श्रेणियों के स्थायित्व को नकारने वाले इतिहासविद

गैर-ब्राह्मण श्रेणी ने भारतीयों की एकता को चुनौती दी। ठीक उसी तरह, सन् 1990 के दशक में तमिलनाडू में दलित राजनीति के उदय ने गैर-ब्राह्मण श्रेणी को अस्थिर कर दिया

मेरे पीएचडी गाईड और द्रविड़ आंदोलन, जनसंस्कृति, कृषि अर्थव्यवस्था, जाति, राष्ट्र व राजनीति के आलोचनात्मक इतिहासकार, प्रोफेसर एमएसएस पाण्डियन का नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में गत 10 नवम्बर को देहांत हो गया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।

वे जेएनयू के इतिहास अध्ययन केंद्र में समकालीन इतिहास के प्राध्यापक थे। उसके पहले, वे अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों में कार्य कर चुके थे। इनमें मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज शामिल है। वे मद्रास विश्वविद्यालय से कृषि अर्थव्यस्था में पीएचडी थे और उन्होंने इतिहास, राजनीति व जनसंस्कृति आदि विषयों पर उल्लेखनीय कार्य किया। प्रोफेसर पाण्डियन से मेरा सबसे पहले साबका तब पड़ा जब मैनें राष्ट्र, जाति, भाषा व सबाल्टर्न बौद्धिक इतिहास जैसे विषयों पर उनके अत्यंत लोकप्रिय व्याख्यान सुने। वे एक प्रतिभाशाली शिक्षक थे और अपने दो घंटे के साप्ताहिक व्याख्यान के लिए पूरे सप्ताह तैयारी करते थे। उनके व्याख्यान अत्यंत सुसंगत व बोधगम्य हुआ करते थे। वे हम छात्रों को प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करते थे। हम उनकी तीखी टिप्पणियों का बेसब्री से इंतजार करते थे, जो कि अक्सर हमें हमारे शोध के विषय पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर देती थीं।

यथार्थ का निषेध

उन्होनें अर्थशास्त्र पर अपने शोध की शुरुआत, तमिलनाडू के एक इलाके नन्चिल्नाडू की कृषि अर्थव्यवस्था पर अपनी पीएचडी थीसिस लिखने से की।

उनके शोध प्रबंध को तत्कालीत हरित क्रांति से उपजी उस बहस के संदर्भ में देखा गया, जो कि ‘उत्पादन के साधनों’ पर केंद्रित थी। हरित क्रांति के दौरान, खाद्यान्न उत्पादन में अपेक्षित बढ़ोत्तरी नहीं हुई। ऐसा क्यों हुआ, उसके दो अलग-अलग कारण बताए जाते थे। ‘तकनीकी-आर्थिक स्पष्टीकरण’ यह था कि कृषि में लगने वाली उत्पादक सामग्री की पर्याप्तता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी योजना नहीं बन सकी। यही सरकार का भी कहना था। दूसरी ओर, मार्क्सवादी अध्येता, जो कि ‘उत्पादन के साधन’ शिविर में थे, का कहना था कि गांवों में व्याप्त अर्द्ध-सामंती उत्पादन संबंधों के कारण हरित क्रांति असफल हुई। मार्क्सवादी अध्येताओं का कहना था कि अधिशेष उत्पादन का इस्तेमाल, जमींदारों ने साहूकारी और व्यापार जैसी अनुत्पादक गतिविधियों में किया।

प्रोफेसर एमएसएस पाण्डियन

पाण्डियन (द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ एग्रेरियन चेंज: नन्चिल्नाडू 1880-1939 : 1990) इस बहस में कूद पड़े। जहां वे ‘उत्पादन के साधन तर्क’ को ‘तकनीकी-आर्थिक तर्क’ पर तरजीह देते थे वहीं वे उत्पादन के साधन शिविर की इस बात के लिए निंदा भी करते थे कि भारतीय कृषि के ‘ठोस यथार्थ’ पर ध्यान न देते हुए, यह शिविर माक्र्स और लेनिन के सिद्धांत, यांत्रिक ढंग से लागू कर रहे हैं। पाण्डियन के शब्दों में ”उत्पादन के साधन बहस में सिद्धांत पर एकतरफा और जरूरत से ज्यादा जोर था। इस हद तक कि यथार्थ, बहस में से गायब ही हो गया था’।

इस अध्ययन में उन्होंने माओ के लेखन को उद्धृत किया। इस तरह, वे उत्पादन के साधन शिविर के अध्येताओं से मतभिन्नता रखते थे और यह मानते थे कि उन अध्येताओं ने परिवर्तन के मुख्य वाहकों के आंतरिक विरोधाभासों को महत्व नहीं दिया। कुल मिलाकर, पाण्डियन ने हमें मार्क्सवादी श्रेणियों की सीमाओं से परिचित करवाया और इसका मुख्य कारण यह था कि उनमें यथार्थ और आंतरिक विरोधाभासों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया जाता था।

सिनेमा और राजनीति

अर्थशास्त्र में पीएचडी करने के बाद उन्होंने राजनीति व जनसंस्कृति के क्षेत्र में पदार्पण किया। उनका उद्देश्य था ‘एमजीआर परिघटना’ को समझना। एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने सन् 1936 से तमिल फिल्मों में काम करना शुरू किया। सन् 1953 से 1972 तक एमजीआर, डीएमके के सदस्य रहे। उनकी फिल्मी सितारे के तौर पर लोकप्रियता को भुना कर, डीएमके ने जमकर वोटों की फसल काटी। डीएमके, राजनैतिक संवाद के लिए सिनेमा का इस्तेमाल करती थी। जैसा कि पाण्डियन (‘द इमेज ट्रेप: एमजी रामचंद्रन इन फिल्मस् एण्ड पॉलिटिक्स’, 1992) लिखते हैं कि रामचंद्रन की सिनेमाई छवि को राजनीति में हस्तांतरित कर दिया गया और इससे उनकी बड़े पर्दे की छवि असली जान पडऩे लगी। दूसरे शब्दों में, रामचंद्रन की गरीबों के मददगार नायक की सिनेमाई छवि का इस्तेमाल, जनता को आकर्षित करने और उसके वोट पाने के लिए किया गया।

अपनी जबरदस्त लोकप्रियता के बल पर एमजीआर तमिलनाडू के मुख्यमंत्री बन गए और सन् 1987 में अपनी मृत्यु तक, क्षेत्रीय राजनीति के सर्वेसर्वा रहे। पाण्डियन की दृष्टि में एमजीआर का मुख्यमंत्रित्व काल (1977-1987), समकालीन तमिल इतिहास का सबसे ‘अंधकारपूर्ण’ युग था। उन्होंने रामचंद्रन की सबाल्टर्न संस्कृति को कमजोर करने, मतभिन्नता को कुचलने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए कड़ी आलोचना की। मेरे विचार में पाण्डियन की ‘इमेज ट्रेप’ का मुख्य योगदान है ऐसे अध्ययनों की आवश्यकता को प्रतिपादित करना, जो यह बताएं कि शासक वर्ग किस तरह सबाल्टर्न वर्गों से सहमति प्राप्त करने के ढांचे का निर्माण करता है। अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा, ”मेरे विचार से, तमिलनाडू के समकालीन राजनैतिक इतिहास में एमजीआर परिघटना अध्ययन का विषय हो सकती है। इसका अध्ययन इसलिए किया जाना चाहिए ताकि अब तक अनछुए रहे इस क्षेत्र की पड़ताल की जा सके और यह समझा जा सके कि श्रेष्ठी वर्ग जिस तरह की राजनीति करता है, उसके लिए वह उन लोगों की सहमति का उत्पादन कर लेता है, जिन पर उसका प्रभुत्व होता है। इस तरह, एमजीआर परिघटना पर इस लेख का एक विशिष्ट अकादमिक संदर्भ भी है’।

गैर-ब्राह्मण आंदोलन

गैर-ब्राह्मण राजनीति से उनके गहरे जुड़ाव ने ही शायद पाण्डियन को द्रविड़ आंदोलन का इतिहास लिखने और गैर-तमिल पाठकों तक उसे पहुंचाने की प्रेरणा दी। द्रविड़ आंदोलन के अपने शोधपूर्ण इतिहास में वे ‘ब्राह्मण’ व ‘गैर-ब्राह्मण’, इन दो श्रेणियों की चर्चा करते हुए यह बताते हैं कि किस तरह गैर-ब्राह्मण श्रेणी का निर्माण, भारतीय राष्ट्रवाद के विरोध में किया गया था क्योंकि इस राष्ट्रवाद ने 20वी सदी की शुरूआत में जातिगत व सामाजिक सुधारों को नजरअंदाज किया।

सन् 1916 में टी.एम. नायर व पिट्टी थिआग्राया चेट्टी सहित कई ‘प्रमुख’ राष्ट्रवादियों ने मद्रास प्रेसिडेंसी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया। इसके बाद उन्होंने एक गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र जारी किया, जिसमें यह कहा गया था कि अगर अंग्रेज भारत को स्वराज्य देते हैं तो उसके नतीजे में ‘देश में ब्राह्मणों की तानाशाही स्थापित हो जाएगी’ क्योंकि यद्यपि वे आबादी का केवल तीन प्रतिशत हैं, तथापि औपनिवेशिक व्यवसायों और अफसरशाही पर उनका पूर्ण नियंत्रण और प्रभुत्व है।

पाण्डियन ने कैम्ब्रिज स्कूल और गैर-ब्राह्मण पहचान के समर्थकों, दोनों की कड़े शब्दों में निंदा की। केम्ब्रिज स्कूल की इसलिए क्योंकि उसने गैर-ब्राह्मण पहचान को ‘मूर्खतापूर्ण व अस्पष्ट’ अवधारणा बताते हुए खारिज कर दिया और इस पहचान के समर्थकों की इसलिए क्योंकि वे इस श्रेणी को स्थायी मानते थे। पाण्डियन का कहना था कि किसी भी पहचान का निर्माण, इतिहास के विशिष्ट कालखंड में होता है और उसे नित उभरती नई पहचानों से लगातार चुनौती मिलती रहती है।

उदाहरणार्थ, गैर-ब्राह्मण श्रेणी ने भारतीयों की एकता को चुनौती दी। ठीक उसी तरह, सन् 1990 के दशक में तमिलनाडु में दलित राजनीति के उदय ने गैर-ब्राह्मण श्रेणी को अस्थिर कर दिया। पाण्डियन ने लिखा, ”दलितों की आवाज ने एकरुप और एकीकृत गैर-ब्राह्मण पहचान में दरारें डाल दी हैं क्योंकि उसने ऐसी अन्य कई पहचानों को जिंदगी दी है, जो अब तक गैर-ब्राह्मण पहचान का हिस्सा बनी हुई थीं”। कहने का मतलब यह है कि वे यह नहीं मानते थे कि कोई भी पहचान अनादिकाल के लिए स्थिर है और उनके लिए राजनीति का अर्थ था सत्ता के विभिन्न स्वरूपों के बीच अनवरत प्रतिस्पर्धा।

अतीत का अ-राष्ट्रीयकरण

किसी भी श्रेणी को स्थायी न मानने के उनके सिद्धांत ने उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा की समालोचना करने की प्रेरणा दी। ई.व्ही. रामासामी, जो कि तमिलनाडू के स्वाभिमान आंदोलन के नेता और कांग्रेस के कट्टर विरोधी थे, के बारे में लिखते हुए पाण्डियन (‘डिनेशनलाईजिंग द पास्ट’, इकोनामिक एण्ड पालिटिकल वीकली, 1993) ने कहा कि रामासामी, जो पेरियार के नाम से लोकप्रिय हैं, ने अतीत के ‘राष्ट्रवादीकरण’ की आलोचना की और राष्ट्रवाद को अतीत से विलग कर दिया। दूसरे शब्दों में, पेरियार के अनुसार, ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों ने भारत के गौरवपूर्ण इतिहास के मिथक का प्रचार इसलिए किया ताकि शेष समाज पर उनका प्रभुत्व बना रहे। यहां यह महत्वपूर्ण है कि पाण्डियन के अनुसार, पेरियार ने न केवल भारतीय राष्ट्रवाद के मिथक को चूरचूर किया वरन् प्राचीन तमिल अतीत के निर्माण पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए।

इसी तर्क को उन्होंने अपने प्रसिद्ध लेख ‘नेशल इम्पोसिबल’ (ईपीडब्ल्यू 2009) में आगे बढ़ाते हुए राष्ट्र निर्माण की उन प्रक्रियाओं पर तीखे हमले किए, जिनमें ‘एकरूपता’, ‘समानता’, ‘अपवर्जन’, ‘हिंसा’ और ‘विरोधाभास’ की भूमिका रहती है। राष्ट्र-राज्य की उनकी समालोचना की पृष्ठभूमि में भारत और श्रीलंका द्वारा की गई हिंसा और नस्लीय शुद्धिकरण का प्रयास भी था। अंत में पाण्डियन ने 200 साल पुराने राष्ट्र-बढ़कर, ‘अ-प्रादेशिक कल्पना’ का समर्थन किया।

हमने इस लेख में पाण्डियन के कुछ प्रमुख सिद्धांतों की चर्चा की है। परंतु इस संक्षिप्त श्रंद्धाजलि में उनके जटिल लेखन के सभी पक्षों को समेटना संभव नहीं है। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके लेखन को पढ़े-समझें और आलोचनात्मक विचारक के तौर पर उनकी विरासत को आगे बढ़ाएं।

 

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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