को जानने तथा पहचानने के बेहतर समाजशास्त्रीय दस्तावेज हो सकते हैं। आत्मकथा में व्यक्ति छिपाए जाने वाले तथ्यों को भी उजागर करता है। उसके लिए हिम्मत की जरूरत होती है, क्योंकि भारतीय मानसिकता सच कहने पर प्रतिबंध लगाती है। हिन्दुओं के सामाजिक ढांचे में भी वैयक्तिकता की बहुत कम कीमत है।

आत्मकथा केवल आपबीती होती है। स्त्री एवं दलितों की आत्मकथाएं सामान्य आत्मकथाओं से भिन्न हाशिये पर पड़े लोगों की आत्मकथाएं हैं। राजेंद्र यादव के अनुसार, आत्मकथाएं समाज और परिवार की उन भीतरी सच्चाइयों से साक्षात्कार हैं, जिसकी चुभन जूते की कील की तरह सिर्फ पहनने वाला ही जानता है।

सिर्फ दलित या पिछड़ी जाति के साहित्य का उल्लेख ही अगर हम करें तो उनमें कौसल्या बैसंत्री की आत्मकथा दोहरा अभिशाप, सुशीला टाकभौरे का शिकंजे का दर्द, बेबी हालदार की आलो-आंधारी, रमणिका गुप्ता की हादसे, या फिर बेबी काम्बले की आत्मकथा है। आत्मकथाओं के बहाने सामाजिक परिवर्तन का परचम हाथ में लिए रजनी तिलक जैसी तेज-तर्रार महिलाएं भी आईं। उन्होंने सावित्री बाई फूले जैसी सशक्त महिला को उत्तरी भारत के पाठकों से परिचित कराया। उन पर कुछ किताबें भी आईं। उनके अलावा हेमलता महिश्वर ने कहानियों के साथ ही अपने आलेखों के द्वारा दलित एवं महिला विमर्श में दस्तक दी। रजतरानी मीनू लम्बे समय से कविताएं और कहानियां लिख रही हैं। देखा जाए तो दलित साहित्य में स्वयं उत्तरी भारत की दलित महिलाओं ने अच्छा-खासा योगदान किया है और दलित साहित्य को आंदोलन से जोड़ा है।

निश्चित ही दलित साहित्य और आंदोलन के लिए उनमें प्रतिबद्धता आई। साथ ही घरों में रखे देवी-देवताओं के प्रति उदासीनता का भाव भी। उनका विश्वास खंड-खंड हुआ। बाबूलाल मधुकर इसी विश्वास के खिलाफ विद्रोह करते हैं..तुम्हारी अर्चना कर सकूं/ तुम्हारी वंदना कर सकूं/ ऐसा कोई विश्वास तो तुमने दिया नहीं/ हमारे श्रम के पुण्यकाल पर/ कुंडली मारकर बैठने के सिवा/ किया ही क्या है तुमने।

1931 की जनगणना का हवाला देते हुए बाबा साहेब आम्बेडकर कहते हैं कि भारतीय आदिवासियों की संख्या 25 दसलक्ष है। गुनाहगार जमात की संख्या साढ़े चार लाख है। हिन्दू समाज में इनका कौन-सा स्थान है। सबसे अधिक तो शोषित यही वर्ग है। बाबा साहेब के बाद ऐसे सवाल दलित साहित्यकार पूछने लगे हैं। सबसे बड़ा सकारात्मक परिवर्तन तो यह हुआ कि हाशिये के सभी वर्ग, जाति, उपजातियों द्वारा केंद्र में आने का प्रयास करना। साथ ही उनके बीच संबंध का बनना। चाहे वो संबंध दलित, आदिवासी का हुआ या दलित पिछड़ों का। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि देशभर के विभिन्न भाषा-भाषी दलित लेखकों, साहित्यकारोंं, पत्रकारों तथा समीक्षकों को दलित साहित्य ने जोड़ा है। वे दलित इतिहास तथा अस्मिता के लिए एक मंच पर आए हैं। कहना न होगा कि आज दलित समाज मानवीय अधिकारों तथा सामाजिक प्रतिष्ठा का हकदार बना बैठा है। आम्बेडकर यही तो चाहते थे।

मेरी राय में आज दलित साहित्य की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। कल तक जो दुख-दर्द, यातना का इतिहास था, आज उससे संघर्ष भी जुड़ गया है। खेतों में काम करनेवाली महिला पढऩे-लिखने के साथ आंदोलन से भी जुड़ गई हैं। वह संघर्ष करना सीख गई हैं। इसी कारण द्विज समाज में भयानक किस्म की प्रतिक्रिया शुरू हो गई है। वह उन्मादी हो गया है। उसके संस्कार फिर से उभरने लगे हैं। महिलाओं पर शिकंजा कसा जाने लगा है। दलितों के अंदर आई जागरुकता उससे बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। गांव-कस्बों में तो नाकेबंदी कर दी गई है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि द्विज समाज के लोग इस तरह का सामाजिक परिवर्तन कतई नहीं चाहते। अत: वे दलितों के खिलाफ लामबंद हो गए हैं।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित)


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