मुश्किलात से कश्मकश

ब्राह्मणवाद और जातिवाद के खिलाफ प्रतिबद्ध पत्रकारिता की शुरुआत 19वीं शताब्दी में महात्मा फुले के नेतृत्व में सत्यशोधक आंदोलनों के दौर में ही हो गई थी

अनेक दलित-बहुजन बुद्धिजीवी कहते हैं कि यह ठीक समय है, जब दलित-बहुजन अस्मिता और आंदोलन को समर्पित पत्रिकाएं अपना विस्तार करें, क्योंकि आज दलित-बहुजन मध्यम वर्ग एक सामाजिक हकीकत है और उसका विस्तार हो रहा है। ‘फारवर्ड प्रेस’ ने जब दलित-बहुजन प्रकाशनों की वास्तविक स्थिति जाननी चाही तो यह तथ्य सामने आया कि इन प्रकाशनों की जिजीविषा के आधार हैं प्रतिबद्धता और मुहिम के प्रति समर्पण।

ब्राह्मणवाद और जातिवाद के खिलाफ प्रतिबद्ध पत्रकारिता की शुरुआत 19वीं शताब्दी में महात्मा फुले के नेतृत्व में सत्यशोधक आंदोलनों के दौर में ही हो गई थी। 1879 में कृष्णराव भालेकर ने ‘दीनबंधु’ साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया था, 1890 में मुकुंद राव पाटिल ने ‘दीनमित्र’ और 1917 में बालचंद्र कोठारी ने ‘जागरूक’ का प्रकाशन शुरू किया था। हिंदी में अछूतानन्द जी ने 1923 में ‘आदि धर्म’ निकाला तो 1934 में अल्मोड़ा से ‘समता’ अखबार निकला। ये सब प्रयास कुछ ही सालों तक जीवित रहे और धनाभाव में दम तोड़ते गए। डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर ने भी ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘जनता’ नामक पत्रिकाएं क्रमश: 1920, 1927 और 1930 में निकालीं। इसमें सबसे लम्बी उम्र (26 साल) ‘जनता’ की रही, जिसका बाद में नाम बदलकर ‘प्रबुद्ध भारत’ (1956) हो गया और उसका प्रकाशन जारी रहा।

आज भी हिंदी में दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार और पंजाब सहित कई राज्यों से दर्जन दलित-बहुजन अस्मिता और आन्दोलन की पत्रिकाएं निकल रही हैं। ‘भीम पत्रिका’, ‘आम्बेडकर मिशन’, ‘दलित टुडे’, ‘आम्बेडकर इन इण्डिया’, ‘आदिवासी सत्ता’, ‘बयान’, ‘वंचित जनता’ व ‘मूक वक्ता’ जैसी  दर्जनों पत्रिकाओं ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ मुहिम को गति दिलाई है और मानस निर्माण का काम किया है। इनमें ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘हंस’, ‘जन मीडिया’, ‘अपेक्षा’, ‘दलित दस्तक’, ‘सोशल ब्रेनवाश’, ‘फारवर्ड प्रेस’ ‘दलित आदिवासी दुनिया’ आदि ने ‘तथाकथित मुख्यधारा’ में भी अपनी मजबूत उपस्थिति बना रखी हैं, जो मुख्यधारा के द्विज वर्चस्व को तोड़ती रही हैं। इन पत्रिकाओं ने दलित, ओबीसी, स्त्री और आदिवासी को साहित्य तथा समाज के विमर्श और चिंता के केंद्र में लाने का काम किया है। पत्रकारिता के अध्यापक रूपचंद गौतम कहते हैं-‘दलित-बहुजन पत्रिकाएं मानवीय मूल्यों की पत्रिकाएं हैं और उनके संचालन में व्यावसायिकता की जगह आम्बेडकरवादी प्रतिबद्धताएं काम करती हैं। इनके अलावा कुछ ऐसी राजनीतिक पार्टियों और संगठनों की भी पत्रिकाएं हैं, जिनके एजेंडे में शूद्र-अतिशूद्र हैं और जिनका नेतृत्व भी दलित-बहुजन के पास है, जैसे रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी ‘न्याय चक्र’ प्रकाशित करती है, जिसके संपादक स्वयं पासवान हैं।

अपनी प्रतिबद्धताओं से संचालित इन पत्रिकाओं में ‘हंस’ आदि को छोड़ दिया जाए तो वे प्राय: निजी प्रयत्नों, संसाधनों या ब्राह्मणवाद विरोधी प्रतिबद्ध पाठकों के बल पर चल रही हैं। इनकी 300 से 3 हजार तक प्रतियां छपती हैं और पाठक सहयोग के भाव से इन्हें पढ़ते हैं। ‘फारवर्ड प्रेस’ और ‘हंस’ इनमें निश्चित तौर पर अपवाद है, जिसकी लगभग 10,000 प्रतियां छापी जाती हैं। दलित-बहुजन पत्रिकाओं में से ‘बयान’ जैसी कुछेक पत्रिकाएं ही हैं, जिन्हें दिल्ली सरकार सहित सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के विज्ञापन मिलते हैं। ‘आम्बेडकर इन इण्डिया’ के संपादक दयानाथ निगम, जो 1999 से पत्रिका का मासिक प्रकाशन कर रहे हैं, कहते हैं कि ‘हम जैसे पत्रिका छापने वाले लोगों को व्यक्तिगत संपर्कों से तो कुछ विज्ञापन मिल जाते हैं लेकिन सरकारी महकमे में बैठे लोग आम्बेडकर आदि नाम देखते ही उपेक्षा के भाव में आ जाते हैं। आज की उत्तरप्रदेश की सरकार में तो यह प्रवृत्ति और भी भयानक है।’ वहीं पटना से प्रकाशित 28 पेज की मासिक पत्रिका ‘आम्बेडकर मिशन’ के संपादक बुद्ध शरण ‘हंस’ कहते हैं कि ‘हमारी पत्रिका का मूल आधार नेटवर्क है-प्रतिबद्ध नेटवर्क।’ 1993 में जब बुद्ध शरण ‘हंस’ ने पत्रिका प्रकाशित करनी शुरू की थी तब से लेकर अब तक इसकी कापियों की यात्रा 200 से 3000 तक पहुंची है। यही नेटवर्किंग ‘मूक वक्ता’ का भी आधार है। 11 वर्षों से इस पत्रिका की 3 हजार से 5 हजार तक प्रतियां छप रही हैं। कांशीराम के बामसेफ के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष मूलचंद जी इसके प्रकाशक और संपादक हैं तथा बामसेफ ही इसके प्रसार और निरंतरता का मूल आधार है। मूलचंद जी सरकारी विज्ञापनों के लेने की प्रक्रिया को ‘काफी जिल्लत भरा’ बतलाते हैं और इसलिए ‘मूक वक्ता’ के लिए वे प्रयास भी नहीं करते हैं।

दलित-बहुजन आधार की पत्रिकाओं और अखबारों के आर्थिक त्रासदी के संदर्भ में चिंतक एवं पत्रकार अनिल चमडिय़ा कहते हैं कि ‘1878 में ‘द हिन्दू’ की शुरुआत हुई थी और 1893 में रेत्तामलाई श्रीनिवासन ने दलित पत्रिका ‘परायण’ शुरू की थी। 1905 तक ‘द हिन्दू’ की 800 प्रतियां बिकती थीं जबकि प्रकाशन के दो दिनों में ही ‘परायण’ की 400 प्रतियां बिक गईं। ‘परायण’ 1900 तक ही जीवित रही और ‘द हिन्दू’ को खरीदार मिल गए और वह आज तक प्रकाशित हो रहा है।’ तो यह स्थिति हिंदी में प्रकाशित दलित-बहुजन पत्रिकाओं की ही नहीं है। पैंथर आन्दोलन के दौरान से प्रकाशित पत्रिका ‘भूमिका’ लगभग दम तोड़ चुकी है। मुंबई से प्रकाशित ‘दैनिक सम्राट’ शानदार शुरुआत के बावजूद अपना विस्तार नहीं कर पा रहा है। हालांकि बेहतर नेटवर्क और प्रतिबद्धता से बेहतर हासिल भी किया जा सकता है। इसका उदाहरण है मराठा सेवा संघ की मराठी पत्रिका ‘मराठा मार्ग’ जो फुले-आम्बेडकर विचारों की पत्रिका है और नियमित निकल भी रही है। सत्यशोधक आन्दोलन से जुड़ी स्त्रीवादी विचारक नूतन मालवी के अनुसार आज बड़ा मध्यमवर्ग है। बेहतर कमिटमेंट और प्रोफेशनलिज्म के साथ हमारी पत्रिकाएं’ मुख्यधारा’ को चुनौती दे सकती हैं।

एक जो खास बात हिंदी में प्रकाशित इन पत्रिकाओं के संपादकों से या पत्रिका को देखते हुए स्पष्ट होती है वह है वामपंथ से इनके खट्टे-मीठे रिश्ते। कई संपादक वामपंथी हैं लेकिन अधिकांश जमीन पर वामपंथी कार्रवाईयों में ब्राह्मणवाद के वर्चस्व के खिलाफ मुखर हैं। इस बाबत ‘अपेक्षा’ के संपादक तेज सिंह का कहना है कि साहित्य और विचार केन्द्रित ‘अपेक्षा’ के अब तक 43 अंक आ चुके हैं। हमारी पत्रिका ने न सिर्फ महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई है बल्कि कई सैद्धांतिकियां भी दी हैं। हमारा वामपंथ से गहरा संबंध रहा है। मैं खुद भी माकपा में रहा हूं, जहां जरूरत पड़ी है वहां हमारा रुख आलोचनात्मक भी रहा है। ‘अपेक्षा’ ‘भीम पत्रिका’ के संपादक एसआर बाली पर एक अंक लाने जा रही है। वहीं ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक रमणिका गुप्ता का मानना है कि ‘युद्धरत आम आदमी’ के कई अंक दलित-आदिवासी केन्द्रित आए हैं। हमने हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं की दलित रचनाधर्मिता पर अंक लाए हैं। कई नए साहित्यकारों को खोजा है, उन्हें हिंदी जगत से परिचित कराया है। दिल्ली सरकार ने हमें बुलाकर अपना विज्ञापन दिया है। मैं मानती हूं कि किसी दलित-बहुजन के द्वारा निकाली जाने भर से कोई पत्रिका दलित-बहुजन की पत्रिका नहीं हो सकती, उसे आम्बेडकरी-फुलेवादी होना जरूरी होगा। हिंदी साहित्य में दलित-स्त्री विमर्श को केंद्र में लाने के लिए ‘हंस’ को श्रेय दिया जाता है, इसका कारण इसका दिल्ली से निकलना है। 2000 में दिल्ली आने के बहुत पहले से ‘युद्धरत आम आदमी’ ने इस दिशा में काम करना शुरू किया था, तब हमारी पत्रिका हजारीबाग से प्रकाशित हो रही थी।’

(कुछ अन्य दलित-बहुजन पत्रिकाओं की संघर्ष-कथा फारवर्ड प्रेस के अगले अंक में)

 

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित)


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