केवल संख्याबल काफी नहीं : पंचायतों को चाहिए असली सत्ता में भागीदारी

यह लड़ाई यदि गति पकड़ती है, तो जो सबसे महत्वपूर्ण परिणाम निकलता दिख रहा है वह है ग्रामीण समाज और संस्कृति में द्विज सत्ता को मिलने वाली चुनौती। जरूरत है इस लड़ाई को गांधीवादी कर्मकांड से आगे ले जाकर फुले-आम्बेडकर पैटर्न के संघर्ष में तब्दील करने की

डॉ. आंबेडकर की नजर में गांव, सामन्ती बुराइयों की खान हैं। वहां अज्ञानता, जातिवाद, साम्प्रदायिकता  व कुपमंडूकता का बोलबाला है। गांधी ‘ग्राम स्वराज’ की वकालत करते थे जबकि आंबेडकर, शहरीकरण और सतत विकास में दलितों की भलाई देखते थे। इन दिनों बिहार में गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ के सिद्धांत और आन्दोलन के रास्ते, ग्रामीण सत्ता में बहुजन भागीदारी का एक नायाब माहौल बन रहा है, जो आन्दोलन की शक्ल में सम्पूर्ण बिहार में फैलने के लिए तैयार है।

‘बिहार मुखिया महासंघ’ के बैनर तले, ग्राम पंचायतों में सत्ता के वास्तविक विकेंद्रीकरण की लड़ाई चल रही है, जिसकी अगली कड़ी के रूप में, 30 सितम्बर को पटना के गांधी मैदान में ‘पंचायत अधिकार रैली’ आयोजित की गई है। बिहार में गांवों में सत्ता पर बहुजनों का वर्चस्व है। कुल मिलाकर, 70 से 75  प्रतिशत सीटों पर इस वर्ग के पंचायत प्रतिनिधि है। 22.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति/जनजाति तथा 20 प्रतिशत अति पिछड़ों के अलावा 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। समान्य सीटों पर भी पिछड़े और दलित उम्मीदवार चुन कर आये हैं। इस तरह, सत्ता में भागीदारी का समीकरण बदला है। हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। राज्य सरकार ने ग्राम सभा के अधिकारों में जबरदस्त कटौती की है। पंचायत प्रतिनिधियों के अधिकारों की लड़ाई, ‘बिहार मुखिया महासंघ’ के बैनर तले जिन लोगों ने शुरू की है, उनमें प्रमुख नाम है अति पिछड़ी जाति से आने वाले मोहन मुकुल का, जो कि समान्य सीट से चुनकर आये हैं। फारवर्ड प्रेस से बातचीत करते हुए मुकुल कहते हैं, ‘आज गांवों की राजनीति में वंचित समूहों की भागीदारी बढ़ी है। हमारी लड़ाई वंचितों की लड़ाई है। सरकार, ग्राम सभा के अधिकार छीन कर पंचायतों को पंगु बना चुकी है। बीपीएल सूची के निर्माण और अनुमोदन तक से ग्राम सभा को अलग कर दिया गया है, जो गांवों में विकास का सबसे बड़ा आधार है।’

दरअसल, इस आन्दोलन की सुगबुगाहट, महात्मा गांधी की कर्मस्थली चंपारण के भीतिहरवा से हुई थी और इसे कई गांधीवादियों का समर्थन प्राप्त है। यह आंदोलन पिछले कई महीनों से अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ते हुए, गांधी मैदान में निर्णायक दौर में पहुँचने की स्थिति में है। बिहार मुखिया महासंघ के राज्य अध्यक्ष प्रियदर्शिनी शाही गांधी मैदान में जन भागीदारी का गणित बताते हुए उसे बिहार की राजनीति के लिए निर्णायक बताते हैं। उनका दावा है कि ‘बिहार में 8423 मुखिया हैं, इसके अलावा, त्रिस्तरीय पंचायती राज के दूसरे प्रतिनिधि भी हक की इस लड़ाई में शामिल हुए हैं। एक लाख से अधिक संख्या में इनके समर्थकों की भीड़ गांधी मैदान में जुटेगी। जो गाँव को सत्ता देगा, अधिकार देगा, आगे की राजनीति उसकी होगी।’ शाही के दावों के पीछे आत्मविश्वास की एक पृष्ठभूमि है। 11 अक्तूबर 2012 को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में पांच हजार से अधिक पंचायत प्रतिनिधि, खासकर मुखिया जुटे थे। इनकी संख्या 19-20 जनवरी 2013 को राजगृह में ग्राम पंचायत के दो दिवसीय कार्यशाला में डेढ़ गुनी हो गई।

पंचायतों के अधिकार की यह लड़ाई नीतीश कुमार के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है। पंचायत प्रतिनिधि अपनी-अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को अलग रखकर, अपने अधिकारों के लिए एकजुट हैं। नीतीश कुमार के प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद यादव का समर्थन इन ग्रामीण जनप्रतिनधियों के बीच बढ़ा है। इसके पीछे जनप्रतिनिधियों की समाजिक पृष्ठभूमि भी है, जो कि मुख्यत: यादव हैं या लालू का समर्थन करने वालीं अन्य पिछड़ी व अति पिछड़ी जातियों के सदस्य हैं। यह लड़ाई यदि गति पकड़ती है, तो जो सबसे महत्वपूर्ण परिणाम निकलता दिख रहा है वह है ग्रामीण समाज और संस्कृति में द्विज सत्ता को मिलने वाली चुनौती। जरूरत है इस लड़ाई को गांधीवादी कर्मकांड से आगे ले जाकर फुले-आम्बेडकर पैटर्न के संघर्ष में तब्दील करने की। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक, गांधी मैदान में रामदास अठावले सहित दलित बहुजन नेताओं को जोड़ऩे की सुगबुगाहट दिखने लगी थी।

(फारवर्ड प्रेस के अगस्त 2013 अंक में प्रकाशित)

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