दलित परिवार ने मृत पुत्र के अंग दान किए

अश्रूपूरित नेत्रों से माता-पिता ने कहा ‘हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब हम अपने पुत्र को उसकी आंखों से अपनी ओर देखते हुए देख सकेंगे और उसके हृदय को किसी और के शरीर में धड़कता हुआ सुन सकेंगे’।

शिमला : हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के संकटगढ़ गांव के एक दलित परिवार ने 16 जून, 2013 को अपने ‘ब्रेन डेड’, 20 वर्षीय पुत्र के अंग दान कर पांच व्यक्तियों को नया जीवन दिया।

संजय कुमार के पिता बालाराम महेश और मां निर्मला कुमारी ने फारवर्ड प्रेस को बताया कि उन्होंने अपने पुत्र के मृत शरीर को 17 जून, 2013 को दान किया और 18 जून को चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर, जहां उनके पुत्र का इलाज चल रहा था, के डाक्टरों ने उन्हें बताया कि उनके पुत्र की आंखें, हृदय, गुर्दे और यकृत को सफलतापूर्वक जरूरतमंद मरीजों के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया गया है।

बालाराम ने बताया कि 11 जून को उनके पुत्र एक दुर्घटना के शिकार हो गए और डाक्टरों ने उन्हें बताया कि चूंकि उनके पुत्र ‘ब्रेन डेड’ हो चुके हैं इसलिए उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। बालाराम पंचायत सचिव हैं और कई सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं। निर्मला, संकटगढ़ नगर पंचायत की पूर्व अध्यक्षा हैं।

इस पर बालाराम ने कहा, ‘हमारा परिवार समाजसेवा से जुड़ा हुआ है और इसी प्रतिबद्धता के कारण हमने यह निर्णय लिया’। पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ में उनके पुत्र के इलाज के दौरान, अस्पताल के एक कांउसलर ने उन्हें उनके मौत के कगार पर खड़े पुत्र के शरीर को दान देने की प्रेरणा दी, ताकि एक अर्थ में उनका पुत्र जीवित रह सके। बालाराम ने बताया ‘उस समय तो हमें बुरा लगा परंतु बाद में सोच-विचार कर हमने 16 जून को संजय के अंगों को दान करने की स्वीकृति दे दी’। एक मां होने के नाते निर्मला का मन आज भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उनका पुत्र अब इस दुनिया में नहीं रहा। वे कहती हैं, ‘मैं जानती हूं कि मेरा पुत्र दूसरों के शरीर में जिंदा है और मैं जल्दी ही उससे मिलूंगी।’ उन्होंने बताया कि पीजीआई के डाक्टरों ने उनसे संजय की फोटो मांगी है जिसे अस्पताल में प्रदर्शित किया जाएगा ताकि और लोगों को भी ऐसा नेक काम करने की प्रेरणा मिल सके। अश्रूपूरित नेत्रों से माता-पिता ने कहा ‘हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब हम अपने पुत्र को उसकी आंखों से अपनी ओर देखते हुए देख सकेंगे और उसके हृदय को किसी और के शरीर में धड़कता हुआ सुन सकेंगे’।

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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