जम्मू-कश्मीर : रेवडिय़ां नहीं, सत्ता हो साध्य

अगर स्वाधीनता के दशकों बाद भी ओबीसी, अनुसूचित जातियों व जनजातियों को उनके संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं तो इसका कारण यह है कि वे ऊँची जातियों के हिन्दुओं व ऊँची जातियों के मुसलमानों को अपना मत और अपना धन, दोनों, देते आ रहे हैं

सन् 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद, जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ ब्राह्मणों ने ब्राह्मण राजनीतिज्ञों से यह शिकायत की कि केन्द्र सरकार, अर्धसैनिक बलों और अन्य संस्थाओं में ओबीसी कोटे के बैकलॉग की पूर्ति के लिए विशेष भर्ती अभियान चला रही है और इसमें ऊँची जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों को आवेदनपत्र तक भरने नहीं दिया जा रहा है। ब्राह्मण राजनेता इस अपमान – जिसका कारण केन्द्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण था – को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने तुरत-फुरत एक बैठक बुलाई और कानून का विस्तार से अध्ययन किया। परंतु वे कुछ न कर सके क्योंकि भर्तियां केन्द्र सरकार द्वारा की जा रहीं थीं। उसके बाद, उन्होंने अन्य ऊँची जातियों के नेताओं के साथ एक और बैठक की।

उस स1652015224649521मय 1994 का एसआरओ 126 लागू था और राज्य सरकार ने ओबीसी कोटा का केवल दो प्रतिशत ओबीसी उम्मीदवारों के लिए छोड़ा था। जहां केन्द्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण था, वहीं सत्ताधारी नेशनल कांफे्रस ने इसमें से 20 प्रतिशत पिछड़े क्षेत्र के निवासियों (आरबीए) और तीन प्रतिशत वास्तविक नियंत्रण रेखा के निवासियों (आरएएलसी) के लिए आरक्षित कर दिया था। इस असंवैधानिक निर्णय के विरूद्ध प्रदेश के ओबीसी ने उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। उनका कहना था कि जाति व वर्ग विरासत में प्राप्त होते हैं और अगर कोई व्यक्ति नीची जाति में जन्म लेता है, तो सामाजिक पिछड़ेपन का कलंक कभी उसका पीछा नहीं छोड़ता। परंतु यह बात आरबीए व आरएएलसी जैसे भौगोलिक वर्गों के बारे में सही नहीं है। जम्मू-कश्मीर के ओबीसी ने ‘पिछड़े क्षेत्र’व ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा से जुड़े क्षेत्र’को सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में शामिल करने का कड़ा विरोध किया। मंडल आयोग ने सन् 1979-80 में राज्य का दौरा किया था और उसने इस प्रकार के क्षेत्र-आधारित आरक्षण की सिफारिश नहीं की थी। यहां यह महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने केन्द्र सरकार की सेवाओं में आरबीए और आरएएलसी आधारित आरक्षण को मान्यता नहीं दी है।

इसके बाद ऊँची जातियों के नेताओं ने एक योजना बनाई। वे एक नया आरक्षण अधिनियम और नए आरक्षण नियम बनाना चाहते थे। उन्होंने नए एसआरओ 294 में नियम 21(2) समाविष्ट कर दिया, जिसके अनुसार ‘जो व्यक्ति पिछड़े व वंचित वर्ग का होने के आधार पर किसी लाभ का दावा कर रहा है, उसे यह साबित करना होगा कि तत्समय उसके अभिभावक, वास्तविक रूप से उसी पेशे में हैं, जिसके आधार पर लाभ का दावा किया जा रहा है’। परिणामस्वरूप, जब तक यह एसआरओ लागू रहा, पिछड़े वर्गों के सदस्य ओबीसी प्रमाणपत्र के लिए आवेदन ही नहीं कर सके। एक भी ओबीसी उम्मीदवार को राज्य या केन्द्र सरकार की नौकरी नहीं मिली क्योंकि वे ओबीसी, जो पारंपरिक जाति-आधारित व्यवसायों में रत थे, शिक्षित नहीं थे और जिन्हे आवश्यक शैक्षणिक अहर्ताएं प्राप्त थीं, वे ओबीसी प्रमाणपत्र के लिए आवेदन ही नहीं कर सकते थे क्योंकि उनके अभिभावकों ने बहुत समय पहले जाति-आधारित पेशों से तौबा कर ली थी।

फिर सन् 2008 में राज्य की कांग्रेस-पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) सरकार ने एसआरओ 144 जारी किया, जिसमें ‘अभिभावकों के पेशे’को ‘जन्म की जाति’से प्रतिस्थापित कर दिया गया और संबंधित एजेन्सी को निर्देश दिया गया कि इस नए आधार पर ओबीसी प्रमाणपत्र जारी किए जाएं। प्रदेश के सभी पिछड़े वर्गों ने इस निर्णय का स्वागत किया और ऐसे जश्न मनाया मानो सरकार ने उन्हें कोई बहुत बड़ा तोहफा दे दिया हो। ओबीसी यह नहीं समझ सके कि यह उनका अधिकार था, जिसे इसी कांग्रेस-पीडीपी सरकार ने तीन साल पहले अपहृत कर लिया था और तब से उनके अधिकार पर कुंडली मारकर बैठी थी। उन्हें यह भान नहीं हुआ कि मनुवादी-ब्राह्मणवादी कलम ने उसके पहले के तीन सालों में, लाखों ओबीसी को उनके संवैधानिक मूलाधिकार से वंचित कर दिया था। इस तरह के अधिकांश उम्मीदवार नौकरी के लिए आवेदन करने की आयु सीमा को पार कर चुके थे।

अगर हम स्वाधीनता के बाद के 68 सालों के इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता चलेगा कि जम्मू-कश्मीर के लगभग सभी मुख्यमंत्री या तो ऊँची जातियों के हिन्दू थे या ऊँची जातियों के मुसलमान। वहां के मूल निवासी भारतीयों को उनकी नस्ल व जाति के आधार पर भेदभाव के संत्रास से गुजरना पड़ा। शायद भारत ही दुनिया का एकमात्र ऐसा प्रजातांत्रिक देश है जहां के निवासियों को उन अधिकारों को प्राप्त करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, जिन्हें संविधान ‘मूल अधिकार’के रूप में परिभाषित करता है। यही नहीं, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और सरकार को यह निर्देश दिया कि लोगों को उनके अधिकार एक निश्चित समय सीमा के अंदर उपलब्ध करवाए जाएं, तब भी प्रभावित लोगों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। मूल भारतीयों-अर्थात ओबीसी, अनुसूचित जातियों/जनजातियों व धर्मांतरित अल्पसंख्यकों-को अपने मूल संवैधानिक अधिकारों को पुन: प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए?

24 सितंबर, 1944 को मद्रास में बोलते हुए डॉ. बीआर आम्बेडकर ने कहा, ”हमारे अंतिम लक्ष्य को समझिए। हमारा अंतिम लक्ष्य है इस देश का शासक बनना। इस लक्ष्य को अपने घरों की दीवारों पर लिख लीजिए ताकि आप इसे कभी न भूलें। हम चन्द नौकरियों या कुछ छोटे-मोटे लाभों के लिए संघर्ष नहीं कर रहे हैं। हमें एक बड़े लक्ष्य को हासिल करना है और वह लक्ष्य है इस भूमि का शासक बनना’’। 4 अक्टूबर, 1945 को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन की कार्यकारी समिति को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ”राजनीति, पिछड़े वर्गों की धमनियों में रक्त की तरह बहनी चाहिए’’। चूंकि कांग्रेस, जो कि वर्चस्वशाली जातियों का भोंपू थी, की राजनीति पिछड़े वर्गों के हितों बल्कि उनके अस्तित्व के लिए भी खतरा थी, इसलिए आंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के सभी पीडि़तों का एक व्यापक आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया।

यह स्पष्ट है कि जब तक ओबीसी, अनुसूचित जाति या जनजाति का एक भी व्यक्ति, किसी ऊँची जाति के हिन्दू या ऊँची जाति के मुसलमान या पिछड़ी जाति के ऐसे व्यक्ति, जो ऊँची जाति या हिन्दुओं या मुसलमानों के नेतृत्व वाली पार्टी का उम्मीदवार हो, को वोट देता रहेगा, तब तक दुनिया की कोई शक्ति पिछड़े वर्गों को नहीं बचा सकती। अगर स्वाधीनता के दर्शकों बाद भी ओबीसी, अनुसूचित जातियों व जनजातियों को उनके संवैधानिक अधिकार, विशेषकर वे अधिकार जो उन्हें अनुच्छेद 15(4) व 16(4) द्वारा प्रदत्त किए गए हैं, प्राप्त नहीं हैं तो इसका कारण यह है कि वे ऊँची जातियों के हिन्दुओं व ऊँची जातियों के मुसलमानों को अपना मत और अपना धन, दोनों, देते आ रहे हैं।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2016 अंक में प्रकाशित )

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