सर्वहारा के केंद्र में ओबीसी साहित्य

सर्वहारा के साथ बहुजन शब्द जोडऩा मैं उचित समझता हूं, क्योंकि ‘पूंजी’ ही भारतीय समाज में सब कुछ नहीं है। इसके अलावा भी कुछ है, जिसका विरोध जरूरी है, जिन्हें यह दृष्टि नहीं है, वह न तो मार्क्सवादी आलोचना को समझ सकता है और न ही बहुजन साहित्य को

ऐसे सर्वहारा शब्द का अधिकतर इस्तेमाल कम्युनिज्म की भाषा में प्रोलेतेरियत के पर्यायवाची रूप में होता आया है, जिसका अर्थ होता है, जिसके पास शरीर को छोड़कर कुछ नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में सवाल यह उठता है कि भारत में प्रोलेतेरियत कौन हैं? और इसका साहित्य क्या है?

कुछ लोग भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े लोगों द्वारा रचित साहित्य को ही सर्वहारा का साहित्य घोषित कर देते हैं। चाहे वे सवर्ण हों या अवर्ण। यह निश्चित ही गलत है। नरेन्द्र प्रताप सिंह अपनी पुस्तक शिक्षा दर्शन में मार्क्सवादी दृष्टिकोण को पारिभाषित श्रम की महिमा प्रतिपादित करते हैं और समाज के विपन्न वर्ग पर विशेष ध्यान देते हुए श्रम की महत्ता को सर्वोपरि स्थान देते हैं। अर्थात् मार्क्स की नजर में श्रम का बड़ा महत्व है जो निश्चित ही श्रमशीलों से होगा। जाति की संरचना पर आधारित भारत में श्रमशील जातियों से भी। मार्क्स का सिद्धांत उन लोगों के हकों की वकालत करता है, जिन्होंने श्रम की बदौलत विकास को गति दिया हो। फिर यहीं पर दूसरा सवाल पैदा होता है कि क्या मनुवादी ब्राह्मणों द्वारा रचित साहित्य ने समाज के विकास को गति प्रदान किया है ? या उसकी राह का रोड़ा बनकर समाज की गति को बाधित करने का काम किया है? फिर उनका साहित्य आमजन का साहित्य क्यों और कैसे होगा? वेद-पुराण से लेकर मनुस्मृति तक का साहित्य कैसा और किसका साहित्य है ? यह छानबीन का सवाल है। यह सर्वविदित है कि पुरोहित-ब्राह्मण भारत में सामंतों को राज करने के लिए समाज में भूमि तैयार करते आए हैं और कुछ नहीं। ताकि जनता-आसामी-रैयत-रैयान का ध्यान सत्ता की ओर न जाए, बल्कि उनका ध्यान भगवान-देवी-देवताओं में उलझकर रह जाए। इसके लिए वे सत्यनारायण भगवान कथा से लेकर स्वर्ग-नरक की परिकल्पना तक करते हैं और उसे समाज में स्थापित करते रहे। भैरव प्रसाद गुप्त का उपन्यास ‘अक्षरों के आगे’ और सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. ललन प्रसाद सिंह की पुस्तक ‘प्रगतिवादी आलोचना : विविध प्रसंग’ इसका विश्लेषण बारीकी से करती हैं। ऐसे समय में जब दुश्मनों का साहित्य (गैर लोकतांत्रिक साहित्य) विभिन्न तरह के नकाब पहनकर अपना असल चेहरा छुपाकर आमजन-सर्वहारा (पिछड़ा, दलित) को अपने मकसद से डायवर्ट कर रहा है, उनकी पहचान करना तथा दलित-पिछड़े-आदिवासी लोगों को यह बताना जरूरी बन आता है कि यह तुम्हारा साहित्य नहीं है। तुम्हारा तो साहित्य ओबीसी साहित्य है, दलित साहित्य है और आदिवासी साहित्य है या एक शब्द में कहूं तो बहुजन साहित्य है। ऐसे में प्रेम कुमार मणि का आलेख ‘हनुमान और शंबूक’ की याद स्वत: हो आती है, जो हमारी स्थिति तय करती है कि हम सर्वहारा बहुजन को कहां रहना चाहिए। ओबीसी साहित्यकार इंदिरा दांगी की कहानी ‘व्यवस्था बाइज्जत बरी है’ हनुमान भक्तों को नया जीवन प्रदान करने वाली सशक्त कहानी है। बजरंग बिहारी तिवारी ने डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह को ‘ओबीसी साहित्य’ का मान्य सिद्धांतकार बताया है। इनका हिन्दी साहित्य का सबाल्टर्न इतिहास पूरे सर्वहारा बहुजन को गाइड करने वाला साहित्य इतिहास है। जो दलित-पिछड़े रचनाकारों को अपने साहित्येतिहास में उचित स्थान देता है, साथ ही अपनी भूमि की पहचान भी कराता है।

‘आलोचना संदर्भ मार्क्सवाद’ डा. ललन प्रसाद सिंह की एक गंभीर आलोचना पुस्तक है। यह पुस्तक मार्क्सवादी आलोचना धारा में ‘सामाजिक न्याय’ की न सिर्फ मांग करती है, बल्कि उसे दलित-पिछड़ों को हर क्षेत्र में उस न्याय के लिए लामबंद होने की जरूरत को महसूस करता है। ओबीसी साहित्य आज विमर्श के मुख्य केन्द्र में है। यह मुख्यधारा का साहित्य है, क्योंकि यह भारत की बहुजन समाज की समस्याओं को अपनी रचना की आत्मा के रूप में स्वीकार करता है। साथ ही वैसे रचनाकारों को जो अच्छा रचने के बावजूद भी व्यापक चर्चा व साहित्यिक केन्द्र में विस्थापित इसलिए कर दिए गए, क्योंकि वे जाति के शोषित वर्ग से संबंध रखते थे या जिनके साहित्य में शोषित-सर्वहारा-बहुजन की पीड़ा मुखर हुई हो। ओडिया के सुप्रसिद्ध मल्ल साहित्यकार फकीर मोहन सेनापति और संस्कृत के महान कुशवाहा रचनाकार ब्रजनंदन वर्मा ऐसे ही रचनाकार लेखक हैं। ‘ओबीसी साहित्य’ ऐसे रचनाकारों की रचना-दृष्टि व मोतियों-से विचार की बदौलत स्वयं को खड़ा कर पाया है। और न जाने और कितने रचनाकार हैं, जो आज रचना के क्षेत्र में उपेक्षित हैं। यह कम आश्चर्यजनक नहीं है। फणीश्वरनाथ रेणु, अनूप लाल मंडल, राजेंद्र यादव, मधुकर सिंह, चंद्रकिशोर जायसवाल, संजीव, शिवमूर्ति, रामधारी सिंह दिवाकर और प्रेमकुमार मणि ओबीसी के स्तंभ रचनाकार हैं।


इधर जब से हिन्दी साहित्य धारा के एक रूप में ‘ओबीसी साहित्य’ विमर्श शुरू हुआ है, कुछ सवर्णवादी सोच के साहित्यकार इसे ‘गंदगी’ के रूप में देखने लगे हैं। उनका मानना है कि जिस तरह राजनीति को आरक्षण ने गंदा बना दिया है, उसी तरह यह विमर्श भी साहित्य को गंदा बना देगा। कम से कम इससे तो हिन्दी साहित्य बचे। साफ बात तो यह है कि जिस तरह राजनीति में दलित-पिछड़ों की उपस्थिति उन्हें हमेशा से नापसंद रही है, ठीक उसी तरह साहित्य में इनकी उपस्थिति नहीं देखना चाहते, क्योंकि वे हमेशा एकछत्र राज सभी क्षेत्रों में चाहते हैं। राजेन्द्र यादव ने जब ‘हंस’ के माध्यम से दलित-स्त्री विमर्श शुरू किए तो इन्हीं तथाकथित सवर्णों को दलितों-स्त्रियों को बोलना अच्छा नहीं लगा था। भला जो झाडू़-बुहारन और जी-हजूरी करता था, वही इनके सामने बोलना-लिखना सीख जाए तो इन्हें बर्दाश्त कैसे हो?

मुझे खुशी इस बात की हो रही है कि पिछड़े वर्ग के कुछ रचनाकार स्वयं को ओबीसी साहित्यकार के रूप में बता रहे हैं। पर, दुख इस बात को लेकर भी है कि स्वयं को ‘सवर्ण’ भी कुछ लोग नहीं कहेंगे और ओबीसी दलित की पंगत में भी बैठने को प्रत्यक्ष तैयार नहीं होंगे। कौशलेंद्र प्रताप यादव ने इन्हें ‘मजामारू’ तबका कहा था। जयप्रकाश कर्दम ने यह बात ठीक ही कहा था कि ओबीसी के अधिकतर साहित्यकार सवर्णों के पिछलग्गू नहीं होते तो कब के आगे निकल गए होते।


सर्वहारा के साथ बहुजन शब्द जोडऩा मैं उचित समझता हूं, क्योंकि ‘पूंजी’ ही भारतीय समाज में सब कुछ नहीं है। इसके अलावा भी कुछ है, जिसका विरोध जरूरी है, जिन्हें यह दृष्टि नहीं है, वह न तो मार्क्सवादी आलोचना को समझ सकता है और न ही बहुजन साहित्य को। सवर्णवादी मानसिकता वाले लोगों ने सचमुच में मार्क्सवादी आलोचना को भारत में बेईमानी बना दिए हैं, जिसका खुलासा राजेन्द्र प्रसाद सिंह कर रहे हैं। बातचीत के दौरान मार्क्सवादी आलोचक डा. ललन प्रसाद सिंह ने ‘मार्क्सवाद फैशन की चीज’ की ओर इशारा किया था, जो निश्चित ही छद्म सवर्ण मार्क्सवादियों की ओर था। वरना, भारत की सत्ता कब की दलित-पिछड़े-सर्वहारा बहुजनों के हाथ में होती। आज ओबीसी साहित्य उस मुहाने पर खड़ा है, जहां से भारतीय समाज का सच स्पष्ट नजर आएगा। प्रेम कुमार मणि का उपन्यास ‘ढलान’ हो या राजेन्द्र यादव का ‘सारा आकाश’ वे भारत की जटिल सामाजिक संरचना को उभारकर सामने रख देते हैं। पात्र, घटनाएं और परिवेश ‘सारा आकाश’ को निम्न मध्यवर्गीय समाज के साथ ‘ओबीसी साहित्य’ के नजदीक लाकर खड़ा कर देता है।

ओबीसी साहित्य को समझने के लिए बुद्ध और मार्क्स दोनों दृष्टियों का एक साथ होना जरूरी है। वरना इसके अभाव में ओबीसी साहित्य को समझना अति कठिन है। ‘जनपथ’ के कई लेखों में प्रेमचंद की परंपरा के कहानीकार मधुकर सिंह ने अपना दर्द ब्यान किया है और चंद्रकिशोर जायसवाल की कई कहानियां इस सत्य को उजागर करने में सक्षम साबित हुई हैं। ‘ओबीसी साहित्य’ इन प्रगतिवादी दृष्टियों व बहुजन दर्शन का कर्जदार है।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2013 अंक में प्रकाशित)

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