एक अवधारणा का निर्माण काल

जोतिबा फुले और आम्बेडकर दोनों ने मुख्य रूप से अलग-अलग शब्दावली में शूदों-अतिशूद्रों तथा स्त्री की गुलामी और इससे मुक्ति के लिए इनकी एकता की बात की है। हिंदी में ‘बहुजन साहित्य’ का जन्म प्रकारांतर से इसी विचार के सांस्कृतिक-सामाजिक आधार की खोज की जरूरत पर बल देने के लिए हुआ है

यह फारवर्ड प्रेस की तीसरी बहुजन साहित्य वार्षिकी है। वर्ष 2012 में हमने इसे पहली बार जोतिबा फुले और भीमराव आम्बेडकर की जयंती के अवसर पर अप्रैल महीने में प्रकाशित किया था। वर्ष 2013 में भी यह अप्रैल में ही आई। इस साल अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होने के कारण हमें लगा कि अप्रैल महीने के अंक को साहित्य की बजाय ‘बहुजन राजनीति’ को समर्पित करना चाहिए। मई में प्रकाशित हो रही यह वार्षिकी भी भारत के इन्हीं दोनों महापुरुषों को समर्पित है, जिन्होंने देश में आधुनिक बहुजन सोच के लिए जमीन तैयार की।

जोतिबा फुले और आम्बेडकर दोनों ने मुख्य रूप से अलग-अलग शब्दावली में शूदों-अतिशूद्रों तथा स्त्री की गुलामी और इससे मुक्ति के लिए इनकी एकता की बात की है। हिंदी में ‘बहुजन साहित्य’ का जन्म प्रकारांतर से इसी विचार के सांस्कृतिक-सामाजिक आधार की खोज की जरूरत पर बल देने के लिए हुआ है। वर्ष 2012 में जब हमने पहली बार बहुजन साहित्य वार्षिकी प्रकाशित की थी, उस समय यह विचार बहुत नया था इसलिए कुछ प्रमुख हिंदी लेखकों को इस बारे में समझाना कठिन साबित हुआ था। लेकिन पिछले दो सालों में स्थितियां काफी बदली हैं। अनेक पत्रिकाओं ने इस विषय पर चर्चा की। इस विचार के लिए हमें प्रशंसा और निंदा दोनों खूब मिली। साहित्य में निंदा भी चुप्पी से भली होती है। इस मामले में ‘बहुजन साहित्य’ का विचार सौभाग्यशाली रहा कि नामवर सिंह के अपवाद को छोड़कर प्राय: सभी प्रमुख हिंदी लेखकों ने इस मामले में अपना कोई न कोई मत बनाया तथा उसे किसी न किसी रूप में प्रकट भी किया। फारवर्ड प्रेस के इस अंक में भी आप मराठी लेखक शरण कुमार लिंबाले तथा अनेक प्रमुख हिंदी लेखकों को इस विषय पर विभिन्न मत-मतांतरों के साथ पाएंगे। कुछ किंतु-परंतु, के साथ सभी इस पर लगभग एकमत हैं कि बहुजन साहित्य की प्राचीन धारा की खोज होनी चाहिए तथा इसे समकालीन साहित्य की प्रमुख धारा बनना चाहिए, जिसमें दलित, आदिवासी, ओबीसी व स्त्री का साझा साहित्य शामिल हो।

कुछ लेखकों की आपत्ति ओबीसी साहित्य को लेकर है। इस साहित्य के ‘ओबीसी’ नामकरण से मैं भी आरंभ से ही सहमत नहीं हूं। ‘ओबीसी’ एक संवैधानिक-कानूनी पद है, जिसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई जातियों को राज्य द्वारा कुछ भौतिक लाभ देने के लिए गढ़ा गया है। अलग-अलग प्रदेशों में इस पद के अंतर्गत ब्राह्मण, राजपूत और वैश्यों की भी अनेक उपजातियां शामिल हैं। जाहिर है, इन जातियों के सांस्कृतिक-सामाजिक साझेपन का कोई पुख्ता आधार नहीं है। इसलिए ‘ओबीसी’ साहित्य के नामकरण को लेकर तो आपत्ति जायज है, लेकिन मध्यवर्ती जातियां भारतीय समाज की एक विशाल वास्तविकता है, इसे आप कैसे अनदेखा कर सकते हैं ? एक अंग्रेजी कहावत का सहारा लेकर कहूं तो कमरे में अगर हाथी मौजूद हो तो हमें अन्य बातों को छोड़कर सबसे पहले उसी पर बात करनी होगी। भारत में मध्यवर्ती जातियां सबसे बड़ा सामाजिक समूह हैं, जो ‘ओबीसी’ नाम संवैधानिक-कानूनी समूह का भी प्रमुख हिस्सा हैं। यही कारण है कि इस समूह के साहित्य को कुछ लोग संभवत: सुविधा के लिए ‘ओबीसी साहित्य’ का नाम दे रहे हैं। आम बोलचाल की भाषा में तो यह चल सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि साहित्य में हमें इसे ‘मध्यवर्ती जातियों का साहित्य’ कहना चाहिए, या फिर इसके लिए और अधिक स्पष्ट अर्थछवि वाला कोई शब्द ढूंढना चाहिए। उम्मीद है आने वाले समय में हम इस पर और बहस-मुबाहिसे से गुजरेंगे तथा इस समूह के साहित्य के लिए एक सर्वमान्य नामकरण संभव हो सकेगा। हां, यह तो बहुत स्पष्ट है कि बहुजन साहित्य की अवधारणा इस विशाल समूह के साहित्य की स्वायत्त पहचान के बिना असंभव है।

मध्यवर्ती जातियों और दलित जातियों के बीच प्राचीन काल से ही साझेपन का मजबूत आधार रहा है। मनुवादी व्यवस्था में दोनों के लिए निचली जगहें निर्धारत थीं। छूत और अछूत का भेद सिर्फ द्विजों की सुविधा के लिए था, ताकि रोजमर्रा के कामों में वे इन दोनों समूहों का अलग-अलग तरीके से उपयोग कर सकें। पिछले लगभग 2500 सालों के ज्ञात इतिहास के नायकों को देखें-बुद्ध, कौत्स, मक्खली गोशाल, अजित केशकंबली, कबीर, शाहू जी महाराज, जोतिबा फुले, आम्बेडकर, कांशीराम। दक्षिण भारत के नायकों को छोड़ भी दें तो भी यह सूची बहुत लंबी हो सकती है। लेकिन आप कैसी भी सूची बनाएं, एक बात तो यह दिखती है कि इनमें से अधिसंख्य मध्यवर्ती जातियों में ही पैदा हुए हैं, जिन्हें आज ओबीसी कहा जाता है। दूसरी बात यह स्पष्ट दिखती है कि ये नायक चाहे मध्यवर्ती जातियों में पैदा हुए हों या दलित जातियों में, सबने इन दोनों समुदायों तथा स्त्रियों की साझी गुलामी से मुक्ति की बात की। आज की परिस्थितियों में वर्तमान व्यवस्था की सबसे अधिक मार खा रहे आदिवासी भी इस अवधारणा के अंतर्गत आएंगे।

जरूर पढ़ें

मैं आपको इस वार्षिकी में विशेष रूप से मराठी लेखक शरण कुमार लिम्बाले और हिंदी लेखक प्रेमकुमार मणि का साक्षात्कार व आदिवासी मामलों के जानकार अश्विनी कुमार पंकज का लेख पढने की सलाह देना चाहूंगा। लिम्बाले बताते हैं कि जिस प्रकार दलित साहित्य मराठी से चलकर हिंदी में आया, ठीक उसी प्रकार पिछले कई सालों से मराठा साहित्य में बहुजन साहित्य को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए सम्मेलन हो रहे हैं। वे यह भी बताते हैं कि फुले-आम्बेडकर से प्रेरणा लेकर आज ओबीसी विमर्श का एक नया दौर शुरू हो चुका है। मराठा साहित्य में ओबीसी ने दलितों के साथ मिलकर यह दौर शुरू किया है। इसका बड़ा फायदा दलित आंदोलन को यह हुआ है कि अब ओबीसी दलितों के साथ मिल रहे हैं, जिससे प्रगतिशील ताकतों को दिशा मिल रही है। यद्यपि प्रेमकुमार मणि ने ओबीसी साहित्य के विचार को खारिज किया है, इसके बावजूद उल्लेखनीय यह है कि वे बेहद तर्कपूर्ण ढंग से बहुजन साहित्य को प्रगतिशील साहित्य का विकास मानते हैं। अश्विनी कुमार पंकज ने अपने लेख में आदिवासी साहित्य और दलित साहित्य की संवेदना को रेखांकित किया है। जब तक हम इस संवेदना के अंतर को नहीं समझेंगे और उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं देंगे तब तक हम इस साहित्य के मर्म को नहीं समझ पाएंगे।

युवा कहानीकार संदीप मील की एक उम्दा कहानी, रत्नकुमार सांभरिया के उपन्यास अंश तथा कुछ बेहतरीन बहुजन कवियों की कविताओं के साथ यह वार्षिकी मुख्य रूप से ‘बहुजन साहित्य’ की अवधारणा पर मत-मतांतर प्रस्तुत कर रही है। इस अंक में बिहार के लालू युग के साहित्य की द्विज दृष्टि पर अरुण नारायण की आलोचना को भी आप पर्याप्त विचारोत्तेजक पाएंगे। फारवर्ड प्रेस के मुख्य संपादक आयवन कोस्का भी इस अंक में एक अनुसंधान-आधारित लेख के साथ मौजूद हैं, जिसमें उन्होंने फुले द्वारा भक्तिकाल के कवियों को खारिज किए जाने की विवेचना की है तथा ‘भक्ति’ साहित्य की क्रांतिकारिता पर सवाल उठाए हैं। फुले के समकालीन अन्य समाज सुधारकों जैसे रानाडे ने भक्त कवियों की रचनाओं को बहुत महत्व दिया था। निश्चित रूप से यह हिंदी के साहित्य विमर्श में एक नए अध्याय की तरह है, जो आलोडऩ पैदा करेगा। आखिर फारवर्ड प्रेस इसी मौलिक सोच और नए विमर्शों के लिए जाना जाता है। मैं यह नहीं कहता कि हमारे पास अंतिम सत्य है, लेकिन भक्ति आंदोलन पर नए सिरे से विचार तो होना ही चाहिए। हम इस विषय पर आगामी अंकों में बहस चलाने के लिए भी प्रस्तुत हैं। जरूरत है अनुसंधान आधारित लेखों की।

जरूरत है अनुसंधान आधारित लेखों की

हम न सिर्फ फारवर्ड प्रेस की आगामी साहित्य वार्षिकी में बल्कि सामान्य अंकों में भी बहुजन साहित्य की अवधारणा को विकसित करने वाले शोधपरक आलोचनात्मक लेख प्रकाशित करना चाहेंगे। हमारे पास आपके लिए एक अच्छी खबर है। इस अंक से हमें आईएसएसएन नंबर (2348-9286) भी मिल गया है। विश्वविद्यालयों में शोध कर रहे युवा लेखक तथा कुछ प्राध्यापक इसके लिए हम पर लगातार दवाब बना रहे थे। दरअसल, यूजीसी ने एक नियम बना दिया है, जिसके तहत वे अकादमिक क्षेत्र में उन्हीं लेखों को मान्यता देते हैं, जो आइएसएसएन नंबर वाली पत्रिका में छपा हो। जैसा कि आप जानते होंगे कि अकादमिक क्षेत्रों में पिछले सालों में बहुजन युवाओं की संख्या तेजी से बढ रही है। मुझे विश्वास है कि मानविकी, समाज विज्ञान, इतिहास तथा साहित्य के अनुशासनों में उच्च शिक्षा में आने वाले ये युवा अपनी मेहनत, त्वरा और जमीन से जुड़े जीवनानुभव के कारण अगले अधिकतम पांच सालों में बहुजन के साहित्य को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करेंगे और उसे भारतीय साहित्य और संस्कृति में उसका उचित स्थान दिलवाएंगे। ‘बहुजन साहित्य’ की अवधारणा तो इसकी शुरुआत भर है।

 

(फारवर्ड प्रेस, बहुजन साहित्य वार्षिक, मई  2014 अंक में प्रकाशित)


बहुजन साहित्य से संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए फॉरवर्ड प्रेस की किताब बहुजन साहित्य की प्रस्तावनादेखें। यह हिंदी के अतरिक्‍त अंग्रेजी में भी उपलब्‍ध है। प्रकाशकद मार्जिनलाइज्डदिल्‍लीफ़ोन : +919968527911

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