भारत स्वतंत्र राष्ट्र कैसे बना?

आम्बेडकर निश्चित रूप से वह देख रहे थे जिसे शौरी हमें नहीं बताना चाहते। सन् 1942 तक ब्रिटिश यह निर्णय कर चुके थे कि वे भारत को स्वतंत्र कर देंगे। देरी का कारण भारतीयों के बीच एकता का अभाव था। सवाल सिर्फ हिंदुओं और मुसलमानों के बीच परस्पर अविश्वास का ही नहीं था बल्कि सामंती राजाओं और प्रजातंत्र समर्थकों के बीच टकराव का भी था, जो दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उभरकर सामने आया था

18 अगस्त, 2013 को एनडीटीवी ने भारत की स्वतंत्रता की 66वीं वर्षगांठ के अवसर पर ‘राष्ट्रवाद’ विषय पर एक चर्चा का प्रसारण किया। पैनल में शामिल थे उदारवादी, प्रजातांत्रिक भाजपा नेता जसवंत सिंह, राजनीतिक मनोवैज्ञानिक डाक्टर आशीष नंदी, बॉलीवुड के गीतकार व पठकथा लेखक जावेद अख्तर व राजनीतिक समीक्षक स्वपन दासगुप्ता।

चर्चा की शुरुआत करते हुए जसवंत सिंह ने यह स्वीकार किया कि स्वतंत्र भारत ने ‘राष्ट’ की यूरोपीय अवधारणा को अपनाया। इस अवधारणा का इसके पहले के भारत में कोई स्थान नहीं था। ‘मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि राष्ट्रीयता शब्द को हमने अपनाया है। इस अवधारणा का जन्म वेस्टफेलां में हुआ था। उसके पहले तक केवल राज्य हुआ करते थे…यही कारण है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के पूर्व के काल का भारत का एक भी नक्शा आप को नहीं मिल सकता। कोई नक्शा है ही नहीं।’ किसी हिन्दू, मुसलमान या बौद्ध ने कभी ‘भारत’ का नक्शा नहीं बनाया क्योंकि किसी ने ‘भारत’ को एक राष्ट्र के रूप में देखा ही नहीं।

स्वपन दासगुप्ता ने इस विचार का समर्थन किया। ‘मुझे लगता है कि भारत को आकार देने में यूरोपीय प्रभावों की भूमिका को आगे चलकर कई लोगों ने कम करके आंका। जब हमें स्वतंत्रता मिली तो हम इतने उत्साहित और प्रसन्न थे कि हम यह मान बैठे कि इसे हमने स्वयं पाया है। केवल दो या तीन छोटे-छोटे उदाहरण काफी होंगे। ट्रस्ट की अवधारणा, सरकार को एक ट्रस्टी के रूप में देखने का विचार और यह सोच कि सरकार सभी लोगों के द्वारा, सभी लोगों के लिए बनी है, यह ब्रिटेन की 1688 की महान क्रांति से हमें मिले। यह अवधारणा इसके पहले तक भारत में नहीं थी। इसी तरह, राष्ट्रीयता की अवधारणा को भी हमने यूरोप से आयात किया, विशेषकर पिछली सदी की शुरुआत में।’

तिरुवनंतपुरम् से कांग्रेस सांसद शशि थरूर, भाजपा के बुद्धिजीवी से सहमत हैं। एनडीटीवी के लिए लिखे एक लेख (12.03.2014) में वे कहते हैं, ‘भारत की एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में परिकल्पना-एक ऐसे राष्ट्र के रूप में जो मानवाधिकारों और नागरिकता पर आधारित हो, जिसमें कानून का राज हो और जिसमें कानून की नजर में सभी समान हों-तुलनात्मक दृष्टि से नया और अत्यंत आधुनिक विचार है।’

भारत की स्वाधीनता की जड़ें

स्वतंत्र  भारत का विचार कहां से आया? भारत स्वतंत्र राष्ट्र कैसे बना?

यह विचार आया बाईबल से, जो कि 66 किताबों का संग्रह है और जिसका संकलन 3,400 वर्ष पूर्व, मिस्र से आए यहूदी गुलामों के 12 कबीलों को फिलीस्तीन की धरती पर एक स्वतंत्र और महान राष्ट्र के रूप में बदलने के लिए शुरू हुआ था। भारत में स्वतंत्र राष्ट्र का विचार, ईस्ट इंडिया कंपनी से नहीं आया। यह विचार यहां बाईबल लाई। विलियम कैरी (1761-1834) आधुनिक मिशनरियों के पितामह व आधुनिक बंगाली थे। उन्हें जब यह पता भी नहीं था कि वे मिशनरी बतौर भारत जाएंगे, तब भी उन्होंने मिशनरियों के घोषणापत्र का समर्थन यह तर्क देते हुए किया था कि बाईबल ही वह बीज है, जो गैर-ईसाई विश्व में सभ्य व स्वतंत्र सरकारों को जन्म देगा, जैसा कि उसने यूरोप में किया। इन आपत्तियों का उत्तर देते हुए कि किसी भी प्रकार के कानून से न बंधे समुदाय, विदेशी धर्मों की शिक्षा देने वाले मिशनरियों को मार डालेंगे, कैरी ने लिखा, ‘इस आपत्ति को उन (ईसाई) धर्मप्रचारकों और उनके उत्तराधिकारियों ने कोई महत्व नहीं दिया जो बर्बर जर्मन और गोल लोगों और उनसे भी बर्बर ब्रिटेन निवासियों के बीच गए। उन्होंने इस बात का इंतजार नहीं किया कि इन देशों के प्राचीन रहवासी पहले सभ्य बन जाएं और उसके बाद उन्हें ईसाई बनाया जाए। वे केवल क्रास के सिद्धांत के आधार पर वहां गए और टरटलियन यह दावा कर सके कि ‘ब्रिटेन के वो हिस्से, जिन पर रोम की सेनाएं भी कब्जा नहीं कर सकीं उन पर सुसमाचार ने विजय प्राप्त कर ली-इस सुसमाचार को मिले सौहार्दपूर्ण स्वागत ने ऐसे खुशनुमा माहौल को जन्म दिया जो यूरोपवासियों के साथ लंबे से लंबे अंतर्संबंधों से भी नहीं पैदा हो सकता था…’

वे अंग्रेज जो बाईबल को गंभीरता से नहीं लेते थे, कैरी से असहमत थे। परंतु उनका मिशन अंतत: सफल हुआ। कैरी की मृत्यु के एक वर्ष पहले, सन् 1833 में, लॉर्ड थामस बेबिंग्टन मैकाले-जो कि हिन्दुत्ववादियों के लिए सबसे घृणित साम्राज्यवादी व्यक्तित्व है-ब्रिटेन की संसद को यह विश्वास दिलाने में सफ ल रहे कि ब्रिटेन को भारत पर इस ढंग से शासन करना चाहिए ताकि भारतीयों को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अपना शासन चलाने के लिए तैयार किया जा सके।

प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ स्वर्गीय नानी पालकीवाला ने अपनी पुस्तक ‘वी, द पीपुल’ में मैकाले की भूमिका का वर्णन करते हुए लिखा ‘अगर भारत आज एक स्वतंत्र गणराज्य है तो उसका श्रेय भी ब्रिटिश शासन को जाता है। भारतीयों ने विदेशी प्रभुसत्ता से मुक्ति पाने के लिए बहुत कड़ा संघर्ष किया परंतु यह संभव है कि अगर हमने ब्रिटिश शासन के दौर में स्वतंत्रता के विचार को आत्मसात नहीं किया होता तो भारत आज भी भारतीय राजाओं के प्रभुत्व से मुक्त नहीं हो पाता। मैकाले को ऐसा होने का अंदेशा था। उन्होंने कहा था,’अच्छा शासन देकर हम हमारी प्रजा को इस तरह शिक्षित कर सकते हैं कि आने वाले समय में वे यूरोप की (स्वतंत्र) संस्थाओं की मांग करें। वह दिन जब भी आएगा, ब्रिटेन के इतिहास का सबसे गौरवपूर्ण दिन होगा।’

मैकाले का भारत की स्वाधीनता के पक्ष में ब्रिटेन की संसद में दिए गए वक्तव्य का महत्वपूर्ण हिस्सा इस प्रकार है : ‘क्या हमें भारत के लोगों को इसलिए अज्ञानी बनाकर रखना है ताकि वे हम से दबे रहें? क्या हम ऐसा सोचते हैं कि हम उनमें बिना महत्वाकांक्षा जगाए उन्हें ज्ञान दे सकेंगे? या हम उनमें महत्वाकांक्षा जगाकर उसे पूरा करने का कोई वैध तरीका उपलब्ध नहीं करवाएंगे ? कौन है जो इनमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर हां में दे। परंतु इनमें से किसी एक का उत्तर हर उस व्यक्ति को हां में देना पड़ेगा जो यह मानता है कि हमें स्थानीय निवासियों को स्थाई रूप से उच्च पदों से वंचित रखना है। मुझे कोई डर नहीं है। कर्तव्यपथ मेरे सामने है और यही बुद्धिमत्ता, राष्ट्र की समृद्धि और राष्ट्र के सम्मान का पथ भी है।’

और यह कोरे दावे नहीं थे। भारत की स्वतत्रंता एक मिशन थी क्योंकि ईसा मसीह इस धरती पर इसलिए आए थे ताकि दमन के हर बंधन को तोड़ दिया जाए और जो पराधीन हैं वे मुक्त हो सकें (यशायाह 58:6)। यशायाह को उद्धृत करते हुए ईसा मसीह ने कहा कि ‘प्रभु की आत्मा मुझ पर है, इसलिए कि उसने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिए मेरा अभिषेक किया है, और मुझे इसलिए भेजा है कि बंदियों को छुटकारे का और अंधों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं (लूका 4: 18)। सन् 1838 में मैकाले के नजदीकी रिश्तेदार चाल्र्स ट्रेवेलियन ने भारत को स्वतंत्र करने के लिए मिशनरियों की व्यावहारिक, शैक्षणिक रणनीति का खुलासा किया। अपनी पुस्तक ‘ऑन द एजुकेशन ऑफ  पीपुल ऑफ इंडिया’ में ट्रेवेलियन लिखते हैं, भारत और इंग्लैण्ड के बीच इतनी दूरी है कि उनके आपसी संबंध कभी स्थाई नहीं हो सकते। हम कोई भी नीति क्यों न अपनाएं, हम स्थानीय रहवासियों को उनकी स्वतंत्रता पुन: हासिल करने से नहीं रोक सकते। परंतु उस बिंदु तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। पहला है क्रांति का और दूसरा है सुधार का …(क्रांति) का अंतिम नतीजा होगा हमारे और भारत के रहवासियों के हितों और सोच का पूर्ण अलगाव जबकि दूसरा (सुधार) एक स्थायी गठजोड़ है जो पारस्परिक लाभ और एक दूसरे के प्रति सद्भाव पर आधारित होगा…देश के रहवासी स्वतंत्रता पाएंगे परंतु पहले यह सीखकर कि वे उसका इस्तेमाल कैसे करें और हमें लाभप्रद प्रजा की जगह और अधिक लाभप्रद साथी मिलेंगे…जिन्हें हम प्रसन्न और स्वतंत्र रहने का प्रशिक्षण दे चुके होंगे और जो हमारे ज्ञान व हमारी राजनीतिक संस्थाओं से परिचित होंगे। भारत, ब्रिटिश उदारता का सबसे गौरवपूर्ण स्मारक होगा…’

भारत की स्वतंत्रता संबंधी मिथक

छह दशक से भी लंबे समय से हमारे देश के लोगों को यह पाठ पढ़ाया जा रहा है कि ‘भारत महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अहिंसक आंदोलनों के कारण स्वतंत्र राष्ट्र बन सका।’ यथार्थ यह है कि गांधी जी के डाक्टर भीमराव आम्बेडकर जैसे समकालीन, भारत छोड़ो आंदोलन को पाखण्ड मानते थे। गांधी जी का असली एजेंडा था अपने प्रतिद्वंद्वियों जैसे सुभाषचंद्र बोस और डाक्टर आम्बेडकर को हाशिए पर खिसकाना। परंतु अरुण शोरी, आम्बेडकर पर सच बोलने के लिए हमला करते हैं : ‘जब कांग्रेस के नेता जेलों में सड़ रहे थे तब आम्बेडकर ब्रिटिश सरकार की ओर से रेडियो पर भाषण दे रहे थे…भारत छोड़ो आंदोलन पर जोर देने की बजाय वे यह कह रहे थे कि एक नए भारत के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि स्वतंत्रता देने की शर्त पर ही ब्रिटेन को युद्ध में समर्थन देने की बात क्यों कही जा रही है। यह औचित्यपूर्ण तभी होता जब ‘भारत की स्वतंत्रता के अधिकार को उससे छीनने के लिए अचानक कोई षड्यंत्र रचा गया होता परंतु ऐसे किसी षड्यंत्र का कोई प्रमाण नहीं है।’ उन्होंने कहा कि अगर भारत स्वतंत्र नहीं हो पा रहा है तो इसका कारण भारतीयों के बीच एकता का अभाव है। भारत की स्वतंत्रता के शत्रु केवल भारतीय हैं और कोई नहीं’, आम्बेडकर ने ब्रिटिश वायसराय की काउंसिल के सदस्य बतौर कहा (वर्शिपिंग फाल्स गॉड्स पृष्ठ 102-103)।

आम्बेडकर निश्चित रूप से वह देख रहे थे जिसे शौरी हमें नहीं बताना चाहते। सन् 1942 तक ब्रिटिश यह निर्णय कर चुके थे कि वे भारत को स्वतंत्र कर देंगे। देरी का कारण भारतीयों के बीच एकता का अभाव था। सवाल सिर्फ  हिंदुओं और मुसलमानों के बीच परस्पर अविश्वास का ही नहीं था बल्कि सामंती राजाओं और प्रजातंत्र समर्थकों के बीच टकराव का भी था, जो दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उभरकर सामने आया था। यह उच्च जाति के हिंदुओं और ‘दमित वर्गों के बीच की गहरी खाई भी था।’ गांधी जी का सबसे बड़ा सिरदर्द था कांग्रेस के भीतर एकता का अभाव-सुभाष उग्रवादियों व नरमपंथियों के बीच की दरार, जैसी की उनके और बोस के बीच थी।

भारत की स्वतंत्रता के तथ्य

14 अगस्त, 1941 के पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वे मूर्तिपूजकों/रोमनों के साम्राज्य की अवधारणा को त्याग दें और बाईबल के राष्ट्र के विचार को अपनाएं। उनके बीच का समझौता, जिसे अटलांटिक चार्टर कहा जाता है, में यह कहा गया था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विजेता देश, हारे हुए देशों को अपना उपनिवेश नहीं बनाएंगे बल्कि सभी उपनिवेशों को स्वतंत्रता का अधिकार देंगे।

राष्ट्रों की स्वतंत्रता के अधिकार का सिद्धांत पहली बार सन् 1555 में जर्मनी में उभरा। यह वह समय था जब रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट ल्यूथेरनों के बीच युद्ध का अंत हुआ था। भयावह थर्टी ईयर वॉर (1618-1648) के दौरान स्वाधीनता के सिद्धांत को परिष्कृत किया गया और इसे जॉन एमस पामिनियस, जिन्हें आधुनिक शिक्षा का पितामह भी कहा जाता है, द्वारा वाणी दी गई। बाईबल की राष्ट्र की अवधारणा के कारण ही वेस्टफेलां की शांति संधि संभव हो सकी थी, जिसका हवाला जसवंत सिंह ने एनडीटीवी की चर्चा में दिया था। शांति इसलिए स्थापित हो सकी क्योंकि अपने आपसी मतभेदों के बावजूद, काल्विनिस्टों ल्यूथेरनों और कैथोलिकों ने बाईबल की सत्ता को स्वीकार किया।

अटलांटिक चार्टर के द्वारा रूजवेल्ट ने बाईबल के राष्ट्र के विचार का वैश्वीकरण किया और इससे यूनाईटेड नेशन्स (1945) न कि यूनाईटेड एम्पायर्स के गठन की राह प्रशस्त हुई। स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जब तक कि राष्ट्रों का ‘स्व’ न हो। वे ईश्वर के समक्ष अस्तित्व में न हों और उनके द्वारा लिए गए निर्णय सम्मान दिए जाने के काबिल न हों।

सुभाषचंद्र बोस का मानना था कि हिटलर के साथ जुडऩा अंग्रेजों से मुक्ति पाने का सबसे आसान रास्ता है। महात्मा गांधी सोचते थे कि चूंकि अमेरिका युद्ध में शामिल हो गया है इसलिए हिटलर को जीत हासिल नहीं होगी। वैसे भी, हिंसक संघर्ष से जबरन का खून-खराबा होगा क्योंकि अंग्रेज पहले ही अपने हर उपनिवेश को स्वतंत्रता देने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। स्वतत्रंता प्राप्त करने के लिए केवल इतना काफी था कि भारत के लोग सड़कों पर उतर आएं और अपनी इच्छा से अपने ब्रिटिश शासकों को वाकिफ  कराएं। महात्मा गांधी को भारत छोड़ो आंदोलन की जरूरत इसलिए थी ताकि वे कांग्रेस पर अपना नियंत्रण बनाए रख सकें। उन्हें अपनी छवि बोस जैसे उग्रवादियों से भी अधिक उग्र बनानी थी। गांधी जी की ये हरकतें डाक्टर आम्बेडकर को प्रभावित नहीं कर सकीं। वे उसे राष्ट्रवाद नहीं मानते थे क्योंकि उनका संबंध भारत की स्वतंत्रता से नहीं था।

(फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2014 अंक में प्रकाशित)


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