भारतीय प्रगतिशीलों का पाखंड

भारत के वामपंथी, जाति की बुराई से लडऩे में पूरी तरह विफल रहे हैं। केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों, जहां उन्होंने कई दशकों तक राज किया है, में भी उन्होंने जातिगत भेदभाव को समाप्त करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया

आप किसी भी दिशा में चलें, जाति की बुराई आपको अपने सामने खड़ी दिखाई देगी। जब तक इस बुराई को मारा नहीं जाता तब तक आप न तो राजनीतिक सुधार कर सकते हैं और ना ही आर्थिक सुधार।…हिंदुओं के आचार-व्यवहार पर जाति का अत्यंत घातक प्रभाव पड़ा है। जाति ने लोगों में परस्पर प्रीतिभाव को नष्ट कर दिया है। जाति ने व्यापक समाज के लिए परोपकार करने की प्रवृत्ति को समाप्त कर दिया है। जाति ने जनमत का निर्माण असंभव बना दिया है।…सदगुण जातिग्रस्त हो गए हैं और नैतिकता, जाति की सीमाओं में बंध गई है। जो पात्र हैं, उन्हें सहानुभूति नहीं मिलती। गुणी व्यक्तियों का कोई सम्मान नहीं है। ज़रूरतमंदों के लिए परोपकार नहीं किया जाता।…परोपकार किया जाता है, परंतु वह जाति से शुरू होकर जाति पर खत्म हो जाता है। एक हिंदू में यह क्षमता ही नहीं है कि वह किसी व्यक्ति के गुणों को, उसकी जाति से अलग करके देख सके’’डॉ. आंबेडकर

हाल में जब मैं आंबेडकर का ‘ऐनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जाति का उन्मूलन) पर भाषण-जो दिया नहीं गया-को एक बार फिर पढ़ रहा था तब मुझे ऐसा लगा कि 1936 में उन्होंने समाजवादियों से जो प्रश्न पूछे थे, वे आज कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। जो मुद्दे और प्रश्न इस भाषण में उठाए गए थे, उनपर विचार करने या उनका रचनात्मक उत्तर देने का प्रयास समाजवादियों और वामपंथियों ने कभी किया ही नहीं। यही कारण है कि स्वतंत्रता के 68 साल बाद भी वामपंथी केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं और ना ही वे हमारी असमान सामाजिक व्यवस्था में ऐसे सुधार ला पा रहे हैं, जिनसे देश के बहुसंख्यक लोगों की उन्नति हो सके।

जो प्रश्न आंबेडकर ने पूछे थे, वे ये थे ”क्या आप सामाजिक व्यवस्था में सुधार लाए बिना आर्थिक सुधार ला सकते हैं? क्या यह कहा जा सकता है कि भारत का सर्वहारा वर्ग-जो अति निर्धन है-गरीब और अमीर के अलावा, किसी और भेद को नहीं जानता? क्या यह कहा जा सकता है कि भारत के गरीब, जाति और पंथ व ऊँच-नीच के भेदभाव को नहीं जानते-समझते? अगर तथ्य यह है कि वे इसे समझते हैं, तब इस तरह के सर्वहारा वर्ग से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह एक होकर अमीरों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाएगा? क्या सर्वहारा वर्ग की एकता के बगैर कोई क्रांति हो सकती है?’’

भारत के वामपंथी, जाति की बुराई से लडऩे में पूरी तरह विफल रहे हैं। केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों, जहां उन्होंने कई दशकों तक राज किया है, में भी उन्होंने जातिगत भेदभाव को समाप्त करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया और ना ही उन्होंने कभी वंचितों या तथाकथित नीची जातियों के किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री या पार्टी का महासचिव बनने दिया। वंचितों और नीची जातियों का कर्तव्य केवल यह था कि वे ‘अपनी’ पार्टी को सत्ता में लाएं और ऊँची जातियों के लोगों को ‘अपनी ओर से’ शासन करने दें। उन्हें कभी शासन करने का अवसर नहीं दिया गया।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि केरल के कई ‘शिक्षित’ ईसाई और मुसलमान यह कहते नहीं थकते कि उनकी पृष्ठभूमि ऊँची जाति की है, क्योंकि उनके जिन पूर्वजों ने ईसाई धर्म या इस्लाम अंगीकार किया था वे ब्राह्मण थे! इस तरह, लगभग हर ‘शिक्षित’ ईसाई या मुसलमान यह दावा करता है कि उसकी नसों में ब्राह्मणों का खून दौड़ रहा है। उनके ‘शिक्षित’ होने के बावजूद, वे इस ऐतिहासिक तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि जातिगत दमन से मुक्ति के लिए दमितों और वंचितों ने ही हिंदू धर्म छोड़कर ईसाईयत अथवा इस्लाम को अपनाया था। केरल में वामपंथी काफी प्रभावशाली हैं और कई बार वहां सरकार बना चुके हैं। परंतु देश के तथाकथित सबसे शिक्षित राज्य के लोगों की सामूहिक सोच को न तो वो जाति की अवधारणा और ना ही जातिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त करा सके। आखिर क्या कारण है कि इतनी शैक्षणिक प्रगति और राज्य में तथाकथित प्रगतिशील वामपंथियों का जबरदस्त प्रभाव होने के बाद भी, वहां के लोग जाति के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाए हैं? इसका कारण यह है कि वामपंथियों ने कभी जाति के खिलाफ संघर्ष में रूचि ही नहीं दिखाई। केरल 58 साल पुराना राज्य है और इनमें से 29 साल वाममोर्चे ने वहां राज किया। परंतु एक भी दलित वहां का मुख्यमंत्री नहीं बन सका!

Diksha_Bhumi_50th_large-737252जो मैं कहना चाह रहा हूं वह यह है कि हमारी शिक्षा या पारंपरिक प्रगतिशील सोच, जाति की बुराई को मारने में हमारी मदद नहीं करती। उल्टे, वह तथाकथित ऊँची जातियों के लोगों को उनकी जाति और उनके अतीत पर गर्व करना सिखाती है। वह ईसाईयों और मुसलमानों को अपनी ऊँची जाति के होने की कहानियां गढऩा सिखाती है। वह दलितों को यह सिखाती है कि वे अपने अतीत-जिसमें सदियों तक उनके साथ भेदभाव किया गया-से घृणा करें। वह उन्हें आंबेडकर को भगवान का दर्जा देकर अपनी जातिगत पहचान पर ज़ोर देना सिखाती है (सलीना प्राक्कनम नामक एक महिला दलित कार्यकर्ता ने अपनी आत्मकथा में बताया है कि किस तरह उन्हें अपने कालेज की पढ़ाई इसलिए छोडनी पड़ी क्योंकि उनके शिक्षक उन्हें नीची निगाहों से देखते थे। और यह देश के सबसे ‘शिक्षित’ व ‘विकसित’ राज्य केरल में हुआ)। नतीजा यह है कि जाति की बुराई, जिसे आंबेडकर मारना चाहते थे, और मज़बूत और यहां तक अपराजेय बन गया। और उसे ताकत दी ऊँची जातियों, ईसाईयों, मुसलमानों और दलितों ने भी! आंबेडकर वह दूरदृष्टा थे जिन्होंने कहा था, ”यद्यपि मैं हिंदू पैदा हुआ था परंतु मैं आपको सत्यनिष्ठा से यह आश्वासन देता हूं कि मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा’’। और वे हिंदू के रूप में नहीं मरे। आज हम उनके विचारों का इस्तेमाल, दलितों, ओबीसी व कथित ऊँची जातियों को भी, सच्चा मानव बनाने के लिए कर सकते हैं। इसकी जगह, उनका इस्तेमाल पहचान की राजनीति के प्रतीक के रूप में किया जा रहा है। नि:संदेह हमें पहचान की राजनीति की आवश्यकता है परंतु यह केवल एक साधन होना चाहिए, जिसका साध्य हो जाति का उन्मूलन।

गांधी, जो कहते थे कि भारत गांवों में बसता है, की विरासत पर नगरवासियों ने कब्जा कर लिया और देश का शासन संभाल कर, गांवों को बर्बाद कर दिया। आंबेडकर, जो जाति का उन्मूलन करना चाहते थे, को आज एक दलित प्रतीक के रूप में देखा जाता है; एक ऐसे महान भारतीय के रूप में नहीं, जो अपने देशवासियों को दमघोंटू जाति व्यवस्था से मुक्त करवाना चाहता था। वामपंथियों के पास इतना समय ही नहीं है कि वे आंबेडकर और फुले के विचारों को पढ़ें-समझें और उनके ज़रिए लोगों तक पहुंचें। इसकी जगह, उन्होंने मार्क्‍स और सोवियत संघ पर अपना समय बर्बाद किया। आज भी, दलित राजनीति, स्त्रीवाद और पर्यावरणवाद ‘मुख्यधारा’ की भारतीय वामपंथी पार्टियों के लिए अछूत विषय हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि वामपंथी उसी तरह गायब होते जा रहे हैं जैसे सोवियत संघ गायब हो गया।

आज भारत के लोगों के सामने जो सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है वह है गांधी को शासक वर्ग और आंबेडकर व फुले को चंद दलित गिरोहों के चंगुल से मुक्त कराना और भारत के संबंध में दोनों की मिलीजुली सोच को पर्यावरण संरक्षण की आज की आवश्यकता से जोडऩा। आप सहित कोई राजनैतिक दल इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

आज से 80 साल पहले, आंबेडकर आज के समाजवादियों या वामपंथियों से कहीं अधिक क्रांतिकारी थे। उन्होंने लिखा था कि ”बेहतर तो यही होता कि हिंदुओं में पुरोहित वर्ग को समाप्त कर दिया जाता परंतु चूंकि ऐसा करना असंभव प्रतीत होता है इसलिए कम से कम इतना तो किया ही जाना चाहिए कि पुरोहिताई पैतृक न रहे। जो भी व्यक्ति हिंदू धर्म का आचरण करता है, उसे पुरोहित बनने का अधिकार होना चाहिए। ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए कि कोई हिंदू तब तक पुरोहित बनने का पात्र नहीं होगा, जब तक वह राज्य द्वारा निर्धारित परीक्षा पास न कर ले और राज्य उसे पुरोहिताई करने की सनद न दे दे’’ (ऐनिहिलेशन ऑफ कास्ट)।

जाति या लिंग, आखिर क्यों किसी व्यक्ति के पुरोहित बनने में बाधक होने चाहिए? आज भी, दलितों, ओबीसी और महिलाओं को हमारे मंदिरों के गर्भगृह में प्रवेश की इजाजत नहीं है और फिर भी हम यह दावा करते हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र हैं!

जैसा कि आंबेडकर ने ‘ऐनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ के अंतिम भाग में लिखा था आज की सबसे महती आवश्यकता है कि हम ”अपने धर्म को एक नया सैद्धांतिक आधार दें-एक ऐसा आधार जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों या संक्षिप्त में प्रजातंत्र के अनुरूप हो’’।

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब फासीवाद प्रजातंत्र की आत्मा को कुचल रहा है और प्रजातंत्र को, असहमति, बहुवाद और विविधता जैसी उसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं से विहीन किया जा रहा है। जैसा कि आंबेडकर ने कहा था, ”‘प्रजातंत्र केवल शासन का एक स्वरूप नहीं है। वह मुख्यत: मिलजुल के रहने का तरीका है, वह संयुक्तता का अनुभव है। मूलत: वह अपने साथी मनुष्यों के प्रति आदर और सम्मान का भाव है।’’

फिर दलितों के घरों को आग के हवाले कैसे किया जा सकता है? दलितों को मंदिरों में प्रवेश करने के लिए जिंदा कैसे जलाया जा सकता है? लोगों को अपनी पसंद का खाना खाने के लिए पीट-पीटकर कैसे मारा जा सकता है? छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार कर उनकी हत्या कैसे हो सकती है?

यूनेस्को की ‘एजुकेशन फॉर ऑल ग्लोबल मानिटरिंग रिपोर्ट 2013-14, टीचिंग एंड लर्निंग : अचिविंग क्वालिटी फॉर ऑल’ के अनुसार भारत में 28.7 करोड़ अशिक्षित वयस्क हैं, जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे बड़ी अशिक्षित आबादी है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन की 2014 की वार्षिक रपट के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा-19.66 करोड़-कुपोषित लोग रहते हैं। भारतीय राज्य की कारपोरेट-परस्त नीतियों के कारण, सन 1991 से असहाय भारतीय किसानों की आत्महत्या का जो दौर शुरू हुआ था, वह अब तक थमा नहीं है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार, 1995-2011 की अवधि में देश में 2,90,740 किसानों ने आत्महत्या की-अर्थात औसतन 18,171 प्रति वर्ष ने! अपने लेख ”कारपोरेट सोशलिज्मस् टू जी ओर्जी’’ (द हिंदू, 7 मार्च, 2011) में पी. सांईनाथ लिखते हैं, ”2005-06 से लेकर पिछले 6 सालों में भारत सरकार ने 3,74,937 करोड़ रूपए का कारपोरेट इनकम टैक्स माफ कर दिया। एक ओर इतनी बड़ी रकम को कारपोरेटों को दान कर दिया गया तो दूसरी ओर प्रणव मुखर्जी के ताज़ा बजट में कृषि क्षेत्र के आवंटन में हज़ारों करोड़ रूपए की कमी की गई।’’

वर्तमान केंद्र सरकार कारपोरेट जगत की सेवा में हाथ बांधे खड़ी है। कारपोरेट जगत की धन की लिप्सा के शिकार होंगे दलित, आदिवासी, धर्मनिरपेक्षता, बहुवाद, पर्यावरण और देश की समावेशी व मिलीजुली संस्कृति। जब तक आंबेडकर ने हमें 80 साल पहले जो सिखाया था, हम उस पर अमल नहीं करते, तब तक जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक हिंसा के दानव हम पर हावी रहेंगे।

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