पाटीदार आंदोलन : अद्विजों की आवाज

पिछले एक दशक से गैर-द्विज जातियां अपने लिये आरक्षण की मांग कर रही है। ये समुदाय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में द्विज सवर्णों से इतर अपना वजूद बनाने की कोशिश कर रही हैं

जुमलेबाजी, आरक्षण और बीफ  सन 2015 की चर्चित शब्दावली में सबसे प्रमुख थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत वाली भाजपा के लिये यह साल दु:स्वप्न साबित हुआ। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा की करारी हार हुई। दोनों विधानसभा चुनावों में आरक्षण की समीक्षा और बीफ पर संभावित प्रतिबन्ध के मुद्दे और प्रत्येक व्यक्ति के बैंक खाते में 15 लाख रुपये जमा करने के वायदे को जुमला बताना भाजपा को महंगा पड़ा और उसकी हार के प्रमुख कारणों में से एक रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गढ़ गुजरात में सामाजिक तथा राजनीतिक रूप से सशक्त पटेल समुदाय के लाखों लोग अपने समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर हार्दिक पटेल के पीछे लामबंद हो गए। पूरे देश में यह मान्यता थी कि गुजरात में पटेल सबसे संपन्न समुदाय है। इसलिए आश्चर्य भी हुआ कि उसे आरक्षण के लिये आन्दोलन क्यों करना पड़ा? एक समय पटेलों ने आरक्षण का विरोध किया था लेकिन आज वे खुद को पिछड़ा कहने के लिये तैयार हैं। क्या गुजरात में पटेलों का वर्चस्व टूट रहा है? क्या दलित-पिछडे अब सवर्ण समुदाय को शासन-प्रशासन में चुनौती देने लगे हैं? क्या बहुप्रचारित ‘गुजरात माडल’खोखला साबित हुआ है? क्या द्विज (ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया) और गैर-द्विज (मराठा, जाट और पटेल आदि) सवर्णों के हितो में टकराव हो रहा है? इन सबकी पड़ताल करना जरूरी है।

गुजरात के पाटीदार या पटेल अपने को श्रीराम के वंशज मानते हैं। वे मुख्यत: उत्तरी गुजरात और सौराष्ट्र में सकेंद्रित है और राज्य में उनकी कुल आबादी 1.5 करोड़ है। पटेल समुदाय के सबसे बड़े प्रतीक पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल हैं। चूंकि सरदार पटेल मूलत: गुर्जर परिवार से आते थे अत: गुर्जर भी अपने को पटेल मानते है। पाटीदार मुख्यत: दो समुदायों में विभक्त है- लेउवा पाटीदार और कडवा पाटीदार। वे अपने-आप को लव-कुश की संतान मानते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि लेउवा पाटीदार उत्तर Patel community protest in Vadodaraभारत के कुर्मियों के समकक्ष हैं और कडवा पाटीदार कोईरियों के। उत्तर भारत में भी कुर्मी और कुशवाहा अपने को लव-कुश से जोड़ते है। बिहार के वरिष्ठ लेखक प्रेमकुमार मणि ने लव-कुश यानि कुर्मी-कोयरी को जोडऩे की बात कही थी, जिसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वीकार किया था और बिहार चुनावों में इसका फायदा उनकी पार्टी को मिला है।

पटेल समुदाय ने आजादी के आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। सरदार पटेल के नेतृत्व में गुजरात में आन्दोलन में उत्साह से शामिल हुए। आजादी के बाद, गुजरात के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक क्षेत्र में पटेलों की प्रभावी भूमिका रही और वे कांग्रेस को वोट देते रहे। जब पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) गुट बनाकर पटेलों को एकदम किनारे लगा दिया तब वे भाजपा की तरफ मुड़े और उसकी राजनीतिक जड़ें मजबूत कीं। आईआईएम, अहमदाबाद के प्रोफ़ेसर सेबास्टियन माँरिस के अनुसार,  पटेल शूद्र (वर्तमान में पिछड़ा) वर्ग में आते थे। उनका स्थान ब्राह्मण, क्षत्रिय और बनिया से नीचे था। अंग्रेजों की रैय्यतवाड़ी व्यवस्था से पटेलों को काफी उपजाऊ जमीन मिल गयी। 1860 में बडौदा स्टेट में रेल चलने से पटेलों को कपास, तम्बाकू तथा तिलहन के अच्छे दाम मिलने लगे, जिससे उनकी सम्पन्नता में वृद्धि हुई और उनकी सामाजिक हैसियत बेहतर हुई। उन्होंने शहरों में आकर उद्योग-धंधो में हाथ अजमाया, जिसमे वे सफल हुये और विदेश भी गये। लेकिन मूलत: पटेल कृषि पर आधारित शूद्र कौम ही है।

1991 में शुरू हुये निजीकरण और उदारीकरण के दौर ने जहाँ बड़े पूंजीपतियों को और ज्यादा संपन्न बनाया वहीं छोटे तथा मझोले उद्योग तथा कृषि पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा। गुजरात में पटेल समुदाय सर्वाधिक प्रभावित हुआ। प्रख्यात पत्रकार तथा विश्लेषक आकार पटेल लिखते है कि, ‘भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सर्विस सेक्टर की 59 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि गुजरात में 46 फीसदी है। गुजरात में औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 30 प्रतिशत है। मतलब गुजरात,आईटी सेक्टर और उससे सम्बंधित रोजगार में पीछे रह गया,  जिससे बाज़ार में तेजी से आये बदलाव का फायदा गुजरात को नहीं मिला।

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात का नाम बड़ा और दर्शन छोटे थे। प्रख्यात समाजशास्त्री घनश्याम शाह के अनुसार, ”शहरीकरण और तेजी से हो रहे परिवर्तनों से पटेल समुदाय साम्य नहीं रख पाया। वैश्वीकरण के दौर में उनकी छोटी आद्यौगिक इकाइयों को नुकसान पहुंचा है, जिससे पटेल सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षित हुये हैं। इधर गुजरात में औद्योगिक क्षेत्र की विकास दर में भारी गिरावट आई है, जिससे पटेल समुदाय को काफी क्षति हुई है। गाँव से शहर आकर बसे पटेल अब लौटकर गाँव नहीं जाना चाहते। गुजरात माडल से सर्वाधिक दुष्प्रभावित समुदाय पटेलों का है।’

प्रोफ़ेसर सेबास्टियन मारिस के अनुसार, ‘2002-03 के बीच विकास दर बहुत नीचे गिर गयी थी। राष्ट्रीय स्तर पर विकास दर जहाँ 4.5 से 5 प्रतिशत थी वही गुजरात में 3 प्रतिशत थी। 2012 से गुजरात में नकारात्मक विकास दर की राह पर है, जिसे आधिकारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है। इधर रिजर्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने मुद्रास्फीति को कम करने के लिए मुद्रा प्रवाह पर लगाम कसी है, जिसका असर छोटी आद्योगिक इकाइयों पर पड़ा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़े के अनुसार, 2014 में गुजरात में बीमार इकाइयों की संख्या 48,000 थी,  जिनमें से अधिकांश पटेलों की थी। जेएनयू के पूर्व कुलपति वाई.के. अलघ के अनुसार, ‘पटेलों के पास पर्याप्त उपजाऊ जमीनें हैं लेकिन पिछले पांच सालों में कृषि क्षेत्र की नकारात्मक विकास दर के चलते पटेल किसानों का खेती-किसानी से मोहभंग हुआ है। किसान परिवारों की युवा पीढ़ी गाँव छोड़कर शहर आ रही है। इधर विकास का गुजरात माडल रोजगार सृजन नहीं कर पा रहा है। रोजगार के अभाव में युवा पीढ़ी निराश हो रही है।’यह एक महत्वपूर्ण कारण है जिसके चलते पटेल समुदाय की युवा पीढ़ी आरक्षण के लिये सड़कों पर आन्दोलन कर रही है और अपनी आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग कर रही है।

पटेल आरक्षण आन्दोलन की शुरुआत मेहसाणा जिले से हुई जहाँ पटेलों की सर्वाधिक आबादी है। शुरुआत में शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में ओबीसी की तरह आरक्षण की मांग ही थी लेकिन जैसे-जैसे आन्दोलन को समर्थन मिलता गया, उसके नेताओं की मांगें बढ़ती गयीं। पटेल आरक्षण आन्दोलन के प्रमुख नेता ‘पाटीदार अनामत आन्दोलन समिति’के संयोजक हार्दिक पटेल और सरदार पटेल ग्रुप के संयोजक लालजीभाई पटेल थे। 25 अगस्त की रैली के बाद हार्दिक पटेल पटेल, आन्दोलन के शीर्षतम व सर्वमान्य नेता बन गये। हार्दिक पटेल ने आन्दोलन को राष्ट्रीय स्वरुप देने की भी कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारत में पटेलों की संख्या 27 करोड़ है। वे गुर्जर, कुर्मी, मराठा, रेड्डी, कापू, कुडमी और खंडायतो को भी पटेल समुदाय में जोड़ते हैं और नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को अपने समुदाय का मुख्यमंत्री बताते हैं।

25 अगस्त को ‘क्रान्ति रैली’में हार्दिक पटेल ने कहा- ‘हमें आरक्षण मिलेगा। न तो भाजपा न कांग्रेस देगी। हमें सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा है। क्लर्क या चपरासी की नौकरी के लिए 10 से 12 लाख रुपये देने पड़ रहे हैं। कोई एससी, एसटी या ओबीसी का बेटा नौकरी पाता है तो हमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन किसान समुदाय के लड़कों को 90 फीसदी अंक होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलती है, तो उसका विरोध है, चाहे कोई भी सरकार हो। हमने पंजे को उखाड़ फेंका था और 2017 आ रहा है। यदि आरक्षण नहीं मिलेगा तो कमल भी नहीं खिलेगा।’

इस आन्दोलन में शुरू में यह मांग उठी थी कि या तो पटेलों को आरक्षण मिलना चाहिये या किसी को भी नहीं मिलना चाहिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस मुद्दे पर आन्दोलन का समर्थन किया था। संघ ने कहा कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिये। सवर्ण वर्चस्व वाली मीडिया ने भी आन्दोलन पर पूरा फोकस रखा और देश में यह माहौल बनाने की कोशिश की कि अब आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिये, सामाजिक तथा शैक्षणिक पिछड़ापन के आधार पर नहीं। फिर शायद उत्तर भारत में पिछड़ों के लिये लागू आरक्षण को देखकर आन्दोलन के नेताओं ने कहा कि हम जाति के आधार पर आरक्षण चाहते हैं आय के आधार पर नहीं। इसके बाद संघ ने आन्दोलन को समर्थन देना बंद कर दिया। 2 अक्टूबर को हार्दिक पटेल ने दिल्ली में बयान दिया कि संघ आन्दोलन को हथियाना चाहता है। आज पूरा पाटीदार समुदाय भाजपा के खिलाफ लामबंद हो गया है।

पिछले एक दशक से गैर-द्विज जातियां अपने लिये आरक्षण की मांग कर रही है। ये समुदाय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में द्विज सवर्णों से इतर अपना वजूद बनाने की कोशिश कर रही हैं। महाराष्ट्र में मराठों तथा हरियाणा और अखिल भारतीय स्तर पर जाटों द्वारा आरक्षण पाने की असफल कोशिशें की गयी। आज भी नौकरी, प्रशासन और नीति-निर्धारक संस्थाओं में द्विज सवर्णों का वर्चस्व है और गैर-द्विज सवर्णों, दलित-पिछड़ों-आदिवासियों की संख्या नगण्य है। अब बहुजन राजनीति के अगुआ कांशीराम के नारे ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’को लागू करने का समय आ गया है। सभी जातियों को उनकी आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व दे दिया जाये। विकास का माडल सामाजिक न्याय के समावेशी विकास का  माडल होना चाहिये। इस सिद्धांत से ही सही मायनों में ‘सबका साथ-सबका विकास’ होगा।

(फारवर्ड प्रेस के जनवरी, 2016 अंक में प्रकाशित )

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