वाईब्रेंट गुजरात में दलितों के लिए जगह नहीं : सूखे के समय भेदभाव

सन् 2012 में न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में गुजरात दौरे पर आए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक दल ने यह पाया कि गुजरात के 77 गांवों के दलितों को सामाजिक बहिष्कार के चलते मजबूरी में अपने गांव से पलायन करना पड़ा है

वाईब्रेंट गुजरात के सौराष्ट्र की जसदान तहसील के कनेसरा गांव में एक नन्हा-सा दलित बालक अपनी दादी से कहता है, मुझे एक गिलास पानी तो दो। बहुत प्यास लगी है। वे उत्तर देती हैं, तुम अपनी मां को घर आ जाने दो। वे बहुत दूर पानी लेने गई हैं। लड़का पूछता है, मेरी मां को एक मटका पानी लाने के लिए इतनी दूर क्यों जाना पड़ता है, गांव की हौदी में तो ढेर सारा पानी है। दादी को इस प्रश्न का उत्तर बहुत अच्छी तरह से मालूम है परंतु वे उस छोटे-से बालक को समझा नहीं सकतीं।

यह संक्षिप्त बातचीत गुजरात के कुछ हिस्सों में व्याप्त अस्पृश्यता की भयावहता की ओर संकेत करती है। यह वही गुजरात है जहां की नरेंद्र मोदी सरकार बार-बार कहती है कि आल इज वेल।

उस छोटे से बच्चे की मां जया मकवाना गांव से तीन किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पानी भरकर लाती है। वह कहती है, हमारे गांव में नर्मदा का पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, परंतु ऊंची जातियों के लोग हम लोगों को पानी नहीं लेने देते।

जसदान तहसील के दस गांवों में लगभग 900 दलित परिवार रहते हैं। इस क्षेत्र में कोली जाति का दबदबा है। दलित गंभीर जलसंकट से जूझ रहे हैं, परंतु इसका कारण सूखा नहीं वरन जातिगत भेदभाव है। गांव में नर्मदा का पानी आसानी से उपलब्ध है, परंतु दलितों को उस पानी के उपयोग की इजाजत नहीं है। प्रभुत्वशाली जाति के किसानों के खुद के ट्यूबवेल हैं और उन्हें उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नर्मदा के पानी की जरूरत नहीं पड़ती।

खड़वारी गांव में हैंडपंप हैं, परंतु किसी दलित को उसके इस्तेमाल की इजाजत नहीं है। दलित स्वयं को ठगा-सा महसूस करते हैं, क्योंकि उनके प्रयासों से ही गांव में हैंडपम्प की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है। एक दलित कहता है, इस गर्मी में दलित महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए कई मील पैदल जाना पड़ता है। बाहुबली जाति के लोग हमें हैंडपम्प से पानी नहीं भरने देते। वे कहते हैं कि हम पानी तभी ले सकते हैं जब वे अपने लिए पानी भर ले।

नवसर्जन व राबर्ट के केनेडी सेंटर फॉर जस्टिस एण्ड ह्यूमन राईट्स द्वारा तैयार की गई रपट अन्डरस्टेडिंग अनटचेबिलिटी, (समझें अस्पृश्यता को) कहती है कि गुजरात में 90 प्रकार की अस्पृश्यताएं व्यवहार में हैं। दलितों को सार्वजनिक स्रोतों से पानी नहीं लेने दिया जाता, वे मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते और आज भी गुजरात में 12 हजार से अधिक लोग सिर पर मैला ढोने के काम में लगे हुए हैं। वे अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ भी नहीं सकते, क्योंकि पुलिस और प्रशासन उनकी मदद नहीं करता। विरोध करने पर उनका सामाजिक बहिष्कार भी किया जाता है।

अहमदाबाद जिले की धनधूका तहसील के गलसाना गांव में रहने वाले लगभग 100 दलित परिवारों को ऊंची जातियों के लोग उन्हें गांव के मंदिरों के प्रांगण तक में नहीं घुसने देते। इस साल फरवरी में सुरेन्द्र नगर के मुली स्वामीनारायण मंदिर के महंत स्वामी कृष्णवल्लभ ने गांव के मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलवाने की पहल की थी, परंतु उनका प्रयास सफल न हो सका। ऊंची जातियों ने ऐसा नहीं होने दिया। गलसाना गांव के दलित रहवासी सुनील परमार कहते हैं, जिस दिन प्रवेश करवाया जाना था उस दिन गांववालों और मंदिर के पुजारियों ने यह तय कर लिया कि मंदिर के पट खोले ही नहीं जाएंगे। अगर राज्य के कुछ हिस्सों में ये हालात हैं तो फिर मोदी की दलित पुजारी वाली घोषणा का क्या होगा।

सन् 2012 में न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में गुजरात दौरे पर आए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक दल ने यह पाया कि गुजरात के 77 गांवों के दलितों को सामाजिक बहिष्कार के चलते मजबूरी में अपने गांव से पलायन करना पड़ा है। जाने-माने गुजराती लेखक कानूभाई आचार्य कहते हैं, यद्यपि राज्य के शहरी इलाकों में दलितों के साथ भेदभाव में कमी आई है, परंतु गांव में अब भी यह बहुत आम है। सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तरी गुजरात के गांव में छुआछूत प्रचलित है। पिछले दो सालों से कुछ दलित परिवार दीसा के मामलतदार, तालुका स्तर के भू-राजस्व अधिकारी के कार्यालय के बाहर विरोध-स्वरूप धरना दिए हुए हैं, क्योंकि उनका सामाजिक बहिष्कार कर ऊंची जातियों के दरबारों, अनौपचारिक अदालतों ने उन्हें गांव छोडऩे पर मजबूर कर दिया है।

गुजरात के गांव में दलितों के शासनतंत्र का हिस्सा बनने का भी प्राणपन से विरोध किया जाता है। गुजरात सरकार की समरस योजना के अंतर्गत कमला मकवाना नामक एक दलित महिला लखवाड गांव की सरपंच चुनी गई। उनके और उनके परिवार के खिलाफ अमानत में खयानत का मुकदमा दायर कर दिया गया। उन्हें और उनके परिवार के सभी सदस्यों को जेल जाना पड़ा, क्योंकि उनके पास जमानत भरने के लिए भी पैसे नहीं थे। हाल में एक एनजीओ की मदद से कमला को जमानत मिल सकी।

दलितों को न केवल परेशान किया जाता है, वरन प्रभावशाली लोगों के इशारे पर उन पर शारीरिक हमले भी होते हैं। हाल में अप्रैल में जूनागढ़ के मेयर को आम्बेडकर नगर में एक घर में तोडफ़ोड़ करने, एक दलित पर हमला करने और एक गाड़ी को आग के हवाले करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर तो दलित भेदभाव के शिकार हैं ही, पुलिस भी उन पर अत्याचार करने में पीछे नहीं है। सुरेन्द्र नगर जिले के थानगढ़ शहर में पुलिस द्वारा किया गया गोलीचालन दलितों के विरुद्ध पुलिस के अत्याचारों का सबसे ताजा उदाहरण है। इस गोलीचालन में तीन दलित मारे गए थे, जिनमें से दो अवयस्क थे। दलित कार्यकर्ता राजू सोलंकी कहते हैं, 23 सितंबर, 2012 को विरोध-प्रदर्शन कर रहे दलितों पर गुजरात पुलिस ने कारबाइन से गोलियां चलाईं। उसके पहले न तो उन पर लाठीचार्ज किया गया, न पानी की फुहारें छोड़ी गईं और ना ही आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ। इसी तरह की कारबाईन का इस्तेमाल सन् 2008 में मुंबई पर हमला करने वाले कसाब व अन्य आतंकवादियों के खिलाफ किया गया था। क्या ये दलित आतंकवादी थे? राजू सोलंकी पूछते हैं। दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी कहते हैं, यद्यपि राज्य के अपराध अनुसंधान विभाग ने साफ-साफ कहा है कि भीड़ हिंसक नहीं थी परंतु फिर भी पुलिस ने उस पर गोलियां चलाईं। आजतक पुलिस ने थानगढ़ के दलितों पर लादे गए झूठे मुकदमे वापस नहीं लिए हैं। उन पर आपराधिक षड्यंत्र रचने और हत्या करने के आरोप लगाए गए हैं।

गुजरात में ऐसी कई घटनाएं हुईं हैं, जिनसे ऐसा लगता है कि पुलिस जानबूझकर अन्याय के खिलाफ  दलितों के संघर्ष को कुचलना चाहती है। अरविंद मकवाना नाम के एक दलित युवक को पंचमहल जिले के वैद गांव में केवल चड्डी पहनाकर पूरे गांव में घुमाया गया। उसका अपराध यह था कि उसने ऊंची जाति के एक सेवानिवृत्त पुलिस इंस्पेक्टर का किसी मुद्दे को लेकर विरोध किया था। बरासकांठा जिले के पथवाड़ा पुलिस थाने में अरविंद चौहान नामक एक दलित युवक पुलिस हिरासत में मारा गया। दशरथ सोलंकी ने ढोलका पुलिस स्टेशन के सामने आत्महत्या कर ली, क्योंकि पुलिस वालों ने व्यापार में उसके साझेदार जो कि ऊंची जाति का था, के खिलाफ रपट लिखने से इंकार कर दिया था।

इन गंभीर व चिंतनीय हालातों के बीच एक अच्छी खबर यह है कि गुजरात की न्यायपालिका इस तरह की घटनाओं का स्वमेव संज्ञान लेकर दोषियों को सजा दे रही है।

(फारवर्ड प्रेस के जून 2013 अंक में प्रकाशित)

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