फारवर्ड विचार, अगस्‍त, 2015

यह मात्र संयोग नहीं है कि पिछले अक्टूबर में, एफ़पी पर हुए प्रायोजित हमले की जडें एक प्रमुख विश्वविद्यालय में थीं. यह एक मान्य सिद्धांत है कि जब भी रोशनी की ताकतें आगे बढ़तीं है, अन्धकार की प्रतिक्रियावादी ताकतें उनपर हल्ला बोलतीं हैं

“टाउन एंड गाउन”. ये दो शब्द या शब्द-युग्म, जिनमें ‘एंड’ का भावार्थ बनाम है, इंग्लॅण्ड में विश्वविद्यालयों और उनके आसपास के समुदाय के बीच के तनावपूर्ण रिश्तों के परिचायक हैं. उस समय, उच्च शिक्षा केवल श्रेष्ठी वर्ग का विशेषाधिकार थी और शिक्षाविदों (जो सन १९६० के दशक तक गाउन पहनते थे) व सम्बंधित नगरवासियों में पटती नहीं थी. यह श्रेष्ठी वर्ग और आमजनों के बीच के अनेक अंतरों में से एक था. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही ब्रिटेन के मेहनतकश समुदाय को उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश मिला.

August'15एक तथ्य, जिसकी जानकारी शायद कम ही लोगों को होगी, वह यह है कि न केवल भारत वरन एशिया के पहले डिग्री प्रदान करने वाले विश्वविध्यालय सीरामपोर कॉलेज की स्थापना सन १८१८ में विलियम केरे और सीरामपोर मिशन ने की थी और इस संस्थान के दरवाज़े सभी जतियों और दोनों लिंगों के लिए खुले थे. परन्तु, १८५७ के बाद से, ब्रिटिश माडल पर आधारित भारत के आधुनिक विश्वविध्यालय, श्रेष्ठी वर्ग के अभेद्य किले बन कर रह गए. फर्क सिर्फ यह था कि ब्रिटिश ‘वर्ग’ का स्थान भारतीय ‘जाति’ ने ले लिया था. दक्षिण भारत के इतिहास के अग्रणी अध्येता फ्राईकेनबर्ग लिखते हैं कि यद्यपि शिक्षा ने “भारतीय समाज के विविध तत्वों को एकीकृत कर, अलग-अलग वफादारियों वाले लोगों को एक बंधन में बाँधा” तथापि भारतीय विश्वविद्यालयों के स्नातक “स्वच्छ जातियों से और मुख्यतः ब्राह्मण थे”. इन्हीं वर्गों का ब्रिटिश औपनिवेशिक और रियासतों की सरकारों में बोलबाला रहा और बाद में स्वाधीन भारत में भी.

पहले अनुसूचित जातियों-जनजातियों और बाद में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण के प्रावधान के प्रभाव को इसी संदर्भ में देखा और आंकलित किया जाना चाहिए. इस माह की आवरण कथा में, फॉरवर्ड प्रेस. एक नयी पेशकदमी में, मंडल-२ (२००६) – जब भारत सरकार ने उच्च व व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रावधान किया- के कारण भारतीय विश्वविद्यालयों के कैम्पसों के बदलते परिदृश्‍य पर नज़र डाल रही है. प्रमोद रंजन के मार्गदर्शन में, संजीव चंदन के नेतृत्व वाली एक टीम ने उन परिवर्तनों का खाखा खींचा है, जो भारतीय विश्वविध्यालयों में स्पष्ट देखे जा सकते हैं. इस सन्दर्भ में अधिक गहरे, मात्रात्मक अध्ययनों (जो अब तक नहीं हुए हैं) की ज़रुरत हैं परन्तु एफ़पी का फोकस गुणात्मक परिवर्तनों पर है.

पिछले कई सालों से एफपी उन विभिन्न घटनाओं, आन्दोलनों, विद्याथियों की राजनैतिक विजयों व सांस्कृतिक परिघटनाओं पर नज़र रखता आया है, जिनके नतीजे मैं विश्वविध्यालयों के कैम्पसों में यह परिवर्तन आया है और बहुजन विद्यार्थियों की संख्या व उनके संगठन एक प्रभावी स्तर तक पहुँच गए हैं. जैसा कि यूूपीएससी परीक्षा के ताज़ा नतीजे (देखें फोटो फीचर) बताते हैं, सफल उम्मीदवारों में से ५२ प्रतिशत बहुजन हैं और इनमें से कई ने संयुक्त मेरिट लिस्ट में भी उच्च स्थान हासिल किया है. यह योग्यता और सामाजिक न्याय के कथित परस्पर विरोधाभास की कलई खोलता है.  यह साफ़ है कि बहुजन छात्रों और उम्मीदवारों ने यह दिखा दिया है कि उनमें योग्यता की कोई कमी नहीं है.

इस विषय का चयन मात्र संयोग नहीं है. हमारे पाठकों और लेखकों में से अनेक शिक्षक और विद्यार्थी हैं, विशेषकर स्नातकोत्तर स्तर के. उनकी मांग के चलते ही हमनें आईएसएसएन नंबर प्राप्त किया ताकि शोधकर्ता अपने शोधपत्रों और शोधप्रबंधों में एफ़पी को उद्धृत कर सकें. सच तो यह है कि एफ़पी के सभी (छह वर्षों के) अंकों की सजिल्द प्रतियों की शोध हेतु जबरदस्त मांग है. मुझे नहीं मालूम कि भारत की कितनी पत्रिकाओं को अपने पाठकों का इतना प्रेम हासिल होगा और उनकी इनकी मांग होगी.

यह मात्र संयोग नहीं है कि पिछले अक्टूबर में, एफ़पी पर हुए प्रायोजित हमले की जडें एक प्रमुख विश्वविद्यालय में थीं. यह एक मान्य सिद्धांत है कि जब भी रोशनी की ताकतें आगे बढ़तीं है, अन्धकार की प्रतिक्रियावादी ताकतें उनपर हल्ला बोलतीं हैं. परन्तु हम महात्मा फुले (और अब भारतीय गणराज्य) के इस आदर्श वाक्य में विश्वास करते हैं कि सत्यमेव जयते.

 

अगले माह तक .. सत्‍य में आपका
आयवन कोस्‍का

फारवर्ड प्रेस के अगस्त, 2015 अंक में प्रकाशित

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