क्रिकेट का राजनीतिशास्त्र

नेताओं की क्रिकेट में इतनी दिलचस्पी क्यों है? संसद में एक दूसरे का इस्तीफा मांगने वाले क्रिकेट में एक ही टीम के खिलाड़ी कैसे बन जाते हैं। साफ है बीसीसीआई में क्रिकेटर और खिलाडिय़ों का कम राजनीतिक नेताओं का बोलबाला ज्यादा है। बीसीसीआई के फैसले क्रिकेटर नहीं राजनेता लेते हैं

लोग अब इसे अलग-अलग नाम से जानने और पुकारने लगे हैं.. इंडियन पॉलिटिकल लीग, इंडियन पावर लीग, इंडियन पाप लीग, इंडियन पैसा लीग और न जाने कितने नाम हैं इसके। और इन सब का सरदार है बीसीसीआई। पिछले दिनों जब आईपीएल में फिक्सिंग का खुलासा हुआ तब किसी को हैरानी नहीं हुई। इस लीग की बुनियाद ही सट्टेबाजी और फिक्सिंग से रखी गई थी। मैच, विज्ञापन और दूसरे कानूनी और नैतिक स्रोतों से जितने पैसे इस लीग में आ-जा रहे हैं उससे कई गुना ज्यादा पैसे गैरकानूनी और अनैतिक तरीकों से।

आईए, समझते हैं परदे के पीछे के इस खेल को और इसके खिलाडिय़ों को। शुरुआत संसद के राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली से करते हैं।

अरुण जेटली

अरुण जेटली बीसीसीआई के उपाध्यक्ष हैं। बीसीसीआई की सबसे ज्यादा कमेटियों के सदस्य भी इस समय अरुण जेटली हैं। अरुण जेटली आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य भी हैं। राज्यसभा में विपक्ष के तेज-तर्रार नेता बात-बात पर पीएम का इस्तीफा मांगते हैं। नैतिकता की दुहाई देने में सबसे आगे रहते हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण में वे चुप हो गए। चुप्पी की साजिश में अपना रोल किसी ने बखूबी निभाया तो वे हैं अरुण जेटली। श्रीनिवासन का कार्यकाल सितंबर तक बाकी है। सूत्रों की मानें तो अगला बीसीसीआई अध्यक्ष नॉर्थ जोन से बनाया जा सकता है। ऐसे में जेटली की नजर अध्यक्ष पद पर है। वे बिना वजह किसी को खासकर दक्षिण की लॉबी को नाराज नहीं करना चाहते। लिहाजा जेटली की जुबान नहीं खुली।

नरेंद्र मोदी

राजनीति के बुलंद सितारे नरेंद्र मोदी भी क्रिकेट से अपने को दूर नहीं रख पाए हैं। मोदी गुजरात क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं। राष्ट्रीय राजनीति में अपना दम-खम बढ़ा रहे मोदी हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं। सोशल नेटवर्किंग में भी मोदी को महारत हासिल है। बीजेपी से पीएम पद की उम्मीदवारी को लेकर उनका नाम सबसे आगे है। भ्रष्टाचार का कोई मसला आए, मोदी कांग्रेस सरकार पर हमला करने से नहीं चूकते। वे देश को विकास का एक नया मॉडल देने की बात करते हैं। मोदी अगर सामने आकर नहीं बोलते तो ट्वीटर पर जरूर ट्वीट करते हैं। नरेंद्र मोदी टोपी नहीं पहनना चाहते और एक खेल जो करोड़ों लोगों को टोपी पहना रहा उस पर बोलना भी नहीं चाहते। आखिर वे कौन-सी ताकतें हैं जो मोदी को बोलने से रोक रही हैं।

राजीव शुक्ला

बीसीसीआई में सबसे ज्यादा चर्चित नाम कोई है तो वो है राजीव शुक्ला का। राजीव शुक्ला यूपीए-2 में संसदीय कार्य राज्यमंत्री हैं। संसदीय राजनीति हो या खेल की राजनीति, शुक्ला रणनीति बनाने के माहिर खिलाड़ी हैं। विवादों की जड़ आईपीएल-6 के कमिश्नर रहे शुक्ला इस पूरे प्रकरण में सबसे चतुर खिलाड़ी नजर आए। आईपीएल-6 के कमिश्नर पद संभालने के अलावा वे आईपीएल की गवर्निंग काउंसिल कमेटी के चेयरमैन भी हैं। इसके अलावा वे कई और कमेटियों में शामिल हैं। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग विवाद पर इन्होंने चुप्पी तो नहीं साधी पर श्रीनिवासन को बचने का रास्ता इन्होंने ही बताया। चेन्नई में बुलाई गई बैठक में जो फैसला लिया गया उसकी बुनियाद राजीव शुक्ला ने काफी पहले ये कहते हुए रख दी थी कि श्रीनिवासन को मामले की जांच पूरी होने तक उस प्रक्रिया से अलग रहना चाहिए। विवादों के बीच मामले को तूल पकड़ता देख राजीव शुक्ला ने आईपीएल कमिश्नर पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस इस्तीफे को भी एक सोची-समझी राजनीतिक चाल माना जा रहा है। आईपीएल खत्म होने के बाद कमिश्नर का क्या काम ही बचा था।

फारुख अब्दुल्ला

अवसरवादी राजनीति के रोल मॉडलों में से एक फारुख अब्दुल्ला का भी क्रिकेट से पुराना रिश्ता रहा है। फारुख अब्दुल्ला केंद्र सरकार में नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री का पद संभाल रहे हैं। नेशनल कान्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। इसके साथ ही वे बीसीसीआई मार्केटिंग सब कमेटी के चेयरमैन भी हैं। मैदान के बाहर के खेलों में इनकी खूब दिलचस्पी रहती है। आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग विवाद में अब्दुल्ला एकमात्र ऐसे शख्स के रुप में सामने आए, जिन्होंने कहा कि श्रीनिवासन को इस्तीफा नहीं देना चाहिए। फारुख अब्दुल्ला पर जम्मू और कश्मीर क्रिकेट संघ के करोड़ों रुपये के घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा था। हालांकि उन्होंने आरोपों से इंकार किया था। लेकिन मामले की तफ्तीश कहां तक पहुंची और क्या तथ्य सामने आए किसी को पता नहीं।

इन दिग्गजों के अलावा कई और राजनीतिक हस्तियों का क्रिकेट में प्रभाव है। इनमें से प्रमुख हैं बीजेपी के युवा नेता और सांसद अनुराग ठाकुर। ठाकुर बीसीसीआई के संयुक्त सचिव होने के साथ-साथ जूनियर क्रिकेट कमेटी और अंपायर्स कमेटी के संयोजक हैं। क्रिकेट राजनीति में इनका रुतबा दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। हां, वे खुद भी अच्छा क्रिकेट खेलते हैं। इनके अलावा कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, सीपी जोशी व नवीन जिंदल भी बीसीसीआई से जुड़े हुए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया बीसीसीआई की फाइनेंस कमेटी के चेयरमैन हैं। इसके अलावा वे आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी के खिलाफ जांच कर रही अनुशासन समिति के सदस्य हैं और साथ ही मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। सीपी जोशी बीसीसीआई की मीडिया कमेटी के चैयरमैन के साथ-साथ राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चेयरमैन भी हैं। कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल बीसीसीआई में सरकार के नामित सदस्य हैं। इन सब के अलावा आंध्रप्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री किरन कुमार रेड्डी भी क्रिकेट राजनीति से जुड़े हुए हैं। रेड्डी हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। कई और दिग्गज भी क्रिकेट की राजनीति में हावी रहे हैं। कृषि मंत्री शरद पवार तो बीसीसीआई से लेकर आईसीसी के अध्यक्ष रह चुके हैं। परदे के पीछे की राजनीति में इनका रोल अहम होता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की भी क्रिकेट की राजनीति में दिलचस्पी रहती है।

नेताओं की क्रिकेट में इतनी दिलचस्पी क्यों है? संसद में एक दूसरे का इस्तीफा मांगने वाले क्रिकेट में एक ही टीम के खिलाड़ी कैसे बन जाते हैं। साफ है बीसीसीआई में क्रिकेटर और खिलाडिय़ों का कम राजनीतिक नेताओं का बोलबाला ज्यादा है। बीसीसीआई के फैसले क्रिकेटर नहीं राजनेता लेते हैं। बीसीसीआई एक ऐसा मंच है जहां पक्ष और विपक्ष दोनों एक ही खेमे में है। बीसीसीआई की पिच पर सभी दलों के राजनेता एक ही टीम की ओर से बैटिंग-बॉलिंग करते हैं। जाहिर है यह पैसों का मामला है। यहां सब के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं।

(फारवर्ड प्रेस के जुलाई 2013 अंक में प्रकाशित)

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