दलित-बहुजन के समर्थन में ‘चलो ईएफएलयू’

गत् 12 मई को, ‘चलो ईएफएलयू’ के आहवान के चलते, उस्मानिया विश्वविद्यालय व हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र जुलूस के रूप में ईएफएलयू परिसर पहुंचे। उन्होंने मांग की कि तीनों विद्यार्थियों का निलंबन समाप्त किया जावे और कुलपति सुनैना कुमार अपने पद से इस्तिफा दें।

बहुत समय नहीं हुआ जब ‘सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेस’, हैदराबाद को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देकर उसका नामकरण ‘इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेस यूनिवर्सिटी’ किया गया। तब तक, इस संस्थान का परिसर एक शांत स्थान हुआ करता था जहां केवल किताबों या अनुसंधान में डूबे विद्यार्थी नजर आते थे। विद्यार्थियों की संख्या बहुत कम हुआ करती थी और वे उस्मानिया विश्वविद्यालय-जिसमें यह संस्थान स्थित था-के विद्यार्थियों से घुलते-मिलते तक नहीं थे-बाहरी दुनिया तो दूर की बात है। परंतु हालात रातों-रात बदल गए। इस छोटे से संस्थान को अपने खोल से बाहर निकलना पड़ा। संस्थान में अचानक विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हो गई। और ये सब अलग-अलग पृष्ठभूमि से थे व इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के विद्यार्थी शामिल थे। विद्यार्थियों की संख्या तो बढ़ गई परंतु वहां उपलब्ध सुविधाएं व परिसर का आकार वही बना रहा है। सुविधाओं के विस्तार के काम में भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आईं। विद्यार्थियों व प्रबंधन के बीच अविश्वास का भाव बढ़ता गया। छात्र राजनीति गर्मा गई और इसका नेतृत्व निम्न जातियों के विद्यार्थियों ने संभाला। संस्थान प्रशासन-जो कि अब तक बिना किसी शोर-शराबे या विरोध के, शांत अकादमिक वातावरण का आदी था-ने इस आंदोलन के प्रति तिरस्कारपूर्ण रवैया अपनाया और उसे कुचलने का प्रयास किया।

विवाद मार्च के महीने में तब शुरू हुआ जब पुस्तकालय के रीडिंग रूम को 24 घंटे खोले रखना बंद कर दिया गया। विद्यार्थियों ने लगभग एक सप्ताह तक विरोध किया परंतु प्रशासन ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी। नौंवे दिन, विद्यार्थी जब पुस्तकालय पहुंचे तो उन्होंने उसे बंद पाया। उन्होंने जबरदस्ती अंदर घुसने की कोशिश की। इस प्रयास में कांच का एक दरवाजा टूट गया। प्रशासन ने इसके लिए तीन विद्यार्थियों को दोषी ठहराया और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बगैर, उन्हें लंबी अवधि के लिए निलंबित कर दिया। यह घटनाक्रम अप्रैल का है। छात्र यूनियन का दावा है कि प्रशासन के पास इन विद्यार्थियों को दोषी ठहराने के लिए न तो कोई गवाह है और ना ही सुबूत। पुस्तकालय कर्मियों ने यह लिखकर दिया है कि वे उन विद्यार्थियों को नहीं पहचानते जिन्होंने दरवाजा तोड़ा।

यह मात्र संयोग नहीं है कि दोषी ठहराए गए तीनों विद्यार्थी वे हैं जो प्रशासन की हठधर्मी व उसके कथित भ्रष्टाचार के विरोध के अगुवा थे। शायद यह भी संयोग नहीं है कि वे तीनों दलित बहुजन हैं- मोहन धाखनाथ, सतीश नैनाला व सुभाष कुमार। हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ व दलित-बहुजन ने उनके निलंबन की निंदा की है। गत् 12 मई को, ‘चलो ईएफएलयू’ के आहवान के चलते, उस्मानिया विश्वविद्यालय व हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र जुलूस के रूप में ईएफएलयू परिसर पहुंचे। उन्होंने मांग की कि तीनों विद्यार्थियों का निलंबन समाप्त किया जावे और कुलपति सुनैना कुमार अपने पद से इस्तिफा दें। विरोध प्रदर्शन करने वालों में चुक्का रमैय्या, एम वेद कुमार, विमालक्का, व्ही संध्या व पीएल विश्वेश्वरात सहित अनेक शिक्षाविद् व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। ईएफ एलयू परिसर पहुंचने के बाद प्रदर्शनकारियों ने वहां बीआर आंबेडकर की एक मूर्ति की स्थापना की। विद्यार्थी 19 मई को परिसर में महाधरना आयोजित करने जा रहे हैं।

 

(फारवर्ड प्रेस के जून, 2014 अंक में प्रकाशित)


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