क्‍या सवर्णों के लिए आरक्षित रहेंगे प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर पद?

शिक्षा का एकाधिकारी वर्ग बहुजन समाज समाज के लोगों को वीसी, डीन, प्रोफेसर, प्रॉक्टर, डॉक्टर, इंजीनियर,लेखक,पत्रकार इत्यादि के रूप में नहीं देखना चाहता है। दुःख तो इस बात का है कि एक भयावह संकट आसन्न देखकर भी आरक्षित वर्गों के नेता आंखें मूदे हुए हैं

BHU-image7 जून को जब एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास की हस्तक्षेप.कॉम में ‘हिन्दू राष्ट्र की तरफ एक और कदम:एसोसियेट व प्रोफ़ेसर पद पर आरक्षण ख़त्म ‘शीर्षक से छपी रिपोर्ट पढ़ा तो स्तब्ध हुए बिना रह सका।

देश के अकादमिक हलकों में ताजा खबर यह है कि यूजीसी ने अपनी ताजा अधिसूचना में कहा है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफ़ेसर व प्रोफ़ेसर के पदों पर आरक्षण न दिया जाय। अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए इन पदों पर आरक्षण जारी रहेगा इससे पूर्व सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ उड़ीसा और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ केरल समेत विभिन्न यूनिवर्सिटियों में इन पदों पर भी ओबीसी को आरक्षण दिया जाता रहा है, जबकि दिल्ली यूनिवर्सिटी व जेएनयू में इसके लिए संघर्ष जारी था। यह नया घटनाक्रम बहुत चिन्ताजनक है तथा न सिर्फ मनुवाद की स्थापना की दिशा में उठाया गया कदम है, बल्कि वंचित समुदायों में फूट डालने की रणनीति का भी हिस्सा प्रतीत होता है। गौरतलब है एक आरटीआई के अनुसार केंद्रीय विश्विद्यालयों में प्रोफ़ेसर पद पर ओबीसी समुदाय से आने वालों की, संख्या उँगलियों पर गिनने लायक है। जो सिरे से आरक्षण विरोधी हैं और निजीकरण का सिर्फ इसलिए समर्थन कर रहे हैं कि निजी क्षेत्र में आरक्षण और कोटा नहीं है, उनके लिए यह बहुत बड़ी खुशखबरी है।

योजनाबद्ध ढंग से शिक्षा अब क्रयशक्ति के आधार पर खरीदी जाती है और इसकी अर्थव्यवस्था सेल्फ फायनेसिंग है, यानी अभिभावक मर खप कर पैसे का इंतजाम करें या छात्र सीधे बाजार या बैंक या नियोक्ताओं के पास अपना भविष्य गिरवी रखकर उच्चशिक्षा के साथ रोजगार हासिल करें। कहीं भी कोई स्क्रीनिंग नहीं है और माध्यमिक, उच्च माध्यमिक परीक्षाओं में थोक के भाव सौ फीसद से लेकर अस्सी फीसद तक अंक हासिल करके सरकारी संस्थानों में स्थानाभाव की वजह से निजी संस्थानों मे महज क्रयशक्ति के आधार पर करोड़ों बच्चे दाखिला ले रहे हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे या तो सत्ता वर्ग से किसी न किसी तरीके से नत्थी है या जाति से सवर्ण हैं या बहुजनों के मलाईदार तबके के बच्चे ये हैं। इन संस्थानों की फीस और फीस के अलावा दूसरे खर्च इतने अधिक हैं कि माध्यमिक उच्चमाध्यमिक तक अंग्रेजी सीखकर नौकरी पाने की जुगत में सब कुछ दांव पर लगाकर,  जो आम लोग अपने बच्चों को शत फीसद से लेकर अस्सी फीसद तक अंक हासिल करते देख फूला न समाये, उनकी औकात इन संस्थानों के स्वयंवित्त पोषित वातानुकूल बाड़ेबंदी में घुसने की होती नहीं है और क्रमशः जल जंगल जमीन आजीविका नौकरी और नागरिकता से भी वंचित इन बहुसंख्य आम लोगों के बच्चे इस अभूतपूर्व मेधा बाजार में घुस ही नहीं सकते। पूरा खेल संपन्न और नवधनाढ्य वर्ग के लोगों की जेब काटने का है,जो इस बंदोबस्त के सबसे बड़े समर्थक हैं तथा आरक्षण और कोटा के अंधविरोध में निजीकरण, विनिवेश, विनियमन और विनियंत्रण के अबाध आखेटगाह में अपने बच्चों को खुशी- खुशी बलि चढ़ाने को तैयार हैं,  ताकि बहुजनों के बच्चों को उनके बच्चों के मुकाबले कोई मौका ही न मिले।’

इस रिपोर्ट को पढने बाद परेशान होकर दिन भर सोशल मीडिया जानकारी बटोरता पर रहा। अंततः 8 जून की सुबह सोशल मीडिया पर यह खबर पढ़कर थोड़ी राहत मिली कि राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के हस्तक्षेप के बाद मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने इस अधिसूचना को वापस ले लिया है। थोड़ी देर बाद जब फेसबुक पर फॉरवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन का यह पोस्ट पढ़ा ,कुछ देर पहले मिली राहत जाती रही। उन्होंने लिखा था, “गत 3 जून को यूजीसी ने एक पत्र जारी laluकर अन्य पिछडा वर्ग को प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर आरक्षण नहीं देने का निर्देश दिया था। इस संबंध में पिछडा, दलित व आदिवासी समाज की ओर से तीखी प्रति‍क्रिया आते ही कल पटना में लालू प्रसाद ने प्रेस कांफ्रेंस की तथा अपने अंदाज में इसके विरोध में आंदोलन करने की चेतावनी दी। आनन-फानन में कल यूजीसी ने एक पत्र जारी कर कहा है कि ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछडा वर्ग के लिए फैकल्टी पदों पर आरक्षण नियमों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है’। यूजीसी ने कहा कि आरक्षण नियमों का पालन उसके 24 जनवरी, 2007 के पत्र के अनुसार किया जाए। लेकिन यूजीसी ने इसमें कहीं नहीं कहा कि अन्य पिछडा वर्ग को प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर पूर्ववत आरक्षण दिया जाए, जैसा कि सिक्किम सेंट्रल यूनिवर्सिटी, उडीसा सेंट्रल यूनिवर्सिटी, केरल सेंट्रल यूनिवर्सिटी आदि द्वारा जारी विज्ञापनों में दिया गया था।

वस्तुत: यूजीसी का यह दूसरा पत्र एक विशुद्ध छल है। 2007 ही नहीं, 2011 में भी जब सुखदेव थोराट यूजीसी के चेयरमैन थे, तब भी यूजीसी ने ऐसे पत्र जारी कर ओबीसी आरक्षण की गलत व्याख्या  प्रस्तुत की थी। यूजीसी ने अपने उसी पत्र का हवाला भर दिया है, जिसके अनुसार ओबीसी को इन पदों पर आरक्षण नही दिया जाना है, क्योंकि ये कथित तौर पर ‘इंट्री लेवल’ के पद नहीं हैं।

लेकिन लालू प्रसाद तो लालू प्रसाद हैं।उन्हें लगा कि उनकी राजनीति रंग लायी।उन्होंने गर्वपूर्वक ट्विट किया कि ‘ केंद्र को कल ही चेताया था और कल ही रोल बैक कर लिया। ‘क्या रोल बैक कर लिया गया? यूजीसी का 2007 का पत्र क्या है? इन सवालों से तो जैसे उनका कोई वास्ता ही नहीं है। काश, अन्य पिछडा वर्ग के पास इन बारीकियों पर नजर रखने वाले राजनेता होते, जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों के पास हैं।या कम्युनिस्ट पार्टियां ही यह समझ पातीं कि आज अगर मार्क्स होते तो क्या वे निरंतर और दरिद्र होते जाते, सदियों से वंचित इन समूहों के पक्ष में खडा होना पसंद नहीं करते?”

फेसबुक पर विचरण करते-करते मेरी दृष्टि सुप्रसिद्ध पत्रकार दिलीप मंडल के पोस्ट पर स्थिर हो गयी। उन्होंने लिखा था, ‘बात 3 जून के ओबीसी विरोधी नोटिस को 7 जून को वापस लेने की नहीं है।बात ब्राह्मणवादी कमीनेपन की है, जिसे संघ आगे बढ़ा रहा है। वह कौन लोग हैं,जिनकी शह पर 3 जून का नोटिस आया? क्या नरेंद्र मोदी में ऐसे लोगों को बर्खास्त करने का साहस है? क्या नरेंद्र मोदी मनुस्मृति ईरानी से पूछेंगे कि यह नोटिस क्यों आया? इस गंदी नीयत के होते ओबीसी का भला कभी नहीं हो पाएगा। आप नजर रखिए और मेरा दावा है कि एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के अगले किसी भी विज्ञापन में ओबीसी रिजर्वेशन नहीं होगा।आप मुझसे शर्त लगा सकते हैं।’

यूजीसी की नयी अधिसूचना देश के विशिष्ट बहुजन बुद्धिजीवियों की राय देखने के बाद आरक्षित वर्गों को यह बात गांठ लेनी होगी कि उच्च शिक्षा से उनके सफाए की तैयारी हो चुकी है।इससे यूजीसी की ताज़ी अधिसूचना में सुरक्षित दिख रहे एससी/एसटी भी नहीं बचने वाले हैं।

दरअसल उच्च शिक्षा में आरक्षित वर्गों के लिए स्थितियां और परिस्थितियां बन या बनाई जा रही है,उसके मूल में केंद्र की वह सरकार है जो भारत को मंडल पूर्व युग में ले जाने के लिए आमादा होती दिख रही है। इसके शह पर ही शिक्षा में ऐसे-ऐसे बदलाव किये जा रहे हैं जो सिर्फ इस देश के परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न वर्ग के अनुकूल हो।परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त तबकों के हितों की चैम्पियन मौजूदा सरकार का हिडेन अजेंडा आरक्षण का खात्मा है।इसी का शह पाकर गत अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने एक याचिकापर सुनवाई करते हुए उच्च शिक्षण संस्थानों में मोदी सरकार को आरक्षण ख़त्म करने की हिदायत दे दी थी।शायद सुप्रीम कोर्ट की उस हिदायत से उत्साहित हो कर हाल ही में एक विश्वविद्यालय ने 84 में से 83 सीटों को अनारक्षित कर उस पर ब्राह्मण जाति के लोगों की नियुक्ति कर ली थी।असंभव नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश से ही प्रेरित होकर यूजीसी ने नई अधिसूचना जारी कर दी है।

smriti_bhagwatबहरहाल उच्च शिक्षा में जो खेल चल रहा है उसे देखते हुए आरक्षित वर्ग जितना जल्दी यही अप्रिय सच्चाई महसूस कर लेगा उतना ही प्रतिरोध करने की स्थिति में रहेगा कि एक निहायत ही बहुजन विरोधी सरकार का प्रश्रय पाकर उच्च शिक्षण संस्थाओं को संचालित करने वाले सवर्ण वीसी,डीन,प्रोफ़ेसर,प्रॉक्टर ही नहीं,सवर्ण अभिभावक,साधु-संत,मीडिया-बुद्धिजीवी,जज-वकील,उद्योगपति-व्यापारी,अधिकारी और नेता सभी ही हजारों साल से शिक्षा से बहिष्कृत रहे दलित,आदिवासी,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को उच्च शिक्षा से बाहर करने के लिए लामबंद हो रहे हैं।ऐसा लगता है शिक्षा का अधिकारी वर्ग गुलाम भारत का इतिहास आजाद भारत में भी दोहराने का मन बना लिया है।स्मरण रहे गुलाम भारत में अंग्रेजों के सौजन्य से शिक्षालयों से बहिष्कृत जातियों के शिक्षार्जन का अवसर जिस तरह ब्राह्मणों की अगुआई में सवर्णों ने प्रायः पूरी तरह व्यर्थ कर दिया था,उसी तरह आजाद भारत में संविधान विधान के जरिये उच्च शिक्षा में मिले अध्ययन-अध्यापन के अवसर को व्यर्थ करने की तैयारी चल रही है।गुलाम भारत में ब्राह्मणों में एक तरह से बल पूर्वक शिक्षा के सारे अवसरों पर कब्ज़ा जमा लिया था,अब आजाद भारत की उच्च शिक्षा में वीसी,डीन,प्रोफ़ेसर,प्रॉक्टर,रजिस्ट्रार इत्यादि के प्रायः 90 प्रतिशत पदों पर कब्ज़ा जमाकर लोकतंत्र का खुला मजाक उड़ाने वाले ब्राह्मण-सवर्ण मीडिया,न्यायपालिका में हावी ब्राह्मणों को संगी बना कर उच्च शिक्षा में संविधान प्रदत अवसरों को बेकार करने का मन बना लिए हैं।इन्हें गाँधी की भांति बहुजनों की उतनी ही शिक्षा काम्य है जिससे वे तीसरे,चौथे दर्जे का काम ठीक-ठाक तरीके से कर सकें। शिक्षा का एकाधिकारी वर्ग बहुजन समाज के लोगों को वीसी,डीन,प्रोफेसर,प्रॉक्टर,डॉक्टर ,इंजीनियर,लेखक,पत्रकार इत्यादि के रूप में नहीं देखना चाहता है। दुःख तो इस बात का है कि एक भयावह संकट आसन्न देखकर भी आरक्षित वर्गों के नेता आंखें मूदे हुए हैं।

ऐसे में यदि बहुजन समाज के लोग उच्च शिक्षा में चल रही साजिश की काट करना चाहते हैं तो मरता क्या न करता की तर्ज पर अब बिना देर किये एजुकेशन डाइवर्सिटी के लिए कमर कसने से भिन्न उनके समक्ष कोई अन्य विकल्प नहीं है।उच्च शिक्षा एजुकेशन डाइवर्सिटी का अर्थ हुआ विश्वविद्यालयों के अध्ययन-अध्यापन और प्रशासनिक विभाग में भारत की सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन, अर्थात भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूहों-(1)-सवर्ण,(2)-ओबीसी,(3)-धार्मिक अल्पसंख्यकों और (4)- एससी/एसटी-)के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में उपरोक्त क्षेत्रों में अवसरों का बंटवारा।मसलन डीयू/जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय हों या आईआईटी,आईआईएम,एम्स जैसे हाई प्रोफाइल संस्थान,वहां एडमिशन और टीचिंग में जिस सामाजिक समूह का जो जनसंख्यानुपात है उसमें आधा अवसर उस समाज के पुरुषों को और आधा उसकी महिलाओं को मिले।ऐसा करने पर उच्च शिक्षण संस्थाओं का प्रजातंत्रीकरण हो जायेगा,जिससे सभी सामाजिक समूहों के स्त्री-पुरुषों को समान अवसर मिलेगा। वीसी,प्रोफ़ेसर,डीन और प्रॉक्टर,एसोसियेट प्रोफ़ेसर,प्रोफ़ेसर इत्यादि के पदों के बंटवारे में भी यह विविधता अनिवार्य रूप से दिखनी चाहिए।

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