आरक्षण : राष्ट्र और संस्कृति का सवाल

समान अवसर बनाम विशेष अवसर, मेरिट, गुणवत्ता और सबसे आगे राष्ट्र, आरक्षण विरोधी द्विज आज भी हमें इन्हीं सवालों में उलझाए रखना चाहते हैं

गर यह रिपोर्ट (मंडल रिपोर्ट) ठीक प्रकार से लागू हो गई तो सदियों से चली आ रही वर्णव्यवस्था और जाति व्यवस्था का टूटना तय है। इसीलिए वर्णव्यवस्था की पोषक ताकतें आखिरी युद्ध के लिए अपने को एकजुट कर रही हैं। भारतीय इतिहास का यह महानतम युद्ध आने वाले वर्षों में लड़ा जाएगा।मस्तराम कपूर, (लेखक व राजनीतिक विश्लेषक)

भारत में प्रतिनिधित्व का सवाल नया नहीं है। लगभग 140 वर्ष पहले हंटर आयोग (1872) के समक्ष महात्मा जोतिबा फुले ने आरक्षण के द्वारा शूद्र-अतिशूद्रों को नौकरियों में समुचित प्रतिनिधित्व देने की अपील की थी और 1902 में छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने स्टेट कोल्हापुर की सभी नौकरियों में पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देकर सामाजिक न्याय के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा। आधुनिक भारत के निर्माताओं ने संविधान की उद्देशिका में सामाजिक न्याय को पहले स्थान पर रखा। संविधान द्वारा प्रदत्त संवैधानिक प्रावधानों के कारण ही दो बार पिछड़ा वर्ग आयोग बना और 1990 में इसकी सिफारिशों को लागू किया गया। ओबीसी आरक्षण लागू हुए लगभग 20 वर्ष हो गए परंतु आरक्षण विरोधियों द्वारा इसके विरोध में दिए जाने वाले तर्कों से लगता है कि मानो आरक्षण का सवाल बिल्कुल नया हो। समान अवसर बनाम विशेष अवसर, मेरिट, गुणवत्ता और सबसे आगे राष्ट्र, वे आज भी हमें इन्हीं सवालों में उलझाए रखना चाहते हैं।

उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग के ‘नए आरक्षण नियम’ पर जारी सामाजिक गतिरोध और उसके बाद न्यायालयों द्वारा दिए गए फैसलों के आधार पर कहा जा सकता है कि आरक्षण को बचाना सामाजिक न्याय की ताकतों के लिए चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

उत्तरप्रदेश में आरक्षण पर गतिरोध

जुलाई-अगस्त, 2013 के दौरान उत्तरप्रदेश में चले आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान भी यही प्रवृत्तियां सामने आईं। 27 मई, 2013 को उत्तरप्रदेश लोकसेवा आयोग की बैठक में लिए गए ‘त्रिस्तरीय आरक्षण फार्मूला’ फैसले के आलोक में 4 जुलाई, 2013 को घोषित सम्मिलित राज्य प्रवर अधीनस्थ सेवा (मुख्य) परीक्षा, 2011 के परिणाम आते ही सवर्ण बौखला उठे। ‘नए आरक्षण नियम’ के अन्तर्गत 170 आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग में ‘ओवरलैंपिंग’ कराया गया था। सवर्ण अभ्यर्थियों ने इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की और कोर्ट के सामने ही अनशन पर बैठ गए। आरक्षण विरोधियों ने सरकार और न्यायालय पर दबाव बनाने के लिए हिंसक आंदोलन का रास्ता अख्तियार करते हुए 15 जुलाई को कई वाारदातों को अंजाम दिया। इन छात्रों के निशाने पर न केवल सार्वजनिक संपत्ति बल्कि सपा के कार्यालय और उनके नेताओं के घर भी थे। लाठियों-डंडों के साथ हजारों की संख्या में सवर्ण छात्रों के हुजूम ने पूरे इलाहाबाद शहर को अपने आगोश में ले लिया। सवर्ण अभ्यर्थियों के साथ मीडिया ने प्रोपेगेंडा फैलाते हुए कहा कि ‘नया आरक्षण नियम’ एक जाति (यादव) के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यूपी लोकसेवा आयोग के दरवाजे पर आरक्षण विरोधियों ने ‘यादव लोक सेवा आयोग’ लिख दिया। वास्तविकता यह थी कि परीक्षा परिणाम में सभी ओबीसी और एसटी जातियों के उम्मीदवार आनुपातिकरूप से पहले से अधिक संख्या में चुनकर आए थे। यादवों की संख्या उत्तरप्रदेश में अधिक होने के कारण उनकी संख्या भी उसी अनुपात में अधिक थी। बहराहाल, 26 जुलाई को मुलायम सिंह यादव से आरक्षण विरोधियों ने वार्ता की। मुलायम सिंह यादव ने उन्हें आश्वस्त किया कि ‘सरकार पुराने नियमों का ही समर्थन करती है। मामला हाईकोर्ट में है। लेकिन अगर कोर्ट का फैसला आरक्षण के इस नए नियम के विरोध में आता है तो सरकार उसके खिलाफ ऊंची अदालत में अपील नहीं करेगी।’ जाहिर है उनका इतना संकेत प्रशासनिक महकमे के लिए काफी था। इस संकेत के मिलते ही रातों-रात यूपीपीएससी ने ‘नए आरक्षण नियम’ के आधार पर जारी परीक्षा परिणाम रद्द कर दिए।

आरक्षण विरोधियों द्वारा कृष्ण और गायों पर हमला

इस आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान कई नई प्रवृत्तियां भी देखने को मिलीं। ‘नए आरक्षण नियम’ पर सरकार के बैकफुट पर आते ही आरक्षण विरोधियों ने इलाहाबाद में विजय जुलूस निकाला। इस जुलूस के दौरान गायों और भैंसों को निर्दयतापूर्वक पीटा गया। उन्होंने दूध से भरे बर्तनों को सड़कों पर उलट दिया। इस भीड़ ने ‘कृष्णा’ नामक डेयरी पर हमला किया और कृष्ण की टंगी फोटो को फाड़कर पैरों तले मसला और कृष्ण की मूर्ति को तोड़ते हुए डेयरी में रखे दूध-दही को जमीन पर उड़ेल दिया। आरक्षण विरोधियों की नफरत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हमले का शिकार हुई डेयरी किसी ‘यादव’ की नहीं थी, बल्कि वह एक ‘वैश्य’ परिवार की थी। आसपास के लोग उन्हें ‘गुप्ताजी’ के नाम से जानते हैं। दरअसल, सवर्णों ने कृष्ण की टंगी फोटो वाली दुकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया। (इस दौरान गाय को मां और कृष्ण को विष्णु का अवतार कह पिछड़ी जातियों को हिन्दुत्व का पाठ पढाने वाली ताकतें कहां गायब हो गई थीं? साधु, संत, महंत, शंकराचार्य कहां गए? ‘गौरक्षा’ के नाम पर स्थापित विश्व हिन्दू परिषद् की इस घटना पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि इलाहाबाद में ही प्रवीण तोगडिय़ा और अशोक सिंघल का घर भी है।

आरक्षण समर्थक आंदोलन का बिगुल

‘नए आरक्षण नियम’ से अखिलेश सरकार के पीछे पैर खींच लेने की घटना और उसके बाद सवर्णों के विजय जुलूस ने अब तक चुप बैठे पिछड़े छात्रों को आक्रोशित किया। अप्रत्याशित रूप से हजारों की संख्या में बैकवर्ड छात्र इलाहाबाद की सड़कों पर सरकार के खिलाफ उतरे। इनकी संख्या इतनी बड़ी थी कि सरकार और मीडिया सकते में आ गए। ‘विजय’ का जश्न मना रहे सवर्णाों की तो जैसे घिग्घी ही बंध गई। उनकी तख्तियों पर लिखा था, ‘आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’, ‘सामान्य वर्ग किसी जाति का नाम नहीं है’ आदि। इन छात्रों ने ऐलान किया कि 30 जुलाई को लखनऊ विधानसभा का घेराव किया जाएगा और उक्त तारीख को यूपी के विभिन्न इलाकों से लगभग बीस हजार छात्र लखनऊ की सड़कों पर उतरे। कथित रूप से ‘अपनी सरकार’ के खिलाफ न्याय की उम्मीद लिए सड़कों पर उतरे छात्रों पर सवर्ण अधिकारियों ने जमकर लाठियां चलाईं। इसके बावजूद विधानसभा के सामने आरक्षण समर्थक छात्रों ने दो दिनों तक अपना अनशन जारी रखा। दूसरे दिन चेन्नई से लौटे मुख्यमंत्री ने छात्रों को लखनऊ में वार्ता के लिए आमंत्रित किया। मुख्यमंत्री ने आरक्षण समर्थक छात्रों से कहा कि ‘आयोग पुराने नियम के आधार पर ही परिणाम जारी करेगा।’ मुख्यमंत्री के व्यवहार से निराश आरक्षण समर्थक छात्रों ने ‘आरक्षण का सही नियम’ लागू होने तक आंदोलन जारी रखने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री से मिलकर लखनऊ से लौटे आरक्षण समर्थक छात्रों ने इलाहाबाद में ‘आरक्षण बचाओ आंदोलन’ को तेज करते हुए 7 अगस्त को मंडल दिवस पर कैंडल मार्च निकाला। मौसम खराब होने के बावजूद बालसन चौराहा पर हजारों आरक्षण समर्थक छात्र जमा हुए और पंक्तिबद्ध होकर सुभाष चौक की तरफ बढऩे लगे। पूरे आंदोलन के दौरान आरक्षण विरोधियों की खबरों को प्रमुखता देने तथा आरक्षण समर्थकों को अपमानित करने में किसी भी हिंदी अखबार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन आरक्षण विरोधियों के पक्ष में तथ्यों को तोड़ऩे-मरोडऩे के मामले में ‘दैनिक जागरण’ सबसे अधिक बदनाम था। मार्च के दौरान आरक्षण समर्थक छात्रों ने ‘दैनिक जागरण’ के कार्यालय पर हमला बोल दिया तथा उसके होर्डिंग्स आदि उखाड़ फेंके। इस तोड़-फोड़ के आरोप में कई छात्रों और छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आजादी की 67वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर आरक्षण समर्थक छात्र नेताओं को जमानत पर रिहा किया गया और इसी दिन आयोग ने पुराने नियमों के आधार पर ‘नया परीक्षा परिणाम’ भी जारी कर दिया। दरअसल, इलाहाबाद से उठी आरक्षण की चिंगारी ने राजधानी लखनऊ तक विकराल रूप धारण कर लिया। 6 अगस्त को विधानभवन के सामने केंद्रीय अनुसूचित जाति आयोग के प्रदेश निर्देशक और पूर्व मंत्री विनोद कुमार तेजयान और जेएस कश्यप के नेतृत्व में भारतीय विद्यार्थी मोर्चा ने विशाल प्रदर्शन किया। डॉ. लालजी निर्मल के नेतृत्व में आम्बेडकर महासभा, अमरेश यादव के नेतृत्व में भारतीय युवा संसद, अवधेश कुमार वर्मा के नेतृत्व में आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति, सुशील चन्द्र गौतम के नेतृत्व में राष्ट्रीय भागीदारी आन्दोलन समेत दर्जनों संगठनों ने विरोध-प्रदर्शन किया।

जारी है आरक्षण समर्थकों का आंदोलन

उत्तरप्रदेश सरकार के सवर्णों के दबाव में आ जाने के बावजूद पिछड़े वर्ग के छात्रों ने हार नहीं मानी है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आरक्षण समर्थकों का आक्रामक आंदोलन शुरू होते ही सवर्ण मीडिया ने चुप्पी साध ली है। अब वे ना तो आरक्षण के समर्थन में खबरें छाप रही हैं और ना ही विरोध में। बहरहाल, आंदोलनरत छात्रों की मानें तो यह आंदोलन लोकसभा चुनाव तक चलेगा और उसे प्रभावित भी करेगा। 17 सितंबर को इलाहाबाद में आरक्षण समर्थक छात्रों ने पिछड़ा वर्ग महापंचायत करने का ऐलान किया है। अखिलेश सरकार भले ही ‘आरक्षण के नए नियम’ से पीछे हट गई हो लेकिन पिछड़े वर्ग के छात्रों को आरक्षण का सही रास्ता तो उसने दिखा ही दिया है। अब आरक्षण समर्थक छात्रों के ऊपर यह निर्भर करता है कि वे इसके लिए कितना और कहां तक संघर्ष करते हैं। फिलहाल सड़कों पर आंदोलन के साथ-साथ ‘नए आरक्षण नियमों’ से प्रभावित 170 आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

(फारवर्ड प्रेस के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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