फिर निकला मराठा आरक्षण का जिन्न

देश में आधिकारिक रूप से मराठा नामक कोई जाति नहीं है। महाराष्ट्र में रहने वाले और शिवाजी से अपना संबंध जोड़ऩे वाले समुदाय को मुख्यत: मराठा कहा जाता है। महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और उपमुख्यमंत्री अजित पवार दोनों ही मराठा हैं और कैबिनेट के अधिकांश मंत्री भी मराठा हैं

महाराष्ट्र में आगामी चुनाव को देखते हुए मराठा आरक्षण के जिन्न को एक बार फिर से बोतल से निकालने की कवायद तेज हो गई है। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की गठबंधन की राज्य सरकार ने मराठा संगठनों की लगातार बुलंद होती मांग स्वीकार करते हुए उद्योग व रोजगार मंत्री नारायण राणे की अध्यक्षता में मराठा आरक्षण पर विचार करने के लिए बाकायदा समिति बना दी है, जो अब राज्य का दौरा शुरू कर रही है।

 

इस आंदोलन से जुड़े लगभग सभी राजनेताओं के अपने-अपने तर्क हैं। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे ने वंचित वर्ग के लिए आरक्षण को समय की जरूरत बताते हुए कहा कि अस्सी प्रतिशत मराठा आबादी पिछड़ी है इसलिए सरकार को उन्हें शिक्षा और सेवा में तत्काल आरक्षण देना चाहिए। दूसरी ओर सत्ताधारी एनसीपी के मधुकर राव का कहना है कि आरक्षण बहुत ही संवेदनशील मामला है। सरकार ने मराठा आरक्षण से संबंधित सभी मसलों को सुलझाने के लिए नारायण राणे समिति का गठन किया है। हम सभी को इसकी रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए, जबकि दलित रिपब्लिकन नेता रामदास आठवले सीधे तौर पर बिना किसी किन्तु-परंतु के मराठों को आरक्षण देने की वकालत करते हैं।

इन राजनेताओं से इतर सामाजिक आधार पर आंदोलन करने वालों के भी अपने अलग मत हैं। फारवर्ड प्रेस ने मराठा आंदोलन से जुड़े विभिन्न पक्षों से भी बात की। ओबीसी आरक्षण बचाओ समिति महाराष्ट्र के अध्यक्ष प्रो. श्रवण देवरे कुनबी मातला आमी मराठा झाला मराठी कहावत के हवाले से कहते हैं कि मंडल आयोग द्वारा अनुशंसित ओबीसी में कुनबी जाति को शामिल किया गया है जो मूलत: मराठा ही है लेकिन मराठा समाज उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न जाति मानता है। आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद जब महाराष्ट्र में कुनबी जाति के लोग ओबीसी कोटे से अधिक संख्या में चुने जाने लगे तो अपने आप को उच्च और सभ्य समझने वाले मराठों को यह नागवार गुजरने लगा कि यह उनके लिए स्वाभिमान की बात हो गई है और वे अपने लिए आरक्षण की बात करने लगे हैं। इसलिए मराठों की मूल जाति कुनबी जब पहले से ही आरक्षण के दायरे में है तो इन्हें अलग से आरक्षण देने की क्या आवश्यकता है। अगर सरकार को राजनीतिक लाभ के लिए मराठाओं को आरक्षण देना ही है तो अलग से कोई विशेष प्रावधान कर दे। इसमें ओबीसी समाज को कोई आपत्ति नहीं होगी। इसके विपरीत अखिल भारतीय मराठा संघ के अध्यक्ष शशिकांत पवार का कहना है कि मराठा समाज को आरक्षण के मुद्दे पर महाराष्ट्र के पिछले तीनों मुख्यमंत्रियों विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण ने कोरे आश्वासन ही दिए हैं। हरियाणा सरकार ने वहां के क्षत्रिय राजपूतों को विशेष 10 प्रतिशत आरक्षण दिया है तो महाराष्ट्र सरकार मराठा समाज को आरक्षण देने में क्यों कतरा रही है, यह समझ के परे है। इसलिए हमको आर्थिक स्थिति से पीडि़त और बेरोजगारी से तंग आए मराठा समाज के लोगों के हक के लिए लड़ऩा पड़ रहा है और हम मराठा समाज को न्याय दिलाकर ही दम लेनेवाले हैं।

मराठा समाज और आरक्षण का इतिहास

देश में आधिकारिक रूप से मराठा नामक कोई जाति नहीं है। महाराष्ट्र में रहने वाले और शिवाजी से अपना संबंध जोड़ऩे वाले समुदाय को मुख्यत: मराठा कहा जाता है। महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और उपमुख्यमंत्री अजित पवार दोनों ही मराठा हैं और कैबिनेट के अधिकांश मंत्री भी मराठा हैं। चीनी मिलों और महाराष्ट्र की सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक दुनिया में प्रबल हस्तक्षेप रखने वाला यह समुदाय कांग्रेस-एनसीपी दोनों का मुख्य आधार है। 1902 में छत्रपति शिवाजी के वंशज शाहू महाराज कोल्हापुर ने पहली बार नौकरियों में बहुजनों को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया था। इस 50 प्रतिशत आरक्षण में उन्होंने मराठा समाज को भी शामिल किया था। 1982 में तत्कालीन मुख्यममंत्री बाबासाहेब भोंसले की सरकार में विधायक अण्णाजी ने पहली बार मराठा आरक्षण की मांग की थी। 1982 से अब तक कई सामितियों का गठन हुआ लेकिन हुआ कुछ भी नहीं।

मराठा समुदाय के लोग पहले अपने को ओबीसी में शामिल करने की मांग करते थे। लेकिन जब ओबीसी वर्ग के लोग इसका विरोध करने लगे हैं तो मराठा समुदाय के लोगों ने ओबीसी आरक्षण के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करते हुए अतिरिक्त आरक्षण की मांग करनी शुरू कर दी। फिलहाल तो आरक्षण की यह गेंद महाराष्ट्र की कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गठबंधन वाली राज्य सरकार के पाले में है। लेकिन इतना तय है कि मराठा आरक्षण पर राज्य सरकार का फैसला चाहे जो भी हो महाराष्ट्र के समाज और राजनीति पर उसका बेहद प्रभावी और दूरगामी असर होगा।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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