बहुजन साहित्य का विकास एक ऐतिहासिक परिघटना

आज स्थिति यह है कि दलित साहित्य कोई धारा न बनकर कूप बन गया। ‘ठाकुर का कुआं’ की तरह ‘दलितों का कुआं’ जिस पर कुछ दलित पहरेदारी करते हैं कि कोई गैरदलित कुएं के जगत तक न पहुंच जाए और इसका ‘अमृत’ न चख ले। ऐसी ही तबीयत के कुछ ओबीसी बहुजन साहित्य को ओबीसी साहित्य में परिवर्तित कर देना चाहते हैं और उस पर अपना वर्चस्व रखना चाहते हैं

वरिष्ठ लेखक प्रेमकुमार मणि से प्रेमा नेगी की बातचीत :

बहुजन साहित्य क्या है?

बहुजन साहित्य का अर्थ मेरी समझ से ‘लिटरेचर ऑफ मेनी’ यानी बहुतों का साहित्य है, कुछ लोगों का साहित्य नहीं। और यह भाव है, तब मैं इस बहुजन साहित्य का स्वागत करूंगा। यह भी कहूंगा, यह कोई नया नहीं है। साहित्य तो बहुतों का ही होता है। थोड़े-से लोगों का, और थोड़े से लोगों के लिए, जो साहित्य लिखा गया, वह सामंती साहित्य कहा गया-दरबारी साहित्य कहा गया। यह बहुत चल नहीं पाया। इसे वैसी प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी जो साहित्य को मिलनी चाहिए। मसलन कालिदास के साहित्य को वाल्मीकि या वेदव्यास जैसी प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी। जनता का कंठहार नहीं बन सका कालिदास का साहित्य। निस्संदेह वह सुंदर है, लेकिन कल्याण के भाव वहां कम हैं, मनोरंजन के भाव अधिक हैं। यह कुछ लोगों को केंद्र में रखकर लिखा गया। वाल्मीकि या वेदव्यास ने बहुतों को केंद्र में रखकर लिखा। वाल्मीकि और वेदव्यास की रचनाओं के कई रूप जनभाषाओं में, बोलियों में लिखे गए। यह भी संभव है कि महाभारत और रामायण की कथाएं जनभाषाओं में थीं और वाल्मीकि और वेदव्यास ने उसे शिष्टजनों के लिए उनकी भाषा में फि र से रचा। तो जन और अभिजन के साहित्य का भेद पुराने जमाने से है। आधुनिक जमाने में जन साहित्य को मार्क्सवादी मित्रों ने अपना वैचारिक जामा दिया मार्क्सवादी  वैचारिकी से जन साहित्य संवरकर जब आया, तब उसे प्रगतिशील और जनवादी साहित्य कहा गया। लेकिन जन के साथ यह ‘बहु’ प्रत्यय पहली दफा बुद्ध ने लगाया था इसलिए मार्क्सवादी दौर के अवसान के बाद कुछ साथियों ने बहुजन साहित्य की चर्चा की, तब इसका एक अर्थ यह है कि साहित्य को बुद्ध के सरोकारों और विचारों से जोड़ा जाए। डॉ. आंबेडकर ने बुद्ध के विचारों की आधुनिक व्याख्या की है। तो बड़े परिप्रेक्ष्य में और आधुनिक अर्थों में बहुजन साहित्य का अर्थ होता है साहित्य का फुले-आम्बेडकरवाद से जुडऩा। एक तय वैचारिकी से जुडऩा। मार्क्सवादी जन या जनवादी साहित्य का बहुजन साहित्य में विकसित होना एक ऐतिहासिक घटना ही कही जाएगी। इस विकास को रेखांकित किया जाना चाहिए।

प्रेमकुमार मणि

प्रगतिशील साहित्यकारों पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने शूद्रों और अतिशूद्रों के साहित्य को अपने आलोचकीय संज्ञान में नहीं लिया?

प्रगतिशील साहित्यकारों ने साहित्य को नए अर्थ दिए और श्रमिकों- किसानों के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश की। लेकिन यह सहानुभूति का दौर था। श्रमिक और किसानों के बीच से लेखक बहुत कम थे, न के बराबर। हां, जो लिख-पढ़ रहे थे उनके मन में श्रमिकों और किसानों के लिए सहानुभूति के भाव उमड़े और संघनित हुए। यह राष्ट्रीय आंदोलन का उत्तरकाल था। 1930 के दौर में किसानों, दलितों, अन्य पिछड़े तबकों के आंदोलन उभरने लगे। बुर्जुआ वर्चस्व से आक्रांत राष्ट्रीय आंदोलन इन्हें अंगीकार करने से भरसक कतराता रहा, लेकिन 1936 में उर्दू-हिंदी के कुछ लेखकों ने प्रगतिशील लेखक संघ बनाकर लखनऊ में एक सम्मेलन किया जिसमें अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद ने कहा, ‘जो दलित हैं, वंचित हैं, पीडि़त हैं यह चाहे व्यक्ति हो या समाज, उनकी वकालत करना हमारा फर्ज है।’ मैं समझता हूं प्रगतिशील साहित्य की इस विरासत को हमें छोडऩा नहीं चाहिए। हर चीज का विकास होता है, मेटामॉरफोसिस  होता है। प्रगतिशील साहित्य का विकास बहुजन साहित्य है। मैं इसे इसी रूप में रखना चाहूंगा। बहुजन साहित्य प्रगतिशील साहित्य के विरोध में नहीं है, उसे गतिशील रूप देने के लिए है। हम यह स्वीकारते हैं कि प्रगतिशील साहित्य सामाजिक परिवर्तनों को आत्मसात करने में अक्षम रहा। कायदे से इसे स्पष्ट करने के लिए कम से कम एक सेमिनार का समय चाहिए। निश्चय ही इसके कारण थे, लेकिन आपके प्रश्न कि शूद्र-अतिशूद्रों के साहित्य को अपने आलोचकीय संज्ञान में नहीं लिया, का अर्थ मैं नहीं समझ सका। यहां था शूद्र-अतिशूद्रों का साहित्य, जिसका आलोचकीय संज्ञान नहीं लिया गया। यह ठीक है कि कबीर की रामचंद्र शुक्ल ने उपेक्षा की, लेकिन कुछ ही समय बाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन पर एक स्वतंत्र पुस्तक लिखी। वर्ष 1978 में ही महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण पुस्तक में रामविलास शर्मा ने हीरा डोम की कविता ‘अछूत की शिकायत’ को पूरा का पूरा कोट करते हुए उसको संज्ञान में लिया। विशद् चर्चा की। जीवन की तरह ही साहित्य में भी एक धारा होती है, उसे धारा में रखकर ही समझना चाहिए।

ओबीसी साहित्य की अवधारणा कितनी प्रासंगिक है?

इसे मैं सिरे से खारिज करना चाहूंगा। यह एक कुंठा है। न इसकी कोई विचारधारा है, न हो सकती है। 1970 के दशक में मराठी में दलित
साहित्य उभरा, फुले-आंबेडकर की विचारधारा के साथ। मराठी के स्थापित आधुनिक साहित्य में गांधी-सावरकरवादी रूझानों की यह
प्रतिक्रिया थी। यह बांझ मार्क्सवादी के विरोध में भी एक विद्रोह था, लेकिन दुर्भाग्य से दलित साहित्य धीरे-धीरे शिड्यूल्ड कास्ट लिटरेचर में तब्दील होता गया। इसे मैं दलित साहित्य का पतन मानता हूं। आज स्थिति यह है कि दलित साहित्य कोई धारा न बनकर कूप बन गया। ‘ठाकुर का कुआं’ की तरह ‘दलितों का कुआं’ जिस पर कुछ दलित पहरेदारी करते हैं कि कोई गैरदलित कुएं के जगत तक न पहुंच जाए और इसका ‘अमृत’ न चख ले। ऐसी ही तबीयत के कुछ ओबीसी बहुजन साहित्य को ओबीसी साहित्य में परिवर्तित कर देना चाहते हैं और उस पर अपना वर्चस्व रखना चाहते हैं। बहुजन साहित्य में तो दलित साहित्य भी समाहित है और प्रगतिशील साहित्य भी। मैं नहीं समझता इसे ओबीसी लिटरेचर तक सीमित करना समझदारी की बात होगी। ओबीसी या शिड्यूल्ड कास्ट कानून के शब्द हैं। पिछड़े सामाजिक समूहों को विशेष अवसर देने के लिए इसे एक तय समय के लिए बनाया गया है। इसकी सीमाएं बदलती रह सकती हैं। जैसे बीपीएल (बिलो पावटी्र लेबल) है। जो इस वर्ष बीपीएल में हैं, संभव है अगले साल एपील हो जाएं। यदि ओबीसी साहित्य बन सकता है, तब बीपीएल साहित्य क्यों नहीं ? लेकिन यह ठीक होगा क्या? इस तरह का विभाजन साहित्य में संभव नहीं है। मैंने कई बार कहा है कि रूसी लेखक तोलस्तोय जमींदार घराने से आते थे, उन्होंने उसी तबके पर लिखा भी। लेकिन उनका सािहत्य किसान चेतना का लेखन है। लेनिन ने उन्हें किसान चेतना का लेखक कहा, इसलिए कि उनका दृष्टिकोण किसानों का दृष्टिकोण था।

कुछ साहित्यकार ‘बहुजन’ को सिर्फ राजनीतिक कैटेगरी मानते हैं, आपकी क्या राय है?

बहुजन शब्द में राजनीति नहीं है, एक वैचारिक पृष्ठभूमि जरूर है। 1980 के दशक में सुप्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक कांशीराम ने लंबे विमर्श के बाद आम्बेडकर के दलित का विस्तार बुद्ध के बहुजन के रूप में किया और 1984 में बहुजन समाज पार्टी नामक एक राजनीतिक पार्टी बनायी। डॉ. आम्बेडकर ने अपने जीवन में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन बनाया था और इसी मंच से 1952 का चुनाव लड़ा था। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्होंने इस फेडरेशन को रिपब्लिक पार्टी में तब्दील कर दिया। कांशीराम रिपब्लिकनों के पाखंड को एक अरसे से देख रहे थे। आम्बेडकर के अनुयायियों ने रिपब्लिक पार्टी को तहस-नहस कर दिया था। कांशीराम ने देखा कि दलित बिना पिछड़ी जातियों के कोई बड़ी लड़ाई नहीं जीत सकते। पिछड़ी जातियां भी दलितों से अलग रहकर केवल जातिवादी पाखंड रच रही थीं। कांशीराम ने दलित, ओबीसी, आदिवासी, मायनॅरिटी सबका एक मंच बनाया और इसे बहुजन कहा। यह था परंपरा और प्रगतिशीलता का मणिकांचन संयोग। इसकी एक सुदीर्घ वैचारिक पृष्ठभूमि भी थी। जो इस पृष्ठभूमि से अपरिचित हैं, उन्हें यह खालिस राजनीतिक शब्द प्रतीत होता है। दरअसल, उसी समय दलित साहित्य को भी बहुजन साहित्य में रूपांतरित हो जाना चाहिए था, लेकिन उस वक्त हमारी साहित्यिक पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी। बहुजन साहित्य स्पष्ट तौर पर दलित साहित्य का विस्तार है और इसकी वैचारिकता में बुद्ध, फुले-आम्बेडकर से लेकर अंतोनियो ग्राप्सी और देरिदा भी हैं दुनियाभर के तमाम मुक्तिकामी विचार और संघर्ष बहुजन साहित्य की थाती-धरोहर होनी चाहिए और हर तरह की संकीर्णता से उसे मुक्त होना चाहिए। बहुजन साहित्य का अर्थ होना चाहिए मानव मुक्ति का साहित्य। कुछ लोग इसे जातीय गिरोहबंदी का साहित्य बनाना चाहते हैं, यह दुखद है। दलित साहित्य के अनुसूचित जातिकरण की तरह ही इसका ओबीसीकरण होगा। मैं तो अब भी कहता हूं कि यदि दलित साहित्य का जाति समीकरण से बंधना नहीं होता, तो वह शिड्यूल्ड कास्ट लिटरेचर नहीं बनता, तब बहुजन साहित्य की कोई जरूरत ही नहीं थी।

क्या साहित्य को अलग-अलग जातियों-खेमों में विभाजित कर रचनाकर्म को स्थापित करना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बेहतर है?

नहीं, बिल्कुल नहीं। मैंने इसका कभी समर्थन नहीं किया है। विमर्श के लिए विभेद प्रसंग लाना और उस पर चर्चा करना एक बात है, उसकी हिमायत करना अलग बात। रेणु ने अपने उपन्यास ‘मैला आंचल’ में ‘बारहों बरन’ की चर्चा की है, लेकिन वह नायक बनाते हैं एक अज्ञात कुलशील निर्जात (डिकास्ट) प्रशांत को। यह है चेतना। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने उपन्यास ‘गोरा’ में भी एक ऐसे ही नायक को खड़ा किया है। हमारा आदर्श ऐसा होना चाहिए।

बहुजन साहित्य की अवधारणा के तहत शूद्र, अतिशूद्र, महिला विमर्श और आदिवासी साहित्य को एक ही छतरी के नीचे लाने की बात हो
रही है, इस पर आपकी क्या राय है?

इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। बहुजन साहित्य का उद्देश्य ही होना चाहिए ऐसे तमाम विमर्शो को समेटना, एक जगह लाना। उपेक्षित और उत्पीडि़त राष्ट्रीयताओं और अस्मिता एवं पहचान के लिए अलग-अलग चल रहे संघर्षों को समन्वित करना बड़ी बात होगी। बुद्ध विचार से ज्यादा करुणा पर जोर देते थे। बहुजन साहित्य को भी विचार से अधिक संवेदना पर जोर देना चाहिए। विचारों के साथ तानाशाही और मिथ्याचार उभरने का खतरा रहता है, लेकिन संवेदना इसे खारिज करती है। हां, विचारहीन संवेदना भी लिजलिजी होती है। मुक्तिबोध ने संवेदात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की बात की थी। यह महत्वपूर्ण विचार है। बहुजन साहित्य को इसे स्वीकारना चाहिए।

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन पर आरोप है कि कबीर को खंडन-मंडन का कवि कहकर उनकी न्यायपरक समीक्षा नहीं की गई, इसलिए कबीर के तर्कसंगत मूल्यांकन के लिए ओबीसी आलोचना की जरूरत है?

कबीर विद्वानों और आलोचकों के बूते कभी नहीं रहे। अपने जीवन में भी विद्वानों की नगरी काशी में चौराहे पर खड़े होकर ‘ज्ञानी’ पांडे समुदाय को ललकारते रहे कि तुम मेरे ज्ञान को नहीं समझ सकते। वह मस्त और मुक्त कवि थे। उन्हें जाति-संप्रदाय के कठघरे में खड़ा करना न सिर्फ उनकी तौहीन करना है, बल्कि उनकी सीमा निर्धारित करना भी है। वह इन सबसे हटकर सोचने वाले कवि थे। वे कहते भी हैं : ‘हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध। हद-बेहद दोनों तजै तिनका मता अगाध।। कबीर की समीक्षा- आलोचना के नाम पर उनकी सीमा तय करना उनका सबसे बड़ा अपमान है। जैसे समुद्र और आकाश किसी की मुट्ठी में नहीं समा सकते, कुछ ऐसे ही कबीर भी हैं। वे समीक्षा-आलोचना के मोहताज नहीं हैं। वह असाधारण कवि हैं। उनकी समीक्षा उन दस्तकारों, किसानों और कारीगरों ने उनकेजमाने में ही की थी, जिन्होंने उनकी कविताओं से खुद को मांजकर आध्यात्मिक बनाया था, अपने जीवन को संवारा था और फिर इस उत्स को अपनी मेहनत सेकारीगरी में उतारा था। इसी कारीगरी ने मुगलकाल को शिखर पर पहुंचाया था।

जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी जड़ता का विरोध करते हुए किसानों के आर्थिक हालातों में सुधार का समर्थन किया, मगर प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों की भारी भीड़ के बावजूद उनके लेखन में इन दोनों विचारकों की उपस्थिति दर्ज नहीं है?

पहले तो मैं प्रश्न में ही सुधार करना चाहूंगा। जोतिबा फुले ने किसानों के आर्थिक हालातों में सुधार का समर्थन नहीं किया, बल्कि इसकी प्रस्तावना रखी। प्रश्न से लगता है कि किसानों के सुधार के लिए काम हो रहे थे और फुले ने उनका समर्थन किया। फु ले वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस प्रसंग को समाज के सामने रखा। फुले ने महाराष्ट्र में राष्ट्रीय नवजागरण के बीच ब्राह्मणवाद विरोध को शामिल किया। यह एक नई बात थी। उस समय इसे लोगों ने नहीं समझा। महाराष्ट्र में भी नहीं। यह लगभग सौ सालों तक इतिहास के हाइबरनेशन में रहे। 1970 के दशक में गेल ऑम्वेट और कुछ अन्य विद्वानों ने उन्हें अपने अध्ययन के माध्यम से सामने लाया। तब से लोग उन्हें जानने लगे। अब धीरे-धीरे उनका महत्व प्रकट हो रहा है। निस्संदेह वह अद्भुत वैचारिक-सांस्कृतिक योद्धा थे। हिंदी में उनका कुछ था नहीं। मराठी से अनुवाद रूप में 1990 के इर्द-गिर्द उनका लेखन आया। तब से उनकी चर्चा हो रही है। इसके पूर्व उनकी चर्चा कैसे होती? इसके लिए किसी को दोष देना मूर्खता है। फु ले को ही बुद्ध के बारे में बहुत कम जानकारी थी, उतनी जानकारी नहीं थी जितनी डॉ. आम्बेडकर को थी। आम्बेडकर यदि फुले  के समय में होते तो उन्हें भी बुद्ध के बारे में जानकारी नहीं होती, क्योंकि बुद्ध विषयक बहुत सी सामग्री बीसवीं सदी के आरंभ में ही आ सकी। पुरातत्व की खुदाइयों से अशोक और मोहनजोदड़ों की जानकारी मिली। इन सबके अभाव में हमारा इतिहास विषयक ज्ञान सीमित था। यह सब जानकर ही ऐसे विषयों पर हमें टिह्रश्वपणी करनी चाहिए। ऐसी चीजों के लिए प्रगतिशील धारा के आलोचकों को दोष देना नाइंसाफी  होगी। फुले ही क्यों मलयाली के सुप्रसिद्ध कवि कुमारन आसान के बारे में ही हिंदी के लोग आज भी कितना जानते हैं। हमारे यहां अनुवाद के काम कम हुए हैं। इस ओर लोगों का ध्यान ही नहीं जाता। हम क्या कर रहे हैं, इस पर ध्यान नहीं जाता, दूसरों ने क्या नहीं किया, इस ओर हमारा ध्यान खूब जाता है।

स्त्री मुक्ति के सवाल पर ईमानदारी से चिंतन व्यक्त करने वालों में जोतिबा फुले निर्विवाद मान्य हैं, जबकि कबीर, गांधभारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद समेत कुछ आधुनिक सोच रखने वाले विचारक-लेखकों पर सवाल उठते रहे हैं। आप क्या कहना चाहेंगे?

स्त्री विमर्श, महिला मुक्ति और नारीवादी आंदोलन अलग-अलग विषय हैं। जोतिबा फु ले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं की मुक्ति के लिए बहुत काम किए। इनके कार्यों की चर्चा भी अब होने लगी है, लेकिन भारत में नारीवादी आंदोलन की आधारशिला पंडिता रमाबाई ने रखी। उनकी अभी उतनी चर्चा नहीं होती। पच्चीस-तीस साल पहले पंडिता रमाबाई पर मैंने एक लेख लिखा था, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनकी उतनी चर्चा अब भी नहीं होती। वह गांधी युग के आरंभ होने तक जीवित रहीं। उनके कार्य उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने फुले के। फिर भी वे हाशिए पर हैं। नारीवादी कार्यकर्ताओं को उन पर कार्य करना चाहिए। हिंदी के जिन लेखकों-कवियों की चर्चा आपने की है, उनका स्त्री विमर्श महत्वपूर्ण है। गुप्त जी ने ‘साकेत’ में उर्मिला को रेखांकित किया या फिर यशोधरा में बुद्ध को स्त्री दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की। प्रसाद जी ने ‘धु्रवस्वामिनी’ में स्त्री के एक नए रूप को रखा। प्रेमचंद ने एक नई स्त्री चेतना को हमारे समक्ष रखा। इन सबका महत्व है और रहेगा। यह सब हमारी विरासत है और इसे नजर अंदाज करना तंगख्याली होगी। इस विरासत को लेकर हम आगे बढ़ेंगे, वहीं टिके नहीं रहेंगे। प्रसाद या गुप्त जी के जमाने में हम टिक नहीं सकते। उनकी समीक्षा करने में हमें उदारतापूर्वक विचार करना होगा। हमें उन्हें उनके समय में ही रखकर देखना चाहिए। हमें उनकी आलोचना में समय न गंवाकर उनकी चेतना को आगे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। प्रेमचंद की झुनिया अपने घर-मोहल्ले में संघर्ष कर रही थी, आज की झुनिया को संसद में संघर्ष करना होगा।

 

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई  2014 अंक में प्रकाशित)


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