राष्ट्रध्वज फहराने पर विवाद में दलितों की हत्या

इस लड़ाई का एक पहलू यह भी है कि बिहार में सामाजिक सम्मान की लड़ाई लगभग ठहर ही गई है। एक समय था, जब राजपूत-भूमिहारों के सामने पिछड़ी और दलित जातियों के लिए चौकी पर बैठना अपराध था।

लोक सभाध्यक्ष मीरा कुमार के संसदीय क्षेत्र सासाराम के शिवसागर प्रखंड के बड्डी में 15 अगस्त को राष्ट्रध्वज फहराने को लेकर राजपूतों और रविदास समुदाय के सदस्यों के बीच हिंसात्मक विवाद में रविदास समुदाय की एक महिला समेत दो लोग मारे गए। विलास राम की मौत घटनास्थल पर ही तब हो गई जब राजपूतों ने उसपर लाठियों और डंडों से हमला कर दिया जबकि सुखिया देवी की मौत इलाज के दौरान हो गई।

 

बड्डी के रहने वाले थे वीरकुंवर सिंह के सेनानायक निशान सिंह, जिन्हें अंग्रेजों ने इसी गांव में तोप से उड़ा दिया था। इन्हीं निशान सिंह के परिजनों व अन्य स्वजातीय राजपूतों ने रविदास जाति के लोगों पर हमला किया। लड़ाई का तात्कालिन कारण ध्वजारोहण भले हो, लेकिन इसकी जड़ में था गांव में वर्षों पहले बना रविदास मंदिर। गांव की सड़क के बगल में सरकारी जमीन पर बने रविदास मंदिर में हाल ही में संत रविदास की प्रतिमा लगायी गई थी। यह राजपूतों को बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इसके प्रतिशोध में राजपूत जाति के लोग रविदास मंदिर के आसपास ही निशान सिंह की प्रतिमा लगाना चाहते थे। इसका विरोध रविदास जाति के लोग कर रहे थे। 15 अगस्त को राजपूत जाति के लोग मंदिर के बगल में झंडा फहराने चाहते थे, ताकि उस जमीन पर कब्जा कर निशान सिंह की प्रतिमा लगायी जा सके। इसी बात को लेकर टकराव की नौबत आई और राजपूतों ने पुलिस के सामने ही तांडव किया।

इस लड़ाई का एक पहलू यह भी है कि बिहार में सामाजिक सम्मान की लड़ाई लगभग ठहर ही गई है। एक समय था, जब राजपूत-भूमिहारों के सामने पिछड़ी और दलित जातियों के लिए चौकी पर बैठना अपराध था। उसके खिलाफ लंबी सामाजिक व राजनीतिक लड़ाई लड़ी गई थी। इस लड़ाई को भाकपा माले ने मजबूती से लड़ा था। इसका व्यापक असर हुआ था। मगध और शाहाबाद के इलाके का सामाजिक स्वरूप ही बदल गया था। यह बदलाव राजपूत और भूमिहारों को स्वीकार नहीं था। लेकिन बदलते सामाजिक व राजनीतिक समीकरणों के चलते राजपूत व भूमिहार जाति के लोग फिर से अपनी पुरानी सामाजिक सत्ता हासिल करने के लिए आपराधिक वारदात करने लगे हैं। उन्हें प्रशासन का संरक्षण भी मिल रहा है। लेकिन यह बदलाव का असर ही है कि दलितपिछड़े अभी भी उनका प्रतिवाद करना बंद नहीं किए हैं। बिहार के राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक, बड्डी की घटना को इसी परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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