रीमेक फिल्में : वो बात कहां

रीमेक फिल्में अपनी मूल फिल्मों से कमतर होती हैं इस बात को नियम की तरह कहा जा सकता है। पर जैसा कि नियम है कि हर नियम के कुछ अपवाद होते हैं, वैसा यहां भी है। फिल्मों के रीमेक बनाने की शुरुआत भारतीय सिनेमा के जन्म के चंद वर्ष बाद ही हो गई थी

कहते हैं कि इतिहास पहली बार अपने आप को त्रासदी और दूसरी बार स्वांग के रूप में दोहराता है। यह बात अपने संपूर्ण और नग्न अर्थ में एक दौर की महान और अच्छी फिल्मों और उनकी रीमेक फिल्मों पर लागू होती है। पिछले कुछ सालों में बनीं पुरानी फिल्मों के रीमेक ने हमें यह मानने पर लगभग मजबूर-सा कर दिया है। साजिद खान की ‘हिम्मतवाला’ और फिर डेविड धवन की ‘चश्मेबद्दूर’ जिस तरह से बनी और फिर प्रदर्शित हुई, अगर हिन्दुस्तान में जागरूक दर्शक समूह और सचेत फिल्म समाज होता तो वह पुरानी क्लासिकल फिल्मों के रीमेक बनाने पर प्रतिबंध की मांग नहीं भी तो, कम-से-कम रीमेक बनाने के संबंध में कुछ नीति-निर्देश, कुछ संहिता और बनाने वाले फिल्मकार से न्यूनतम फिल्मी संवेदनशीलता और अर्हता की मांग जरूर करता। पर कवि शमशेर बहादुर सिंह कह गए हैं न, जो नहीं है उसका क्या गम? जैसे कि समझदारी! तो बात वहीं घुमा-फिराकर चली जाती है।

रीमेक फिल्में अपनी मूल फिल्मों से कमतर होती हैं इस बात को नियम की तरह कहा जा सकता है। पर जैसा कि नियम है कि हर नियम के कुछ अपवाद होते हैं,  वैसा यहां भी है। फिल्मों के रीमेक बनाने की शुरुआत भारतीय सिनेमा के जन्म के चंद वर्ष बाद ही हो गई थी। जब दादा साहब फाल्के ने 1913 में बनाई पहली भारतीय फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ को सिर्फ चार साल बाद ही फिर से बनाया था। हिंदी सिनेमा के इतिहास को पलटकर देखने पर एक ही सार्वकालिक निर्विवाद महान रीमेक हमें नजर आती है–‘मदर इंडिया’। 1957 में महबूब साहब ने 17 साल पहले यानी 1940 में खुद की ही बनाई फिल्म ‘औरत’ को फिर से बनाया। वैसे ही जैसे एक ही कविता को हम अलग-अलग वक्त में लिखते हैं और उसे और संवेदनात्मक गहराई और कलात्मक ऊंचाई देने की कोशिश करते हैं। ऐसी जरूरत लेखकों-कलाकारों को इसलिए आन पड़ती है, क्योंकि कलात्मक प्यास कितनी भी अच्छी कृति बना दें, बुझती नहीं है और बुझ गई तो खत्म हो जाती है। महबूब खान की ‘औरत’ औसत फिल्म थी और इसे वे भी स्वीकारते थे। असल में वे इसे जैसी बनाना चाहते थे वह वैसी बन नहीं पाई थी। इस बात की टीस वे महसूस करते थे और अपनी मृत्यु से महज पांच साल पहले उन्होंने अपने सपनों की फिल्म ‘औरत’ को रूपहले पर्दे पर ‘मदर इंडिया’ के नाम से टांक दिया। लेकिन इसके बाद जब भी रीमेक फिल्में बनीं वह मूल फिल्मों से कमतर ही रहीं जबकि समय के विकास के हिसाब से उन्हें बेहतर फिल्म होनी चाहिए थीं। केदार शर्मा के साथ महबूब खान वाला मामला नहीं था। भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर वे इसी नाम से एक अमर फिल्म 1941 में बना चुके थे। यह उन चंद फिल्मों में थी जो किसी साहित्यिक कृति पर बनी थी और उसमें नए आयाम जोड़ती थी। साथ ही इसने बॉक्स ऑफिस और कलात्मकता दोनों को एक साथ सफलतापूर्वक साधा था। इसके 23 साल बाद जब वे कई और सफल फिल्में बना चुके थे, वे फिर ‘चित्रलेखा’ पर लौटे। अब तक वे बड़े फिल्मकार बन चुके थे। उन्हें लगता था कि चित्रलेखा में असीम संभावनाएं हैं, जिनका दोहन किया जाना है। साथ ही पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता के द्वंद्व की कहानी कहना एक बार फिर समय की मांग है। सो उन्होंने फिर से चित्रलेखा बनाई। उसमें भी इस बार अशोक कुमार जैसे बड़े हीरो के साथ और वो भी रंगीन। लेकिन फिल्म अपने संगीत के लिए जितनी याद की जाती है उतनी बेहतरीन फिल्म के रूप में नहीं।

देवदास पर बनी विभिन्न फिल्मों के बारे में बनी एक मोटी और काफी हद तक सही धारणा है कि इस पर बनी तमाम फिल्म क्रमश: थोड़ी-थोड़ी डिग्रेड होती गईं। पीसी बरुआ की केएल सहगल अभिनीत देवदास (1936) से लेकर, बिमल रॉय की दिलीप कुमार अभिनीत देवदास (1955), भंसाली की शाहरुख खान अभिनीत (2002) और अनुराग कश्यप की अभय देओल अभिनीत देव डी (2009) तक। करण जौहर की करण मल्होत्रा निर्देशित ‘अग्निपथ’ ने पैसे भले ही मुकुल आनंद निर्देशित मूल फिल्म से ज्यादा बनाए हों और सौ करोड़ी हो गई हो, पर मूल फिल्म में व्यक्त प्रतिरोध और प्रतिशोध की सघन भावना को वह छू भी नहीं पाई। मुकुल आनंद के विजय (अमिताभ) का 1990 में बोला गया यह डायलॉग कि ‘मैं अपनी मौत की तारीख अपनी डायरी में लिख कर चलता हूं’ आज तक लोगों के जेहन में है। राम गोपाल वर्मा ने ‘शोले’ की आत्मा को जिस तरह अपनी ‘आग’ में जला डाला था, वैसे ही डेविड धवन ने ‘चश्मेबद्दूर’ के हास्य को फूहड़ और द्विअर्थी चुटकुलों में रिड्यूस कर दिया। ऐसे चुटकुले हम कॉमेडी सर्कस में देख लेते हैं। उसके लिए अलग से फिल्म बनाना समय, संसाधन और ऊर्जा बर्बाद करना है। साजिद खान की ‘हिम्मतवाला’ के बारे में बात करना वक्त और स्थान खराब करना ही कहा जाएगा। बहरहाल, गुरुदत्त के ‘साहब, बीवी और गुलाम’ की अनाधिकारिक रीमेक तिंग्मासू धूलिया की ‘साहब बीवी और गैंगेस्टर’ (एक व दो दोनों) जरूर ऐसी रीमेक फिल्मों के बीच उस भरोसे की तरह है जो कहती है कि नहीं, अच्छी रीमेक फिल्में भी बन सकती हैं। बस कोशिश तो समझदारी और न्यूनतम फिल्मबोध से करो यारो!

(फारवर्ड प्रेस के मई 2013 अंक में प्रकाशित)

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